अंतरराष्ट्रीय
बांग्लादेश में हिंसा और तख्तापलट केवल छात्र आंदोलन नहीं, भारत को इससे सबक लेने की जरूरत। 
बांग्लादेश में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन इतना बढ़ा कि शेख हसीना को अपनी सत्ता छोड़कर देश से भागना पड़ा। वह भारत पहुंचीं और कई देशों से अपने लिए शरण की गुहार लगाती दिखीं। लेकिन, यह मत सोचिए कि बांग्लादेश में जो कुछ हुआ है, वह बांग्लादेश तक ही सीमित है। क्योंकि, जब अमेरिकी डीप स्टेट, चीन और पाकिस्तान के साथ अन्य कई आतंकी ताकतें किसी देश में हस्तक्षेप करती हैं तो ऐसा ही होता है।
इसके पहले सबसे बेहतर उदाहरण अफगानिस्तान और श्रीलंका में हुआ तख्तापलट है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई शेख हसीना की सरकार ने ये सोचा भी नहीं होगा कि पाकिस्तान की राह पर चलकर वहां भी सेना के इशारे पर तख्तापलट की साजिश होगी और वह भी छात्र आंदोलन की आड़ में, जिसमें देश की आतंकी ताकतें भी शामिल होंगी। यह जो आंदोलन बांग्लादेश में देखने को मिला, यह केवल बांग्लादेश तक ही सीमित है, ऐसा सोचना हमारे लिए भी खतरनाक हो सकता है। क्योंकि, पश्चिमी देश जो दूसरे देशों के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करते हैं तो उसका असर ऐसा ही होता है।
शेख हसीना लोकतांत्रिक तरीके से चुनावी प्रक्रिया के जरिए चौथी बार चुनकर वहां की सत्ता पर काबिज हुई थी। लेकिन, वहां बेगम खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और बांग्लादेश के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन, जमात-ए-इस्लामी यह पचा नहीं पा रही थी और फिर अमेरिकी डीप स्टेट, चीन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का जिस तरह से उन्हें सपोर्ट मिला, उसी की तस्वीरें आपको बांग्लादेश में नजर आ रही है। मतलब साफ था कि वहां जो सत्ता में नहीं आ सके, उन्होंने अलगाववाद, हिंसा, अराजकता के साथ सेना का सहारा लेकर वहां तख्तापलट दिया और इसमें उन्हें दूसरे देशों से भी खूब सहारा मिला। जिसमें अमेरिकी डीप स्टेट, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई, पाकिस्तान के कई आतंकी संगठन, चीन की भी कम्युनिस्ट पार्टियों का समर्थन मिला।
शेख हसीना अमेरिका और चीन की परवाह किए बिना बांग्लादेश को ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत के तहत विकास के रास्ते पर आगे ले जा रही थी। जिसकी वजह से एशिया के कई देशों के मुकाबले ‘विकास और हैप्पीनेस’ के मामले में बांग्लादेश बेहतर स्थिति में था, जो अमेरिका और चीन सहित पाकिस्तान की कई ताकतों को एकदम पसंद नहीं आ रहा था। सुपर पावर अमेरिका बांग्लादेश में एयरबेस के लिए जमीन मांग चुका था और शेख हसीना ने इससे इनकार कर दिया था।
अमेरिका इससे नाराज था और वह चाहता था कि हसीना बांग्लादेश का चुनाव हार जाए। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं और अब अमेरिका को लग गया कि उनके हाथ से चीजें खिसक गई है और उन्होंने इस बात का समर्थन शुरू किया कि हसीना ने अलोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराए। जबकि, यही अमेरिका पाकिस्तान में इमरान खान की चुनी हुई सरकार को गिराने और आर्मी की मदद से शाहबाज शरीफ की सरकार बनवाने के लिए आगे आई और वहां शाहबाज की सरकार का गठन कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। उसे ऐसे में पाकिस्तान में लोकतंत्र दिखाई देता है और बांग्लादेश में सबकुछ अलोकतांत्रिक दिखाई देता है। शेख हसीना ने अपने दो दशक के कार्यकाल में भारत और चीन दोनों के साथ अपने संबंध बेहतर बनाए।
भारत के साथ वह ‘फ्री ट्रेड’ की राह पर भी बढ़ रही थी, लेकिन चीन को तो बांग्लादेश में बीआरई के लिए जमीन चाहिए थी। हसीना इसके लिए राजी नहीं थी, ऐसे में वह चीन को भी नाराज कर बैठी। ऐसे में हसीना घेरलू मोर्चे पर, इस्लामिक रेडिकलिज्म के मोर्चे पर घिरने के साथ ही विदेशी सुपर पावर की आंखों में भी खटकने लगी थी। बांग्लादेश में जो हुआ उसको लेकर अमेरिका की तरफ से यहां तक कहा गया कि लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की इजाजत दी जाए। लेकिन, जिस तरह से ढाका में सड़कों पर उतरकर वहां के लोगों को बंधक बनाया गया। हिंसा का नंगा नाच सड़कों पर हुआ।
कट्टर इस्लामी ताकतें अपनी क्षमता का प्रदर्शन करती वहां की सड़कों पर दिखीं। कई राजनीतिक नेताओं की हत्याएं और साथ ही खास लोगों के घरों को जलाना ये कहीं से शांतिपूर्ण प्रदर्शन तो नहीं लग रहा है और अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए इसको लेकर क्या कर रही है, यह किसी को भी पता नहीं है। यह किसी भी तरह से छात्र आंदोलन तो नहीं नजर आ रहा बल्कि यह एक तरह से कट्टर इस्लामी ताकतों का वहां की सड़कों पर तांडव है।
क्या इन ताकतों को सड़कों पर देखकर लगता है कि यह वहां की संस्थाओं का सम्मान करते हैं। ऐसे में यह भी देखना होगा कि इस तख्तापलट के बाद वहां सत्ता में किसकी वापसी हो रही है, जो वहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कराए गए चुनाव में हार गए थे। भारत में भी हालात ऐसे ही हो सकते हैं, ऐसे में हमें सावधान और सतर्क रहकर सोचने की जरूरत है। क्योंकि जिस दिन ये पश्चिमी देश हमारे यहां लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर घुसे, उस दिन के लिए हमें बांग्लादेश से सबक लेने की जरूरत है कि उनके साथ क्या हुआ। हमारे राजनेता देश के बाहर जाकर यह कहते हैं कि भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को हस्तक्षेप करना चाहिए। इसके साथ ही हमें यह देखना होगा कि क्या हम राज्यों में विभेद देखकर, जातियों में बंटकर उन राजनीतिक ताकतों के हाथों की कठपुतली तो नहीं बन रहे हैं जो चुनाव जीतकर सत्ता में नहीं आ पाए और उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
जिस तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ पार्टियों ने ‘आरक्षण खत्म होगा’ और ‘संविधान बदला जाएगा’ का डर दिखाकर चुनाव की पूरी व्यवस्था को अलग रंग दे दिया, कहीं वह ताकतें देश में बांग्लादेश वाली स्थिति तो नहीं पैदा करना चाहती हैं। तीसरा जिस तरह देश के कुछ राजनीतिक दल धर्म के नाम पर अलसंख्यकों को डरा रहे हैं और बहुसंख्यक जातियों में फूट पैदा कर उन्हें एक आंदोलन के लिए आरक्षण, जाति जनगणना और हिस्सेदारी के नाम पर भड़का रहे हैं। कहीं वह यहां भी बांग्लादेश की तरह तख्तापलट कर सत्ता में काबिज होने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं।
देश में जिस तरह से पिछले दस सालों में आंदोलन खड़े किए गए। जिस तरह से सीएए के नाम पर सड़कों को घेरा गया, दिल्ली में 50 से ज्यादा लोगों की दंगे में जान गई। किसान आंदोलन के नाम पर जिस तरह से शांतिपूर्ण प्रोस्टेट को समर्थन देकर उग्र बनाया गया। लाल किले की प्राचीर पर प्रदर्शनकारियों द्वारा जिस तरह से तांडव किया गया। तिरंगे के साथ जिस तरह से लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराया गया।
जिस तरह से देश की संस्थाओं को बदनाम करने और उसके खिलाफ लोगों के मन में एक तरह का भय पैदा करने की कोशिश की जा रही है, कहीं यह बांग्लादेश की स्थिति को यहां दोहराने की कोशिश तो नहीं है। क्योंकि, बांग्लादेश में देखकर यह सीखना होगा कि क्या जो राजनीतिक ताकतें देश के लोकतंत्र के लिए पश्चिमी ताकतों को देश में हस्तक्षेप के बारे में कह रही हैं, क्या वह सही है? दूसरा, इस तरह के प्रदर्शन की तो तस्वीरें सामने आ रही हैं, क्या ये संस्थाओें का समर्थन करते हैं? तीसरा, ये केवल देश को दूसरी ताकतों के हाथों बेचने के लिए ऐसा कर रहे हैं? और अंतिम, ऐसे प्रदर्शनकारियों को लोकतांत्रिक मूल्यों से और चुनाव से कुछ भी लेना-देना नहीं है, ये किसी भी हालत में केवल सत्ता को अपने हाथ में रखना चाहते हैं।
राष्ट्रीय समाचार
कमजोर वैश्विक संकेतों से गिरावट के साथ खुला शेयर बाजार, फाइनेंशियल स्टॉक्स पर दबाव

भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ खुला। सुबह 9:28 पर सेंसेक्स 267 अंक या 0.34 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 78,686 और निफ्टी 34 अंक या 0.14 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 24,603 पर था।
शुरुआती कारोबार में बिकवाली का दबाव फाइनेंशियल स्टॉक्स में देखा जा रहा है। सूचकांकों में निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज टॉप लूजर्स था। निफ्टी प्राइवेट बैंक, निफ्टी मीडिया, निफ्टी पीएसयू बैंक, निफ्टी सर्विसेज, निफ्टी कमोडिटीज, निफ्टी फार्मा और निफ्टी इन्फ्रा भी हरे निशान में थे। दूसरी तरफ निफ्टी आईटी, निफ्टी ऑटो, निफ्टी रियल्टी, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी एनर्जी, निफ्टी इंडिया डिफेंस और निफ्टी ऑयल एंड गैस लाल निशान में थे।
सेंसेक्स पैक में टीसीएस, टेक महिंद्रा, एचसीएल टेक, इन्फोसिस,एमएंडएम, एनटीपीसी, बीईएल, सन फार्मा, एसबीआई, एलएंडटी, पावर ग्रिड, टाइटन और आईटीसी हरे निशान में थे। बजाज फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, ट्रेंट, आईसीआईसीआई बैंक, भारती एयरटेल, इटरनल और अल्ट्राटेक सीमेंट लाल निशान में थे।
मिडकैप और स्मॉलकैप में मिलाजुला कारोबार हो रहा है। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 122 अंक या 0.19 प्रतिशत की मजबूती के साथ 63,446 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 38 अंक या 0.19 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 19,839 पर था।
जानकारों ने कहा, “मार्केट में स्थिरता आ रही है और यह धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ रहा है। निकट भविष्य में यह ट्रेंड जारी रहने की संभावना है, जिससे आगे ब्रेकआउट आ सकता है। पहली के नतीजों से कुछ अहम बातें सामने आई हैं, जिन्हें निवेशकों को ध्यान में रखना चाहिए, जिसमें पहली बात, फाइनेंशियल, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स और टेलीकॉम जैसे सेक्टर की अधिकतर कंपनियों ने आय और मुनाफे में दोहरे अंकों की ग्रोथ दर्ज की है। इससे उनके स्टॉक की कीमतों को मजबूती मिली है। दूसरा, आईटी सेक्टर को धीमी ग्रोथ और एआई के असर को लेकर चिंताओं का सामना करना पड़ा रहा है। तीसरा, मेटल्स और ऑयल जैसी कमोडिटीज के मामले में मिली-जुली स्थिति रही है।”
ज्यादातर एशियाई बाजारों में भी मिलाजुला कारोबार हो रहा था। टोक्यो, बैंकॉक और सोल लाल निशान में थे। शंघाई, हांगकांग और जकार्ता हरे निशान में थे। अमेरिकी शेयर बाजार गुरुवार को लाल निशान में बंद हुआ था, जिसमें डाओ जोन्स 0.85 प्रतिशत की कमजोरी के साथ और टेक्नोलॉजी इंडेक्स नैस्डैक 0.06 प्रतिशत की गिरावट के साथ सपाट बंद हुआ।
व्यापार
सोने और चांदी में तेजी के साथ कारोबार, कीमतें एक प्रतिशत तक बढ़ीं

सोने और चांदी की शुरुआत मंगलवार को तेजी के साथ हुई और दोनों कीमती धातुओं में करीब एक प्रतिशत की बढ़त देखी गई।
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने का 5 अक्टूबर, 2026 का कॉन्ट्रैक्ट पिछली क्लोजिंग 1,42,915 रुपए प्रति 10 ग्राम के मुकाबले 1,43,559 रुपए प्रति 10 ग्राम पर खुला।
सुबह 9:50 पर यह 555 रुपए या 0.39 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,43,470 रुपए प्रति 10 ग्राम पर खुला। अब तक के कारोबार में सोने ने 1,43,365 रुपए प्रति 10 ग्राम का न्यूनतम स्तर और 1,43,915 रुपए प्रति 10 ग्राम का उच्चतम स्तर छुआ।
सोने के साथ चांदी में भी तेजी देखी गई।
चांदी का 4 सितंबर, 2026 का कॉन्ट्रैक्ट पिछली क्लोजिंग 2,16,746 रुपए प्रति किलो के मुकाबले 2,18,143 रुपए प्रति किलो पर खुला।
फिलहाल यह 2,354 रुपए या 1.09 प्रतिशत की तेजी के साथ 2,19,100 रुपए प्रति किलो पर खुला।
अब तक के कारोबार में चांदी ने 2,18,143 रुपए प्रति किलो का न्यूनतम स्तर और 2,19,896 रुपए प्रति किलो का उच्चतम स्तर छुआ।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में तेजी देखने को मिली। कॉमेक्स पर सोना 0.55 प्रतिशत की तेजी के साथ 4,113 डॉलर प्रति औंस और चांदी 1.98 प्रतिशत की बढ़त के साथ 59 डॉलर प्रति औंस पर था।
इसके अलावा, वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ‘गोल्ड डिमांड ट्रेंड्स’ रिपोर्ट में बताया गया कि 2026 की दूसरी तिमाही में सोने की कुल मांग सालाना आधार पर 1,269 टन पर स्थिर रही। वहीं, साल की पहली छमाही मांग सालाना आधार पर 2 प्रतिशत बढ़कर अनुमानित 2,522 टन (जिसकी कीमत 380 अरब डॉलर थी) हो गई है।
साल की दूसरी तिमाही में गोल्ड ईटीएफ, बार और सिक्कों में निवेश घटकर 262 टन रह गया। इस गिरावट की मुख्य वजह दूसरी तिमाही में गोल्ड-बैक्ड ईटीएफ से 45 टन की निकासी थी, हालांकि साल की पहली छमाही में ईटीएफ की मांग 18 टन के साथ थोड़ी सकारात्मक बनी रही। बार और सिक्कों में निवेश काफी हद तक स्थिर रहा; दूसरी तिमाही में इसमें साल-दर-साल सिर्फ 3 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि पहली छमाही की मांग पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 21 प्रतिशत ज्यादा रही, जिसकी वजह पहली तिमाही में हुई जबरदस्त मांग थी।
व्यापार
गोदरेज प्रॉपर्टीज का पहली तिमाही में मुनाफा 46 प्रतिशत घटा, रेवेन्यू में 85 प्रतिशत की बड़ी गिरावट

देश की प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी गोदरेज प्रॉपर्टीज ने मंगलवार को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के नतीजे जारी किए। इस दौरान कंपनी के मुनाफे और राजस्व में गिरावट दर्ज की गई।
जून तिमाही में कंपनी के समेकित शुद्ध लाभ (पीएटी) में तिमाही-दर-तिमाही 46 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछली तिमाही के 650 करोड़ रुपए के मुकाबले 350 करोड़ रुपए रह गया।
वहीं, पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही के मुकाबले भी मुनाफा 41.7 प्रतिशत घटा है। एक साल पहले यह आंकड़ा 600 करोड़ रुपए था।
कंपनी की ऑपरेशनल आय यानी परिचालन से राजस्व में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली। जून तिमाही में राजस्व घटकर 506 करोड़ रुपए रह गया, जबकि मार्च तिमाही में यह 3,458 करोड़ रुपए था। इस तरह तिमाही आधार पर राजस्व में 85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, सालाना आधार पर कंपनी का राजस्व 16.5 प्रतिशत बढ़ा है, क्योंकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 435 करोड़ रुपए था।
परिचालन स्तर पर भी कंपनी का प्रदर्शन दबाव में रहा। गोदरेज प्रॉपर्टीज ने अप्रैल-जून तिमाही में 285 करोड़ रुपए का ईबीआईटीडीए घाटा दर्ज किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में ईबीआईटीडीए घाटा 243 करोड़ रुपए था। इसके अलावा, कंपनी की अन्य आय भी घटकर 839 करोड़ रुपए रह गई, जो एक साल पहले 1,186 करोड़ रुपए थी।
हालांकि, बिक्री और मांग के मोर्चे पर कंपनी को अच्छी सफलता मिली। जून तिमाही में कुल बुकिंग वैल्यू 8,651 करोड़ रुपए रही, जो पिछले साल की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक है। खास बात यह है कि यह लगातार छठी तिमाही है जब कंपनी की बुकिंग्स 7,000 करोड़ रुपए से ऊपर रही हैं।
तिमाही के दौरान कंपनी ने 3,738 आवासीय इकाइयों (यूनिट्स) की बिक्री की। इनकी कुल बिक्री योग्य क्षेत्रफल 62 लाख वर्ग फुट (6.2 मिलियन स्क्वायर फीट) रहा।
बुकिंग्स के लिहाज से बेंगलुरु कंपनी का सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा, जहां से कुल बुकिंग्स का 44 प्रतिशत योगदान मिला। इसके बाद मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) का योगदान 21 प्रतिशत, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का 18 प्रतिशत, पुणे का 11 प्रतिशत और हैदराबाद का 5 प्रतिशत रहा।
तिमाही नतीजों के साथ कंपनी के निदेशक मंडल ने गोदरेज हाउसिंग प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के गोदरेज प्रॉपर्टीज लिमिटेड में विलय को भी मंजूरी दे दी है। कंपनी का मानना है कि इससे कारोबारी ढांचे को और अधिक सरल और प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
कमजोर वित्तीय नतीजों के बाद शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। बीएसई पर गोदरेज प्रॉपर्टीज का शेयर करीब 4 प्रतिशत गिरकर 1,992.80 रुपए के इंट्राडे निचले स्तर तक पहुंच गया। कंपनी का शेयर पिछले 52 हफ्तों में 2,351.60 रुपए के उच्चतम और 1,434 रुपए के न्यूनतम स्तर को छू चुका है।
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