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Wednesday,16-September-2026
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किसी ने मुझे इस्तीफा देने के लिए नहीं कहा था : तीरथ सिंह रावत

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चार महीने के अंदर इस्तीफा देने वाले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कहा है कि उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से परामर्श करने के बाद राज्य में संवैधानिक और कानूनी संकट से बचने के लिए निर्णय लिया और किसी ने उनसे इत्सीफा देने के लिए नहीं कहा था।

आईएएनएस के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि जब उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था, तो ‘कुछ लोगों’ ने उनकी छवि खराब करने की साजिश शुरू कर दी थी।

प्रश्न: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में अपने छोटे कार्यकाल के बारे में आप क्या कहेंगे?

उत्तर: किसी ने मुझसे इस्तीफा देने के लिए नहीं कहा। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से सलाह मशविरा करने के बाद मैंने संवैधानिक और कानूनी संकट से बचने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया। मुझे उत्तराखंड का नेतृत्व करने का अवसर देने के लिए मुझ पर विश्वास दिखाने के लिए मैं प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और सभी केंद्रीय नेतृत्व को धन्यवाद देता हूं। यह सब अचानक बजट सत्र के बीच में हुआ जब पार्टी नेतृत्व ने मुझे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के लिए कहा था।

लेकिन कुछ संवैधानिक प्रावधानों के कारण संकट खड़ा हो गया था। संवैधानिक और कानूनी संकट से बचने के लिए मैंने पार्टी नेतृत्व से सलाह मशविरा करने के बाद इस्तीफा देने का फैसला किया और उन्होंने मेरे फैसले का समर्थन किया।

प्रश्न: मुख्यमंत्री के रूप में आपके कार्यकाल की शुरूआत में, गलत कारणों से बहुत सारे बयान सुर्खियों में रहे। आप उन विवादित टिप्पणियों के बारे में क्या कहेंगे?

उत्तर: सुर्खियों में रहे सभी बयान, संदर्भ से बाहर किए गए थे और यह कुछ लोगों द्वारा साजिश के तहत एक सुनियोजित रणनीति के तहत किया गया था। मैं एक वैचारिक पृष्ठभूमि से आता हूं और जनता (लोग), क्षेत्र (रीजन) और प्रदेश (स्टेट) के लिए क्या अच्छा है, इस बारे में फैसले किए।

मैंने अपनी मन की बात की लेकिन कुछ लोगों ने संपादित और जोड़-तोड़ वाले बयान दिखाकर मनभ्रम (भ्रम) पैदा कर दिया था।

प्रश्न: आपको कुंभ आयोजित करने की अनुमति देने के लिए बहुत आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, जिसे कोविड की दूसरी लहर के मुख्य कारणों में से एक कहा गया। अब, क्या आपको लगता है कि यह एक गलत निर्णय था?

उत्तर : कुंभ 12 साल में एक बार आयोजित किया जाता था। मुख्यमंत्री के रूप में दूसरे दिन मैंने कुंभ को बड़े पैमाने पर आयोजित करने का निर्णय लिया क्योंकि यह लोगों की आस्था और भावना का मामला है। बाद में, प्रधानमंत्री की अपील पर, अखाड़े के प्रमुखों ने अंतिम शाही स्नान में भाग नहीं लिया।

लोगों की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए कुंभ के खिलाफ माहौल बनाया गया था, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित सभी कोविड प्रोटोकॉल और एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) का पालन करते हुए आयोजित किया गया था। हमने कई लोगों को कोविड निगेटिव रिपोर्ट के अभाव में वापस भी कर दिया। यह अब तक के सबसे अच्छे कुंभों में से एक था।

जो लोग दूसरी लहर के फैलने के लिए कुंभ को जिम्मेदार ठहरा रहे थे, क्या वे बता सकते हैं कि क्या केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में कोई कुंभ आयोजित हुआ था, जहां से कोविड की शुरूआत हुई थी? हरिद्वार कभी भी कुंभ के दौरान शीर्ष तीन संक्रमित जिलों, या दूसरी लहर के चरम पर या अब भी दैनिक मामलों की गिनती के मामले में नहीं रहा है।

जो लोग हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ हैं, उन्होंने कुंभ के खिलाफ माहौल और प्रचार किया।

कोई केरल से सवाल क्यों नहीं कर रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बकरीद त्योहार के लिए छूट की अनुमति देने के लिए कुल दैनिक मामलों की संख्या का 50 प्रतिशत से ज्यादा रिपोर्ट कर रहा है। कुंभ को दोष देना और महामारी के दौरान केरल के तुष्टिकरण के मॉडल के बारे में कुछ नहीं कहना,इन लोगों की हिंदू विरोधी मानसिकता को दर्शाता है।

प्रश्न: आप अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की संभावनाओं को कैसे देखते हैं?

उत्तर: पांच राज्यों-उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च में होंगे। उत्तराखंड समेत सभी राज्यों में बीजेपी दो-तिहाई बहुमत से जीतेगी और इसका एकमात्र कारण नरेंद्र मोदी का ‘विकास’ मॉडल है। 2014 से प्रधानमंत्री मोदी ने आम आदमी को विकास से जोड़ा है और उत्तराखंड विकास की नई ऊंचाईयों पर पहुंच गया है।

देश को विकास की नई ऊंचाईयों पर ले जाने के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने महामारी के दौरान 80 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत राशन उपलब्ध कराकर लोगों का ध्यान भी रखा है और योजना के तहत उत्तराखंड ने भी लोगों को चीनी उपलब्ध कराई है।

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारतीय नागरिकों को मुफ्त टीके प्रदान करने वाला एकमात्र देश बन गया और उत्तराखंड बुजुर्गों और दिव्यांगों को उनके घर पर टीका लगा रहा है।

पिछले पांच वर्षों में प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में उत्तराखंड ने सभी गांवों में नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की, नल का पानी उपलब्ध कराने का काम करते हुए, ग्रामीण से राष्ट्रीय राजमार्गों तक सड़क नेटवर्क को मजबूत किया और बढ़ाया गया है। राज्य में रेल संपर्क बढ़ा है। कभी सड़क की मांग करने वाले उत्तराखंड के लोग अब रेल संपर्क की मांग कर रहे हैं।

मैं काम के आधार पर कह रहा हूं कि बीजेपी उत्तराखंड और अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव दो तिहाई बहुमत से जीतेगी।

प्रश्न: अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने उत्तराखंड विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है। क्या आपको आप पार्टी से कोई चुनौती नजर आती है?

उत्तर: लोकतंत्र में सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार है। लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि वह (केजरीवाल) दिल्ली में अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में क्या कहेंगे। उनका बहुप्रचारित ‘दिल्ली मॉडल’ विफल हो गया है और कोविड की पहली लहर के दौरान उजागर हो गया था जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाना पड़ा था।

महामारी के दौरान केजरीवाल के विश्व स्तरीय ‘मोहल्ला क्लीनिक’ विफल रहा, जबकि उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने ‘घर-घर क्लिनिक’ बनाकर घर-घर स्वास्थ्य सुविधा प्रदान की। जहां वह हर जगह मुफ्त बिजली देने का वादा कर रहे हैं, वहीं दिल्ली में लोगों के बढ़े हुए बिल आ रहे हैं।

जहां आप और केजरीवाल ने लोगों को गुमराह किया, वहीं बीजेपी ने जो कहा वह किया। उत्तराखंड के लोग अलग प्रकृति के हैं, वे राष्ट्रवादी हैं और मोदी के साथ हैं। केजरीवाल के झूठे वादों से जनता गुमराह नहीं है।

प्रश्न: तो क्या आपको लगता है कि बीजेपी का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है?

उत्तर: हमें किसी पार्टी से कोई चुनौती नहीं मिल रही है, लोग हमारे साथ हैं। कांग्रेस नेता आपस में लड़ रहे हैं। राज्य और देश भर में जमीन खो रहे हैं। लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली भाजपा से भिड़ने से पहले उन्हें अपना घर ठीक करना चाहिए।

राष्ट्रीय समाचार

भारत का वस्तु निर्यात अगस्त में 26 प्रतिशत बढ़ा, व्यापार घाटे में आई कमी

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भारत का वस्तु निर्यात अगस्त में सालाना आधार पर 26.1 प्रतिशत बढ़कर 43.81 अरब डॉलर हो गया है। यह निर्यात में देश का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। यह इस बात की भी पुष्टि करता है कि देश का निर्यात क्षेत्र लगातार मजबूत प्रदर्शन कर रहा है। यह जानकारी सरकार की ओर से मंगलवार को दी गई।

इस दौरान देश के व्यापार घाटे में भी कमी देखने को मिली है, जो कि अगस्त में 26.86 अरब डॉलर पर रहा है, जो कि एक साल पहले समान अवधि में 27.22 अरब डॉलर पर था। इस साल जुलाई में व्यापार घाटा 32 अरब डॉलर था।

अगस्त में वस्तु आयात सालाना आधार पर 26 प्रतिशत बढ़कर 72.67 अरब डॉलर पर रहा है, जो कि इस साल जुलाई में 76.22 अरब डॉलर था। मासिक आधार पर अगस्त में निर्यात में भी कमी दर्ज की गई है, जो कि जुलाई में 44.24 अरब डॉलर पर था।

वाणिज्य मंत्रालय में सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा, “निर्यात में बढ़ोतरी इंजीनियरिंग के सामान, पेट्रोलियम उत्पादों, केमिकल और टेक्सटाइल की वजह से हुई और इनकी सबसे ज्यादा मांग अमेरिका, ईयू और ब्रिक्स देशों से थी।”

आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अगस्त में सोने का आयात गिरकर 2.3 अरब डॉलर रह गया, जो अगस्त 2025 के 5.4 अरब डॉलर के आंकड़े से आधे से भी कम था।

आरबीआई के इस महीने की शुरुआत में जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी) 4.2 अरब डॉलर रहा। पश्चिमी एशिया संकट के कारण ग्लोबल मार्केट में तेल, एलपीजी और फर्टिलाइजर की कीमतें बढ़ने के बावजूद यह जीडीपी का 0.5 प्रतिशत बना रहा।

पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में सीएडी का अनुमान जीडीपी का 0.4 प्रतिशत था।

ब्लूमबर्ग के डेटा के अनुसार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) या एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट स्कीम की वजह से डॉलर के इनफ्लो में जबरदस्त बढ़ोतरी के बाद, भारत दुनिया में विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला चौथा सबसे बड़ा देश बन गया है।

डेटा से पता चलता है कि 4 सितंबर को खत्म हुए हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 44.9 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 785.7 अरब डॉलर हो गया, जिससे भारत ने रूस को चौथे स्थान से हटा दिया और अब वह चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद चौथे स्थान पर है।

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राष्ट्रीय समाचार

किसानों के लिए वरदान हैं ये 3 सरकारी योजनाएं, मिलता है सालाना 6,000 रुपए से लेकर 5 लाख तक लोन का लाभ

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किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार कई योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें कुछ ऐसी योजनाएं भी हैं जो किसानों को सीधे वित्तीय सहायता, वृद्धावस्था में पेंशन और खेती के लिए आसान ऋण जैसी सुविधाएं प्रदान करती हैं। हालांकि, जानकारी के अभाव में आज भी कई पात्र किसान इन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे में अगर आप खेती करते हैं, तो आज हम आपको सरकार की तीन ऐसी योजनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके बहुत काम आ सकती हैं।

दरअसल, हम किसानों से संबंधित जिन योजनाओं की बात कर रहे हैं वो हैं-प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी), जो आपके लिए बड़े काम की साबित हो सकती हैं।

सबसे पहले बात करते हैं पीएम किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना की। पीएम-किसान देश की सबसे लोकप्रिय किसान योजनाओं में शामिल है। इस योजना के तहत पात्र भूमिधारक किसानों को हर वर्ष 6,000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह राशि किसानों के बैंक खातों में 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में सीधे हस्तांतरित की जाती है।

योजना का उद्देश्य किसानों को खेती और घरेलू जरूरतों के लिए अतिरिक्त आर्थिक मदद उपलब्ध कराना है। इसका लाभ उन किसानों को मिलता है जिनके नाम पर खेती योग्य जमीन दर्ज है। योजना का पैसा प्राप्त करने के लिए ई-केवाईसी, आधार से बैंक खाते की लिंकिंग और भूमि रिकॉर्ड का सत्यापन अनिवार्य है।

पीएम-किसान योजना का लाभ केवल पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को दिया जाता है। संस्थागत भूमिधारक इसके पात्र नहीं होते। इसके अलावा, जिन परिवारों में कोई सदस्य आयकरदाता है, उन्हें भी इस योजना का लाभ नहीं मिलता।

डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट और आर्किटेक्ट जैसे पंजीकृत पेशेवर भी योजना की अपात्र श्रेणी में आते हैं। इसलिए आवेदन से पहले पात्रता की शर्तों को समझना जरूरी है।

दूसरी योजना है-प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना। छोटे और सीमांत किसानों को बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार यह योजना संचालित करती है। इस योजना के तहत 60 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद पात्र किसानों को प्रति माह 3,000 रुपए पेंशन दी जाती है।

योजना से जुड़ने के समय किसान की उम्र 18 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए और उसके पास अधिकतम 2 हेक्टेयर तक खेती योग्य भूमि होनी चाहिए। किसान को अपनी उम्र के अनुसार हर महीने 55 रुपए से 200 रुपए तक का योगदान करना होता है। खास बात यह है कि किसान जितनी राशि जमा करता है, उतनी ही राशि केंद्र सरकार भी उसके पेंशन खाते में योगदान के रूप में जमा करती है।

इस योजना में पारिवारिक पेंशन का भी प्रावधान है। यदि पेंशन प्राप्त कर रहे किसान का निधन हो जाता है, तो उसके जीवनसाथी को नियमों के अनुसार पेंशन राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा पारिवारिक पेंशन के रूप में दिया जाता है। इससे परिवार को भी आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

तीसरी योजना है-किसान क्रेडिट कार्ड। खेती के दौरान किसानों को बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों के लिए बड़ी राशि की आवश्यकता होती है। ऐसे में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) किसानों को सस्ती और आसान ऋण सुविधा उपलब्ध कराता है।

इस योजना के तहत किसान खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए बैंक से ऋण प्राप्त कर सकते हैं। केवल फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि पशुपालन, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों से जुड़े पात्र लाभार्थी भी केसीसी के माध्यम से ऋण सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।

किसान क्रेडिट कार्ड के तहत मिलने वाली ऋण सीमा किसान की जमीन, फसल पैटर्न, उत्पादन लागत और वित्तीय जरूरतों के आधार पर तय की जाती है। बैंक सभी पहलुओं का मूल्यांकन करने के बाद क्रेडिट लिमिट निर्धारित करते हैं।

योजना के तहत पात्र किसानों को 5 लाख रुपए तक का लोन मिल सकता है, जिससे कृषि कार्यों के लिए पूंजी जुटाना आसान हो जाता है और किसानों की साहूकारों पर निर्भरता कम होती है।

इसतरह, ये तीनों योजनाएं किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा, आय सहायता और वित्तीय सशक्तिकरण का मजबूत आधार बनकर उभरी हैं।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

यमन में जारी लड़ाई की वजह से लोग घर छोड़ने को मजबूर : संयुक्त राष्ट्र

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संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से जुड़े मानवीय सहायता संगठनों ने चेतावनी दी है कि यमन में जारी लड़ाई लोगों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर कर रही है। इससे आम नागरिकों की मौत और घायल होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। वहीं, पहले से दबाव में चल रहे राहत कार्यों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) ने सोमवार (स्थानीय समयानुसार) बताया कि सितंबर की शुरुआत से अब तक यमन में फिर से भड़की हिंसा के कारण कम से कम 1.25 लाख लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है।

स‍िन्हुआ न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इस महीने के पहले दो हफ्तों में 40 आम नागरिकों के हताहत होने की पुष्टि की है। इनमें 8 लोगों की मौत हुई है और 32 लोग घायल हुए हैं। मरने वालों में आधे और घायल होने वालों में आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं।

ओसीएचए ने कहा कि बेहद मुश्किल हालात के बावजूद संयुक्त राष्ट्र और उसके सहयोगी संगठन राहत कार्य जारी रखे हुए हैं। शनिवार तक हजारों परिवारों को सहायता पहुंचाई जा चुकी थी। हालांकि, राहत सामग्री की भारी कमी हो रही है और उपलब्ध फंडिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

ओसीएचए ने कहा, “सुरक्षा संबंधी जोखिमों के कारण राहत एजेंसियों की आवाजाही और सहायता पहुंचाने का काम गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।”

संस्था ने बताया कि यमन के पश्चिमी तट के कई इलाकों में मानवीय सहायता पहुंचाने और राहत कर्मियों की आवाजाही फिलहाल रुकी हुई है। कई महत्वपूर्ण सड़कें या तो बंद हैं या उन पर यात्रा करना संभव नहीं है।

ओसीएचए ने एक बार फिर सभी पक्षों से अपील की कि वे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करें और राहत सहायता को सुरक्षित तथा बिना किसी रुकावट के जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने दें।

इस महीने की शुरुआत में यमन की सरकारी सेना ने कहा था कि पश्चिमी तट पर हूती विद्रोहियों के साथ एक महीने तक चली लड़ाई में 500 से ज्यादा सैनिक मारे गए और लगभग 1,500 घायल हुए।

यह लड़ाई उस समय तेज हो गई जब हूती समूह ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाब-अल-मंदब स्‍ट्रेट की ओर बड़े पैमाने पर बढ़त बनाने की कोशिश की।

सरकारी समर्थक नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज ने सरकारी चैनल अल-जौम्हूरिया टीवी पर जारी बयान में कहा कि ये हताहत 9 अगस्त से 10 सितंबर के बीच दर्ज किए गए।

बयान में दावा किया गया कि इस दौरान 1,000 से अधिक हूती लड़ाके मारे गए और हजारों घायल हुए। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

बयान के अनुसार, लड़ाई की शुरुआत हूती समूह की ओर से किए गए मिसाइल, ड्रोन और विस्फोटक नौकाओं से हमलों के साथ हुई थी।

इसके बाद संघर्ष लाल सागर के किनारे स्थित होदेदाह प्रांत के दक्षिणी हिस्से के हैस क्षेत्र से बढ़कर पड़ोसी ताइज़ प्रांत के कई मोर्चों तक फैल गया।

यह हताहत ऐसे समय में हुए हैं जब हूती समूह ने तीन सितंबर को एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था, जिसने यमन के लाल सागर तट पर नियंत्रण की स्थिति को तेजी से बदल दिया।

इस अभियान के दौरान हूती लड़ाकों ने होदेदाह और पड़ोसी ताइज प्रांत के कई ऐसे क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया, जो पहले सरकार के नियंत्रण में थे।

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