व्यापार
मारुति सुजुकी इंडिया बायोगैस प्रोजेक्ट्स में 150 करोड़ रुपए का निवेश करेगी, ग्रीन एनर्जी को मिलेगा बढ़ावा
नई दिल्ली, 5 जून: देश की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड ने शुक्रवार को दो बड़े बायोगैस प्रोजेक्ट्स में कुल 150 करोड़ रुपए निवेश करने का ऐलान किया। इसके जरिए कंपनी की कोशिश देश में सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग और क्लीन एनर्जी इकोसिस्टम अपनाने को बढ़ावा देना है।
कंपनी ने कहा कि वह हरियाणा के खरखोदा स्थित अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में 10 टन प्रति दिन की क्षमता वाला एक नया बायोगैस प्लांट स्थापित करेगी।
इस प्रोजेक्ट के चालू वित्त वर्ष में शुरू होने की उम्मीद है। इसके अलावा, मारुति सुजुकी ने मानेसर स्थित अपने मौजूदा बायोगैस प्लांट की क्षमता को 0.2 टन प्रति दिन से बढ़ाकर 0.7 टन प्रति दिन कर दिया है।
कार निर्माता कंपनी ने कहा कि ये पहल सरकार के ‘बेस्ट से वेल्थ’ मिशन के अनुरूप हैं और इनका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और अपने सभी परिचालनों में रिन्यूएबल एनर्जी सॉल्यूशंस को बढ़ावा देना है।
कंपनी के अनुसार, आगामी खरखोदा बायोगैस प्लांट पूरी क्षमता से चलने पर प्रति वर्ष लगभग 9,490 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगा।
इस प्लांट से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की कुल गैस आवश्यकता का लगभग 20 प्रतिशत पूरा होने की उम्मीद है।
इन पहलों पर टिप्पणी करते हुए, प्रबंध निदेशक और सीईओ हिसाशी ताकेउची ने कहा कि कंपनी जीवाश्म ईंधन की खपत और आयातित तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए लगातार प्रयासरत है।
उन्होंने कहा, “ऐसे समय में जब दुनिया ऊर्जा के बढ़ते अनिश्चित परिदृश्य का सामना कर रही है, ऐसी पहल का महत्व और भी बढ़ जाता है।”
ताकेउची ने आगे कहा, “भारत के प्रधानमंत्री द्वारा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के आह्वान के मद्देनजर, हमारे द्वारा बायोगैस प्रोजेक्ट को चालू करने का यह एक सही समय है। यह हमें कई अन्य चल रहे प्रयासों के साथ-साथ वर्तमान राष्ट्रीय प्राथमिकता में एक छोटा लेकिन सार्थक योगदान देने में सक्षम बनाता है।”
इस अतिरिक्त मानेसर में विस्तारित बायोगैस प्लांट से प्रति वर्ष लगभग 3.6 लाख मानक घन मीटर बायोगैस उत्पन्न होने का अनुमान है।
कंपनी का अनुमान है कि इस परियोजना से प्रति वर्ष लगभग 664 टन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी।
मानेसर प्लांट में खाद्य अपशिष्ट, नेपियर घास और धान के भूसे का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है और पशुओं के गोबर का उपयोग करके उत्पादन को और बढ़ाया जा सकता है।
व्यापार
आरबीआई ने अतिरिक्त तरलता के बीच वीआरआरआर नीलामी के माध्यम से अवशोषित किए 2.23 लाख करोड़ रुपए

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शुक्रवार को कहा कि उसने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने और अल्पकालिक मुद्रा बाजार दरों को रेपो दर के अनुरूप बनाए रखने के लिए वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (वीआरआरआर) नीलामी के माध्यम से 2.23 लाख करोड़ रुपए अवशोषित किए हैं।
आरबीआई द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 2.25 लाख करोड़ रुपए की निर्धारित राशि के मुकाबले उसे 2,22,629 करोड़ रुपए की बोलियां प्राप्त हुईं और केंद्रीय बैंक ने सभी बोलियों को स्वीकार कर लिया। यह राशि 5.24 प्रतिशत की भारित औसत दर पर अवशोषित की गई।
आरबीआई पिछले महीने से लगातार वीआरआरआर नीलामियां आयोजित कर रहा है, ताकि बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त तरलता को कम किया जा सके और ओवरनाइट मनी मार्केट दरों को नीतिगत रेपो दर के साथ संतुलित रखा जा सके।
केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 17 सितंबर तक बैंकिंग प्रणाली में लगभग 6.94 लाख करोड़ रुपए की अधिशेष तरलता मौजूद थी।
यह ताजा कार्रवाई एक दिन पहले की गई ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) नीलामी के बाद हुई है, जिसके तहत आरबीआई ने 50,000 करोड़ रुपए की सरकारी प्रतिभूतियां बेची थीं।
इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने अपनी व्यापक तरलता प्रबंधन रणनीति के तहत 21 सितंबर और 28 सितंबर को 25,000-25,000 करोड़ रुपए की दो अतिरिक्त ओएमओ बिक्री भी निर्धारित की है।
इस सप्ताह की शुरुआत में भी आरबीआई ने एक अन्य वीआरआरआर नीलामी के जरिए 3.93 लाख करोड़ रुपए की नकदी अवशोषित की थी। उस नीलामी में 5 लाख करोड़ रुपए की निर्धारित राशि के मुकाबले 3,93,352 करोड़ रुपए की बोलियां प्राप्त हुई थीं और पूरी राशि को 5.24 प्रतिशत की कट-ऑफ तथा भारित औसत दर पर स्वीकार किया गया था।
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 11 सितंबर तक बैंकिंग प्रणाली में अधिशेष तरलता करीब 10.73 लाख करोड़ रुपए थी। इससे संकेत मिलता है कि हाल के दिनों में केंद्रीय बैंक की तरलता अवशोषण कार्रवाइयों के कारण अतिरिक्त नकदी में कुछ कमी आई है।
व्यापार
पीयूष गोयल ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए कनाडा के मंत्री मनिंदर सिद्धू से की मुलाकात

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू के साथ भारत-कनाडा व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) को आगे बढ़ाने के संबंध में एक सार्थक बैठक की।
गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि दोनों पक्षों ने अपने नेतृत्व की उस प्रतिबद्धता को दोहराया है जिसके तहत सीईपीए वार्ताओं को तेजी से पूरा कर जल्द से जल्द समझौते को अंतिम रूप देने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि इससे वस्तुओं, सेवाओं और निवेश सहित कई क्षेत्रों में नए अवसर खुलेंगे।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भारत-कनाडा सीईपीए का शीघ्र निष्कर्ष दोनों देशों के साझा लक्ष्य को साकार करने में मदद करेगा। इससे द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और भारत-कनाडा आर्थिक साझेदारी को आपसी लाभ के लिए और मजबूत किया जा सकेगा।
इस सप्ताह भारत और कनाडा ने प्रस्तावित सीईपीए के लिए नई दिल्ली में चौथे दौर की वार्ता शुरू की। दोनों देशों का लक्ष्य इस वर्ष के अंत तक समझौते को अंतिम रूप देना है।
पांच दिनों तक चली इन वार्ताओं में वस्तुओं का व्यापार, सेवाएं, मूल नियम (रूल्स ऑफ ओरिजिन) और तकनीकी व्यापार बाधाएं जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से शामिल रहे। इससे पहले तीसरा दौर जुलाई में कनाडा की राजधानी ओटावा में आयोजित किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इसी वर्ष मार्च में नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान सीईपीए वार्ताओं को वर्ष के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया था। दोनों नेताओं ने ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई थी।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और कनाडा के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 8.66 अरब डॉलर रहा, जबकि कनाडा को भारत का निर्यात 4.22 अरब डॉलर तक पहुंचा।
कनाडा को भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों में दवा उत्पाद, मशीनरी एवं यांत्रिक उपकरणों के पुर्जे, लोहे और इस्पात से बने उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कार्बनिक रसायन, आभूषण, रत्न एवं कीमती पत्थर, परिधान एवं वस्त्र, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग उत्पाद और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं।
वहीं कनाडा से भारत के प्रमुख आयातों में दालें, उर्वरक, खनिज ईंधन, लकड़ी का पल्प, रत्न एवं कीमती पत्थर, विमान के पुर्जे, मशीनरी के हिस्से तथा लोहा और एल्युमीनियम स्क्रैप शामिल हैं।
सेवा क्षेत्र में भारत का आईटी उद्योग कनाडा को सेवाओं के निर्यात में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बना हुआ है। सीईपीए के लागू होने से दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को और अधिक गति मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय समाचार
भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह 13 प्रतिशत बढ़कर 12.12 लाख करोड़ रुपए पहुंचा

भारत का प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष में अब तक (1 अप्रैल से 17 सितंबर तक) सालाना आधार पर 13 प्रतिशत बढ़कर 12.12 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। यह जानकारी केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) की ओर से शुक्रवार को दी गई।
सरकारी डेटा के मुताबिक, सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह सालाना आधार पर 15 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 14.3 लाख करोड़ रुपए हो गया है।
कॉर्पोरेट कर संग्रह 19.48 प्रतिशत बढ़कर लगभग 5.56 लाख करोड़ रुपए हो गया है, जबकि व्यक्तिगत आयकर और हिंदू अविभाजित परिवारों (एचयूएफ) से होने वाला कर संग्रह 6 प्रतिशत बढ़कर 6.16 लाख करोड़ रुपए से अधिक पहुंच गया है।। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में, 1 अप्रैल से 17 सितंबर के बीच सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) संग्रह 53 प्रतिशत बढ़कर 40,214 करोड़ रुपए हो गया है।
आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान रिफंड जारी करने में 29 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई और यह 2.2 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गया।
17 सितंबर तक एडवांस टैक्स संग्रह 16.18 प्रतिशत बढ़कर 5.22 लाख करोड़ रुपए हो गया। इसमें एडवांस कॉर्पोरेट टैक्स संग्रह 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 4.16 लाख करोड़ रुपए और नॉन-कॉर्पोरेट एडवांस टैक्स संग्रह 9.24 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 1.06 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
पिछले महीने के आखिर में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में भारत का राजकोषीय घाटा 4.55 लाख करोड़ रुपए रहा, जो पूरे वित्त वर्ष के लिए तय लक्ष्य का 26.8 प्रतिशत है।
यह पिछले साल इसी अवधि के राजकोषीय घाटा से कम है, जो 4.7 लाख करोड़ रुपए था और पूरे वित्त वर्ष के अनुमान का 29.9 प्रतिशत था।
वित्त वर्ष 2027 के लिए, केंद्र सरकार ने 16.96 लाख करोड़ रुपए के राजकोषीय घाटे का बजट रखा है, जो देश की जीडीपी का 4.3 प्रतिशत है। सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में 4.4 प्रतिशत का राजकोषीय घाटे लक्ष्य हासिल किया था और राजकोषीय समेकन के तहत मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इसे घटाकर जीडीपी का 4.3 प्रतिशत कर दिया है।
राजकोषीय घाटे में कमी आने से अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत होती है और कीमतों में स्थिरता के साथ विकास का रास्ता खुलता है। इससे सरकार की उधारी कम होती है, जिससे बैंकिंग सेक्टर में कॉर्पोरेट्स और उपभोक्ताओं को कर्ज देने के लिए ज्यादा फंड बचता है, और इससे आर्थिक विकास में तेजी आती है।
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