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Sunday,21-June-2026
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मुंबई: मराठा आरक्षण आंदोलन के पांचवें दिन समाप्त होने के बाद बीएमसी ने आज़ाद मैदान और आसपास के इलाकों में रात भर सफाई अभियान चलाया

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मुंबई: मुंबई के आजाद मैदान में मराठा आरक्षण के मुद्दे पर पांच दिनों तक चले उग्र आंदोलन के बाद, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने बुधवार सुबह तक प्रदर्शन प्रभावित क्षेत्र और उसके आसपास के नागरिक क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए रात भर व्यापक सफाई अभियान चलाया।

कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन में पूरे महाराष्ट्र से हज़ारों प्रदर्शनकारी दक्षिण मुंबई पहुँचे, जिससे यातायात और नागरिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। पाँचवें दिन आंदोलन समाप्त होने पर, नगर निगम अधिकारियों ने इस इलाके की सफाई के लिए भारी संख्या में जनशक्ति और संसाधन तैनात किए। अधिकारियों के अनुसार, लगभग 200 सफाई कर्मचारियों ने 2 सितंबर की रात से लेकर 3 सितंबर की सुबह तक मैदान और आस-पास की सड़कों को उनकी मूल स्थिति में लाने के लिए अथक परिश्रम किया।

कुल मिलाकर, 1,000 से ज़्यादा नगर निगम कर्मचारियों को दो पालियों में तैनात किया गया था ताकि धरना स्थल पर चौबीसों घंटे सफ़ाई सुनिश्चित की जा सके। आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ को देखते हुए, बीएमसी ने पहले ही 100 मोबाइल शौचालयों सहित अतिरिक्त जन सुविधाओं का इंतज़ाम कर दिया था, जिससे कुल संख्या लगभग 450 हो गई। निगम ने भीड़ और देर रात तक काम करने वाले सफ़ाई कर्मचारियों के लिए पर्याप्त रोशनी उपलब्ध कराने हेतु 40 फ्लडलाइट वाले टावर भी लगाए।

शौचालयों के आसपास स्वच्छता बनाए रखने के लिए सक्शन मशीनें और जेट स्प्रे सिस्टम लगाए गए थे। कचरा संग्रहण में सहायता के लिए प्रदर्शन क्षेत्र में कम से कम 1,500 प्लास्टिक के कचरे के थैले और दर्जनों कूड़ेदान वितरित किए गए। प्रदर्शन समाप्त होने के बाद, सड़कों को पानी से अच्छी तरह धोया गया, जबकि सड़कों की सफाई के लिए कॉम्पैक्टर और स्किड स्टीयर लोडर सहित 16 विभिन्न प्रकार के कचरा प्रबंधन वाहन तैनात किए गए।

स्वास्थ्य संबंधी खतरों को रोकने के लिए, नगर निगम के कर्मचारियों ने मक्खियों और मच्छरों के प्रसार को रोकने के लिए पूरे स्थल पर 100 किलोग्राम कीटाणुनाशक और कीटनाशक पाउडर भी छिड़का। विरोध प्रदर्शन के दौरान पीने के पानी की व्यवस्था बीएमसी की ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा थी, जिसके तहत आसपास के क्षेत्र में मिनी टैंकरों सहित 26 पानी के टैंकर तैनात किए गए थे।

पाँच दिनों तक चले इस आंदोलन ने मुंबई के दक्षिणी प्रशासनिक केंद्र के कई हिस्सों को ठप कर दिया था, मंत्रालय के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई थी और परिवहन सेवाओं में बदलाव करना पड़ा था। इस विरोध प्रदर्शन ने मराठा आरक्षण की लगातार माँग को उजागर किया, साथ ही शहर के लिए रसद संबंधी चुनौतियाँ भी पैदा कीं। आंदोलनकारियों के चले जाने के बाद, बीएमसी के तेज़ और बड़े पैमाने पर सफाई प्रयासों ने यह सुनिश्चित किया कि आज़ाद मैदान और उसके आसपास के इलाकों में कुछ ही घंटों में सामान्य जनजीवन बहाल हो जाए।

राष्ट्रीय समाचार

हीरा ग्रुप से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई, ईडी ने 159 करोड़ रुपए की संपत्तियां की नीलाम

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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हीरा ग्रुप ऑफ कंपनीज से जुड़े बहुचर्चित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए लगभग 159 करोड़ रुपए मूल्य की 23 अटैच की गई अचल संपत्तियों की नीलामी सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। ईडी के हैदराबाद जोनल कार्यालय ने यह कार्रवाई आरोपी नोहेरा शेख, हीरा ग्रुप ऑफ कंपनीज और उनसे संबंधित संस्थाओं के खिलाफ की है।

ईडी के अनुसार, नोहेरा शेख और उनकी कंपनियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के दौरान यह सामने आया था कि उन्होंने निवेशकों को सालाना 36 प्रतिशत से अधिक रिटर्न का लालच देकर देशभर के लोगों से 5,978 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जुटाई थी। हालांकि बाद में निवेशकों को उनकी मूल राशि तक वापस नहीं मिल सकी, जिससे हजारों लोगों के साथ धोखाधड़ी हुई।

प्रवर्तन निदेशालय ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में 19 जून को मेटल स्क्रैप ट्रेड कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमएसटीसी) के माध्यम से इन संपत्तियों की नीलामी कराई गई। नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी तरीके से आयोजित की गई, ताकि अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जा सके।

ईडी द्वारा नीलाम की गई संपत्तियां उन परिसंपत्तियों में शामिल हैं जिन्हें धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत अटैच किया गया था। जांच में इन्हें अपराध से अर्जित आय (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) से खरीदी गई संपत्ति के रूप में चिन्हित किया गया था। पीएमएलए की निर्णायक प्राधिकरण (एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी) ने भी इन संपत्तियों की जब्ती की पुष्टि की थी।

एजेंसी ने कहा कि नीलामी से प्राप्त धनराशि का उपयोग वास्तविक निवेशकों और पीड़ितों को मुआवजा देने तथा उनका पैसा लौटाने के लिए किया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और निर्देशों के तहत संचालित होगी।

जांच के दौरान नोहेरा शेख पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करने का आरोप भी लगा। इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी थी। इसके बाद हैदराबाद की विशेष पीएमएलए अदालत ने 7 मई 2026 को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। ईडी ने 21 मई 2026 को उन्हें गुरुग्राम से गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

ईडी ने उनकी निजी सहायक नाजनीन अंसारी उर्फ अबीदा को भी गिरफ्तार किया है। एजेंसी का आरोप है कि वह अपराध से अर्जित धन के प्रबंधन और संपत्तियों की नीलामी प्रक्रिया में बाधा डालने में शामिल थी। फिलहाल वह भी न्यायिक हिरासत में है।

ईडी ने कहा कि निवेशकों को उनका धन वापस दिलाने और अपराध से अर्जित संपत्तियों के प्रभावी परिसमापन के लिए आगे की जांच जारी है।

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राष्ट्रीय समाचार

नोएडा श्रमिक हिंसा मामले में जांच पूरी, एसआईटी ने डेढ़ हजार पन्नों की विस्तृत चार्जशीट कोर्ट में की दाखिल

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नोएडा में अप्रैल माह में हुई श्रमिक हिंसा के मामले में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी जांच पूरी कर ली है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसआईटी ने करीब डेढ़ हजार पन्नों की विस्तृत चार्जशीट न्यायालय में दाखिल कर दी है। चार्जशीट में हिंसा की साजिश रचने वालों और उपद्रव में सीधे तौर पर शामिल लोगों के खिलाफ कई महत्वपूर्ण साक्ष्य और तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं।

जानकारी के अनुसार, 13 और 14 अप्रैल को नोएडा के विभिन्न क्षेत्रों में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान कई स्थानों पर आगजनी, तोड़फोड़ और सार्वजनिक तथा निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आई थीं।

हिंसा के कारण क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन को अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ा था। मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी ने पिछले कई महीनों में घटनास्थलों का निरीक्षण करने, सीसीटीवी फुटेज खंगालने, डिजिटल साक्ष्य जुटाने और बड़ी संख्या में प्रत्यक्षदर्शियों एवं संबंधित लोगों के बयान दर्ज करने का काम किया।

जांच के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर एसआईटी ने करीब 10 ऐसे लोगों की पहचान की है, जिन पर हिंसा भड़काने और पूरी साजिश को अंजाम देने का आरोप है। इसके अलावा लगभग दो दर्जन लोगों को हिंसक घटनाओं में प्रत्यक्ष रूप से शामिल पाए जाने के आधार पर कार्रवाई के दायरे में लिया गया है।

एसआईटी की जांच में मुख्य साजिशकर्ताओं के रूप में रूपेश राय, आकृति, मनीषा, सत्यम वर्मा, हिमांशु ठाकुर और सतीश कुमार सहित कई अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, इन आरोपियों की भूमिका हिंसा की योजना बनाने, लोगों को उकसाने और घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण रही।

इन सभी प्रमुख आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। जांच अधिकारियों का कहना है कि चार्जशीट में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, वीडियो फुटेज, मोबाइल डेटा, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य तकनीकी प्रमाण शामिल किए गए हैं, जो अदालत में अभियोजन पक्ष के लिए महत्वपूर्ण आधार बनेंगे।

अब मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया चलेगी। एसआईटी की चार्जशीट दाखिल होने के साथ ही नोएडा के चर्चित श्रमिक हिंसा प्रकरण की जांच का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। प्रशासन का मानना है कि इस कार्रवाई से हिंसा और अराजकता फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त संदेश जाएगा तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में मदद मिलेगी।

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पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच भारत ने एलपीजी आयात के स्रोत बढ़ाए, तेल कंपनियों को हुआ करीब 22,000 करोड़ रुपए का नुकसान

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पश्चिम एशिया में हाल ही में हुए संघर्ष के दौरान भारत ने तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के आयात के स्रोतों में विविधता लाई और खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका, ईरान और कई अन्य देशों से खरीद बढ़ा दी।

क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारत की एलपीजी आयात संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला। परंपरागत रूप से भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी जरूरतें पश्चिम एशियाई देशों से पूरी करता रहा है। हालांकि अप्रैल 2026 तक अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई तक पहुंच गई, जबकि फरवरी में यह केवल 8 प्रतिशत थी।

यह बदलाव 2025 के अंत में भारत और अमेरिका के बीच हुए 22 लाख टन प्रति वर्ष एलपीजी आपूर्ति समझौते से संभव हुआ। यह समझौता भारत की सालाना एलपीजी आयात जरूरतों का लगभग 10 प्रतिशत पूरा करता है।

ईरान भी भारत के आयात स्रोतों में फिर से शामिल हो गया और अप्रैल में कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत रही। इसके अलावा, भारत ने अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों से भी एलपीजी की खरीद की।

आयात के स्रोतों में विविधता लाने की इस रणनीति से संघर्ष के दौरान आपूर्ति सुरक्षा बनाए रखने में मदद मिली, लेकिन इसके कारण लंबी दूरी से माल लाना पड़ा और परिवहन लागत भी बढ़ गई।

आपूर्ति में बाधा और बढ़ी हुई कीमतों का असर घरेलू खपत पर भी पड़ा। फरवरी में जहां भारत की एलपीजी खपत 32 लाख टन थी, वहीं अप्रैल में यह घटकर 24.7 लाख टन रह गई। ऊंची कीमतों और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों ने मांग को प्रभावित किया।

वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 3.32 करोड़ टन एलपीजी खपत दर्ज की गई थी, जो सालाना आधार पर 6 प्रतिशत की वृद्धि थी। लेकिन इसके बाद के महीनों में मांग में तेज गिरावट देखने को मिली।

मार्च और अप्रैल में एलपीजी की मांग सालाना आधार पर 13 प्रतिशत घटी, जबकि मई में यह गिरावट और बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई।

रिपोर्ट के अनुसार, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हुए क्योंकि उन्हें बाजार आधारित कीमतों का सामना करना पड़ा और बढ़ती लागत का असर उन पर तुरंत पड़ा। दूसरी ओर, घरेलू उपभोक्ताओं की मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही क्योंकि रसोई गैस की खुदरा कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की गई।

क्रिसिल ने बताया कि संघर्ष के कारण वैश्विक एलपीजी कीमतों में तेज उछाल आया। भारतीय आयात के लिए मानक मानी जाने वाली सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून के बीच 46 प्रतिशत बढ़ गई, जिसका कारण आपूर्ति में बाधा की आशंका और बढ़ी हुई मालभाड़ा लागत रही।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि की गई। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत इस अवधि में लगभग 10 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 19 किलोग्राम वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 79 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।

घरेलू गैस की कीमतों को सीमित रखने के कारण तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की अंडर-रिकवरी में भारी वृद्धि हुई, क्योंकि खरीद लागत खुदरा बिक्री मूल्य से काफी अधिक हो गई।

क्रिसिल के अनुमान के अनुसार, मई में दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी 651 रुपए प्रति सिलेंडर तक पहुंच गई। वहीं मार्च से मई के बीच सरकारी तेल कंपनियों को कुल मिलाकर लगभग 22,000 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।

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