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अमेरिकी नौसेना में सिख अब रख सकेंगे दाढ़ी व पहन सकेंगे पगड़ी

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Sikhs


न्यूयॉर्क, 24 दिसम्बर :
एक ऐतिहासिक कदम के तहत एक संघीय अपील अदालत ने फैसला सुनाया है कि यूएस मरीन कॉर्प्स में भर्ती होने वाले सिख दाढ़ी रख सकते हैं और पगड़ी पहन सकते हैं। डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया की संघीय अपील अदालत के न्यायाधीशों ने शुक्रवार को अप्रेजेंट कॉर्प्स के बाल काटने और दाढ़ी मुंडवाने के नियम को धार्मिक स्वतंत्रता बहाली अधिनियम का उल्लंघन बताया। यह फैसला सिख मरीन कॉर्प्स के तीन रंगरूटों आकाश सिंह, जसकीरत सिंह और मिलाप सिंह चहल के बाद आया, जिन्होंने कॉर्प्स के बूट कैंप नियम से तत्काल छूट पाने के लिए डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया की संघीय अदालत में एक आपातकालीन अपील के लिए लड़ाई लड़ी थी।

सिख तिकड़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील एरिक बैक्सटर ने ट्वीट किया, अब, तीन सिख रंगरूट, जिन्हें पहले धार्मिक आवास से वंचित कर दिया गया था, बुनियादी प्रशिक्षण में प्रवेश कर सकते हैं। सिख धर्म में पुरुष पगड़ी पहनते हैं और वे अपनी दाढ़ी या बाल नहीं कटवाते हैं।

मरीन कॉर्प्स ने पहले इन सभी अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया था, जिसके कारण ये तिकड़ी सालों से पूली बनी हुई है, एक व्यक्ति जिसने पहले से ही मरीन बनने के लिए साइन अप कर लिया है, लेकिन बूट कैंप में भर्ती प्रशिक्षण के लिए अभी तक नहीं छोड़ा है।

इसके अलावा, मरीन कॉर्प्स ने तर्क दिया कि सिखों को धार्मिक दाढ़ी रखने की अनुमति देने से सेना की एकरूपता और भर्तियों के बीच उपस्थिति बाधित होगी, अंतत: राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा होगा।

यह अमेरिकी सेना की अन्य शाखाओं के बावजूद अमेरिकी सेना, नौसेना, वायु सेना और तट रक्षक पहले से ही सिख धर्म की धार्मिक आवश्यकताओं को समायोजित कर रही है।

अदालत के लिए लिखते हुए, जज मिलेट ने कहा कि सिख रंगरूटों के पास न केवल योग्यता के आधार पर सफलता की पर्याप्त संभावना है, बल्कि उन्हें खोने की कल्पना करना भी मुश्किल है।

अंतरराष्ट्रीय समाचार

चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने राष्ट्रपति मुर्मु से की मुलाकात, हासिल किया परिचय पत्र

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चीन में भारत के राजदूत विक्रम दोराईस्वामी ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से अपने परिचय पत्र प्राप्त किए हैं। चीन में भारतीय दूतावास ने इसकी जानकारी दी। मार्च में 1992 बैच के आईएफएस अधिकारी दोराईस्वामी को चीन में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया था।

चीन में भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “विक्रम दोराईस्वामी को चीन में राजदूत के तौर पर उनके असाइनमेंट के लिए भारत की राष्ट्रपति से क्रेडेंशियल्स मिले।” 1992 बैच के आईएफएस अधिकारी विक्रम दोराईस्वामी को चीन में भारत का अगला राजदूत नियुक्त किया गया है। विदेश मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर डिग्री ली।

1992-1993 में नई दिल्ली में अपनी इन-सर्विस ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, दोराईस्वामी मई 1994 में हांगकांग में भारतीय दूतावास में थर्ड सचिव नियुक्त हुए। उन्होंने हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय के न्यू एशिया येल-इन-एशिया लैंग्वेज स्कूल से चीनी भाषा में डिप्लोमा पूरा किया।

विदेश मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी में बताया गया कि विक्रम दोराईस्वामी अभी ब्रिटेन में भारत के हाई कमिश्नर हैं और उन्हें चीन में भारत का अगला राजदूत नियुक्त किया गया है। उम्मीद है कि वह जल्द ही यह काम संभाल लेंगे।

सितंबर 1996 में उन्हें बीजिंग में भारतीय दूतावास में नियुक्त किया गया था, जहां उन्होंने लगभग चार साल तक जिम्मेदारी संभाली। फिर 2000 में नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय में लौटने पर दोराईस्वामी ने डिप्टी चीफ ऑफ प्रोटोकॉल (ऑफिशियल) नियुक्त की भूमिका निभाई। दो साल बाद उन्हें प्रधानमंत्री के ऑफिस में प्रमोट किया गया। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री के निजी सचिव के तौर पर काम किया।

2006 में दोराईस्वामी ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में राजनीतिक सलाहकार के तौर पर और अक्टूबर 2009 में जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में भारत के महावाणिज्य दूत के तौर पर कार्यभार संभाला।

जुलाई 2011 में दोराईस्वामी नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय में वापस आ गए, जहां उन्होंने साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन (एसएएआरसी) विभाग का नेतृत्व किया। इस दौरान वे मार्च 2012 में नई दिल्ली में चौथे ब्रिक्स समिट के कोऑर्डिनेटर भी थे।

फिर अक्टूबर 2012 से अक्टूबर 2014 तक दोराईस्वामी विदेश मंत्रालय के अमेरिकी विभाग में संयुक्त सचिव थे। अप्रैल 2015 में कोरिया में भारत के राजदूत नियुक्त होने से पहले वे अक्टूबर 2014 में उज्बेकिस्तान में भारत के राजदूत बने।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

अमेरिका-ईरान में तनाव बढ़ने से कच्चा तेल चार वर्षों के उच्चतम स्तर पर

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अमेरिका-ईरान में तनाव बढ़ने की संभावना के चलते गुरुवार को कच्चे तेल की कीमत चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

भारतीय समयानुसार सुबह 10:22 पर बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का दाम 6.33 प्रतिशत बढ़कर 125.5 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है। वहीं, डब्ल्यूटीआई क्रूड का दाम 3.35 प्रतिशत बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल हो गया है।

इससे पहले कच्चे तेल में यह कीमतें 2022 की शुरुआत में रूस-यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के दौरान देखी गई थीं।

कच्चे तेल में तेजी ऐसे समय पर देखी गई है, जब कुछ अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका की सेंट्रल कमांड ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान में संभावित कार्रवाई के विकल्पों के बारे में जानकारी देगी। इससे दोनों देशों में फिर से संघर्ष शुरू होने की संभावना में इजाफा हुआ है।

अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के ब्लॉक कर रखा है, जिससे ईरान का तेल निर्यात करीब रुक गया है। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से कहा गया कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कोई समझौता नहीं करता, तब तक यह नाकेबंदी नहीं हटेगी। ईरान भी पीछे हटने के तैयार नहीं है। हालांकि, वह अमेरिका के शांति के प्रस्ताव दे चुका है, जिसे ट्रंप ने ठुकरा दिया था।

इस हफ्ते की शुरुआत में मध्य पूर्व में तनाव के कारण अमेरिकी इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन सैश ने 2026 की चौथी तिमाही के लिए कच्चे तेल की औसत कीमतों के अनुमान में फिर एक बार बढ़ोतरी की है।

अमेरिकी इन्वेस्टमेंट बैंक का कहना है कि इस साल के अक्टूबर से दिसंबर अवधि में ब्रेंट क्रूड की कीमत औसत 90 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड का दाम औसत 83 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है।

औसत कीमतों में संशोधन की वजह, मध्य पूर्व में लगातार तनाव बने रहने के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित रहना है। इससे पहले गोल्डमैन सैश ने 2026 की चौथी तिमाही में ब्रेट क्रूड का दाम औसत 80 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड का दाम औसत 75 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया था।

इन्वेस्टमेंट बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि तनाव के चलते मध्य पूर्व से आने वाला लगभग 14.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल बाजार से बाहर हो गया है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

भारत और रूस के रक्षा मंत्रियों की मुलाकात, अंतरराष्ट्रीय हालात व रक्षा सहयोग पर बात

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भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रूस के रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलौसोव के साथ मुलाकात की है। इस मुलाकात के बाद राजनाथ सिंह ने इस बातचीत को बेहतरीन और सार्थक बताया। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान मंगलवार को भारत और रूस के बीच यह अहम द्विपक्षीय वार्ता हुई।

यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हालात पर विस्तार से चर्चा हुई। खास तौर पर रक्षा सहयोग, सैन्य तकनीक और संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत रक्षा संबंध रहे हैं।

भारतीय सशस्त्र बलों में उपयोग होने वाले कई प्रमुख सैन्य उपकरण और प्लेटफॉर्म रूस से जुड़े हैं। इसमें लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और मिसाइल प्रणाली जैसे अहम संसाधन शामिल हैं, जो भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत बनाते हैं। दोनों देश रक्षा उत्पादन में सहयोग को और विस्तार देने पर सहमति जताते रहे हैं। भारत में ही संयुक्त रूप से रक्षा उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलेगी और तकनीकी क्षमता में भी वृद्धि होगी।

दोनों पक्ष समय समय पर रक्षा परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा भी करते हैं। तय समयसीमा में रक्षा परियोजनाओं को पूरा को लेकर दोनों पक्षों के बीच सहमति है। माना जा रहा है कि सैन्य-तकनीकी सहयोग को और मजबूत बनाने के लिए नए क्षेत्रों की पहचान पर भी यहां चर्चा हुई।

इससे पहले मंगलवार को ही रक्षामंत्री राजनाथ सिंह व चीन के रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जुन के बीच एक महत्वपूर्ण मुलाकात हुई है। यह मुलाकात भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षा मंत्रियों की बैठक के इतर आयोजित की गई। दोनों देशों के रक्षामंत्रियों ने यहां क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी सहयोग पर चर्चा की। राजनाथ सिंह यहां एससीओ के अन्य सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के साथ भी द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। वह किर्गिस्तान में रह रहे भारतीय समुदाय से भी मुलाकात करेंगे।

माना जा रहा है कि इस उच्चस्तरीय बातचीत के दौरान दोनों देशों के रक्षामंत्रियों ने एशिया की मौजूदा सुरक्षा स्थिति व क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के उपायों पर विचार विमर्श किया। साथ ही भारत-चीन के बीच संवाद को मजबूत करने जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की गई। वहीं सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और तनाव कम करने के लिए प्रभावी संचार तंत्र को और मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एससीओ जैसे मंच पर इस तरह की द्विपक्षीय वार्ताएं सदस्य देशों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ाती हैं। बिश्केक में हुई यह बैठकें भारत-रूस के रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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