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भारतीय शेयर बाजार में शानदार तेजी, भारत-पाक तनाव कम होने से सेंसेक्स 1900 अंक से पार

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मुंबई, 12 मई। भारतीय शेयर बाजार सोमवार को शानदार तेजी के साथ खुले और सुबह के कारोबार में सेंसेक्स 1,900 अंक से ऊपर उछला। यह तेजी भारत-पाक तनाव कम होने के साथ ही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत देश की सैन्य और रणनीतिक क्षमता के एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन के कारण देखी गई। शुरुआती कारोबार में पीएसयू बैंक, आईटी और ऑटो सेक्टर में खरीदारी देखी गई।

सुबह करीब 9.34 बजे सेंसेक्स 1,943 अंक या 2.45 प्रतिशत बढ़कर 81,398.42 पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी 598.8 अंक या 2.49 प्रतिशत चढ़कर 24,606.85 पर था।

निफ्टी बैंक 1,395.95 अंक या 2.60 प्रतिशत बढ़कर 54,991.20 पर था। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,456.20 अंक या 2.74 प्रतिशत की बढ़त के साथ 54,679.55 पर कारोबार कर रहा था। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 498.95 अंक या 3.10 प्रतिशत की बढ़त के साथ 16,584.60 पर था।

विश्लेषकों के अनुसार, भारत के बाजारों और अर्थव्यवस्था ने शानदार तेजी दिखाई है, जो लगातार बाहरी उथल-पुथल और भू-राजनीतिक तनावों से आगे बढ़ने में एक बड़ी कामयाबी के रूप में देखी गई। यह ताकत एक स्थिर, घरेलू रूप से उन्मुख अर्थव्यवस्था से आती है, जो वैश्विक परेशानियों से बचाने में मदद करती है, यह दर्शाती है कि हर संकट अंततः समाप्त होता है।

एचडीएफसी सिक्योरिटीज में प्राइम रिसर्च के प्रमुख देवर्ष वकील ने कहा, “ट्रेड डील पर बातचीत करने के भारत के प्रयास वैश्विक व्यापार संबंधों को मजबूत करेंगे और इसे दुनिया भर में अधिक बिक्री करने में मदद करेंगे, जिससे स्थिर विदेशी धन आएगा और यह अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा। संतुलित वैश्विक संबंधों और मजबूत साझेदारी के साथ, यह अपेक्षाकृत स्थिर निवेश स्थान बनाता है।”

विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले सप्ताह प्रमुख सूचकांकों में मामूली मिला-जुला रुख रहा। अमेरिका और ब्रिटेन के बीच व्यापार समझौते की घोषणा और सप्ताह के अंत में व्यापार चर्चा के लिए स्विट्जरलैंड में अमेरिकी और चीनी अधिकारियों की बैठक की रिपोर्ट ने बड़ी और महत्वपूर्ण वार्ता और टैरिफ में कमी का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे निवेशकों की धारणा को बल मिला।

इस बीच, सेंसेक्स पैक में अदाणी पोर्ट्स, बजाज फाइनेंस, एक्सिस बैंक, इटरनल, पावर ग्रिड, एनटीपीसी, बजाज फिनसर्व, टाटा स्टील, एलएंडटी, एसबीआई टॉप गेनर्स रहे। जबकि, केवल सन फार्मा टॉप लूजर रहा।

एशियाई बाजारों में चीन, हांगकांग और सोल हरे निशान में कारोबार कर रहे थे, जबकि जापान लाल निशान में कारोबार कर रहा था।

अमेरिकी बाजारों में शुक्रवार को आखिरी कारोबारी सत्र में डाउ जोंस 0.29 फीसदी की गिरावट के साथ 41,249.38 पर बंद हुआ। एसएंडपी 500 इंडेक्स 0.07 फीसदी की गिरावट के साथ 5,659.91 पर और नैस्डैक 17,928.92 पर बंद हुआ।

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार 16 सत्रों तक शुद्ध खरीदार रहने के बाद 9 मई को शुद्ध विक्रेता बन गए। उन्होंने 3,798.71 करोड़ रुपए के शेयर बेचे। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशक (डीआईआई) शुद्ध खरीदार बने रहे, जिन्होंने उसी दिन 7,277.74 करोड़ रुपए का निवेश किया।

राष्ट्रीय समाचार

पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच भारत ने एलपीजी आयात के स्रोत बढ़ाए, तेल कंपनियों को हुआ करीब 22,000 करोड़ रुपए का नुकसान

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पश्चिम एशिया में हाल ही में हुए संघर्ष के दौरान भारत ने तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के आयात के स्रोतों में विविधता लाई और खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका, ईरान और कई अन्य देशों से खरीद बढ़ा दी।

क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारत की एलपीजी आयात संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला। परंपरागत रूप से भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी जरूरतें पश्चिम एशियाई देशों से पूरी करता रहा है। हालांकि अप्रैल 2026 तक अमेरिका भारत के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई तक पहुंच गई, जबकि फरवरी में यह केवल 8 प्रतिशत थी।

यह बदलाव 2025 के अंत में भारत और अमेरिका के बीच हुए 22 लाख टन प्रति वर्ष एलपीजी आपूर्ति समझौते से संभव हुआ। यह समझौता भारत की सालाना एलपीजी आयात जरूरतों का लगभग 10 प्रतिशत पूरा करता है।

ईरान भी भारत के आयात स्रोतों में फिर से शामिल हो गया और अप्रैल में कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत रही। इसके अलावा, भारत ने अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों से भी एलपीजी की खरीद की।

आयात के स्रोतों में विविधता लाने की इस रणनीति से संघर्ष के दौरान आपूर्ति सुरक्षा बनाए रखने में मदद मिली, लेकिन इसके कारण लंबी दूरी से माल लाना पड़ा और परिवहन लागत भी बढ़ गई।

आपूर्ति में बाधा और बढ़ी हुई कीमतों का असर घरेलू खपत पर भी पड़ा। फरवरी में जहां भारत की एलपीजी खपत 32 लाख टन थी, वहीं अप्रैल में यह घटकर 24.7 लाख टन रह गई। ऊंची कीमतों और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों ने मांग को प्रभावित किया।

वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 3.32 करोड़ टन एलपीजी खपत दर्ज की गई थी, जो सालाना आधार पर 6 प्रतिशत की वृद्धि थी। लेकिन इसके बाद के महीनों में मांग में तेज गिरावट देखने को मिली।

मार्च और अप्रैल में एलपीजी की मांग सालाना आधार पर 13 प्रतिशत घटी, जबकि मई में यह गिरावट और बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई।

रिपोर्ट के अनुसार, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हुए क्योंकि उन्हें बाजार आधारित कीमतों का सामना करना पड़ा और बढ़ती लागत का असर उन पर तुरंत पड़ा। दूसरी ओर, घरेलू उपभोक्ताओं की मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही क्योंकि रसोई गैस की खुदरा कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की गई।

क्रिसिल ने बताया कि संघर्ष के कारण वैश्विक एलपीजी कीमतों में तेज उछाल आया। भारतीय आयात के लिए मानक मानी जाने वाली सऊदी अरामको कॉन्ट्रैक्ट प्राइस फरवरी से जून के बीच 46 प्रतिशत बढ़ गई, जिसका कारण आपूर्ति में बाधा की आशंका और बढ़ी हुई मालभाड़ा लागत रही।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि की गई। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत इस अवधि में लगभग 10 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 19 किलोग्राम वाले वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमत में 79 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।

घरेलू गैस की कीमतों को सीमित रखने के कारण तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की अंडर-रिकवरी में भारी वृद्धि हुई, क्योंकि खरीद लागत खुदरा बिक्री मूल्य से काफी अधिक हो गई।

क्रिसिल के अनुमान के अनुसार, मई में दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर अंडर-रिकवरी 651 रुपए प्रति सिलेंडर तक पहुंच गई। वहीं मार्च से मई के बीच सरकारी तेल कंपनियों को कुल मिलाकर लगभग 22,000 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।

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व्यापार

फोनपे वॉलेट इनएक्टिविटी नोटिफिकेशन: यूजर्स के लिए क्या जानना है जरूरी?

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हाल ही में फोनपे द्वारा भेजे गए वॉलेट निष्क्रियता (इनएक्टिविटी) नोटिफिकेशन के बाद डिजिटल वॉलेट और उनके काम करने के तरीके को लेकर उपभोक्ताओं की दिलचस्पी बढ़ गई है। इन चर्चाओं के दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है कि कई यूजर्स अब भी यह मानते हैं कि उनका फोनपे अकाउंट, यूपीआई अकाउंट और फोनपे वॉलेट एक ही चीज हैं। जबकि वास्तव में ये अलग-अलग भुगतान माध्यम हैं, जो स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं।

जैसे-जैसे डिजिटल भुगतान लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है, यह समझना जरूरी है कि वॉलेट कैसे काम करता है और यह यूपीआई से किस तरह अलग है। इससे उपभोक्ताओं को बेहतर निर्णय लेने और इस्तेमाल किए जा रहे उत्पादों को सही तरीके से समझने में मदद मिलती है।

यूपीआई और वॉलेट में क्या अंतर है?

जब आप फोनपे पर यूपीआई के जरिए भुगतान करते हैं, तो पैसा सीधे आपके लिंक किए गए बैंक खाते से कटता है। दूसरी ओर, फोनपे वॉलेट एक प्रीपेड भुगतान साधन (पीपीआई) है, जिसमें पैसा आपके बैंक खाते से अलग रखा जाता है।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निष्क्रियता शुल्क (इनएक्टिविटी चार्ज) केवल फोनपे वॉलेट पर लागू होता है, न कि यूपीआई से जुड़े बैंक खातों पर।

वॉलेट निष्क्रियता शुल्क कैसे काम करता है?

कई यूजर्स के मन में यह सवाल है कि यदि उनके वॉलेट में बैलेंस नहीं है, तो क्या फोनपे उनके बैंक खाते से निष्क्रियता शुल्क काट सकता है? इसका जवाब है – नहीं।

यदि किसी यूजर का फोनपे वॉलेट लंबे समय तक निष्क्रिय रहा है और उसमें जीरो बैलेंस है, तो निष्क्रियता शुल्क उसके बैंक खाते या यूपीआई के जरिए वसूला नहीं जाएगा। इसी तरह वॉलेट का बैलेंस भी नकारात्मक नहीं होगा।

दूसरे शब्दों में:

-लिंक किए गए बैंक खाते से कोई कटौती नहीं होगी।

-यूपीआई के माध्यम से कोई राशि नहीं काटी जाएगी।

-अपर्याप्त बैलेंस वाला वॉलेट निगेटिव बैलेंस नहीं दिखाएगा।

नियमित फोनपे उपयोग के बावजूद नोटिफिकेशन क्यों मिल सकता है?

कुछ यूजर्स ने शिकायत की है कि वे फोनपे का नियमित उपयोग करते हैं, फिर भी उन्हें निष्क्रियता नोटिफिकेशन मिला है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वॉलेट गतिविधि और यूपीआई गतिविधि को अलग-अलग ट्रैक किया जाता है।

संभव है कि कोई ग्राहक रोजाना यूपीआई के जरिए क्यूआर कोड भुगतान, बिल भुगतान या पैसे ट्रांसफर करता हो, लेकिन उसका फोनपे वॉलेट महीनों या वर्षों से इस्तेमाल न हुआ हो। ऐसे मामलों में वॉलेट को निष्क्रिय माना जा सकता है, भले ही यूजर नियमित रूप से फोनपे ऐप का इस्तेमाल कर रहा हो।

एडवांस नोटिफिकेशन और यूजर्स के विकल्प

फोनपे के अनुसार, प्रभावित यूजर्स को किसी भी निष्क्रियता शुल्क की कटौती से 15 दिन पहले सूचना दी जाती है।

इस अवधि के दौरान यूजर्स के पास ये विकल्प होते हैं:

-अपने वॉलेट को सक्रिय करना।

-यदि वे वॉलेट का उपयोग जारी रखना चाहते हैं तो उसमें पैसा जोड़ना।

-पात्र बैलेंस को निकाल लेना।

-यह तय करना कि वे वॉलेट बनाए रखना चाहते हैं या नहीं।

केवाईसी को लेकर आम सवाल

कुछ यूजर्स का मानना है कि वॉलेट को दोबारा एक्टिव करने के लिए उन्हें फुल केवाईसी करानी होगी। हालांकि, वॉलेट को एक्टिव करने के लिए न्यूनतम केवाईसी वाले वॉलेट को फुल केवाईसी में बदलना जरूरी नहीं है।

यूजर ओटीपी वेरिफिकेशन पूरा करके और वॉलेट के माध्यम से एक ट्रांजेक्शन करके अपना वॉलेट एक्टिव कर सकते हैं। फुल केवाईसी कराना सक्रियण की अनिवार्य शर्त नहीं है।

वॉलेट बैलेंस और कैशबैक को लेकर भ्रम

कैशबैक से जुड़ा एक और भ्रम भी सामने आया है। कई यूजर्स मानते हैं कि कैशबैक की राशि उनके फोनपे वॉलेट में जमा होती है। जबकि वास्तव में कैशबैक आमतौर पर एक अलग उपहार कार्ड बैलेंस में जमा किया जाता है, जो फोनपे वॉलेट से अलग होता है।

इसलिए कैशबैक प्राप्त होने का मतलब यह नहीं है कि आपका वॉलेट एक्टिव है और न ही इसका अर्थ है कि उस कैशबैक राशि पर वॉलेट निष्क्रियता शुल्क लागू होगा।

वॉलेट बंद करना और ग्राहक सहायता

कुछ यूजर्स ने ऐप के माध्यम से अपना वॉलेट बंद करने की कोशिश के दौरान त्रुटि संदेश या अतिरिक्त सत्यापन जैसी समस्याओं की शिकायत की है।

ऐसी स्थिति में यूजर्स को अकाउंट बंद करने या वॉलेट से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए फोनपे ग्राहक सहायता से संपर्क करने की सलाह दी जाती है।

निष्क्रियता शुल्क क्यों लिया जाता है?

वॉलेट को प्रीपेड भुगतान साधन के रूप में विनियमित किया जाता है और इसके लिए रखरखाव, अनुपालन और परिचालन सहायता की आवश्यकता होती है, भले ही उनका सक्रिय रूप से उपयोग न किया जा रहा हो।

इसी वजह से कुछ वॉलेट प्रदाता लंबे समय से निष्क्रिय पड़े वॉलेट पर निष्क्रियता या रखरखाव शुल्क लगाते हैं। यह केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रीपेड भुगतान क्षेत्र में कई वॉलेट प्रदाताओं द्वारा अपनाई जाने वाली व्यवस्था है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निष्क्रियता शुल्क केवल फोनपे वॉलेट पर लागू होता है, जो एक अलग प्रीपेड भुगतान साधन है। यह यूपीआई लेनदेन पर लागू नहीं होता, बैंक खाते को प्रभावित नहीं करता और वॉलेट को निगेटिव बैलेंस में भी नहीं ले जाता।

जिन यूजर्स को ऐसा नोटिफिकेशन मिला है, उनके लिए सबसे जरूरी कदम यह है कि वे यह जांचें कि उनके पास एक्टिव फोनपे वॉलेट है या नहीं और फिर तय करें कि वे उसे जारी रखना चाहते हैं, दोबारा एक्टिव करना चाहते हैं या बंद करना चाहते हैं।

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राष्ट्रीय समाचार

लगातार दूसरे दिन सोने की चमक पड़ी फीकी; चांदी में भी छाई सुस्ती

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सोने और चांदी की कीमत में शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन गिरावट देखने को मिली। इससे सोने का दाम 1.45 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी का दाम 2.32 लाख रुपए प्रति किलो से नीचे आ गया है।

इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम 3,123 रुपए कम होकर 1,44,970 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जो कि पहले 1,48,093 रुपए प्रति 10 ग्राम था।

22 कैरेट सोने का दाम 1,35,653 रुपए प्रति 10 ग्राम से कम होकर 1,32,793 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है। 18 कैरेट सोने की कीमत कम होकर 1,08,728 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई है, जो कि पहले 1,11,070 रुपए प्रति 10 ग्राम थी।

सोने के साथ चांदी की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली है।

चांदी का दाम 8,218 रुपए कम होकर 2,31,93 रुपए प्रति किलो हो गया है, जो कि पहले 2,40,191 रुपए प्रति किलो था।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। कॉमेक्स पर सोना 1.68 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 4,174.47 डॉलर प्रति औंस और चांदी 2.12 प्रतिशत की गिरावट के साथ 64.91 डॉलर प्रति औंस पर थी।

एलकेपी सिक्योरिटीज के जतिन त्रिवेदी ने कहा कि फेडरल रिजर्व की ओर से 2026 में ब्याज दरें एक बार बढ़ाने के संकेत के बाद सोने की कीमतों पर दबाव देखने को मिल रहा है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ और सोने जैसी बिना रिटर्न वाली संपत्तियों का आकर्षण कम हो गया। फेड के सख्त रुख के कारण बुलियन बाजारों में बड़े पैमाने पर प्रॉफिट बुकिंग देखी गई।

उन्होंने आगे कहा कि फेड की पॉलिसी के ऐलान के बाद पिछले कुछ सेशन में कॉमेक्स गोल्ड की कीमत लगभग 4375 डॉलर प्रति औंस से गिरकर 4150 डॉलर प्रति औंस हो गई है, जबकि एमसीएक्स गोल्ड का दाम लगभग 1,54,000 रुपए से घटकर 1,47,200 रुपए पर आ गया। डॉलर के मजबूत होने की संभावना और ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदों का असर मार्केट सेंटीमेंट पर पड़ रहा है।

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