राजनीति
प्रधानमंत्री ने रोजगार मेले का उद्घाटन किया, बोले, आठ साल में बदल गई सरकारी व्यवस्था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि लाखों रिक्त पदों पर चयन की प्रक्रिया को चंद महीनों में पूरा करना और नियुक्ति पत्र जारी करना इस बात का संकेत है कि पिछले सात-आठ साल में सरकारी व्यवस्था में बदलाव आया है। उन्होंने वस्तुत: एक रोजगार मेले का उद्घाटन करते हुए ये अवलोकन किए, जहां 75,000 नव नियुक्त नियुक्तियों को नियुक्ति पत्र सौंपे गए।
प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि सरकार ने महामारी के दौरान एमएसएमई क्षेत्र को 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता प्रदान की, जिससे करोड़ों नौकरियों के नुकसान को रोकने में मदद मिली।
उन्होंने बताया कि केंद्र विनिर्माण और पर्यटन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है क्योंकि वे अधिकतम रोजगार पैदा करते हैं।
मोदी ने कहा, “आज वह दिन है जब देश में पिछले आठ वर्षो से चल रहे रोजगार और स्वरोजगार अभियानों से रोजगार मेला के रूप में एक नई कड़ी जुड़ रही है।”
प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के 75 साल को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार एक कार्यक्रम के तहत 75,000 युवाओं को नियुक्ति पत्र दे रही है।
रोजगार मेले का औचित्य बताते हुए उन्होंने कहा, “हमने तय किया है कि एक बार में नियुक्ति पत्र देने की परंपरा शुरू की जानी चाहिए ताकि परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का सामूहिक स्वभाव विभागों में विकसित हो।”
मोदी ने अपने वर्चुअल संबोधन में कहा, “भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। पिछले आठ वर्षों में हम दसवें स्थान से पांचवें स्थान पर पहुंच गए हैं। यह सच है कि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं महंगाई, बेरोजगारी से जूझ रही हैं.. 100 साल के सबसे बड़े संकट के दुष्परिणाम सिर्फ 100 दिनों में दूर नहीं हो सकते।”
उन्होंने कहा कि चुनौतियों के बावजूद, “भारत पूरी ताकत से, नई पहल और कुछ जोखिमों के साथ, वैश्विक संकट से खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है। हम आपके सहयोग से अब तक खुद को बचा पाए हैं। हमने पिछले आठ वर्षों में उन मुद्दों को कम किया है जो हमारे रास्ते में बाधाएं पैदा करते हैं।”
प्रधानमंत्री ने उन दिनों को याद किया जब सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करना एक बोझिल प्रक्रिया थी और चयन में पक्षपात और भ्रष्टाचार व्याप्त था। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के शुरुआती वर्षो में केंद्र सरकार के ग्रुप सी और ग्रुप डी पदों पर सेल्फ अटेस्टेशन और इंटरव्यू खत्म करने जैसे कदमों से युवाओं को मदद मिली है।
राजनीति
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई में ‘बेबी-ममता’ की नजदीकियों से वामपंथियों के बीच बेचैनी बढ़ी

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ पूरे देश में एक गठबंधन बनाने के लिए विपक्ष के बीच दिख रही एकजुटता शायद अभी तक शीर्ष नेतृत्व से नीचे जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंची है। हाल ही में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीआईएम के महासचिव एमए बेबी और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट के बीच दिखी नजदीकी ने खबरों के अनुसार वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) के कुछ हिस्सों में एक असहज बहस छेड़ दी है।
ऐसा लगता है कि नई दिल्ली में रविवार को ‘इंडिया’ ब्लॉक की रैली की एक तस्वीर सामने आने के बाद यह विवाद और भड़क गया है। इस तस्वीर में ‘बेबी’ (एमए बेबी) ममता बनर्जी के कान में कुछ फुसफुसाते हुए दिख रहे हैं, और ममता मुस्कुराते हुए उनकी बात ध्यान से सुन रही हैं।
कुछ समय पहले तक ऐसी तस्वीर की कल्पना करना भी मुश्किल था, और लोग इसे नापसंद भी करते। ऐसा इसलिए है क्योंकि ममता का एकमात्र राजनीतिक लक्ष्य पश्चिम बंगाल में वामपंथियों (लेफ्ट) के गढ़ को तोड़ना था। उन्होंने 2011 में यह हासिल भी कर लिया—कांग्रेस पार्टी छोड़ने के लगभग 13 साल बाद जब उन्होंने कांग्रेस के राजनीतिक इरादों पर सवाल उठाए थे।
इस विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि क्या वामपंथी दल, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कड़ा राजनीतिक संघर्ष जारी रखते हुए भाजपा से भी प्रभावी ढंग से लड़ सकते हैं, खासकर पश्चिम बंगाल में?
कम्युनिस्टों के बीच एक विचारधारा यह है कि भाजपा से लड़ने के लिए वामपंथी दलों को अपने ‘दुश्मन के दुश्मन’ के साथ हाथ मिला लेना चाहिए, भले ही वे क्षेत्रीय स्तर पर उनके विरोधी ही क्यों न हों।
इस विचार का समर्थन करने वाले लोग बताते हैं कि वामपंथियों का एकजुट होना तभी संभव हो पाया, जब सीपीआईएम की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था ने ‘सांप्रदायिक ताकतों’ के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस पार्टी को समर्थन देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
वे यह भी मानते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) से समर्थन वापस लेने के बाद ही वामपंथियों के जनाधार में गिरावट शुरू हुई। हालांकि, इस विचार का कड़ा विरोध भी हो रहा है। विरोध करने वालों का तर्क है कि पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी अपने चरम पर थीं, तब कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बावजूद वे उन्हें चुनौती देने में विफल रहे थे।
एक और पहलू यह है कि केरल में वामपंथी गठबंधन का सीधा मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से है। जमीनी स्तर पर हो रही चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी का एक धड़ा इस नई राजनीतिक दिशा को वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता और पूर्व महासचिव प्रकाश करात की रणनीतिक सोच से दूर जाने के रूप में देख रहा है।
सालों तक, बंगाल के वामपंथी नेताओं का यही मानना रहा है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वामपंथी नेताओं का तर्क था कि ममता बनर्जी के साथ किसी भी तरह का राजनीतिक समझौता करने से उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान कमजोर होगी और उनके कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होगा, खासकर ऐसे राज्य में, जहां पार्टी का आरोप रहा है कि ममता के शासन में उनके समर्थकों पर अत्याचार किए गए हैं। पर्यवेक्षकों का मानना है कि सीपीआईएम प्रमुख बनने के बाद से, बेबी ने ‘भाजपा-विरोधी एकता’ को मजबूत करने पर काफी जोर दिया है। इस दौरान, ‘इंडिया’ ब्लॉक के दायरे में ममता बनर्जी के साथ उनकी बातचीत काफी ‘सौहार्दपूर्ण’ रही है।
भारतीय राजनीति में भाजपा एक प्रमुख ताकत बनी हुई है, लेकिन संसद में सीपीआईएम की मौजूदगी अब पहले की तुलना में बहुत कम रह गई है। ऐसे हालात में पार्टी के भीतर कई लोगों का मानना है कि विपक्ष की एकता अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीतिक जरूरत बन गई है, लेकिन पार्टी के कट्टर समर्थकों को डर है कि इन तस्वीरों और संदेशों से यह संकेत जा सकता है कि सीपीआईएम तृणमूल के प्रति अपना विरोध नरम कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अमेरिका से बातचीत शांति का विकल्प, लेकिन राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा उत्तर कोरिया: किम यो जोंग

उत्तर कोरिया ने बुधवार को कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत शांति स्थापित करने का एक विकल्प है, लेकिन इसे अपने राष्ट्रीय हितों के लिए वो जरूरी नहीं मानता। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने यह बयान देते हुए अमेरिका पर प्योंगयांग के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति जारी रखने का आरोप लगाया।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी (केसीएनए) के हवाले से योनहाप न्यूज एजेंसी ने बताया कि किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका लगातार ऐसे संकेत दे रहा है, जिनसे उत्तर कोरिया को उसके वास्तविक इरादों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, ”शांति के विकल्पों में निश्चित रूप से बातचीत भी शामिल है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बातचीत हमारे राष्ट्रीय हितों के बराबर है।”
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी एफबीआई ने दुनिया के सबसे बड़े क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज बाइनेंस से 6 अरब डॉलर से अधिक की क्रिप्टोकरेंसी चोरी के मामले में उत्तर कोरिया की संलिप्तता का आरोप लगाया है। उत्तर कोरिया ने इस आरोप को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक उकसावे की कार्रवाई बताया है।
किम यो जोंग ने बुधवार को एक बार फिर इस आरोप को अमेरिका की शत्रुतापूर्ण नीति का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि तथाकथित उत्तर कोरियाई क्रिप्टोकरेंसी हैकिंग का मामला अमेरिका की प्योंगयांग विरोधी नीति की वास्तविक प्रकृति की केवल एक झलक है।
उन्होंने दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के विदेश मंत्रियों की हालिया त्रिपक्षीय बैठक का भी उल्लेख किया। इस बैठक में तीनों देशों ने उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। किम ने इन देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यासों को भी उत्तर कोरिया के खिलाफ शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का हिस्सा बताया।
किम यो जोंग ने कहा कि अमेरिका को उत्तर कोरिया के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीति छोड़नी होगी। उनके मुताबिक, सभी समस्याओं के समाधान के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वाशिंगटन अपनी टकराव की नीति नहीं बदलता, तब तक प्योंगयांग के पास अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर बैठने का कोई कारण नहीं है।
उन्होंने कहा, “उत्तर कोरिया को ऐसे अविश्वसनीय और शत्रुतापूर्ण लोगों के साथ आमने-सामने बैठने की जरूरत नहीं है, जो अपनी टकराव की नीति छोड़ने को तैयार नहीं हैं।”
यो ने अमेरिका की कथित शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के जवाब में उत्तर कोरिया की ओर से जवाबी कदम उठाए जाने की चेतावनी भी दी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्योंगयांग किस तरह की कार्रवाई कर सकता है।
उनका यह बयान उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच संभावित कूटनीतिक संपर्कों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मुलाकात की इच्छा जता चुके हैं। इस महीने दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकात को लेकर अटकलें भी लगाई जा रही हैं, हालांकि उत्तर कोरिया की ओर से इस संबंध में कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है।
राष्ट्रीय समाचार
झारखंड में सांसदों-विधायकों पर लंबित आपराधिक मामलों में जांच एजेंसियों की सुस्ती पर हाई कोर्ट नाराज, सीबीआई से पूछे सवाल

झारखंड हाई कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई में हो रही देरी पर नाराजगी जताई है। अदालत ने जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में सुनवाई तेज करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। अदालत ने विशेष रूप से केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से गवाहों को समय पर पेश नहीं कर पाने और जांच से जुड़े दस्तावेज जुटाने में हो रही देरी पर सवाल किए।
झारखंड में फिलहाल सांसदों और विधायकों के खिलाफ 11 आपराधिक मामले लंबित हैं। न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय की पीठ में बुधवार को इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का ट्रायल लंबे समय से लंबित है। ऐसे मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर होनी चाहिए, ताकि उनका निपटारा अनावश्यक रूप से नहीं टले।
अदालत ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दस्तावेज जुटाने में ही काफी समय लग जाता है। इसके अलावा, गवाहों को अदालत में पेश करने के मामले में भी अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई दे रही है। इससे मुकदमों की सुनवाई प्रभावित होती है और उनके निपटारे में देरी होती है।
सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि कुछ पुराने मामलों में गवाह अपने दिए गए पते पर नहीं मिल रहे हैं। इस कारण उन्हें अदालत में पेश करने और उनकी गवाही दर्ज कराने में व्यावहारिक कठिनाइयां आ रही हैं। एजेंसी ने इसे सुनवाई में देरी की एक वजह बताया। मामलों की वास्तविक स्थिति और सुनवाई की प्रगति का आकलन करने के लिए हाई कोर्ट ने दो प्रमुख मामलों का पूरा रिकॉर्ड संबंधित निचली अदालत से तलब किया है।
इन रिकॉर्ड के जरिए अदालत यह देखना चाहती है कि मुकदमों की सुनवाई किस स्तर पर है और किन कारणों से उनमें देरी हो रही है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों को सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर करने और उनके शीघ्र निपटारे के निर्देश दिए हैं।
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