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Thursday,19-March-2026
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अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध : व्हाइट हाउस

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वाशिंगटन, 11 मार्च : व्हाइट हाउस ने कहा है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अमेरिका ने साफ किया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित करने की अनुमति नहीं देंगे।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे अमेरिकी सैन्य अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” का एक मुख्य लक्ष्य इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

दैनिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने दोहराया है कि होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल की आपूर्ति लगातार जारी रहनी चाहिए, ताकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को उनकी ऊर्जा जरूरतें मिलती रहें।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ईरान इस अहम समुद्री रास्ते को बंद करने की कोशिश करता है, तो उसे कड़ी सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

लेविट ने कहा कि अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट में तेल या सामान की आवाजाही रोकने की कोशिश करता है, तो दुनिया की सबसे ताकतवर सेना उसे अब तक से भी कई गुना ज्यादा सख्त जवाब देगी। उन्होंने कहा, “होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे ज़रूरी एनर्जी चेकपॉइंट्स में से एक है, जहां से दुनिया भर में तेल शिपमेंट का एक बड़ा हिस्सा जाता है। वहाँ कोई भी रुकावट तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है और इंटरनेशनल मार्केट को अस्थिर कर सकती है।”

लेविट ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन को पहले से अंदेशा था कि ईरान संघर्ष के दौरान ऊर्जा बाजारों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। इसी वजह से सरकार ने पहले से कई सुरक्षा कदम तैयार कर रखे हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को पूरी उम्मीद थी कि ईरान की सरकार वैश्विक बाजारों को प्रभावित करने की कोशिश करेगी।

इन तैयारियों के तहत अमेरिकी प्रशासन ने खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए कुछ कदम उठाए हैं। लेविट के मुताबिक, अब तक ट्रंप प्रशासन ने खाड़ी में काम करने वाले टैंकरों को राजनीतिक जोखिम बीमा देने की पेशकश की है।

इसके अलावा संकट के दौरान तेल की आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए अमेरिकी सरकार ने कुछ नियमों में अस्थायी राहत भी दी है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने तेल से जुड़े कुछ प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से ढील दी है।

व्हाइट हाउस ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना तेल टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित निकालने के लिए उनके साथ चल सकती है।

उन्होंने कहा कि प्रशासन इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा और ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए आगे के कदमों पर भी लगातार विचार कर रहा है।

लेविट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी ऊर्जा टीम बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं और उद्योग जगत के नेताओं से बातचीत भी कर रहे हैं। साथ ही अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिए गए हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए अतिरिक्त विकल्प तैयार किए जाएं।

व्हाइट हाउस ने बढ़ती ईंधन कीमतों को लेकर चिंतित अमेरिकी नागरिकों को भी भरोसा दिलाने की कोशिश की है।

लेविट ने कहा कि हाल के दिनों में तेल और गैस की कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, वह अस्थायी है। उन्होंने दावा किया कि इस सैन्य अभियान के लंबे समय में सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे और ईंधन की कीमतें कम हो सकती हैं।

उन्होंने कहा, “एक बार जब ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के नेशनल सिक्योरिटी के मकसद पूरी तरह से पूरे हो जाएंगे, तो अमेरिकी तेल और गैस की कीमतों में तेजी से गिरावट देखेंगे, शायद ऑपरेशन शुरू होने से पहले की तुलना में भी कम।”

व्हाइट हाउस के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करने, उसकी नेवी फोर्स को कमजोर करने और तेहरान को न्यूक्लियर हथियार हासिल करने से रोकने के लिए ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया था।

होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ता है। दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसी कारण इस जलमार्ग की सुरक्षा पर दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों, जैसे भारत, चीन, जापान और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं की भी करीबी नजर रहती है।

अंतरराष्ट्रीय

अफगान विदेश मंत्री ने राजनयिकों से कहा,’पाकिस्तान के क्रूर हमले की सच्चाई से दुनिया को कराएं रूबरू’

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काबुल, 18 मार्च : अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने बुधवार को विदेशों में स्थित अफगान दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के राजनयिकों संग वर्चुअल बैठक की। इस बैठक में उन्होंने राजनयिकों को काबुल के स्पष्ट रुख, नीति और भविष्य की कार्ययोजना के संबंध में आवश्यक निर्देश और मार्गदर्शन दिए। यह बैठक पाकिस्तान द्वारा एक नशा मुक्ति अस्पताल पर की गई घातक बमबारी की घटना के बाद हुई, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी।

अफगान विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस बैठक में मंत्री ने पाकिस्तानी सैन्य शासन द्वारा अफगानिस्तान की राष्ट्रीय संप्रभुता के खिलाफ की गई आक्रामकता और हाल की घटनाओं के बारे में जानकारी साझा की।

काबुल द्वारा जारी एक बयान में कहा गया, “उन्होंने इस क्रूर हमले की कड़ी निंदा की और इसे मानवीय सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन बताया। मुत्ताकी ने सभी प्रतिनिधिमंडलों के अधिकारियों को देश की ताजा स्थिति के संबंध में इस्लामिक अमीरात के रुख को अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक पहुंचाने की अपील की।”

बयान में आगे कहा गया, “देश के विदेश मंत्री ने अपने प्रतिनिधिमंडल को इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान के स्पष्ट रुख, नीति और भविष्य की कार्रवाइयों के संबंध में आवश्यक निर्देश और मार्गदर्शन दिया। बैठक का समापन पाकिस्तानी शासन की बमबारी में मारे गए शहीदों को श्रद्धांजलि के साथ हुआ।”

मंगलवार को, मुत्ताकी ने काबुल पर पाकिस्तानी हवाई हमले को मानवीय और इस्लामी सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी हमले में 408 से ज्यादा लोग मारे गए और 260 से ज्यादा घायल हो गए; इनमें से अधिकतर एक नशा मुक्ति केंद्र में इलाज करवा रहे मरीज थे। उन्होंने पाकिस्तान पर जान-बूझकर नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया।

काबुल में विभिन्न संगठनों के राजनयिकों और प्रतिनिधियों से बात करते हुए, मुत्ताकी ने कहा कि पाकिस्तानी हवाई हमले ने समाज के सबसे कमजोर तबकों में से एक को निशाना बनाया—ऐसे लोग जो नशे की लत के इलाज के लिए उपचार ले रहे थे।

उन्होंने कहा कि फरवरी से लगातार हो रहे हमलों, जिनमें अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों में नागरिक इलाकों पर किए गए हमले भी शामिल हैं, ने कूटनीतिक समाधानों पर भरोसे को कम कर दिया है। एरियाना न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हमले जारी रहे तो अफगान सेना “उसी अनुपात में और वैध” रक्षात्मक जवाबी कार्रवाई जारी रखेगी; उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अफगानिस्तान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपनी संप्रभुता और अपने क्षेत्र की रक्षा जरूर करेगा।

मुत्ताकी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान के हमले की निंदा करने का आग्रह किया, और चेतावनी दी कि इस्लामाबाद द्वारा लगातार तनाव बढ़ाने से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैलने और प्रमुख आर्थिक व विकास पहलों पर बुरा असर पड़ने का खतरा है।

इस बीच, अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत और विशेष प्रतिवेदक रिचर्ड बेनेट ने बुधवार को, काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमले की तत्काल, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की मांग की है।

उन्होंने यह भी मांग की कि पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजा दिया जाए।

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अंतरराष्ट्रीय

ईरान परमाणु हथियार नहीं बना सकता, उसे ये बात अच्छी तरह समझ आ गई है : ट्रंप

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वॉशिंगटन, 18 मार्च : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई इसलिए की, ताकि वह परमाणु हथियार हासिल न कर सके। उनका दावा है कि इस कार्रवाई से ईरान की सैन्य ताकत को काफी नुकसान पहुंचा है।

ट्रंप ने व्हाइट हाउस में सेंट पैट्रिक डे के मौके पर कहा, “ईरान परमाणु हथियार नहीं बना सकता, और अब उसे यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है।”

उन्होंने बताया कि अमेरिका ने यह कदम तब उठाया, जब उसे लगा कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब पहुंच गया है। ट्रंप ने कहा, “हमें लगा कि बहुत बुरे इरादे रखने वाले लोगों को रोकना जरूरी है। हम उन्हें परमाणु हथियार बनाने की अनुमति नहीं दे सकते।”

ट्रंप ने इस कार्रवाई को हाल ही में उठाया गया एक मजबूत कदम बताया। उन्होंने कहा, “पिछले दो हफ्तों में हमने एक अहम कदम उठाया है और अब हम तय समय से आगे चल रहे हैं।”

उन्होंने दावा किया कि इस हमले से ईरान के नौसेना, वायुसेना, वायु रक्षा प्रणाली, रडार और नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ है। ट्रंप ने कहा, “हमने उनकी नौसेना, वायुसेना, एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, रडार और उनके नेताओं को खत्म कर दिया।”

ट्रंप ने रणनीतिक बमवर्षक विमानों के इस्तेमाल का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “अगर हमने बी-2 बमवर्षक नहीं भेजे होते, तो वे सफल हो जाते। हम ऐसा नहीं होने दे सकते थे।”

ट्रंप ने इस ऑपरेशन को प्रभावी बताया, लेकिन इसे जश्न मनाने लायक नहीं, बल्कि जरूरी बताया। उन्होंने कहा, “सैन्य नजरिए से यह शानदार रहा है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि यह कुछ ऐसा था जिसे करना ही था।” उन्होंने कहा, “हम इसे खुशी-खुशी नहीं करते।”

ट्रंप ने अमेरिकी सेना की तारीफ करते हुए कहा, “हमारी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है, और अब लोग इसे देख रहे हैं। मैं हमारे सैनिकों को अपना सम्मान और धन्यवाद देता हूं।”

उन्होंने यह भी कहा कि इस कार्रवाई के बाद ईरान की स्थिति बदल गई है। ट्रंप ने कहा, “हमने उन्हें पूरी तरह झटका दे दिया है।”

ये बयान उस समय आए, जब अमेरिका और आयरलैंड के संबंधों पर एक औपचारिक कार्यक्रम चल रहा था। ट्रंप ने कहा, “मैं पूरा दिन आयरिश नेताओं के साथ रहा, जबकि मुझे ईरान के मुद्दे पर भी ध्यान देना चाहिए था।”

इस कार्यक्रम में मौजूद आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकेल मार्टिन ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई पर सीधे कुछ नहीं कहा। हालांकि, उन्होंने शांति और बातचीत पर जोर दिया।

मार्टिन ने कहा, “संवाद, बातचीत और तनाव कम करना ही आगे बढ़ने का सही रास्ता है।” उन्होंने मध्य पूर्व और यूक्रेन में शांति की जरूरत भी बताई।

उन्होंने कहा, “दुनिया में संघर्षों के कारण बहुत लोग जान गंवा रहे हैं, इसलिए हमें बेहतर भविष्य बनाने के लिए प्रयास करने होंगे।”

ट्रंप के बयान से साफ है कि अमेरिका के लिए ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना एक बड़ी प्राथमिकता बना हुआ है, भले ही यह बात एक औपचारिक कार्यक्रम के दौरान कही गई हो।

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अंतरराष्ट्रीय

भारत ने अहमदिया लोगों पर अत्याचार के मामले में पाकिस्तान के इस्लामोफोबिया को उजागर किया

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संयुक्त राष्ट्र, 17 मार्च : भारत ने अहमदिया मुसलमानों पर जानलेवा जुल्म में पाकिस्तान के अपने इस्लामोफोबिया को सामने ला दिया है। वहीं, इस्लामाबाद के प्रतिनिधि ने लगभग मान लिया है कि उनका देश अहमदिया मुसलमानों के साथ जुल्म कर रहा है।

बिना पाकिस्तान का नाम लिए और उसे ‘हमारा पश्चिमी पड़ोसी’ बताते हुए भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने सोमवार (स्थानीय समय) को कहा, ”यह सोचना जरूरी है कि अहमदिया समुदाय पर हो रहे अत्याचार, बेबस अफगानों की बड़े पैमाने पर वापसी (या जबरन निर्वासन) और रमजान के पवित्र महीने में की गई हवाई बमबारी को आखिर क्या कहा जाए?

भारत ने इस्लामोफोबिया से लड़ने के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर जनरल असेंबली में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन अपने बयान में एक इशारा किया ताकि इस्लामाबाद को यह मानने की जरूरत न पड़े कि उस पर आरोप लगाया गया है, जबकि बयान से यह साफ हो गया।

भले ही उनके देश का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया था, फिर भी पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि असीम इफ्तिखार अहमद ने अपनी प्रतिक्रिया में इन आरोपों का खंडन भी नहीं किया। उन्होंने यह कहा कि भारत इस्लामोफोबिया पर जनरल असेंबली की बैठक का राजनीतिकरण कर रहा है।

पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने अहमदिया लोगों पर हो रहे जुल्म को लगभग मान लिया।

अहमदिया समुदाय को लेकर पाकिस्तान के संविधान में 1974 के एक बदलाव में इस्लामी कट्टरपंथ की नीति अपनाई गई। इसके तहत अहमदिया लोगों को ‘गैर-मुस्लिम’ घोषित किया गया और उनके खिलाफ जुल्म को सरकारी नीति बना दिया गया। उनकी धार्मिक मस्जिदों पर अक्सर होने वाले हमलों के अलावा, ईशनिंदा विरोधी कानूनों की वजह से उन्हें मौत की सजा हो सकती है।

पाकिस्तान का नाम लिए बिना, हरीश ने साफ तौर पर कहा कि भारत के बारे में उसका प्रोपेगेंडा सिर्फ इस्लामाबाद की ‘आतंकवादी सोच को दिखाता है, जिसे इस देश ने अपनी शुरुआत से ही बनाए रखा है।

उन्होंने कहा, ”असली मुद्दा यही है। किसी भी दूसरे देश की तुलना में भारत सबसे ज्यादा धर्मों (हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म) की जन्मभूमि होने के नाते सर्व धर्म समभाव की सोच को मानता है, जो सभी धर्मों के लिए बराबर सम्मान की बात कहता है और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रेरित करता है।

उन्होंने कहा, “भारत धर्म के नाम पर हिंसा और नफरत की कड़ी निंदा करता है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब पहले से ही एक ऐसी घोषणा मौजूद है, जो सभी धर्मों के खिलाफ घृणा की स्पष्ट रूप से निंदा करती है, तो संयुक्त राष्ट्र का केवल इस्लामोफोबिया पर विशेष जोर देना उचित है या नहीं।

पी. हरीश 1981 में अपनाए गए सभी तरह की असहिष्णुता और धर्म या विश्वास के आधार पर भेदभाव को खत्म करने की घोषणा का जिक्र कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “1981 की घोषणा हमारे विचार में एक बहुत ही संतुलित और टिकाऊ साधन है, जो बिना किसी को विशेषाधिकार दिए सभी धार्मिक अनुयायियों के अधिकारों को सुरक्षित रखता है।

उन्होंने कहा, ”मैं इस बात पर जोर देता हूं कि यूएन के लिए यह जरूरी है कि वह धार्मिक पहचान को हथियार बनाने और छोटे राजनीतिक मकसदों को पूरा करने के लिए इसका इस्तेमाल करने के बढ़ते व्यापार और खतरों पर ध्यान दे। भारत का पश्चिमी पड़ोसी अपने पड़ोस में इस्लामोफोबिया की मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने का एक बेहतरीन उदाहरण है।

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