मनोरंजन
काजी तौकीर के सपोर्ट में उतरीं सारा आफरीन खान, कहा- शो में चल रहा है उनके खिलाफ गेम
रियलिटी शो ‘बिग बॉस 20’ के हालिया एपिसोड में तीखी बहस और विवाद देखने को मिला। शो के दौरान आसिफ खान ने काजी तौकीर पर हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया और इस मुद्दे पर वह काफी नाराज नजर आए। आसिफ की तीखी प्रतिक्रिया पर टीवी होस्ट और अभिनेत्री सारा आफरीन खान ने भी आपत्ति जताई।
दरअसल, यह विवाद हालिया एपिसोड के प्रसारण के बाद चर्चा में आया। एपिसोड में एक बातचीत या टास्क के दौरान काजी तौकीर ने मजाकिया अंदाज में कहा था, “मुझे दिल का दौरा पड़ रहा है।”
बताया जाता है कि आसिफ खान पहले हृदय संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर चुके हैं। ऐसे में उन्होंने काजी की टिप्पणी को व्यक्तिगत रूप से लिया और इसे अपनी बीमारी का मजाक समझा। हालांकि, काजी ने बार-बार स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य आसिफ या उनकी स्वास्थ्य स्थिति का उपहास करना नहीं था। उन्होंने अपनी बात के लिए कई बार माफी भी मांगी। इसके बावजूद दोनों के बीच तनाव बना रहा और आसिफ का गुस्सा शांत नहीं हुआ। बहस के दौरान उन्होंने काजी के प्रति कड़ी टिप्पणियां भी कीं।
अब इस मामले पर सारा आफरीन खान का कहना है कि काजी तौकीर को शो में बहुत ज्यादा टारगेट और अटैक किया जा रहा है। सारा ने यह भी कहा कि अच्छे और सीधे लोगों पर हमेशा ऐसे हमले होते रहते हैं और यह जिंदगी का एक हिस्सा है।
सारा आफरीन खान ने इंस्टाग्राम स्टोरीज पर वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘बिग बॉस 20’ के अंदर काजी के खिलाफ गेम चल रहा है और घर के सदस्य आसानी से उन्हें निशाना बना रहे हैं।
वीडियो में वह कहती हैं, “शो में दिखाया गया है कि काजी किसी बात पर मस्ती-मजाक में कह रहे हैं, कि उन्हें दिल का दौरा पड़ जाएगा। उन्हें आसिफ की स्वास्थ्य समस्या के बारे में पता भी नहीं था। मैं मानती हूं कि यह किसी भी व्यक्ति की हेल्थ कंडीशन के लिए बहुत सीरियस बात है, लेकिन कभी-कभी हम मस्ती मजाक में ऐसी बातें बोल देते हैं। काजी की बात सुनकर आसिफ उन पर चिल्लाने लगे।”
अभिनेत्री ने काजी का समर्थन करते हुए कहा, “जैसे ही काजी को आसिफ की हेल्थ कंडीशन के बारे में पता चला उन्होंने माफी भी मांगी, लेकिन आसिफ रुके नहीं। वह काजी को और ज्यादा उकसाने लगे। मुझे लगता है कि काजी के साथ इस तरह का बर्ताव सहनीय नहीं है, क्योंकि उन्हें दिन-ब-दिन शो में बस टारगेट किया जा रहा है।”
अभिनेत्री ने आखिरी में कहा कि वह काजी का समर्थन करती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि शो में सबसे समझदार, एंटरटेनिंग और सहनशील कंटेस्टेंट काजी ही हैं।
मनोरंजन
रसिका दुग्गल ने की बच्चों के लिए फिल्में बनाने की अपील, कहा- उनकी जिज्ञासा को अपनाना जरूरी

अभिनेत्री रसिका दुग्गल का कहना है कि ‘लिटिल थॉमस’ जैसी फिल्में बच्चों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऐसी कहानियां उन्हें अपने अनुभवों और भावनाओं से जोड़ने का अवसर देती हैं। फिल्म में वह जेसी मिरांडा के किरदार में नजर आ रही हैं।
अभिनेत्री का कहना है कि इस तरह की कहानी बच्चों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उन्हें सवाल पूछने, कल्पना करने और अपने आसपास की दुनिया को समझने पर आजादी देंगी। उन्होंने कहा, “सिनेमा आपकी दुनिया को बड़ा करने और कल्पना को बढ़ावा देने का एक शानदार तरीका है। बड़े होने पर हमारे मन में जो कई विचार आते हैं, उनका कनेक्शन अक्सर बचपन में देखी गई फिल्मों से होता है।”
बच्चों के लिए अच्छी फिल्मों की जरूरत पर बात करते हुए रसिका ने कहा, “इसलिए हमें ऐसी फिल्मों की जरूरत है, जिनसे बच्चे खुद को जोड़ सकें। ऐसी फिल्में उनकी जिज्ञासा को नजरअंदाज करने के बजाय उसे अपनाएं।”
रसिका ने कहा कि बच्चों के लिए फिल्में बिना हल्की-फुल्की हुए भी मनोरंजक हो सकती हैं। एक्ट्रेस ने कहा, “इस तरह की फिल्में भी बच्चों का मनोरंजन कर सकती हैं। मैं चाहूंगी कि ज्यादा से ज्यादा फिल्ममेकर ऐसी कहानियों को एक्सप्लोर करें जिन्हें बच्चे एन्जॉय कर सकें और जो उनकी कल्पना के लिए नई संभावनाएं खोलें।”
कौशल ओझा द्वारा निर्देशित यह फिल्म 1990 के दशक के गोवा में सात साल के थॉमस और उसके परिवार के जीवन के उतार-चढ़ाव को दिखाती है, जो मालगुडी डेज और रस्किन बॉन्ड की कहानियों की याद दिलाती है। फिल्म में गुलशन देवैया, रसिका दुग्गल और बाल कलाकार हृदांश पारेख मुख्य भूमिकाओं में हैं।
अभिनेत्री रसिका दुग्गल फिल्म में थॉमस की मां ‘जेसी मिरांडा’ का किरदार निभा रही है। जेसी मिरांडा एक ऐसी मां हैं जिनकी दुनिया उनके परिवार, उनकी बेकरी और संगीत के प्रति उनके प्रेम के इर्द-गिर्द घूमती है।
फिल्म में दुनिया को एक बच्चे की नजर से देखने का प्रयास किया गया है, जहां बचपन की जिज्ञासाओं से जन्म लेने वाले सहज और अनपेक्षित बातचीत को प्रमुखता दी गई है। लिटिल थॉमस इसी दृष्टिकोण को पर्दे पर प्रस्तुत करती है। इसकी कहानी एक ऐसे पारिवारिक परिवेश के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक बच्चे के मासूम सवाल और उनके उत्तर जानने की उसकी जिद कई दिलचस्प परिस्थितियां पैदा करती है।
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बर्लिन से टोरंटो तक पहुंची श्वेता त्रिपाठी की फिल्म, कहा- प्रोड्यूसर बनने के बाद कहानी को देखने का बदला नजरिया

एक्ट्रेस श्वेता त्रिपाठी इन दिनों अपनी फिल्म ‘मुझे जान ना कहो मेरी जान’ को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और मार्केट तक ले जा रही हैं। इस साल की शुरुआत में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से सफर शुरू करने वाली उनकी बतौर प्रोड्यूसर पहली फीचर फिल्म अब टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (टीआईएफएफ) 2026 तक पहुंच गई है।
श्वेता का कहना है कि प्रोड्यूसर बनने के बाद कहानी को देखने का उनका नजरिया बदल गया है। अब वह सिर्फ फिल्म बनाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि यह भी सोचती हैं कि फिल्म किन लोगों तक पहुंचेगी और इसके जरिए किस तरह की बातचीत शुरू हो सकती है।
श्वेता ने कहा, ”आप जिस फिल्म पर भरोसा करते हैं, उसे किसी इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म तक ले जाना अपने आप में खास होता है। खासकर तब, जब बतौर प्रोड्यूसर यह आपकी पहली फीचर फिल्म हो। बर्लिन से टोरंटो तक का सफर मेरे लिए बेहद खास रहा है, क्योंकि इस दौरान मुझे ‘मुझे जान ना कहो मेरी जान’ को एक अलग तरीके से पेश करने का मौका मिला।”
उन्होंने आगे कहा, ”जब आप फिल्म को बनाने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर देखते हैं, तो आपके मन में यह सवाल आने लगते हैं कि फिल्म किन लोगों तक पहुंचेगी, इसके जरिए किस तरह की बातचीत शुरू हो सकती है और आगे इसके लिए क्या-क्या संभावनाएं हैं। यह मेरे लिए सीखने का शानदार अनुभव रहा है और मैं यह देखने के लिए उत्साहित हूं कि इस सफर का फिल्म के लिए क्या मतलब निकलता है।”
श्वेता त्रिपाठी ने बताया कि बतौर प्रोड्यूसर काम करने से उन्हें कहानी कहने के तरीके को एक नए नजरिए से समझने का मौका मिला है। उन्होंने कहा, ”प्रोड्यूसर बनने के बाद कहानी कहने को लेकर मेरा नजरिया बदल गया है। एक एक्टर के तौर पर आप किसी किरदार और कहानी को पर्दे पर जीवंत करने में पूरी तरह जुटे रहते हैं।”
उन्होंने कहा, ”प्रोड्यूसर के तौर पर आपको यह भी देखना होता है कि फिल्म बनने के बाद उसका सफर कैसा होगा, कौन लोग इससे जुड़ सकते हैं और आप फिल्म को उसके दर्शकों तक पहुंचाने के लिए किस तरह मौके बना सकते हैं। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और मार्केट ऐसे लोगों को एक साथ लाते हैं, जो इन संभावनाओं को हकीकत में बदलने में मदद कर सकते हैं। अपनी पहली प्रोडक्शन को इन प्लेटफॉर्म पर पेश कर पाना मेरे लिए एक अहम कदम रहा है।”
नेशनल अवॉर्ड जीत चुके फिल्ममेकर संजय नाग के निर्देशन में बनी ‘मुझे जान ना कहो मेरी जान’ में तिलोत्तमा शोम और श्वेता त्रिपाठी नजर आएंगी। यह एक क्वीर लव स्टोरी है, जिसमें प्यार और इंसानी रिश्तों को ईमानदारी और बारीकी से दिखाने की कोशिश की गई है।
बतौर प्रोड्यूसर श्वेता का सफर थिएटर से शुरू हुआ था। साल 2010 में उन्होंने अपनी थिएटर प्रोडक्शन कंपनी ‘ऑलमाइटी’ की शुरुआत की थी। इसकी पहली प्रस्तुतियों में ब्रिटिश नाटककार माइक बार्टलेट का क्वीर ड्रामा ‘कॉक’ शामिल था। माइक बार्टलेट ओलिवियर अवॉर्ड जीत चुके हैं।
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तीन-चार साल की उम्र में पुलिस के चक्कर में फंस गई थीं उमा थर्मन, लाल हाई हील्स खरीदने के लिए घर से चुराए थे पैसे

हॉलीवुड एक्ट्रेस उमा थर्मन ने बचपन का एक ऐसा किस्सा शेयर किया है, जिसके जिक्र से आज भी उन्हें अपना डर याद आ जाता है। एक्ट्रेस ने बताया कि जब वह महज तीन या चार साल की थीं, तब लाल रंग की हाई हील्स खरीदने के लिए उन्होंने घर से 75 सेंट चुरा लिए थे।
वह अकेले जूते की दुकान पर पहुंच गईं और दुकानदार को पैसे देकर जूते खरीदने की कोशिश की। लेकिन दुकानदार को शक हो गया कि इतनी छोटी बच्ची अकेले कैसे आई है। इसके बाद पुलिस को बुलाया गया और उमा को लगा कि अब उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
उमा थर्मन ने यह किस्सा जिमी फैलन के शो ‘द टुनाइट शो विद जिमी फैलन’ में सुनाया।
उन्होंने कहा, ”मेरा परिवार मैसाचुसेट्स के एमहर्स्ट शहर में शिफ्ट हुआ था। मेरे पिता वहां टीचर थे। नए शहर में पहुंचते समय मेरी नजर एक जूते की दुकान की खिड़की में रखी लाल रंग की हाई हील्स पर पड़ी थी। उस वक्त मैं करीब तीन या चार साल की थी और मुझे उन जूतों को देखकर खरीदने का मन हो गया।”
एक्ट्रेस ने आगे कहा, ”अगले दिन मेरी मां दोपहर में सो रही थीं, तभी मैंने टेबल से करीब 75 सेंट उठाए और अकेली ही जूते खरीदने निकल पड़ी। मुझे दुकान का रास्ता याद था, इसलिए मैं वहां पहुंच भी गई। दुकान में मैंने जूते पहने और दुकानदार को भरोसा दिलाया कि मेरी मां भी आने वाली हैं। सब कुछ ठीक चल रहा था। मैंने जूते ट्राई किए, और फिर दुकानदार को 75 सेंट दे दिए। लेकिन दुकानदार को मेरी बात पर भरोसा नहीं हुआ।”
एक्ट्रेस ने कहा, ”मुझसे दुकानदार ने पूछताछ शुरू कर दी। वह समझ गया था कि इतनी छोटी बच्ची की मां शायद दुकान पर आने वाली नहीं है। उसने वहां पुलिस वालों को बुला लिया। पुलिसवालों ने मुझसे मेरे घर का पता पूछा, लेकिन मुझे मेरे घर की सड़क का नाम तक नहीं पता था। मैंने पुलिसवालों से कहा कि मैं खुद घर लौट जाऊंगी, क्योंकि मेरा घर पास में ही है। हालांकि, पुलिस ने मेरी बात नहीं मानी और मुझे अपने साथ ले गई।”
उमा ने कहा, ”मुझे आज भी यह घटना अच्छी तरह याद है, क्योंकि उस दिन मैं अपनी जिंदगी में पहली बार इतना डरी थी। मुझे सच में लग रहा था कि पुलिस मुझे गिरफ्तार करने जा रही है। पुलिस का एक अधिकारी मुझे अपनी गोद में लेकर गाड़ी में बैठा हुआ था। पुलिस की गाड़ी शहर में घूमती रही, लेकिन अब मैं अपना घर पहचान नहीं पा रही थी।”
उमा ने कहा, ”कुछ देर बाद मुझे सड़क पर अपनी मां दिखाई दी। वह घबराकर सड़क पर चिल्ला रही थीं। उन्हें देखते ही पुलिसवालों को समझ आ गया कि यही बच्ची की मां हैं।”
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