Connect with us
Saturday,08-August-2026
ताज़ा खबर

राजनीति

भारत-नेपाल संबंध : देउबा-मोदी मुलाकात के बाद क्या लौट आएगी आपसी संबंधों की गर्माहट

Published

on

नेपाल और भारत के बीच परेशानियों और बकाया मुद्दों में से एक सीमा विवाद है, जिसने कुछ समय के लिए काठमांडू और नई दिल्ली के बीच बड़ी गलतफहमियां पैदा कर दी थीं। दरअसल, साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत ने कालापानी में अपनी सैना तैनात कर दी थी, जिस पर ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के तत्कालीन शासकों के बीच सुगौली संधि (1816) के बाद से नेपाल का कब्जा था। इसका ठीक से पता नहीं है कि ये नेपाल सरकार का निर्णय था या भारत ने कालापानी में अपनी सेना रखने की अनुमति मांगी थी, लेकिन इसका सामरिक महत्व है, क्योंकि यह नेपाल, भारत और चीन के बीच स्थित है।

जब भारत ने नवंबर 2019 के पहले सप्ताह में अपने नए राजनीतिक मानचित्र का अनावरण किया, तब कालापानी विवाद फिर से शुरू हो गया और नेपाल ने इस मुद्दे को हल करने के लिए बातचीत के लिए भारत में राजनयिकों को भेजकर निर्णय का विरोध किया। भारत ने तब कहा था कि इस मामले को कूटनीतिक तरीके से सुलाझाया जाना चाहिए।

भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हिमालय में लिपुलेख के माध्यम से एक नई 8 किमी लंबी सड़क का उद्घाटन करने के बाद यह मुद्दा तीव्र हो गया, जिसे नेपाल भी अपना क्षेत्र मानता है। तब तत्कालीन के.पी. शर्मा ओली सरकार ने सड़क के विस्तार का विरोध किया और भारत पर नेपाल के साथ पूर्व परामर्श के बिना यथास्थिति को बदलने का आरोप लगाया।

सड़क भारत को तिब्बत से जोड़ने और मानसरोवर जाने के इच्छुक भारतीय तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए थी। नेपाल ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख के रास्ते सड़क का विस्तार करने के 2015 के फैसले का पहले ही विरोध किया था।

भारत और चीन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान लिपुलेख के माध्यम से व्यापार गलियारे विकसित करने का फैसला किया था, लेकिन नेपाल सरकार ने इसका विरोध किया था।

साल 2020 में राजनाथ सिंह ने नई सड़क का उद्घाटन किया, तब यह मुद्दा फिर से तेज हो गया।

लिपुलेख के रास्ते सड़क बनाने के भारत के एकतरफा फैसले का विरोध करते हुए नेपाल ने भारत में कुछ राजनयिक भेजे और समझौते के लिए बातचीत की मांग की। लेकिन तब भारत ने कोरोना महामारी के कारण बातचीत को टाल दिया था।

भारत की प्रतिक्रिया के बाद ओली सरकार ने कालापानी और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में शामिल करते हुए नेपाल के एक नए राजनीतिक मानचित्र का अनावरण किया। फिर, दोनों पक्षों के बीच ‘काटरेग्राफिक युद्ध की स्थिति’ बन गई थी।

नेपाल सरकार ने संशोधित आधिकारिक नक्शा जारी किया, जिसमें भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया है। तब भारत के विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा था, ‘यह एकतरफा कार्य ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है।’

इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि, प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की हाल की भारत यात्रा के दौरान सीमा विवाद तीन साल के अंतराल के बाद फिर से सामने आया। उन्होंने मोदी के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के दौरान इस मुद्दे को उठाया।

मशहूर नेपाल के मानचित्रकार और सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने आईएएनएस को बताया कि “अब भारत के साथ आगे की बातचीत के लिए दरवाजा खुल गया है, जिस तरह से हमारे प्रधानमंत्री ने भारत के साथ इस मामले को उठाया है, हमें उम्मीद है कि जल्द ही कुछ प्रगति होगी।”

नई दिल्ली में हैदराबाद हाउस में 2 अप्रैल को देउबा और मोदी के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा, “हमने सीमा मामलों पर चर्चा की और मैंने उनसे (मोदी) स्थापित तंत्र के माध्यम से उन्हें हल करने का आग्रह किया।”

भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि सीमा मुद्दे को सुलझाने पर आम सहमति बनी है। एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर ‘संक्षिप्त चर्चा’ हुई।

उन्होंने कहा, “दोनों पक्षों को हमारे करीबी और मैत्रीपूर्ण संबंधों को ध्यान में रखते हुए चर्चा और बातचीत करने की जरूरत है। ऐसे मुद्दों पर राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है।”

लेकिन देउबा-मोदी वार्ता के बाद जारी किए गए एक भारतीय बयान में हालांकि इस मुद्दे पर चुप्पी साधी हुई थी।

सुस्ता और कालापानी में सीमा रेखा से निपटने के लिए नेपाल और भारत के पास विदेश सचिव और तकनीकी स्तर पर तंत्र हैं। सुस्ता और कालापानी को छोड़कर नेपाल और भारत के साथ सीमा कार्यो को पूरा करने के लिए एक अलग सीमा कार्य समूह (बीडब्ल्यूजी) भी अनिवार्य है।

श्रेष्ठ ने कहा कि देउबा की यात्रा से द्विपक्षीय वार्ता के द्वार खुल गए हैं और दोनों पक्षों के लिए मौजूदा तंत्र को पुनर्जीवित करना बेहतर मौका है।

उन्होंने आगे कहा, “नेपाल और भारत के प्रधानमंत्रियों ने 2014 में सीमा विवाद से निपटने और उसे दूर करने के लिए विदेश सचिव स्तर पर एक तंत्र स्थापित किया था। उन्हें विवाद को सुलझाने के लिए तकनीकी स्तर से प्रतिक्रिया और इनपुट प्राप्त करने के लिए कहा गया था। अब समय आ गया है कि नेपाल और भारत सीमा विवाद के समाधान के लिए विदेश सचिव स्तर के तंत्र को पुनर्जीवित करें।”

नेपाल और भारत के बीच नवंबर 2019 में संबंध बिगड़ने लगे, जब दिल्ली ने अपने क्षेत्र में कालापानी सहित एक नया नक्शा जारी किया।

जैसे ही विवाद फिर से शुरू हुआ, तब श्रृंगला ने नवंबर 2020 के अंत में नेपाल की यात्रा की थी और तत्कालीन विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने जुलाई 2021 में भारत की यात्रा की थी। लेकिन दोनों यात्राएं तनाव को कम नहीं कर सकीं।

इस साल जनवरी में फिर से भारतीय प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई एक टिप्पणी ने नेपाल में एक नया हंगामा खड़ा कर दिया।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की थी कि उनकी सरकार ने लिपुलेख तक एक सड़क का विस्तार किया है और इसे और आगे बढ़ाने की योजना है।

नेपाल के राजनीतिक दलों ने मोदी के बयान पर नाराजगी जताते हुए इसे गैर-जरूरी बताया और उन्होंने मांग की कि देउबा सरकार भारत को जवाब दे।

मुख्य विपक्षी सीपीएन-यूएमएल ने भारत के साथ इस मुद्दे को उठाने में विफल रहने के लिए सरकार की आलोचना की, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन ने भारत के बयान पर आपत्ति जताई।

नेपाल के संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर कार्की ने 16 जनवरी को कहा कि सरकार इस तथ्य के बारे में दृढ़ और स्पष्ट है कि महाकाली नदी के पूर्व में लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल का अभिन्न अंग है।

उन्होंने कहा था कि नेपाल सरकार भारत सरकार से नेपाली क्षेत्र से होकर जाने वाली किसी भी सड़क के एकतरफा निर्माण/विस्तार को रोकने का अनुरोध कर रही है।

उन्होंने आगे कहा, “नेपाल सरकार दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के अनुसार राजनयिक चैनलों के माध्यम से ऐतिहासिक संधियों और समझौतों, तथ्यों, मानचित्रों और साक्ष्य के आधार पर सीमा मुद्दों को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

नेपाली राजनयिकों और अधिकारियों का कहना है कि नेपाल और भारत के बीच हालिया घटनाक्रम जहां दोनों पक्षों ने विवाद को सुलझाने के लिए अपनी उत्सुकता दिखाई है, ये स्वागत योग्य है, लेकिन इसमें कुछ और समय लग सकता है।

नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खड़का ने भी कहा कि मोदी और देउबा मौजूदा सीमा विवाद को मौजूदा तंत्र, बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने और उसका समाधान करने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने आगे कहा, “बातचीत के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने सीमा मुद्दों पर भी चर्चा की और दोनों नेता मौजूदा तंत्र के माध्यम से और बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ऐसे मुद्दों को हल करने पर सहमत हुए।”

प्रधानमंत्री देउबा द्वारा सार्वजनिक रूप से अपने भारतीय समकक्ष से द्विपक्षीय तंत्र की स्थापना के माध्यम से सीमा मुद्दे को हल करने का आग्रह करने के बाद खड़का का बयान महत्वपूर्ण है।

नेपाल के पूर्व राजदूत और दो प्रधानमंत्रियों के पूर्व विदेश नीति सलाहकार दिनेश भट्टराई ने आईएएनएस को बताया कि कम से कम शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को यह अहसास है कि सीमा विवादों को सुलझाना चाहिए और लंबे समय तक अधर में नहीं रहना चाहिए।

उन्होंने कहा, चूंकि भारतीय विदेश सचिव ने कहा कि इस मुद्दे को संबोधित किया जाना चाहिए। यह दर्शाता है कि भारत ने विवाद को स्वीकार कर लिया है।

भट्टराई ने कहा, “इस मुद्दे को मेज पर लाया गया है और दोनों पक्षों को बैठकर सौहार्दपूर्ण समाधान खोजना चाहिए। इसमें कुछ और समय लग सकता है। हमें कई बार बैठक करनी पड़ सकती है और शायद इसे हल करने के लिए बातचीत में सालों लग सकते हैं लेकिन दोनों पक्षों को स्थिति को भड़काना नहीं चाहिए क्योंकि यह एक संवेदनशील मुद्दा है और इससे कूटनीतिक तरीकों और तंत्रों से निपटा जाना चाहिए।”

राजनीति

राहुल गांधी को महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए : रिजिजू

Published

on

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की आजादी और भागीदारी पर बयान दिया। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा कि जब तक महिलाएं खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएंगी, तब तक कोई भी देश पूरी तरक्की नहीं कर सकता।

राहुल गांधी के इस बयान पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए ‘एक्स’ पोस्ट में कहा कि कांग्रेस को अब संसद में महिला आरक्षण विधेयक का बिना शर्त समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

दरअसल, राहुल गांधी ने शुक्रवार को ‘एक्स’ पर एक वीडियो पोस्ट कर में अपनी बात रखी। गुरुवार को भी ‘आस्क मी एनीथिंग’ सत्र में भी उन्होंने इसी मुद्दे पर बात की थी।

उन्होंने ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “मैं सोच रहा था कि भारत की महिलाओं की ऊर्जा फंसी हुई है, उसे व्यक्त करने की इजाजत नहीं है, कल्पना करने की आजादी नहीं है। मेरे लिए कोई भी देश तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वहां की महिलाएं खुद को व्यक्त न कर सकें।”

वीडियो में राहुल गांधी ने कहा कि महिलाओं की आवाज दबने से देश की तरक्की पर असर पड़ता है। मेरी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा यही है कि लोग समझें कि महिलाओं की अभिव्यक्ति के बिना हमारा देश अधूरा और पिछड़ा है।

राहुल गांधी ने कहा कि महिला सशक्तीकरण सिर्फ बिजनेस या राजनीति तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह सिर्फ इस बारे में नहीं है कि महिलाएं बिजनेस या राजनीति में अच्छा करें, बल्कि यह भी है कि वे अपने घरों में, परिवार में और सार्वजनिक जगहों पर खुलकर बोल सकें और सड़कों पर आराम से चल सकें।

उन्होंने आगे कहा, “महिलाओं को यह आजादी होनी चाहिए कि वे दूसरों से अलग राय रख सकें, अपने माता-पिता, पति, भाई-बहन से सवाल कर सकें। भारत को सच में विकसित होना है तो पितृसत्ता और पुरुषों के कड़े नियंत्रण से महिलाओं को थोड़ी आजादी मिलनी ही चाहिए।”

राहुल गांधी के इस वीडियो बयान पर किरेन रिजिजू ने कहा कि यह कांग्रेस के नजरिए में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

यह कांग्रेस पार्टी का सकारात्मक संदेश लगता है। राहुल गांधी के दिल में महिलाओं को लेकर बदलाव दिख रहा है। अब मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक का बिना शर्त समर्थन करेगी।

महिला आरक्षण विधेयक, जिसे संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 या नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है, एक ऐतिहासिक कानून है। इसके तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं। फिलहाल महिला आरक्षण को लेकर सियासी बहस तेज है और सभी की नजर संसद के अगले कदम पर है।

Continue Reading

महाराष्ट्र

असहमति दबाने के लिए दर्ज मामलों को रद्द करें अदालतें, नागरिकों को बोलना न सिखाएं: पूर्व एससी जज अभय ओका

Published

on

मुंबई प्रेस ब्यूरो
मुंबई — संवैधानिक अदालतों का यह परम कर्तव्य है कि वे केवल असंतोष की आवाज को दबाने या आलोचना को खामोश करने के उद्देश्य से दर्ज किए गए आपराधिक मामलों को खारिज (क्वाश) करें। इसके साथ ही, अदालतों को नागरिकों को यह उपदेश देने से बचना चाहिए कि उन्हें क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। यह बात सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय एस. ओका (रिटायर्ड जस्टिस अभय एस. ओका) ने मुंबई में आयोजित एक कानूनी कार्यक्रम के दौरान कही।
मुंबई के के.सी. कॉलेज ऑडिटोरियम में आयोजित प्रथम ‘एडवोकेट हारून सोलकर मेमोरियल लेक्चर’ को संबोधित करते हुए पूर्व न्यायमूर्ति ओका ने बढ़ते असहिष्णुता के दौर में नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया। इस व्याख्यान का विषय “अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 21: पालन किया गया या भुला दिया गया?” (आर्टिकल 19(1)(ए) and आर्टिकल 21: फॉलो किया गया या भूला दिया गया?) था।
“अदालतों का काम उपदेश देना या सिखाना नहीं”
न्यायमूर्ति ओका—जिन्होंने अगस्त 2021 से मई 2025 तक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दीं—ने कहा कि जब नागरिक अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले या प्रेरित मुकदमों के खिलाफ अदालतों का रुख करते हैं, तो न्यायपालिका को उनके मौलिक अधिकारों की ढाल बनना चाहिए। “अदालत को याचिकाकर्ता द्वारा कही गई बात पसंद न भी आए, फिर भी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना अदालत का कर्तव्य है। याचिकाकर्ता को क्या कहना चाहिए था और क्या नहीं, यह सिखाना या उपदेश देना अदालत का काम नहीं है,” न्यायमूर्ति ओका ने स्पष्ट किया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका को केवल यह देखना चाहिए कि कानून के तहत कोई वास्तविक अपराध बनता है या नहीं, न कि बयानों के सामाजिक या राजनीतिक प्रभाव का आकलन करना चाहिए।
सर थॉमस मोर का संदर्भ: “केवल शासकों की पसंद की बात न कहें”
आयरिश लेखक सर थॉमस मोर के विचारों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में नागरिकों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे केवल वही बातें कहें जो सत्ता में बैठे लोगों को पसंद हों। “नागरिकों से केवल वही बातें कहने की उम्मीद नहीं की जा सकती जो आज के शासकों को पसंद हों,” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अलोकप्रिय विचारों को दबाना लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा है। “अगर लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो हमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 के तहत मिली स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी—चाहे इसके लिए हमें कितनी भी बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।”

शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और संवाद के “भूले हुए सिद्धांत”
शांतिपूर्ण प्रदर्शन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग बताते हुए पूर्व जज ने कहा कि जब जनसमस्याओं पर सुनवाई नहीं होती, तो शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना ही नागरिकों के पास अपनी नाराजगी व्यक्त करने का संवैधानिक तरीका होता है।
उन्होंने राज्य (सरकार) की जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए कहा कि भले ही सरकार हर मांग को स्वीकार न करे, लेकिन नागरिकों से चर्चा और संवाद करना उसका प्राथमिक कर्तव्य है: “लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी मांगें रखने का अधिकार है और राज्य का यह कर्तव्य है कि वह उन पर विचार करे,” उन्होंने कहा। “सरकार मांगें माने या न माने, लेकिन उस पर विचार करना, चर्चा और संवाद करना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन समय बीतने के साथ, शायद हम सभी इन सुनहरे सिद्धांतों को भूल गए हैं।”

राज्य के कर्तव्य और न्यायपालिका की सजगता
संविधान के तहत स्थापित दायित्वों पर विचार व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि जहां नागरिकों को अनुच्छेद 51ए के तहत मौलिक कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है, वहीं राज्य का भी यह संवैधानिक दायित्व है कि वह धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे आदर्शों का सम्मान करे।
“वर्तमान समय में, हम शायद ही कभी सरकार को संविधान के आदर्शों का सम्मान करते हुए देखते हैं,” न्यायमूर्ति ओका ने टिप्पणी की। उन्होंने अंत में अदालतों को संविधान का सजग प्रहरी बनने का आह्वान करते हुए कहा: “अगर अदालतें ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करेंगी, तो कौन करेगा? यह अदालतों का परम कर्तव्य है कि संविधान और उसके आदर्शों को कुचला न जाए।”

Continue Reading

महाराष्ट्र

स्कूल जिहाद की आड़ में हो रही कार्रवाई बंद हो, विधायक अबू आसिम ने एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी से मिलकर ज्ञापन सौंपा

Published

on

मुंबई: सरकार नए स्कूल खोलने में नाकाम हो रही है, ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां गरीब और माइनॉरिटी इलाकों में बच्चों को पढ़ाने वाले प्राइवेट और ट्रस्ट के स्कूल ‘स्कूल जिहाद’ जैसे नफरत भरे प्रोपेगैंडा की वजह से दबाव और एफआईआर का सामना कर रहे हैं। इस गंभीर मामले को देखते हुए, मानखुर्द शिवाजी नगर के विधायक अबू आसिम आज़मी ने आज नए बने एडिशनल पुलिस कमिश्नर (एडिशनल सीपी) धनंजय कुलकर्णी से ऐसे एक्शन का सामना कर रहे स्कूलों के एक डेलीगेशन के साथ मुलाकात की और एक मेमोरेंडम सौंपा। मेमोरेंडम में रिक्वेस्ट की गई कि अगर किसी स्कूल में इन्वेस्टिगेशन या जांच के लिए पुलिस का जाना ज़रूरी है, तो ऑफिसर सादे कपड़ों में आएं। डेलीगेशन ने अधिकारियों से रिक्वेस्ट की कि वे पुलिस वैन या भारी पुलिस फोर्स के साथ स्कूल कैंपस से बाहर न निकलें ताकि बच्चों, पेरेंट्स और टीचर्स में डर और पैनिक का माहौल न बने। इसमें कहा गया कि ट्रस्टी पुलिस को मांगे गए किसी भी ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स या रिकॉर्ड देने के लिए खुद पुलिस स्टेशन जाने को तैयार हैं। गरीब इलाकों के बच्चों के एजुकेशन के अधिकार को बनाए रखने वाले एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स के प्रति पुलिस का रवैया सेंसिटिव, कोऑपरेटिव और रिस्पेक्टफुल होना चाहिए। इस मौके पर बोलते हुए, अबू आसिम आज़मी ने ज़ोर देकर कहा कि पढ़ाई का माहौल हर समय सुरक्षित, बिना भेदभाव वाला और डर से मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पिछड़े इलाकों के बच्चों का भविष्य किसी भी नफ़रत भरे एजेंडे या बेबुनियाद सज़ा देने वाली कार्रवाई के लिए कुर्बान नहीं किया जाना चाहिए।

Continue Reading
Advertisement
राजनीति5 minutes ago

राहुल गांधी को महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए : रिजिजू

महाराष्ट्र15 hours ago

असहमति दबाने के लिए दर्ज मामलों को रद्द करें अदालतें, नागरिकों को बोलना न सिखाएं: पूर्व एससी जज अभय ओका

खेल17 hours ago

चेस: आर प्रज्ञानानंद ने जीता सेंट लुइस रैपिड और ब्लिट्ज का खिताब

महाराष्ट्र18 hours ago

स्कूल जिहाद की आड़ में हो रही कार्रवाई बंद हो, विधायक अबू आसिम ने एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी से मिलकर ज्ञापन सौंपा

अपराध19 hours ago

मुंबई में चोरी का संदिग्ध गिरफ्तार, 6 मामले सुलझाए गए

महाराष्ट्र20 hours ago

महाराष्ट्र एटीएस ने ऑनलाइन आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई की, सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश जारी, 6 अगस्त से लागू

व्यापार20 hours ago

जेके टायर का पहली तिमाही में मुनाफा 73 प्रतिशत घटकर 44 करोड़ रुपए रहा; शेयर करीब 6 प्रतिशत फिसले

राष्ट्रीय समाचार21 hours ago

जेन जी हमारे देश की ताकत और बहुत बड़ी धरोहर : कंगना रनौत

राष्ट्रीय समाचार22 hours ago

कमजोर वैश्विक संकेतों से गिरावट के साथ खुला शेयर बाजार, फाइनेंशियल स्टॉक्स पर दबाव

राष्ट्रीय समाचार22 hours ago

सोने और चांदी में उछाल, करीब 1.1 प्रतिशत तक बढ़े दाम

खेल4 weeks ago

मिकेल मेरिनो ने रचा इतिहास, फीफा वर्ल्ड कप में यह कारनामा करने वाले बने विश्व के पहले खिलाड़ी

अपराध2 weeks ago

मुंबई में आतंक! जुल्फिकार गैंग पर बिल्डर से हफ्ता मांगने और उसकी हत्या करने का आरोप, मुंबई क्राइम ब्रांच की कार्रवाई, 12 गुंडे गिरफ्तार

मनोरंजन3 weeks ago

रणदीप हुड्डा की बेटी न्योमिका की पहली चावल रस्म, परिवार के साथ मनाया खास जश्न

महाराष्ट्र3 weeks ago

महाराष्ट्र: वर्धा जिले में सड़क हादसे में छह की मौत, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने जताई संवेदना

राष्ट्रीय समाचार2 weeks ago

सीजेपी प्रदर्शन हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई तेज, अब तक 10 एफआईआर दर्ज

राष्ट्रीय समाचार3 weeks ago

ई20 पेट्रोल विवाद: उपभोक्ता के पक्ष में देश का पहला फैसला, रायपुर कोर्ट ने कंपनी को वाहन बदलने का दिया आदेश

महाराष्ट्र1 week ago

मुंबई: 8 साल के बच्चे के माता-पिता को टी-शर्ट से मिला सुराग, जोगेश्वरी से लापता बच्चा सुरक्षित माता-पिता को सौंपा गया, मुंबई पुलिस की बड़ी कामयाबी

राजनीति3 weeks ago

टीएमसी के बागी सांसदों को बुलाने पर भड़का विपक्ष, सर्वदलीय बैठक से कांग्रेस, सपा और ‘आप’ का वॉकआउट

राजनीति3 weeks ago

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तीन यूरोपीय देशों के दौरे पर हुईं रवाना, भारत के साथ संबंधों को मिलेगी नई रफ्तार

मनोरंजन6 days ago

जाह्नवी कपूर ने शिखर पहाड़िया और परिवार के साथ बिताए गए खास पलों की तस्वीरें शेयर कीं

रुझान