व्यापार
भारत में लोग खरीद रहे बड़े फ्लैट, 2024 में औसत साइज 8 प्रतिशत बढ़ा
मुंबई, 22 जनवरी। भारत में अब लोग पहले के मुकाबले बड़ा फ्लैट खरीदना पसंद कर रहे हैं। दरअसल, 2024 में देश के शीर्ष सात शहरों में औसत फ्लैट का साइज 8 प्रतिशत बढ़कर 1,540 स्क्वायर फीट हो गया है, जो कि 2023 में 1,420 स्क्वायर फीट था। यह जानकारी बुधवार को जारी हुई एक रिपोर्ट में दी गई।
एनारॉक ग्रुप ने कहा कि 2024 में नेशनल कैपिटल रीजन (एनसीआर) में औसत फ्लैट साइज 29 प्रतिशत बढ़कर 2,435 स्क्वायर फीट हो गया है, जो कि 2023 में 1,890 स्क्वायर फीट था। इसकी वजह लग्जरी घरों की आपूर्ति बढ़ना है।
रिपोर्ट में बताया गया कि 2019 में देश के शीर्ष सात शहरों में औसत फ्लैट का साइज 1,145 स्क्वायर फीट था। इसमें पिछले छह वर्षों में 34 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
एनारॉक ग्रुप के चेयरमैन अनुज पुरी के अनुसार, यह उछाल मुख्य रूप से पिछले एक साल में एनसीआर में नए लग्जरी हाउसिंग सप्लाई में हुई बढ़ोतरी के कारण है।
उन्होंने आगे कहा, “यहां के डेवलपर्स मांग पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और उसके मुताबिक प्रोडक्ट्स तैयार कर रहे हैं। यही वजह है कि एनसीआर में 1.5 करोड़ रुपये और उससे ज्यादा कीमत वाले घरों में नई आपूर्ति में वृद्धि देखी गई है।”
2023 में लॉन्च की गई कुल 36,735 इकाइयों में से,लग्जरी सेगमेंट की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत थी। 2024 में एनसीआर में लॉन्च की गई 53,000 इकाइयों में से इस सेगमेंट की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत थी।
2019 में मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) में औसत फ्लैट का आकार 784 स्क्वायर फीट था और 2024 में 8 प्रतिशत बढ़कर 849 स्क्वायर फीट हो गया। 2020 के बाद एमएमआर में औसत आकार 2024 में सबसे अधिक 849 स्क्वायर फीट था।
अन्य दक्षिणी शहरों जैसे चेन्नई और बेंगलुरु में औसत फ्लैट का आकार 2024 में क्रमशः 1,445 और 1,660 स्क्वायर फीट था। कोलकाता का औसत फ्लैट आकार 1,149 स्क्वायर फीट था जबकि पुणे में यह 2024 में 1,135 स्क्वायर फीट था।
रिपोर्ट के अनुसार, एनसीआर में पिछले छह वर्षों में औसत फ्लैट का आकार 95 प्रतिशत बढ़कर 2024 में 2,435 स्क्वायर फीट हो गया है, जो कि 2019 में 1,250 स्क्वायर फीट था।
अंतरराष्ट्रीय
अंतहीन प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा ईरान-अमेरिका समझौता, दोनों देश नई शर्तों के साथ कर रहे संशोधन की तैयारी

वाशिंगटन, 1 जून: अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ चल रहे समझौते की शर्तों में बदलाव करने की योजना बना रहे हैं, ताकि युद्ध को खत्म किया जा सके। वहीं दूसरी तरफ तेहरान नए बदलाव जोड़ने की तैयारी कर रहा है।
सूत्रों से मिजी जानकारी के अनुसार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने बताया कि इस अंतहीन प्रक्रिया में व्हाइट हाउस बातचीत में ईरान की नई प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है। लगता है कि यह बातचीत फिर से शुरुआती और मुश्किल स्थिति में पहुंच सकती है।
एडनक्रोनोस समाचार एजेंसी ने एक अधिकारी के हवाले से बताया कि ट्रंप बातचीत को तेज करना चाहते हैं और दूसरी तरफ दबाव बढ़ाकर समझौता जल्दी करना चाहते हैं। लेकिन उन्हें ईरान की जटिल सत्ता व्यवस्था से भी निपटना पड़ रहा है।
तेहरान में किसी भी बदलाव या समझौते को अंतिम मंजूरी सर्वोच्च नेता के पास होती है। अगर समझौते के मसौदे में बदलाव होता है, तो बातचीत और लंबी हो सकती है।
तस्नीम समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के नए प्रस्ताव के बाद ईरान भी समझौते के ड्राफ्ट में कुछ नए बदलाव जोड़ना चाहता है।
एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप 60 प्रतिशत तक समृद्ध किए गए यूरेनियम के भंडार को लेकर ज्यादा साफ और सख्त नियम चाहते हैं, जो अभी ईरान के पास हैं। साथ ही वह यह भी चाहते हैं कि समुद्री व्यापार के लिए होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के तरीके साफ किए जाएं।
जो मौजूदा ड्राफ्ट समझौता है, उसमें ईरान यह मानने को तैयार है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। साथ ही इसमें 60 दिनों की एक समय-सीमा भी है, जिसमें दोनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और जमा हुए संवर्धित यूरेनियम के भविष्य पर बातचीत करेंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति इसमें और साफ नियम जोड़ना चाहते हैं, खासकर इस बात पर कि अमेरिका उस सामग्री को कब और कैसे हासिल करेगा।
ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा, “मुझे बस यही गारंटी चाहिए कि परमाणु हथियार नहीं बनेंगे। उन्होंने यह मान लिया है।” उन्होंने आगे कहा कि शुरुआत में ईरान ने सिर्फ यह कहा था कि वे परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, लेकिन अब समझौते में यह भी शामिल किया गया है कि वे किसी भी तरह से परमाणु हथियार न तो बनाएंगे और न ही हासिल करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा, “उन लोगों से बातचीत करना बहुत मुश्किल है और इसमें समय लगता है, लेकिन मुझे जल्दी नहीं है।”
व्हाइट हाउस अभी भी इस समझौते को पूरा होने को लेकर आशावादी है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक सरकारी टीवी पर कहा कि अमेरिका के साथ ‘बातचीत और संदेशों का आदान-प्रदान’ अभी भी जारी है, लेकिन जब तक इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता, तब तक इन पर कोई पक्का फैसला नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “इस समय जो भी बातें कही जा रही हैं, वे सिर्फ अटकलें हैं और उन्हें ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए।”
हालांकि, तेहरान से कई बड़े नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। विदेश मंत्री अराघची के नरम रुख के उलट, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबाफ ने सख्त बयान दिया।
उन्होंने कहा, “जब तक हमें यह पूरी तरह भरोसा नहीं हो जाता कि ईरानी लोगों के अधिकार सुरक्षित हैं, हम किसी भी समझौते को मंजूरी नहीं देंगे।” गालिबाफ ने कहा कि जो लोग कूटनीति से जुड़े हैं, वे अमेरिका के वादों या बातों पर भरोसा नहीं करते।
इस बीच, ईरान की राजनीति को लेकर स्थिति और भी जटिल बताई जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने मोज्तबा खामेनेई को अपना इस्तीफा सौंपने का एक पत्र भेजा है। यह जानकारी लंदन स्थित ईरानी विपक्षी वेबसाइट ‘ईरान इंटरनेशनल’ से जुड़े एक सूत्र ने दी है, लेकिन ईरान सरकार ने इस खबर को तुरंत खारिज कर दिया और इसे ‘झूठी मीडिया रिपोर्ट’ बताया।
राष्ट्रीय
नीट यूजी और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी से जुड़े मुद्दों पर संसदीय स्थायी समिति की बैठक

नई दिल्ली, 1 जून: नीट-यूजी परीक्षा व सीबीएसई के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर संसदीय स्थायी समिति वरिष्ठ अधिकारियों से सवाल कर रही है। नीट-यूजी परीक्षा के विषय पर, सोमवार को हो रही समिति की बैठक में विमर्श किया जा रहा है। सोमवार को यहां शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के सचिव, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव और नेशनल एजेंसी (एनटीए) के महानिदेशक को समिति के समक्ष जवाब देने के लिए बुलाया गया है।
समिति देश की प्रमुख प्रवेश एवं बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों की समीक्षा कर रही है। मंगलवार को कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली के उपयोग और उससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी। संसद भवन एनेक्सी परिसर में शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की यह महत्वपूर्ण बैठक शुरू हुई है।
बैठक के एजेंडे में कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) बनाम पारंपरिक पेन-एंड-पेपर परीक्षा प्रणाली की प्रभावशीलता पर चर्चा शामिल है। इसके साथ ही नीट-यूजी परीक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों, परीक्षा संचालन की पारदर्शिता, सुरक्षा व्यवस्था, प्रश्नपत्र प्रबंधन और अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए उठाए गए कदमों पर भी विचार-विमर्श किया जा रहा है।
बैठक में विशेष रूप से नीट-यूजी परीक्षा में कथित प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं और उससे जुड़े विवादों पर सवाल किए जाएंगे। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर पड़े प्रभाव को लेकर एनटीए और स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों से जवाब मांगे जा सकते हैं। समिति इस बात की भी समीक्षा कर रही है कि परीक्षा प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
गौरतलब है कि इस वर्ष नीट-यूजी के प्रश्न लीक होने की वजह से परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। अब इसकी पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जानी है। पुनर्परीक्षा के निर्णय, उसकी आवश्यकता, परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उपाय तथा प्रभावित अभ्यर्थियों के हितों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी समिति की चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।
संसदीय दस्तावेजों के अनुसार, बैठक के पहले सत्र में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों (2025-26) से संबंधित रिपोर्टों पर सरकार की ओर से की गई कार्रवाई की समीक्षा है। इसके बाद शुरू हुए दूसरे सत्र में शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और एनटीए के वरिष्ठ अधिकारियों से परीक्षा प्रणाली और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत सवाल-जवाब किए जाने हैं।
समिति की अगली बैठक 2 जून को होगी, जिसमें स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और सीबीएसई अध्यक्ष शामिल होंगे। बैठक में कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली के उपयोग और उससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी।
ओएसएम के तहत उत्तर पुस्तिकाओं का डिजिटल मूल्यांकन किया जाता है, लेकिन छात्रों और शिक्षकों ने स्कैन की गुणवत्ता, आरेखों के मूल्यांकन और तकनीकी समस्याओं जैसे मुद्दों पर चिंता जताई है। इसके अलावा, कक्षा 9 और 10 में त्रिभाषा सूत्र के क्रियान्वयन की स्थिति और उसके प्रभावों की भी समीक्षा की जाएगी। संसदीय स्थायी समिति की ये बैठकें देश की परीक्षा व्यवस्था, प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता और शिक्षा प्रणाली में सुधार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
राष्ट्रीय
उत्तराखंड: सीआईएसएफ ने प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए किया मॉक ड्रिल

तपोवन, 1 जून: उत्तराखंड के तपोवन में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने सोमवार को मॉक ड्रिल किया। इसमें आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्टेट फायर सर्विसेज़, लोकल पुलिस, बीआरओ, एनटीपीसी, आईबी, एलआईए, एसडीएम ऑफिस, एचसीसी और मेडिकल टीमों ने भी हिस्सा लिया।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस मॉक ड्रिल का आयोजन प्रमुख रूप से बादल फटने और बाढ़ की स्थिति में कैसे रेस्क्यू ऑपरेशन को कैसे अंजाम दिया जाए, इसके लिए अभ्यास करना था। इस मॉक ड्रिल से पहले ही पूरी रूपरेखा तैयार कर ली गई थी, जिसके आधार पर सबकुछ अंजाम दिया गया। मॉक ड्रिल के दौरान यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि कुछ भी रूपरेखा से परे नहीं हो।
वहीं, मॉक ड्रिल समाप्त होने के बाद इसे सफल बताया जा रहा है और साथ ही यह भी दावा किया जा रहा है कि इससे हमें आने वाले दिनों में किसी भी प्रकार की आपदाग्रस्त स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी। ध्यान देने वाली बात है कि इस मॉक ड्रिल का आयोजन करने से पहले इसकी रूपरेखा पहले ही निर्धारित कर ली गई थी।
वहीं, इस मॉक ड्रिल के आयोजन का एक मकसद यह भी था कि सुरक्षाकर्मियों की मौजूदा कार्यकुशलता का आकलन किया जा सके। इस मॉक ड्रिल से यह भी पता चल गया कि अगर किसी कारणवश हमें किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो उससे निपटने के लिए हमारा मौजूदा सुरक्षा दस्ता कितना कुशल और सक्षम है। इसी देखते हुए इस मॉक ड्रिल को काफी सार्थक माना जा रहा है।
साथ ही, कई बार यह भी देखने को मिला है कि तालमेल के अभाव में रेस्क्यू ऑपरेशन जैसे संवेदनशील प्रक्रियाओं को संपन्न करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में इस तरह के मॉक ड्रिल को काफी उपयोगी माना जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस मॉक ड्रिल के बाद अगर अब किसी भी प्रकार की खामियां सामने आई होंगी, तो उसे पुन: दुरूस्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाएगा।
बता दें कि उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से हमेशा से ही संवेदनशील सूबों की फेहरिस्त में शुमार रहा है। ऐसी स्थिति में सीआईएसएफ के इस कदम को काफी माना जा रहा है। \
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