महाराष्ट्र
महाराष्ट्र की वित्तीय स्थिति मजबूत नहीं पर अनुशासनपूर्ण निर्णय बदल सकते हैं तस्वीर
महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार मार्च की शुरूआत में जब अपने तीसरे वार्षिक बजट (2022-2023) के लिए तैयार है तब राज्य की वित्तीय स्थिति एक बार केंद्र में आ गयी है।
कोरोना वायरस से सर्वाधिक प्रभावित रहने के कारण पहले से जूझ रहे इस राज्य को लॉकडाउन के कारण भी कई नुकसान उठाने पड़े। कोरोना महामारी और लॉकडाउन दोनों ने राज्य की अर्थव्यवस्था, राजस्व और व्यय पर कहर बरपाया है। महामारी के प्रसार को रोकने और उससे निपटने के लिये अधिकांश संसाधनों को स्वास्थ्य क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया।
गत वित्त वर्ष (2020-2021) तक, राज्य पर 5,20,717 करोड़ रुपये का भारी कर्ज था, जिसमें ज्यादातर भुगतान नहीं किये गये ऋण और अन्य देनदारियां शामिल थीं।
हालांकि, जीएसडीपी यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद की तुलना में राजकोषीय घाटा 2.1 प्रतिशत है और जीएसडीपी के लिये ऋण स्टॉक 19.6 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष की वित्तीय नीतिगत रणनीति के अनुसार 25 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर है।
जाने-माने आर्थिक विशेषज्ञ और महाराष्ट्र राज्य योजना बोर्ड के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष डॉ रत्नाकर महाजन ने कहा, हालांकि, ऋण का आंकड़ा बड़े पैमाने पर दिखाई दे रहा है लेकिन यह पिछले कई वर्षों में विभिन्न कारकों के कारण जमा हुये ऋण का जोड़ हैं। ऋण में औसत वार्षिक वृद्धि 65,000 करोड़ रुपये के अंदर है।
कई अन्य राज्यों के विपरीत, महाराष्ट्र में बड़े स्तर पर धन का इस्तेमाल करने वाली ‘लोकलुभावन योजनायें’ नहीं चल रही हैं। जनवरी 2020 में शुरू की गयी एक महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजना ‘शिव भोजन थाली’, जो किफायती भोजन उपलब्ध कराती है, एक अपवाद है। इस योजना को कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 में लगाये गये लॉकडाउन के बाद विस्तृत करके इसमें भारी सब्सिडी दी गयी थी।
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा शुरू योजना, ‘शिव भोजन थाली’, जिस पर राज्य सरकार ने पिछले 24 महीनों में 500 करोड़ रुपये से भी कम खर्च किये हैं, शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों और लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में अपने घरों को लौट रहे लाखों लोगों के लिये जीवन रक्षक साबित हुआ है।
उप मुख्यमंत्री अजीत पवार की अध्यक्षता वाले राज्य के वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि कर्ज को हर साल बिना किसी चूक के चुकाना पड़ता है। यह वार्षिक बजट का व्यय हिस्सा होता है लेकिन इसमें विवेकपूर्ण होने की गुंजाइश है।
उक्त अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर यह बताया कि कैसे गंभीर कोरोना महामारी के दो साल ने अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। आर्थिक मंदी, रोजगार की कमी ने अर्थव्यवस्था को और भी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, इनमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। कृषि ऋण माफी, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और सभी प्रकार के कर राजस्व में कमी के अलावा केंद्र से लंबित जीएसटी बकाया की भारी राशि भी अर्थव्यवस्था के लिये बोझिल साबित हुई है।
डॉ. महाजन ने कहा कि बढ़ते राजकोषीय बोझ के लिये जिम्मेदार कारकों में से एक है छोटी अवधि के लिये उच्च ब्याज दरों पर पूंजी को जुटाना, जैसे तीन साल के लिये 11 प्रतिशतकी दर से ऋण लेना।
कुछ सरकारों ने पुराने ऋणों को लंबी अवधि के लिये कम ब्याज दरों पर ऋण पुनर्गठन करके इसे दूर करने में कामयाबी हासिल की है। इसके लिये पांच साल के लिये 8 या 9 प्रतिशत पर ऋण का पुनर्गठन किया गया, जिससे ऋण बोझ को कम करने के साथ ही बिना किसी दिक्कत के कई वर्षों में चुकाने का समय लिया गया।
इसके अलावा, जब भी कोई सरकार नयी या बड़ी परियोजनाओं को हाथ में लेती है, तो यह अगली सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह पर्याप्त बजटीय प्रावधानों के साथ इसे आगे बढ़ाये।
अधिकारियों ने कहा कि ट्रैफिक की भीड़ को कम करने के लिये मेट्रो रेल जैसी कुछ सर्वोच्च प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन बुलेट ट्रेन जैसी परियोजना को महामारी के समय अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के दुर्लभ संसाधनों का इस्तेमाल करने से रोका जा सकता है।
फिर भी डॉ. महाजन को लगता है कि ‘सुरक्षित और सतर्क निर्णयों’ से राज्य के वित्त को केवल दो वर्षों में अच्छी तरह से पटरी पर लाना बहुत संभव है।
उन्होंने कहा, यह पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल के दौरान किया गया था। उनके कुछ फैसलों से वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिली और राज्य के कर्ज का बोझ भी काफी कम हो गया था।
अगले साल के राज्य बजट (2022-2023) के लिये, सभी की निगाहें अजीत पवार पर यह देखने के लिये टिकी हैं कि कैसे वह बढ़े खर्च और कम संसाधनों के बीच अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाते हैं।
महाराष्ट्र
मुंबई में गणेश विसर्जन के दौरान दो गुटों में हुआ विवाद, 7 लोगों के खिलाफ केस दर्ज

मुंबई के मालवणी (मलाड) इलाके में गणपति विसर्जन के दौरान विवाद, मारपीट, गाली-गलौज और जुलूस में बाधा डालने के आरोप में पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। मालवाणी पुलिस ने शिकायतकर्ता के आधार पर आदिल (24), सुनील शेख (25), गौस (22), अजगर (23), जाकिर (26), जुबेर (25) और हुसेन (24) के खिलाफ का मामला दर्ज कर इनकी तलाश कर रही है।
पुलिस के अनुसार, 25 सितंबर की शाम करीब 7:15 बजे निरंकार नगर, एनटीसी स्कूल रोड, गेट नंबर 7, मालवणी, मालाड पश्चिम में गणपति विसर्जन के दौरान गणपति मंडप के प्रवेश द्वार के पास कोल्ड पायरो उपकरण लगाया गया था। इससे निकलने वाले कृत्रिम आग जैसे प्रभाव को लेकर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई और कहा कि इससे सामने स्थित दुकान में आग लग सकती है। इसी बात को लेकर आदिल, सुनील शेख, गौस, अजगर और जाकिर ने गणपति मंडल के कार्यकर्ताओं से विवाद करने लगे।
पुलिस के मुताबिक, जुबेर और हुसैन ने रोहित ठाकुर और सुशील महतो के साथ हाथापाई की। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि अयान शेख नामक व्यक्ति हाथ में एक मटका लेकर आया और महिला कार्यकर्ताओं के सामने गाली-गलौज करते हुए मारपीट करने के लिए दौड़ा।
अनंत चतुर्दशी के दिन शुक्रवार सुबह, लालबाग, परेल, गिरगांव और अन्य क्षेत्रों के पूजनीय गणपति प्रतिमाओं की विसर्जन यात्रा शुरू हुई। ढोल-ताशा, नासिक बाजा और बैंजो की थापों पर लाउडस्पीकर के साथ-साथ गुलाल उड़ाते हुए और भीलतू वाद्ययंत्रों (बीम) का प्रयोग करते हुए जुलूस रवाना हुआ। ‘लालबागचा राजा,’ ‘मुंबईचा राजा,’ ‘परेलचा राजा,’ ‘गिरगांवचा राजा,’ ‘गिरगांवचा महाराजा,’ ‘भगवान गणपति’ और गणेशोत्सव मंडलों की गणेश प्रतिमाएं सुबह की ध्वनि के साथ विसर्जन स्थलों की ओर रवाना हुईं। ‘लालबागचा राजा’ के दर्शन के लिए लालबाग बाजार के बाहर भक्तों की भारी भीड़ जमा थी। पुलिस ने किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की थी। भगदड़ से बचने के लिए ‘सड़क अवरोध’ लगाकर भीड़ को नियंत्रित किया गया।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के 265 तालुकों को सीएम फडणवीस ने किया सूखा घोषित, और सूखे से निपटने के कई उपायों की घोषणा

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सूखे से प्रभावित किसानों और नागरिकों के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। राज्य के 358 तालुकों (तहसील) में से 265 में सूखा घोषित किया गया है। जिन 265 तालुकों में ‘ट्रिगर-1’ के मानक पूरे हुए हैं, उन्हें सूखा-प्रभावित घोषित किया गया है। इससे पता चलता है कि राज्य के लगभग 75 प्रतिशत तालुकों में अब सूखे जैसे हालात हैं।
इसके अलावा मुख्यमंत्री ने सूखे से निपटने के कई उपायों की घोषणा की है। इसके तहत लैंड रेवेन्यू में छूट, फसल लोन का रीस्ट्रक्चर, खेती से जुड़े लोन की रिकवरी पर रोक, खेती के पंपों के मौजूदा बिजली बिल में छूट (7.5 हॉर्सपावर कैपेसिटी वाले इलेक्ट्रिक पंपों का बिजली बिल पहले ही माफ है, अब उससे ज़्यादा कैपेसिटी वाले इलेक्ट्रिक पंपों को भी छूट), स्कूल-कॉलेज के छात्रों की परीक्षा शुल्क में छूट, एम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत नियमों में ढील देकर अधिक से अधिक काम शुरू किए जाएंगे।
इसके अलावा, जहां जरूरी होगा वहां पीने के टैंकर पहुंचाए जाएंगे। किसानों के खेती के पंपों का बिजली कनेक्शन नहीं काटा जाएगा, खेती पर निर्भर किसानों-खेती मजदूरों को अनाज मिलेगा, जानवरों के लिए चारे का इंतजाम, बड़े पैमाने पर पानी बचाने का काम किया जाएगा। पिछले आदेश के मुताबिक, पेयजल और जानवरों के लिए पानी की प्लानिंग जारी रहेगी। सभी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को पंचनामा प्रक्रिया तुरंत पूरा करने के आदेश दिए गए हैं। इसके साथ ही फसलों की हालत दिखाने वाली तस्वीरें और जीपीएस से डेटा इकट्ठा करने के आदेश जारी किए गए हैं।
इसके पहले 24 सितंबर वाशिम दौरे पर पहुंचे देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की थी कि राज्य सरकार जल्द ही प्रभावित इलाकों में गंभीर सूखा घोषित करने के लिए एक सरकारी आदेश (जीआर) जारी करेगी। साथ ही, खेती-किसानी के बढ़ते संकट से जूझ रहे राज्य में उन सभी पात्र किसानों को फसल कर्ज माफी का लाभ दिया जाएगा, जो पिछली योजनाओं में छूट गए थे।
सीएम ने गांव में किसानों को संबोधित करते हुए लोगों को भरोसा दिलाया था कि सरकारी तंत्र ग्रामीण राहत कार्यों को प्राथमिकता देगा। मुख्यमंत्री ने कहा था कि आर्थिक मदद के अलावा, राज्य प्रशासन पीने के पानी की बिना रुकावट सप्लाई सुनिश्चित करने, मवेशियों के लिए चारा बांटने और फसल के नुकसान का आकलन (पंचनामा) तेजी से करने के लिए आपातकालीन उपाय कर रहा है।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र यूसीसी कमेटी से पूर्व जज के इस्तीफे पर जयराम रमेश बोले-‘हर राज्य का अलग यूसीसी संविधान की भावना के खिलाफ’

महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए गठित समिति से हाईकोर्ट के एक पूर्व जज के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव (संचार) और सांसद जयराम रमेश ने मंगलवार को एक बयान जारी कर कहा कि इस इस्तीफे ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं और समिति के कामकाज पर भी गंभीर चिंताएं जताई गई हैं।
जयराम रमेश ने कहा कि क्या संविधान सभा ने कभी ऐसी स्थिति की कल्पना की थी, जिसमें हर राज्य अपना अलग-अलग समान नागरिक संहिता बनाए? इसका जवाब है बिल्कुल नहीं। क्या डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नेतृत्व में संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा था कि एक राजनीतिक दल की राजनीतिक चालों के हिसाब से राज्य अलग-अलग यूसीसी बनाने की होड़ करेंगे? इसका जवाब भी नहीं है।
कांग्रेस नेता ने 21वें विधि आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 17 जून 2016 को मोदी सरकार ने ही यूसीसी के सवाल को विस्तृत अध्ययन के लिए विधि आयोग के पास भेजा था। आयोग ने व्यापक रिसर्च के बाद 31 अगस्त 2018 को अपना कंसल्टेशन पेपर प्रकाशित किया था। इसके पेज 7 के पैराग्राफ 1.15 में स्पष्ट कहा गया था कि “इस स्तर पर समान नागरिक संहिता बनाना न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।” आयोग ने अलग-अलग पारिवारिक कानूनों में मौजूद भेदभाव को दूर करने की सिफारिश की थी।
रमेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने उसी आयोग की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया, जिसे उसने खुद जिम्मा सौंपा था क्योंकि तथ्य उसके राजनीतिक एजेंडे से मेल नहीं खाते थे। पिछले तीन वर्षों में भाजपा शासित राज्यों ने यूसीसी के अपने-अपने वर्जन जबरन पारित कराए हैं। उत्तराखंड में 27 जनवरी 2025 से यूसीसी लागू हो गया जबकि गुजरात में 24 मार्च 2026, असम में 27 मई 2026 और मध्य प्रदेश में 21 जुलाई 2026 को विधानसभा में विधेयक पारित किया गया।
उन्होंने कहा कि ये राज्यस्तरीय यूसीसी एक जैसे भी नहीं हैं। इनमें अलग-अलग प्रावधान, अलग-अलग दंड और कई छूट हैं। उत्तराखंड का यूसीसी कई पितृसत्तात्मक परंपराओं को आज भी जारी रखे हुए है और कानून का पालन करने वाले निवासियों के लिए भी समस्याएं पैदा कर रहा है।
जयराम रमेश ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने घोषणा की है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी राज्यों में यूसीसी लागू कर दिया जाएगा। एनडीए के बाकी दलों की आवाज को दबा दिया गया है। कांग्रेस के अनुसार, मोदी सरकार के लिए यूसीसी कोई कानूनी सुधार नहीं बल्कि विभाजन, व्यवधान और ध्यान भटकाने का औजार है, जो समाज को स्थायी ध्रुवीकरण में बनाए रखने का साधन है।
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