राजनीति
भाजपा विधायक ने मुख्तार अंसारी को सजा दिलाने में प्रियंका की मदद मांगी
दिवंगत विधायक कृष्णानंद राय की विधवा व भाजपा विधायक अलका राय ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को एक भावुक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने बसपा विधायक मुख्तार अंसारी की मदद नहीं करने का आग्रह किया है। अंसारी ने 2005 में कृष्णानंद राय की कथित तौर पर गोली मारकर हत्या कर दी थी, लेकिन बाद में सबूतों के अभाव में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। वर्तमान में वह पंजाब की मोहाली जेल में बंद हैं।
अलका राय ने अपने पत्र में कहा है कि वह पिछले 14 वर्षों से न्याय के लिए लड़ रही हैं।
पत्र में उन्होंने लिखा, “आपकी पार्टी और पंजाब में आपकी सरकार अंसारी को बचा रही है और उसे वापस उत्तर प्रदेश में भेजने से इनकार कर दिया है। यह अविश्वसनीय है कि यह सब आपके या राहुलजी की जानकारी के बिना हो रहा है। पेशेवर अपराधी मुख्तार अंसारी ने कई परिवारों को बर्बाद किया है।”
अलका ने आगे लिखा कि उनके जैसे कई लोग मुख्तार अंसारी को उसके अपराधों के लिए सजा दिए जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
उन्होंने प्रियंका गांधी को संवेदनशीलता दिखाने और अपराधी को सजा दिलाने में मदद करने के लिए कहा।
अलका राय, गाजीपुर के मोहम्मदाबाद सीट से भाजपा की विधायक हैं, जो उनके पति की सीट होती थी।
राष्ट्रीय समाचार
सीजेपी प्रदर्शन हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई तेज, अब तक 10 एफआईआर दर्ज

दिल्ली पुलिस ने संसद तक ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के मार्च के दौरान हुई हिंसक झड़प के सिलसिले में अब तक 10 एफआईआर दर्ज की हैं। पुलिस की ओर से जानकारी दी गई कि प्रदर्शन के दौरान हुई अलग-अलग घटनाओं और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में ये एफआईआर दर्ज की गई हैं। फिलहाल, मामलों की जांच जारी है।
पुलिस के अनुसार, सीजेपी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में संसद मार्ग थाने में 4 एफआईआर और सीपी थाने में तीन एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसके अलावा, मंदिर मार्ग, बाराखंभा रोड और कर्तव्य पथ थानों में एक-एक एफआईआर दर्ज हुई है। इनमें से एक एफआईआर नई दिल्ली क्षेत्र में, जो एक हाई-सिक्योरिटी जोन है, संसद सत्र के दौरान बिना मंजूरी के ड्रोन उड़ाने से जुड़ी है।
दिल्ली पुलिस ने बताया कि आरएएफ जवान पर हुए हमले के मामले में भी एफआईआर दर्ज की गई है। वायरल वीडियो में कुछ लोग आरएएफ जवान को पीटते नजर आए। वे आरएएफ की गाड़ी पर पथराव और तोड़फोड़ भी करते दिखे।
ये एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई हैं। साथ ही, जांच टीमें उपद्रव के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं। बताया गया कि कथित तौर पर जिम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए 250 से अधिक वीडियो की जांच की जा रही है। इनमें मोबाइल फोन रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन कैमरे के विजुअल और पुलिस के बॉडी-वर्न कैमरों से ली गई फुटेज शामिल हैं।
गौरतलब है कि सोमवार को पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए हजारों प्रदर्शनकारियों ने मध्य दिल्ली में संसद तक मार्च किया। जंतर-मंतर से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित संसद तक मार्च करने की कोशिश में प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स गिरा दिए और सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी झड़प हुई।
इस हिंसक प्रदर्शन में दर्जनों पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि कई प्रदर्शनकारियों को भी चोटें आईं।
महाराष्ट्र
‘संवाद खत्म होते ही तानाशाही ढहने लगती है,’ सामना में केंद्र सरकार पर शिवसेना (यूबीटी) ने उठाए सवाल

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि नई दिल्ली में हाल में हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने “पतन के दौर” में प्रवेश कर चुकी है। संपादकीय में कहा गया कि जनता से संवाद करने के बजाय सरकार बल प्रयोग का रास्ता अपना रही है और यही किसी भी शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।
संपादकीय में दावा किया गया कि पुलिस सड़कों पर प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसा रही थी, लेकिन वे पीछे हटने के बजाय शांतिपूर्वक चोट सहते रहे। इसमें कहा गया, “जब ऐसे प्रदर्शनकारी पैदा हो जाते हैं, जो कहते हैं कि और मारो, लेकिन हम यहां से नहीं हटेंगे, तब तानाशाह उनका क्या बिगाड़ सकते हैं?”
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में “सरकारी दमन” देखने को मिला। संपादकीय में दावा किया गया कि बुद्ध की धरती पर सरकार की हिंसा मानवता का मजाक बन गई है। लेख के अनुसार, एक ओर प्रधानमंत्री को वैश्विक मंचों पर “विश्वगुरु” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और उनके समर्थकों में उनके प्रति अत्यधिक श्रद्धा है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ प्रशासनिक कड़ाई सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। संपादकीय के अनुसार, यदि सत्ता में बैठे लोग जनता से संवाद शुरू नहीं करेंगे तो उनका शासन अधिक समय तक नहीं टिकेगा।
संपादकीय में दावा किया गया कि पुलिस कार्रवाई के बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे, जो सरकार के खिलाफ बढ़ते विरोध का संकेत है। इसमें आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार आंदोलनकारियों, पत्रकारों और प्रभावित लोगों से सीधे संवाद करने से लगातार बचती रही है।
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा भी उठाया। संपादकीय में कहा गया कि मौजूदा युवा असंतोष के बीच उनसे इस्तीफा लेना आसान था, लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसमें दावा किया गया कि यदि एक मंत्री का इस्तीफा लिया गया तो उसके बाद पूरी कैबिनेट में इस्तीफों की कतार लग सकती है।
संपादकीय में देशभर में भूमि और पर्यावरण से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया गया। इसमें ऋषिकेश में पेड़ों की कटाई के खिलाफ चल रहे आंदोलन, झारखंड और छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्रों की कटाई तथा महाराष्ट्र के नासिक, अकोला, सोलापुर, भंडारा और बुलढाणा जिलों में भूमि अधिग्रहण, रिंग रोड निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विरोध में किसानों के आंदोलनों का जिक्र किया गया।
उद्धव ठाकरे की पार्टी ने आरोप लगाया कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है। संपादकीय में दावा किया गया कि न्यायपालिका में नियुक्तियां और चुनाव आयोग कार्यपालिका के प्रभाव में हैं। साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की आलोचना करते हुए विधानसभा में विपक्ष के नेता की नियुक्ति नहीं होने तथा संसदीय कार्यवाही को लेकर भी सवाल उठाए गए।
संपादकीय में लीबिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए छात्र एवं युवा आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इतिहास गवाह है कि जब शासकों और जनता के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तब नागरिक असंतोष बढ़ता है और तानाशाही शासन का पतन हो जाता है।
शिवसेना (यूबीटी) ने कहा, “राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है, लेकिन भाजपा और जनता के बीच संवाद खत्म हो चुका है। भाजपा के लिए मतदाता अब खरीदने की वस्तु बन गया है। 12 वर्षों तक इसी सोच के आधार पर चुनाव जीतने का दावा करने वाला अहंकार अब युवाओं के गुस्से के सामने धूल में मिल गया है।”
संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि इतिहास बताता है कि भ्रष्ट और जनता की बात न सुनने वाली सरकारें तब गिर जाती हैं, जब लोगों का धैर्य जवाब दे देता है। साथ ही भाजपा पर न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करने तथा विपक्ष को कमजोर करने का आरोप भी लगाया गया।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ अहम परमाणु समझौते को मंजूरी दीः रिपोर्ट

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से मंगलवार को रिपोर्ट दी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक अहम परमाणु समझौते को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है।
इस समझौते के तहत सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है और अमेरिकी कंपनियों के लिए अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है। इस 30 साल के समझौते से सऊदी अरब को एक सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम तक पहुंच मिल जाएगी।
‘द जर्नल’ के अनुसार, समझौते को इस तरह से तैयार किया गया है कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के उभरते हुए न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर के केंद्र में रहें और विदेशी कंपनियां इससे बाहर रहें। यह डील वॉशिंगटन और रियाद के बीच न्यूक्लियर सहयोग के बड़े विस्तार का संकेत हो सकती है। इससे मिडिल ईस्ट में संवेदनशील न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के प्रसार को लेकर कांग्रेस में चिंताएं फिर से बढ़ सकती हैं।
एक अहम प्रावधान के तहत, अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में यूरेनियम एनरिचमेंट (संवर्धन) प्लांट बना सकती हैं। ‘जर्नल’ के अनुसार, यह प्रोजेक्ट तभी आगे बढ़ेगा जब अमेरिका और सऊदी अरब की संयुक्त स्टडी में यह नतीजा निकले कि ऐसे प्लांट की जरूरत है।
यूरेनियम एनरिचमेंट से आम नागरिकों के इस्तेमाल वाले न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए ईंधन बनाया जा सकता है। इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, अगर बहुत ऊंचे स्तर पर किया जाए तो न्यूक्लियर हथियारों के लिए भी सामग्री बनाई जा सकती है। दोहरे इस्तेमाल की इसी क्षमता की वजह से एनरिचमेंट लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय न्यूक्लियर बातचीत के सबसे संवेदनशील हिस्सों में से एक रहा है।
ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि सीधे अमेरिकी दखल से सऊदी न्यूक्लियर प्रोग्राम पर वॉशिंगटन का असर बढ़ेगा। तर्क है कि अमेरिका की भागीदारी से न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को सैन्य मकसद के लिए इस्तेमाल होने से रोकने में भी मदद मिलेगी।
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले हफ्ते के आखिर में इस समझौते को मंजूरी दे दी थी। उम्मीद है कि अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान बुधवार को इस पर हस्ताक्षर करेंगे।
राइट ने अप्रैल 2025 में इस क्षेत्र की अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान अपने सऊदी समकक्ष के साथ प्रस्तावित सहयोग पर चर्चा की थी। इस समझौते से रिएक्टर बनाने, परमाणु ईंधन सेवाएं देने और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के काम में लगी अमेरिकी कंपनियों को बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते हैं।
सऊदी अरब तेल के अलावा अपने ऊर्जा स्रोतों और अर्थव्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा विकसित करना चाहता है। सऊदी अरब का यह भी तर्क है कि परमाणु ऊर्जा से देश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने और निर्यात के लिए अधिक तेल बचाने में मदद मिल सकती है।
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