अंतरराष्ट्रीय समाचार
ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवारी स्वीकार की
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 नवंबर के चुनाव के लिए रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीवारी को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया है, वहीं उन्होंने ‘अमेरिका फस्र्ट’ (अमेरिका पहले) की नीति पर जोर देते हुए अपने डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी जो बाइडन को एक खतरनाक कट्टरपंथी बताया।
व्हाइट हाउस के साउथ लॉन से गुरुवार को ट्रंप ने अमेरिकियों से अपील करते हुए कहा कि बाइडन और डेमोक्रेट अमेरिका को एक नस्लवादी देश के रूप में देखते हैं, “एक बुरा राष्ट्र जिसे दंडित किया जाना चाहिए”, और उन्होंने पूछा कि वह (बाइडन) इस राय के साथ कैसे नेतृत्व कर सकते हैं।”
उन्होंने कुछ अमेरिकियों के बीच समाजवाद की पुरानी आशंकाओं को फिर से हवा देते हुए, बाइडन को डेमोक्रेटिक पार्टी के कट्टरपंथी विंग के साथ जोड़ा।
ट्रंप ने बाइडन को निशाने पर लेते हुए कहा, “बाइडन समाजवाद के लिए एक ‘ट्रोजन हॉर्स’ हैं। अगर जो बाइडन में बर्नी सैंडर्स और उनके साथी कट्टरपंथियों जैसे मार्क्सवादियों के साथ खड़े होने की ताकत नहीं है, और ऐसे कई हैं, कई हैं, कई हैं, हम उन्हें हर समय देखते हैं, यह अविश्वसनीय है..वास्तव में फिर कैसे वह आपके लिए कभी खड़े हो पाएंगे?”
उन्होंने हालिया दंगों और कुछ राज्यों में बढ़ती अपराध दर का हवाला देते हुए कहा कि बाइडन के सत्ता में आने पर अमेरिकी लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
ट्रंप को कोविड-19 संकट से निपटने को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है। उन्होंने चिकित्सा आपूर्ति और उपकरणों के निर्माण का हवाला देते हुए अपना बचाव किया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, “हम वर्ष के अंत से पहले या इससे पहले ही वैक्सीन बना लेंगे” और वायरस को हराकर मजबूती के साथ उभरेंगे।
इससे पहले, डेमोक्रेटिक पार्टी की उपराष्ट्रपति उम्मीदवार कमला हैरिस ने देश में महामारी के दौरान ट्रंप पर सुस्त और लापरवाह बने रहने का आरोप लगाया।
बाइडन और अन्य पर हमला करते हुए, ट्रंप ने अपने संबोधन में एक बार भी हैरिस का जिक्र नहीं किया।
उनके अभिभाषण में ज्यादातर घरेलू मुद्दों पर जोर रहा। ट्रंप ने विदेश नीति के लक्ष्यों का कोई खाका पेश नहीं किया और रणनीतिक पहलुओं का कोई उल्लेख नहीं किया। व्यापक रूप से उनका संदेश चीन के आर्थिक शोषण को समाप्त करने और वहां से नौकरियों को वापस लाने के बारे में रहा।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
खाड़ी और ब्लैक सी में हमलों की भारत-लाइबेरिया ने की निंदा, समुद्री सुरक्षा पर जोर

भारत और लाइबेरिया के नेतृत्व में स्थापित ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स ऑन सेफ्टी एंड सिक्योरिटी ऑफ शिपिंग एंड सीफेरर्स (जीओएफ एस4 ) का उद्देश्य नाविकों (सीफेरर्स) और वाणिज्यिक जहाजरानी की सुरक्षा को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाना तथा जहाजों और उनके चालक दल को हमलों से सुरक्षित रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है। यह जानकारी शुक्रवार को विदेश मंत्रालय ने दी।
संयुक्त राष्ट्र में गुरुवार को भारत और लाइबेरिया के स्थायी मिशनों ने खाड़ी क्षेत्र और ब्लैक सी में जहाजों तथा नाविकों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की थी।
भारत और लाइबेरिया ने 25 सितंबर को जीओएफ एस4 की शुरुआत की थी। दोनों देश ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति रोकने और नाविकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बेहतर समन्वय का समर्थन करने के लिए तैयार हैं।
शुक्रवार को नई दिल्ली में आयोजित विदेश मंत्रालय की नियमित प्रेस वार्ता में मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस समूह का उद्देश्य वाणिज्यिक जहाजरानी और समुद्री उद्योग से जुड़े देशों तथा हितधारकों को एक मंच पर लाना है। साथ ही उन देशों को भी जोड़ना है जो समुद्री सेवाएं प्रदान करते हैं या जहां बड़ी संख्या में नाविक समुदाय मौजूद है।
उन्होंने कहा, “विचार यह है कि सभी को एक साथ लाया जाए ताकि हमारे नाविकों की सुरक्षा और वाणिज्यिक जहाजरानी की सुरक्षा के मुद्दे को वैश्विक चर्चा के केंद्र में रखा जा सके। साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अभियानों को मजबूत किया जा सके ताकि वाणिज्यिक जहाजरानी प्रभावित न हो, उन पर हमले न हों और नाविक सुरक्षित रहें।”
रणधीर जायसवाल ने बताया कि इस समूह की पहली बैठक हाल ही में न्यूयॉर्क में हुई थी। इसकी अध्यक्षता विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और लाइबेरिया की विदेश मंत्री सारा बायसोलो न्यान्टी ने की थी। इसमें 25 देशों ने हिस्सा लिया।
उन्होंने कहा कि गुरुवार को भारत और लाइबेरिया ने खाड़ी क्षेत्र और ब्लैक सी क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों तथा नाविकों पर हाल में हुए हमलों की कड़ी निंदा की।
भारत और लाइबेरिया द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया, “जीओएफ एस4 के सह-अध्यक्ष होने के नाते भारत और लाइबेरिया खाड़ी क्षेत्र, उसके आसपास के इलाकों और ब्लैक सी में हाल के दिनों में वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों पर हुए अस्वीकार्य हमलों की कड़ी निंदा करते हैं। समुद्री व्यापार को बाधित करने और निर्दोष लोगों की जान लेने वाली ऐसी कार्रवाइयों का कोई औचित्य नहीं है। क्षेत्र में शांति और स्थिरता के हित में हम इन हमलों को तुरंत रोकने की अपील करते हैं।”
संयुक्त बयान में आगे कहा गया, “हम उन नाविकों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं जिन्होंने अपनी जान गंवाई है और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हैं।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर मतभेदों के बावजूद भारत-अमेरिका साझेदारी आगे बढ़ रही है : रिपोर्ट

पिछले 25 वर्षों के ज्यादातर समय में भारत-अमेरिका संबंध इस सोच पर आधारित रहे हैं कि एक मजबूत भारत एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने, सप्लाई चेन में विविधता लाने और एक स्वतंत्र व खुले इंडो-पैसिफिक को मजबूत करने में मदद करके अमेरिका के बड़े रणनीतिक मकसद को पूरा करता है।
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मतभेद तो हमेशा से रहे हैं, लेकिन व्यापक रणनीतिक वजहें इतनी मजबूत मानी जाती थीं कि वे इन मतभेदों को झेल सकें। हालांकि, अब इस सोच को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है।
भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने हाल ही में ‘इंडिया नैरेटिव’ में लिखा, “भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा मतभेद सिर्फ तेल के मुद्दे तक सीमित नहीं हैं। शायद साझेदारी के मतलब को लेकर भी गहरी असहमति है। वॉशिंगटन अक्सर रणनीतिक तालमेल को राजनीतिक सहमति की मांग करने का आधार बनाता है। वहीं, नई दिल्ली में साझेदारी का मतलब संप्रभु देशों के बीच सहयोग माना जाता है, जिनके बीच रूस, ईरान और चीन से निपटने के तरीकों को लेकर मतभेद बने रहेंगे।”
उन्होंने कहा, “जब ये मतभेद वफादारी की सार्वजनिक परीक्षा बन जाते हैं तो कूटनीति की जगह दिखावा ले लेता है। समझौता करना इसलिए और मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसे घुटने-टेकने जैसा दिखाया जाता है।”
राव ने कहा कि नई दिल्ली ने वॉशिंगटन की उस पुरानी सोच से दूर होने में कई साल लगाए हैं, जिसके तहत भारत और पाकिस्तान को एक ही क्षेत्रीय समीकरण का हिस्सा माना जाता था। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने के ट्रंप के बार-बार किए जा रहे दावों से उस पुरानी सोच पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है।
पूर्व भारतीय राजनयिक ने कहा, “यह आपत्ति सिर्फ सम्मान की बात नहीं है। भारत के वैश्विक आर्थिक, तकनीकी और समुद्री हित हैं, जिन्हें सिर्फ पड़ोसी देश के साथ झगड़े के संकीर्ण नजरिए से नहीं समझा जा सकता, लेकिन सोचने की पुरानी आदतें दशकों की कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद बनी रह सकती हैं, खासकर तब जब वे किसी राष्ट्रपति के राजनीतिक जुनून को पूरा करती हों।”
इस रिपोर्ट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हाल ही में न्यूयॉर्क में की गई टिप्पणियों का जिक्र किया गया है, जिसमें उन्होंने भारत का पक्ष साफ तौर पर रखा।
विदेश मंत्री जयशंकर ने एशिया सोसाइटी को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को और ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि सुरक्षा से जुड़ी भारत की सबसे अहम चिंताओं में से किसी एक को न समझने से दोनों देशों के संबंधों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने पड़ोसी देश से होने वाले आतंकवाद को दशकों से चली आ रही एक सोची-समझी नीति बताया।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की प्रतिक्रिया आहत राष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। इसमें कहा गया है कि रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि बाहरी दबाव की कितनी जोर-शोर से निंदा की जाती है, बल्कि इस बात से होती है कि देश उसका कितनी प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है।
राव ने ‘इंडिया नैरेटिव’ में लिखा, “इसके लिए अलग-अलग तरह की डिफेंस सप्लाई, बेहतर एनर्जी सिक्योरिटी, टेक्नोलॉजी की क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग की ताकत और संस्थागत मजबूती की जरूरत है। इन आधारों के बिना स्वायत्तता सिर्फ बातें होंगी जो असल में निर्भरता पर टिकी होंगी। भारत को उन कीमतों को समझना होगा जो उसे चुकानी पड़ सकती हैं और उन्हें चुकाने के साधन भी विकसित करने होंगे।”
इस बात पर जोर देते हुए कि इसका मतलब अमेरिका से पीछे हटना नहीं है, उन्होंने कहा, “एशिया में अनुकूल संतुलन बनाए रखने के लिए भारत को अमेरिकी टेक्नोलॉजी, निवेश और सहयोग की जरूरत है। वहीं, अमेरिका को ऐसे भारत की जरूरत है जो चीन के दबदबे का मुकाबला कर सके। दोनों देशों के पास जो कुछ उन्होंने बनाया है, उसे बनाए रखने की वजह है, और जब भी किसी असहमति को रिश्तों पर जनमत संग्रह बना दिया जाता है, तो किसी को भी फायदा नहीं होता।”
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अफ्रीका के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का: विदेश मंत्री जयशंकर

विदेश मंत्री (ईएएम) एस. जयशंकर ने घाना के फॉरेन सर्विस इंस्टीट्यूट में एक खास सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत अफ्रीका को अपने दिल में बसाए हुए है और वह ऐसी साझेदारी बनाएगा जो न सिर्फ आज के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी होगी।
यहां पर अफ्रीका और ग्लोबल साउथ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया था। बदलते वैश्विक माहौल पर बात करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “आज के उथल-पुथल भरे दौर में, कूटनीति के सामने चुनौती यह है कि प्रतिस्पर्धा को टकराव में बदले बिना उसे कैसे संभाला जाए, और हितों के अलग होने पर भी सहयोग को कैसे बढ़ावा दिया जाए।”
उन्होंने भारत की महत्वाकांक्षा, काम करने के तरीके और आत्मविश्वास की कहानी पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि कैसे अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे, डिजिटल, मैन्युफैक्चरिंग, उद्यमिता और लोगों की आकांक्षाओं में हो रहे बदलाव देश को वैश्विक विकास का एक अहम इंजन बना रहे हैं।
विदेश मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का संबंध सप्लाई चेन की मजबूती, तकनीकी क्षमताओं और जरूरी सामान बनाने की क्षमता से है। उन्होंने कहा कि भारत कई क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ अहम क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को भी महत्व देता है।
विदेश मंत्री ने भारत और अफ्रीका के लिए अपनी युवा आबादी को उत्पादक, कुशल और सशक्त नागरिकों में बदलने के महत्व पर ज़ोर दिया।
विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा, “हमारी वैज्ञानिक और तकनीकी ताकत लगातार बढ़ रही है, जो हमारे विजन, प्रतिबद्धता और कम लागत में बेहतर काम करने की क्षमता को दर्शाती है। तकनीक का लाभ सभी तक पहुंचना चाहिए। इसके साथ ही ईंधन, भोजन, उर्वरक और वित्त जैसी सप्लाई चेन को मजबूत करना बेहद जरूरी है।” उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ को औद्योगीकरण का पूरा अधिकार है।
इस बात पर जोर देते हुए कि भारत की विदेश नीति का नजरिया रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है, उन्होंने कहा, “हमारा मानना है कि साझेदारियों से हमारे विकल्प बढ़ने चाहिए, न कि सीमित होने चाहिए।”
ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए विदेश मंत्री ने कहा, “यह भारत की अध्यक्षता के दौरान जी20 में अफ्रीकन यूनियन को शामिल किए जाने में देखा गया था।”
उन्होंने एक सुधारे हुए वैश्विक व्यवस्था के भारत के विजन पर प्रकाश डाला—”जो अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के विकास, प्रगति और समृद्धि का समर्थन करे।”
विदेश मंत्री जयशंकर ने अफ्रीका के साथ भारत की मजबूत साझेदारी को रेखांकित किया, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, क्षमता विकास, मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर), कृषि, स्वास्थ्य और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। विदेश मंत्री ने कहा, “बेहतर क्षमताओं वाला भारत एक ज्यादा गंभीर और असरदार पार्टनर है। हम अफ्रीका को अपने दिल में बसाए हुए हैं और हम ऐसी पार्टनरशिप बनाएंगे जो न सिर्फ आज के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी होगी।”
विदेश मंत्री जयशंकर ने घाना में भारतीय समुदाय और भारत के दोस्तों से भी बातचीत की और दोनों देशों के बीच पार्टनरशिप को मजबूत करने में उनकी कोशिशों की तारीफ की।
विदेश मंत्री जयशंकर ने घाना के विदेश मंत्री सैमुअल ओकुद्जेटो अब्लाक्वा और शिक्षा मंत्री हारुना इड्रिसु के साथ मिलकर फ्रैंगीपानी (प्लमेरिया) का पौधा लगाया। यह भारत की ‘एक पेड़ मां के नाम’ और घाना की ‘ट्री फॉर लाइफ’ पहल की भावना को दर्शाता है।
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