राष्ट्रीय समाचार
संयुक्त किसान मोर्चा 26 फरवरी को ट्रैक्टर मार्च निकालेगा, 14 मार्च को दिल्ली में करेेगा ‘महापंचायत’
चंडीगढ़, 22 फरवरी। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने आंदोलन के कारण पंजाब और हरियाणा के बीच अंतर्राज्यीय सीमाओं पर तनावपूर्ण स्थिति को लेकर चर्चा करने के बाद गुरुवार को बैठक की, जिसमें 26 फरवरी को ट्रैक्टर मार्च निकालने और 14 मार्च को दिल्ली में ‘महापंचायत’ बुलाने की घोषणा की। हजारों किसान एक सप्ताह से अधिक समय से सीमाओं पर डेरा डाले हुए हैं।
बैठक में किसान आंदोलन के दौरान एक दिन पहले एक व्यक्ति की मौत पर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और गृहमंत्री अनिल विज के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने और मृतक को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने की मांग की गई।
भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत ने एसकेएम की समन्वय समिति की बैठक के बाद मीडिया से कहा कि उनकी मांगों को लागू नहीं किए जाने के कारण पूरे देश में किसान शुक्रवार को ‘काला दिवस’ मनाएंगे। उनकी प्रमुख मांगों में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी देने वाला कानून बनाया जाना भी शामिल है।
उन्होंने कहा, “हम हरियाणा के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ (आईपीसी की) धारा 320 के तहत हत्या का मामला दर्ज करने और एक प्रदर्शनकारी की मौत की न्यायिक जांच करवाने की मांग करते हैं।”
टिकैत ने कहा कि 26 फरवरी को पूरे देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के एक तरफ ट्रैक्टर मार्च निकाला जाएगा। “यात्रियों को सभी राजमार्गों के एक तरफ के उपयोग की अनुमति दी जाएगी। हम केवल एक तरफ ही ट्रैक्टर चलाएंगे।”
अगली रणनीति के तहत 14 मार्च को दिल्ली में एक ‘महापंचायत’ आयोजित की जाएगी।
पंजाब-हरियाणा सीमा पर दो धरना स्थलों में से एक, खनौरी सीमा पर झड़प में एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई और लगभग 12 पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद किसान नेताओं ने बुधवार को ‘दिल्ली चलो’ मार्च दो दिनों के लिए रोक दिया।
राजनीति
क्या यूपी में भी बिहार जैसी सफलता दोहरा पाएंगे असदुद्दीन ओवैसी?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोशिशों को झटका लगता दिख रहा है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या ओवैसी बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी अपनी चुनावी मौजूदगी से विपक्ष के समीकरण बिगाड़ सकते हैं?
बिहार में एआईएमआईएम नेताओं ने दावा किया था कि उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन के साथ सीट बंटवारे को लेकर बातचीत की थी, लेकिन उन्हें सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसके बाद पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में पांच सीटों पर जीत दर्ज की।
ओवैसी ने कथित तौर पर एक बार फिर भाजपा विरोधी दलों के साथ काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर से उन्हें फिलहाल दूरी का सामना करना पड़ रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव एआईएमआईएम को औपचारिक गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि सपा अपने मुस्लिम मतदाता आधार में एआईएमआईएम की राजनीतिक पकड़ मजबूत होने से बचना चाहती है।
इससे पहले एआईएमआईएम ने 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक, ओवैसी गठबंधन के विकल्प तलाश रहे हैं, जबकि सपा और कांग्रेस ने उनसे दूरी बना रखी है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों में एक बड़ा अंतर है। बिहार के सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम को मुस्लिम मतदाताओं का एक मजबूत और भौगोलिक रूप से केंद्रित आधार मिला है। इसी आधार पर पार्टी ने 2020 में पांच विधानसभा सीटें जीती थीं और 2025 में भी अपना प्रदर्शन दोहराया।
सीमांचल में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिले शामिल हैं। यहां पार्टी ने खुद को उन मुस्लिम मतदाताओं के लिए एक विकल्प के तौर पर पेश किया, जिन्हें राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत थी। हालांकि, आलोचकों ने ओवैसी पर विपक्षी वोटों को बांटने का आरोप लगाया। वहीं, एआईएमआईएम का कहना रहा कि वह केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खालीपन को भर रही है। बाद में राजनीतिक विश्लेषकों ने भी माना कि सीमांचल के कुछ इलाकों में एआईएमआईएम की मौजूदगी से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ और महागठबंधन के लिए मुस्लिम मतों को एकजुट करना मुश्किल हुआ।
उत्तर प्रदेश में स्थिति अलग है। यहां मुस्लिम मतदाता किसी एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित होने के बजाय रोहिलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध के कुछ हिस्सों और पूर्वी जिलों में फैले हुए हैं। इसके अलावा, 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सपा भाजपा विरोधी मुस्लिम मतदाताओं के लिए प्रमुख राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी है।
कई मुस्लिम मतदाता राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ चुनावी जीत की संभावनाओं को भी प्राथमिकता देते हैं। इससे सपा के पक्ष में रणनीतिक मतदान की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। ऐसे में ओवैसी के सामने यह चुनौती होगी कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाते हैं कि एआईएमआईएम को वोट देने से प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, न कि विपक्ष की चुनावी संभावनाएं कमजोर होंगी।
इसके बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और नेपाल तथा बिहार की सीमा से सटे उन जिलों में त्रिकोणीय मुकाबले देखने को मिल सकते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी संख्या में है और एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारती है।
इस बीच, मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ एआईएमआईएम के संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा है। इसे कथित ‘दलित-मुस्लिम’ या ‘भीम-मीम’ फॉर्मूले से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, रिपोर्टों के मुताबिक मायावती इस तरह के गठबंधन को लेकर अब तक अनिच्छुक दिख रही हैं। बसपा की ओर से संकेत मिले हैं कि पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना पसंद करेगी।
यदि दोनों दलों के बीच कोई चुनावी समझ बनती भी है, तो उसका दलित वोटों पर कितना असर होगा, इसको लेकर सवाल हैं। बसपा का मूल जाटव वोट बैंक ऐतिहासिक रूप से गठबंधन सहयोगियों के बजाय मायावती के प्रति अधिक वफादार रहा है।
अतीत में दलित-मुस्लिम गठजोड़ के प्रयोगों से भी बड़े पैमाने पर वोटों का एक-दूसरे के पक्ष में हस्तांतरण देखने को नहीं मिला है। वहीं, गैर-जाटव दलित समुदायों के मतदान व्यवहार में हाल के चुनावों में बदलाव देखने को मिला है और इनके कुछ वर्गों का झुकाव भाजपा की ओर भी रहा है।
कुल मिलाकर, बिहार का चुनावी अनुभव बताता है कि एआईएमआईएम को किसी पूरे राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत बनने की जरूरत नहीं है। किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र में मजबूत और केंद्रित वोट आधार भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। उत्तर प्रदेश में पार्टी ऐसा आधार तैयार कर पाती है या नहीं, यह 2027 के चुनाव में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
राष्ट्रीय समाचार
जम्मू-कश्मीर निजी विश्वविद्यालय नियम-2026 लागू, सीएम उमर अब्दुल्ला ने शिक्षा मंत्री को दी बधाई

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शिक्षा मंत्री शमीम फिरदौस को जम्मू-कश्मीर निजी विश्वविद्यालय नियम, 2026 (प्राइवेट यूनिवर्सिटीज रूल्स, 2026) की अधिसूचना जारी होने पर बधाई दी है। उन्होंने इसे क्षेत्र में उच्च शिक्षा की पहुंच बढ़ाने और शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए नियम जम्मू-कश्मीर में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन के लिए एक व्यापक नियामक ढांचा प्रदान करते हैं। इससे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के लिए जम्मू-कश्मीर में अपने परिसर स्थापित करने का अनुकूल माहौल बनेगा।
उन्होंने कहा कि 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच (स्क्रूटनी) सहित सरल अनुमोदन प्रक्रिया उच्च शिक्षा क्षेत्र में निवेश करने के इच्छुक संस्थानों के लिए व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाएगी। साथ ही, यह ढांचा जवाबदेही, गुणवत्ता आश्वासन और निर्धारित शैक्षणिक मानकों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निगरानी की भी व्यवस्था करता है।
मुख्यमंत्री ने स्थानीय हितों की रक्षा पर जोर देते हुए कहा कि छात्र प्रवेश, शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों में जम्मू-कश्मीर के निवासियों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान स्थानीय युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अधिक अवसर सुनिश्चित करेगा।
उन्होंने कहा कि नियमों में प्रवेश प्रक्रिया, फीस ढांचे और शैक्षणिक मानकों की निगरानी के लिए एक समर्पित नियामक व्यवस्था का भी प्रावधान है। नियमों के उल्लंघन, अनियमित प्रवेश, अधिक फीस वसूली, अमान्य डिग्री जारी करने, योग्य शिक्षकों की कमी तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी गड़बड़ियों पर कड़ी कार्रवाई और दंड का प्रावधान किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नए नियमों से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम), चिकित्सा, कानून, बिजनेस स्टडीज और लिबरल आर्ट्स जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नए संस्थानों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा। इससे छात्रों को अधिक शैक्षणिक विकल्प मिलेंगे, अंतर्विषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा और शिक्षण, अनुसंधान तथा नवाचार के नए अवसर पैदा होंगे।
उन्होंने विश्वास जताया कि प्रतिष्ठित संस्थानों के आने से स्थानीय छात्रों को अपने क्षेत्र में ही वैश्विक मानकों वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होगी। साथ ही, इससे देश और विदेश के प्रमुख शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को आकर्षित करने तथा अनुसंधान सहयोग और संस्थागत साझेदारी को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने दोहराया कि सरकार एक पारदर्शी, पूर्वानुमेय और निवेशक-अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो जिम्मेदार निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ छात्रों के हितों की रक्षा और उच्च शैक्षणिक गुणवत्ता को सुनिश्चित करे।
उन्होंने स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू के योगदान की भी सराहना की। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब इस वर्ष बजट सत्र के दौरान जम्मू-कश्मीर विधानसभा में निजी विश्वविद्यालय विधेयक पारित हुआ था, तब शिक्षा विभाग का कार्यभार उनके पास था और उन्होंने विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इन नियमों की अधिसूचना उच्च शिक्षा के विकास और आधुनिकीकरण के लिए शुरू किए गए विधायी प्रयासों को प्रभावी संस्थागत ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
राष्ट्रीय समाचार
एलआईसी का तिमाही-छमाही प्रदर्शन काफी मजबूत, आईडीबीआई बैंक विनिवेश से बैंकएश्योरेंस कारोबार पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर: सीईओ

भारत के सबसे बड़ी सरकारी जीवन बीमा और निवेश कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (एमडी व सीईओ) आर. दोराईस्वामी ने शनिवार को कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही और पहली छमाही में एलआईसी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा है। उन्होंने बताया कि नए व्यवसाय प्रीमियम, कुल प्रीमियम आय और अन्य प्रमुख वित्तीय मानकों में अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही कंपनी का वैल्यू ऑफ न्यू बिजनेस (वीएनबी) मार्जिन भी पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर हुआ है।
न्यूज एजेंसी आईएएनएस से खास बातचीत में दोराईस्वामी ने कहा कि हाल के महीनों में शेयर बाजारों में बढ़ती अस्थिरता और इक्विटी निवेश साधनों के मूल्यांकन पर दबाव का असर बाजार से जुड़े बीमा उत्पादों, खासकर यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूएलआईपी) की बिक्री पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि निवेशकों की रुचि नियमित प्रीमियम वाले मार्केट-लिंक्ड उत्पादों में कुछ कम हुई, जिसके कारण दूसरी तिमाही में यूएलआईपी बिक्री में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल बाजार की स्थिति का परिणाम नहीं था, बल्कि एलआईसी ने प्रबंधन स्तर पर भी रणनीतिक बदलाव करते हुए उच्च टिकट साइज वाले यूएलआईपी और प्रोटेक्शन बिजनेस पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि बाजार की धारणा में सुधार के साथ चालू और आगामी तिमाही में बेहतर नतीजों की उम्मीद है।
वीएनबी मार्जिन में सुधार को लेकर एलआईसी के सीईओ ने कहा कि इसका सबसे बड़ा कारण उत्पादों के मिश्रण में बदलाव और परिचालन दक्षता में सुधार रहा है। उन्होंने कहा, “परिचालन स्तर पर कई सकारात्मक बदलाव हुए हैं, जिनका सीधा असर लाभप्रदता पर पड़ा है। हालांकि जोखिम-मुक्त ब्याज दरों से संबंधित कुछ प्रतिकूल प्रभाव रहे, लेकिन कुल मिलाकर कंपनी बेहतर मार्जिन दर्ज करने में सफल रही।”
बीमा वितरण प्रणाली में प्रस्तावित नियामकीय बदलावों और वितरण लागत पर संभावित सीमा को लेकर उन्होंने कहा कि भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) की यह पहल लंबे समय में पॉलिसीधारकों और उद्योग, दोनों के हित में है। उन्होंने कहा कि बीमा वितरण लागत को नियंत्रित करना सही दिशा में उठाया गया कदम है। उन्होंने कहा कि एलआईसी पहले से ही अधिकांश उत्पाद श्रेणियों में प्रस्तावित सीमाओं के भीतर है और कुछ विशेष उत्पादों तथा प्रीमियम भुगतान अवधि से जुड़े मामलों पर नियामक को सुझाव दिए गए हैं। उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा कि नियामक विभिन्न पक्षों से मिले सुझावों पर उचित विचार करेगा।
एलआईसी एजेंटों की भूमिका पर बोलते हुए दोराईस्वामी ने कहा, “कंपनी व्यक्तिगत एजेंट नेटवर्क को केवल वितरण चैनल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखती है। एजेंटों की उत्पादकता बढ़ाने, प्रशिक्षण देने और उनकी क्षमता निर्माण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में एजेंटों को बीमा क्षेत्र में दीर्घकालिक करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।”
आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इससे एलआईसी के बैंकएश्योरेंस कारोबार पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा, “आईडीबीआई बैंक लंबे समय से एलआईसी का प्रमुख साझेदार रहा है और भविष्य में भी यह सहयोग जारी रहने की उम्मीद है, भले ही बैंक के अन्य जीवन बीमा साझेदार भी हों।”
साइबर सुरक्षा को लेकर दोराईस्वामी ने कहा कि एलआईसी ने अपने आईटी सिस्टम को सुरक्षित बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित सुरक्षा उपायों का भी उपयोग किया जा रहा है और एलआईसी की डिजिटल संरचना को महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना के रूप में विशेष निगरानी और सरकारी सहयोग प्राप्त है।
भविष्य की रणनीति पर उन्होंने कहा, “एलआईसी अब प्रोटेक्शन बिजनेस, हेल्थ इंश्योरेंस, एन्युटी और पेंशन उत्पादों पर विशेष ध्यान दे रही है। हाल में कंपनी ने बीमा प्लेटिनम, जीवन रक्षा, एलआईसी कैंसर कवर और एलआईसी हेल्थ शील्ड जैसे उत्पाद लॉन्च किए हैं। साथ ही सेवानिवृत्ति योजना और नियमित आय से जुड़े उत्पादों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।” उन्होंने कहा कि बचत, प्रोटेक्शन, यूएलआईपी, एन्युटी और ग्रुप इंश्योरेंस जैसे सभी क्षेत्रों में संतुलित वृद्धि की रणनीति अपनाई जाएगी।
‘इंश्योरेंस फॉर ऑल 2047’ लक्ष्य पर दोराईस्वामी ने कहा कि एलआईसी देश के हर हिस्से तक बीमा पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि बीमा सखी योजना के माध्यम से हर ग्राम पंचायत में कम से कम एक महिला एजेंट तैनात करने का प्रयास किया जा रहा है।
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