अंतरराष्ट्रीय समाचार
भारत ने त्रिपक्षीय बैठक के दौरान रूस, चीन से कहा: पाक-आधारित आतंकी संगठनों द्वारा अफगान क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए
भारत ने रूस और चीन से कहा कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों द्वारा अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यह बात रूस-भारत-चीन (आरआईसी) त्रिपक्षीय ढांचे की 18 वीं बैठक की अध्यक्षता के दौरान रखा, जो शुक्रवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग पर हुई, जिसमें रूस और चीन के विदेश मंत्रियों सेर्गेई लावरोव और वांग यी ने भी भाग लिया।
जयशंकर ने अफगानिस्तान में समावेशी और प्रतिनिधि सरकार होने पर भारत के रुख को दोहराते हुए कहा, “आरआईसी देशों के लिए आतंकवाद, कट्टरपंथ, मादक पदार्थों की तस्करी आदि के खतरों पर संबंधित ²ष्टिकोणों का समन्वय करना आवश्यक है।”
मंत्री ने मास्को और बीजिंग के अपने दो समकक्षों को बताया कि, अफगान लोगों की भलाई के लिए भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप, नई दिल्ली ने देश में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए अफगानिस्तान को 50,000 मीट्रिक टन गेहूं की आपूर्ति की पेशकश की थी।
हालांकि, मानवीय पहल में रुकावट आ गई थी, क्योंकि बुधवार तक पाकिस्तान इस खेप को अपने क्षेत्र से गुजरने की अनुमति देने के लिए प्रतिबद्ध नहीं था।
जयशंकर ने आज कहा, “आरआईसी देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है कि मानवीय सहायता बिना किसी रुकावट और राजनीतिकरण के अफगान लोगों तक पहुंचे। एक निकट पड़ोसी और अफगानिस्तान के लंबे समय से साथी के रूप में, भारत उस देश में हाल के घटनाक्रमों, विशेष रूप से अफगान लोगों की पीड़ा के बारे में चिंतित है।”
तीनों मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि आरआईसी देशों के बीच सहयोग न केवल उनके अपने विकास में बल्कि वैश्विक शांति, सुरक्षा, स्थिरता में भी योगदान देगा।
जयशंकर ने अपने संबोधन में, आरआईसी तंत्र के तहत यूरेशियन क्षेत्र के तीन सबसे बड़े देशों के बीच घनिष्ठ संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत की निरंतर प्रतिबद्धता की भी पुष्टि की।
उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और राजनीति आदि क्षेत्रों में हमारा सहयोग वैश्विक विकास, शांति और स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।”
शुक्रवार की बैठक के दौरान नए कोरोनावायरस संक्रमण की महामारी के परिणामों पर काबू पाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
बैठक के बाद जयशंकर ने ट्वीट किया, “कोविड -19 महामारी ने हमें अधिक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्ति चेन की आवश्यकता के प्रति सचेत किया है, विशेष रूप से स्वास्थ्य में। आरआईसी देशों को एक-दूसरे द्वारा जारी टीकाकरण प्रमाणपत्रों को पहचानना चाहिए। दुनिया को अनुचित और अवैज्ञानिक यात्रा प्रतिबंधों से बचना चाहिए।”
बाद में जारी संयुक्त बयान में, तीनों देशों ने अफगानिस्तान और क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी समूहों जैसे अल-कायदा, आईएसआईएल और अन्य के तत्काल उन्मूलन की आवश्यकता पर बल दिया।
तालिबान से अफगानिस्तान पर बातचीत के सभी हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीयऔर क्षेत्रीय प्रारूपों के परिणामों के अनुसार कार्रवाई करने का आह्वान करते हुए, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के महत्व की पुष्टि की कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का उपयोग किसी अन्य देश को धमकी देने या हमला करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
तीनों मंत्रियों ने अफगानिस्तान और उसके बाहर से अफीम और मेथामफेटामाइन में अवैध मादक पदार्थों की तस्करी के प्रसार का मुकाबला करने के लिए अपना ²ढ़ संकल्प भी व्यक्त किया, जो क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा है और आतंकवादी संगठनों के लिए धन प्रदान करता है।
रूस ने कहा कि विचारों के आदान-प्रदान ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बहुपक्षीय नींव को मजबूत करने के साथ-साथ हमारे समय की दबाव की समस्याओं को हल करने के ²ष्टिकोण के संबंध में तीन देशों की स्थिति की समानता की पुष्टि की।
रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा, “वार्ता के दौरान, (जो एक रचनात्मक माहौल में हुई) वैश्विक और क्षेत्रीय एजेंडे के प्रमुख मुद्दों पर विचार किया गया। मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र, जी20, एससीओ, ब्रिक्स में बहुपक्षीय संगठनों और संघों के ढांचे के भीतर बातचीत का विस्तार करने के लिए एक समवर्ती स्वभाव व्यक्त किया गया था।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ईरान के जहाज पर यूक्रेन के हमले का जवाब देना जरूरी : विदेश मंत्री अब्बास अराघची

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि कैस्पियन सागर में ईरान के कमर्शियल जहाज पर यूक्रेन के हमले को बिना जवाब दिए ऐसे नहीं छोड़ा जा सकता।
ईरानी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की पर आरोप लगाया कि उन्होंने इजरायल के कहने पर यूएन चार्टर का खुला उल्लंघन करके यूरोप को अपनी लड़ाई में घसीटने का आदेश दिया।
न्यूज एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्री अराघची ने कहा कि उन्होंने शनिवार और रविवार को यूरोपीय संघ की विदेश नीति की प्रमुख काजा कैलास और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ फोन पर हुई बातचीत में स्पष्ट कर दिया था कि कीव में मुफ्तखोर ने जो किया, उसे बिना जवाब दिए नहीं जाने नहीं दिया जा सकता।
ईरानी विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, अराघची ने शनिवार को ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास के साथ एक फोन कॉल में यह बात कही। इसके साथ ही दोनों पक्षों ने हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर चर्चा की।
बयान के अनुसार, अराघची ने यूक्रेनी हमले की निंदा की और ईयू, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसके गुनाहगारों और समर्थकों को जिम्मेदार ठहराने की अपील की।
इसमें आगे कहा गया कि दोनों पक्षों ने होर्मुज स्ट्रेट में हो रहे घटनाक्रम पर भी बात की और क्षेत्रीय तनाव को मैनेज करने के लिए डिप्लोमैटिक पहल की जरूरत पर जोर दिया।
एक अलग बयान में मंत्रालय ने कहा कि ईरान ने हमले को लेकर शनिवार को तेहरान में यूक्रेन के चार्ज डी’अफेयर्स को बुलाया और औपचारिक रूप से इस काम की निंदा करते हुए विरोध पत्र दिया।
ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह हमला शनिवार को स्थानीय समय के हिसाब से सुबह 3:00 बजे हुआ और इसमें जहाज में धमाका हुआ और एक नाविक की मौत हो गई।
अर्धसरकारी मेहर न्यूज एजेंसी ने रविवार को बताया कि हमले में तीन नाविक भी घायल हुए हैं।
ईरान के उत्तरी गिलान प्रांत के गवर्नर हादी हकशेनास के हवाले से बताया गया कि स्टील लादे इस जहाज पर उस समय हमला हुआ, जब वह रूस के अस्त्राखान बंदरगाह से ईरान के गिलान प्रांत स्थित अंजली बंदरगाह की ओर जा रहा था।
हकशेनास ने कहा कि हमले में जहाज का ब्रिज (नियंत्रण कक्ष) पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे वह अपनी यात्रा जारी रखने में असमर्थ हो गया। उन्होंने कहा कि इस घटना को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कानूनी माध्यमों से उठाया जाएगा।
वहीं, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने शनिवार को दावा किया कि यूक्रेनी बलों ने कैस्पियन सागर में एक रूसी युद्धपोत और ईरान से जुड़े सैन्य सामान की ढुलाई में इस्तेमाल किए जा रहे जहाजों को निशाना बनाया है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
भारत-तंजानिया के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर, विदेश कार्यालय परामर्श में कई मुद्दों पर हुई चर्चा

भारत और तंजानिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने को लेकर बातचीत की। दोनों देशों के बीच दार एस सलाम में हुए विदेश कार्यालय परामर्श में व्यापार, रक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और विकास सहयोग समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि भारत और तंजानिया के बीच विदेश कार्यालय परामर्श (एफओसी) 22 जुलाई 2026 को तंजानिया के दार एस सलाम में आयोजित किया गया। इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (ईएंडएसए) जनेश काइन और तंजानिया के विदेश मामलों एवं पूर्वी अफ्रीकी सहयोग मंत्रालय के एशिया और ऑस्ट्रेलिया विभाग की निदेशक फेलिस्टर रुगाम्बवा ने की।
एफओसी के दौरान जनेश काइन ने तंजानिया के विदेश मामलों एवं पूर्वी अफ्रीकी सहयोग मंत्रालय के स्थायी सचिव राजदूत डॉ. सैमवेल विलियम शेलुकिंडो से भी मुलाकात की।
मंत्रालय ने बताया कि बैठक में दोनों देशों ने आपसी संबंधों की समीक्षा की और व्यापार व निवेश, विकास सहयोग, रक्षा और सुरक्षा सहयोग, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, कृषि, स्वास्थ्य, संस्कृति और लोगों के बीच संबंधों जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा की।
मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से जल्द ही संयुक्त आयोग बैठक (जेसीएम) और संयुक्त रक्षा सहयोग समिति की बैठक आयोजित करने पर सहमति जताई। इसके अलावा, दोनों देशों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपने विचार साझा किए, जिनमें दोनों की समान रुचि है।
मंत्रालय ने बताया कि दोनों पक्षों ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल और सहयोग की सराहना की। दोनों देशों ने यह भी सहमति जताई कि विदेश कार्यालय परामर्श का अगला दौर भारत में आपसी सुविधा के अनुसार किसी तारीख पर आयोजित किया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ अहम परमाणु समझौते को मंजूरी दीः रिपोर्ट

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से मंगलवार को रिपोर्ट दी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक अहम परमाणु समझौते को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है।
इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। इस 30 साल के समझौते से सऊदी अरब को एक सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम तक पहुंच मिल जाएगी।
‘द जर्नल’ के अनुसार, समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते हुए न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केंद्र में रहें और विदेशी कंपनियां इससे बाहर रहें। यह डील वॉशिंगटन और रियाद के बीच न्यूक्लियर सहयोग के बड़े विस्तार का संकेत हो सकती है। इससे मिडिल ईस्ट में संवेदनशील न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के प्रसार को लेकर कांग्रेस में चिंताएं फिर से बढ़ सकती हैं।
एक अहम प्रावधान के तहत, अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में यूरेनियम एनरिचमेंट (संवर्धन) प्लांट बना सकती हैं। ‘जर्नल’ के अनुसार, यह प्रोजेक्ट तभी आगे बढ़ेगा जब अमेरिका और सऊदी अरब की संयुक्त स्टडी में यह नतीजा निकले कि ऐसे प्लांट की जरूरत है।
यूरेनियम एनरिचमेंट से आम नागरिकों के इस्तेमाल वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए ईंधन बनाया जा सकता है। इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, अगर बहुत ऊंचे स्तर पर किया जाए तो न्यूक्लियर हथियारों के लिए भी सामग्री बनाई जा सकती है। दोहरे इस्तेमाल की इसी क्षमता की वजह से एनरिचमेंट लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर बातचीत के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक रहा है।
ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वॉशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी।
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले हफ्ते के आखिर में इस समझौते को मंजूरी दे दी थी। उम्मीद है कि अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान बुधवार को इस पर हस्ताक्षर करेंगे।
राइट ने अप्रैल 2025 में इस क्षेत्र की अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान अपने सऊदी समकक्ष के साथ प्रस्तावित सहयोग पर चर्चा की थी। इस समझौते से रिएक्टर बनाने, परमाणु ईंधन सेवाएं देने और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के काम में लगी अमेरिकी कंपनियों को बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते हैं।
सऊदी अरब तेल के अलावा अपने ऊर्जा स्रोतों और अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा विकसित करना चाहता है। सऊदी अरब का यह भी तर्क है कि परमाणु ऊर्जा से देश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने और निर्यात के लिए अधिक तेल बचाने में मदद मिल सकती है।
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