अंतरराष्ट्रीय समाचार
महत्वपूर्ण फोनवार्ता बाद भारत, चीन मतभेद को विवाद न बनाने पर सहमत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सप्ताहांत में हुए लद्दाख के अग्रिम इलाकों के दौरे और लगातार बनाए जा रहे कूटनीतिक दबाव के चलते लगता है कि भारत-चीन सीमा गतिरोध का कोई समाधान निकल आया है। यह बात ऐसे समय में सामने आई है, जब एक दिन पहले लद्दाख में एलएसी पर चार टकराव बिंदुओं में से तीन पर सेनाओं को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत और चीन में सीमा पर जारी तनाव के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने रविवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ टेलीफोन पर बातचीत की।
भारत और चीन के बीच लंबे वक्त से सीमा विवाद चल रहा है। इसे सुलझाने के लिए दोनों देशों की ओर से प्रतिनिधि तय किए गए हैं, भारत की ओर से अजीत डोभाल स्थायी प्रतिनिधि हैं।
सीमा पर चल रहे गतिरोध को सुलझाने के लिए दोनों विशेष प्रतिनिधियों ने रविवार को भारत-चीन सीमा के पश्चिमी क्षेत्र में हाल के घटनाक्रमों पर विचारों का स्पष्टता एवं गहनता के साथ आदान-प्रदान किया।
हालांकि सोमवार को हुई वार्ता पर चीन की ओर से जो बयान आया है, उसमें वह अपनी पहले बताई गई स्थिति से हटता नजर नहीं आ रहा है, मगर साथ ही उसने दोनों पक्षों से रणनीतिक निर्णयों का पालन करने और महत्वपूर्ण रूप से मतभेदों को विवाद नहीं बनाने पर जोर दिया है।
वांग ने कहा, कुछ दिनों पहले चीन और भारत के बीच गलवान घाटी में सीमा के पश्चिमी हिस्से में जो कुछ हुआ, वह बहुत स्पष्ट है। चीन अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता और सीमा क्षेत्र का शांति के साथ प्रभावी ढंग से बचाव करता रहेगा।
चीनी मंत्री ने जोर देकर कहा कि विकास और सशक्तिकरण चीन और भारत की पहली प्राथमिकता है और चीन और भारत इस सामान्य दिशा में दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को साझा करते हैं। दोनों पक्षों को हमेशा रणनीतिक निर्णयों का पालन करना चाहिए, जो एक-दूसरे के लिए खतरा पैदा न करते हुए विकास के अवसर प्रदान करे।
चीनी विदेश मंत्री ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों में वर्तमान की जटिल स्थिति को सही करने के लिए दोनों देशों को मिलकर प्रयास करने चाहिए और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें दूर करना चाहिए। आशा है कि भारत और चीन एक ही दिशा में आगे बढ़ेंगे और साथ ही सही ढंग से जनता का मार्गदर्शन करेंगे।
उन्होंने कहा कि इस बातचीत के दौरान दोनों पक्षों ने दोनों देशों के बीच मौजूदा सीमा की स्थिति के बारे में खुलकर और गहराई से विचारों का आदान-प्रदान किया और सकारात्मक सहमति तक पहुंचे हैं।
दोनों पक्ष दोनों देशों के नेताओं द्वारा महत्वपूर्ण सहमति का पालन करने के लिए सहमत हैं और मानते हैं कि सीमा क्षेत्र में शांति बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इस बात पर जोर दिया गया कि मतभेद बढ़ने से बचने के लिए सीमा मुद्दे को द्विपक्षीय संबंधों में एक उपयुक्त स्थिति में रखा जाना चाहिए।
इसके साथ ही दोनों पक्षों ने सीमा मुद्दे पर दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षरित समझौतों के पालन की पुष्टि की है और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति को आसान बनाने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई है।
दोनों पक्ष विशेष प्रतिनिधि बैठक तंत्र के माध्यम से संचार को मजबूत करने के लिए सहमत हुए हैं। दोनों पक्षों के बीच गतिरोध को कम करने के लिए कई बैठकें हुई हैं।
दोनों पक्ष दोनों देशों के बीच हाल ही में हुई सैन्य और राजनयिक बैठक में हुई प्रगति का स्वागत करते हैं और बातचीत और परामर्श आगे भी जारी रखने के लिए सहमत हैं। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया है कि सैन्य स्तर पर दोनों सीमा रक्षा बलों के स्तर पर सहमति बनी रहनी चाहिए।
इसके अलावा दोनों पक्षों ने जितनी जल्दी हो सके अग्रिम स्थानों पर तैनात सैनिकों को हटाने पर भी सहमति जताई है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अफगानिस्तान से तनातनी पाकिस्तान की क्षेत्रीय व्यापार महत्वाकांक्षा पर भारी

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है। इस टकराव का असर अब केवल दोनों देशों के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि व्यापारिक गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ा है।
मध्य एशिया और दक्षिण एशिया को जोड़ने वाली व्यापारिक और परिवहन योजनाओं के सामने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों को समुद्री बंदरगाहों तक पहुंच उपलब्ध कराने की इस्लामाबाद की महत्वाकांक्षा को झटका लगा है। इसका ताजा संकेत कजाखस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने के लक्ष्य में आई कमी से मिला है।
क्षेत्रीय मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट ‘यूरेशियानेट’ ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसके अनुसार, कजाखस्तान और पाकिस्तान के बीच सालाना व्यापार एक अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अब दोनों देशों ने व्यापार की संभावित क्षमता करीब 645 मिलियन डॉलर आंकी है। यह आकलन एक नवंबर को अस्ताना में कजाखस्तान के उप प्रधानमंत्री सेरिक झुमांगारिन और पाकिस्तान के निवेश मंत्री कासिम अहमद शेख के बीच हुई बातचीत के दौरान सामने आया।
पाकिस्तान मध्य एशियाई देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत करने और कराची, ग्वादर तथा अन्य बंदरगाहों के जरिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है। उसकी ख्वाहिश और उम्मीदों को डेंट अफगानिस्तान ने लगाया है। अफगानिस्तान के साथ बिगड़ते रिश्ते और सीमा पार व्यापार में बाधाएं इन योजनाओं की रफ्तार में ब्रेक लगा रही हैं।
पाकिस्तान के सामने उज्बेकिस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने का लक्ष्य भी चुनौतीपूर्ण होता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में सालाना द्विपक्षीय व्यापार को दो अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े इस लक्ष्य की राह आसान नहीं बताते।
वर्ष 2024 में पाकिस्तान ने उज्बेकिस्तान को करीब 129 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया था, जबकि उज्बेकिस्तान से पाकिस्तान का आयात लगभग 257 मिलियन डॉलर रहा। वर्ष 2025 के व्यापार आंकड़ों में भी खास बढ़ोतरी दर्ज नहीं हुई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं को अफगानिस्तान के साथ जारी संघर्ष से बड़ा झटका लगा है। अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से पाकिस्तान और मध्य एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। इसके रास्ते मध्य एशियाई देशों का सामान पाकिस्तान के बंदरगाहों तक पहुंच सकता है और वहां से समुद्री रास्तों के जरिए दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजा जा सकता है। लेकिन दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव ने इस पूरे परिवहन नेटवर्क की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर पहले से ही सीमा पार कारोबार पर दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच प्रमुख सीमा चौकियों के बंद रहने से माल की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे पाकिस्तान के उन व्यापारियों और निर्यातकों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो अफगानिस्तान को बाजार के रूप में इस्तेमाल करने के साथ-साथ मध्य एशियाई देशों तक सामान पहुंचाने के लिए इस मार्ग पर निर्भर थे।
पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान में सक्रिय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ कार्रवाई की मांग और काबुल की ओर से इन आरोपों को खारिज किए जाने के बीच दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस विवाद ने क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को भी प्रभावित किया है।
इसका एक संकेत अक्टूबर में मास्को फॉर्मेट के तहत हुई क्षेत्रीय बैठक में भी देखने को मिला था। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर मतभेद के कारण बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। इस बैठक में मध्य एशियाई देशों के अलावा भारत, चीन, ईरान और रूस समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
पाकिस्तान के निवेश मंत्री कासिम अहमद शेख ने अस्ताना में निवेश मंच पर अपने संबोधन में देश के बंदरगाहों को मध्य एशिया के लिए रणनीतिक प्रवेश द्वार बताया था। उनका कहना था कि पाकिस्तान के बंदरगाह क्षेत्रीय व्यापार और परिवहन संपर्क मजबूत करने के साथ सामान की आवाजाही के लिए वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध करा सकते हैं। फिलहाल जो हालात हैं, उसके मद्देनजर इन दावों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के क्षेत्रीय हितों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से अफगानिस्तान और ईरान के रास्ते मध्य एशिया तक व्यापारिक एवं परिवहन संपर्क मजबूत करने की पैरवी करता रहा है। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) इसी व्यापक क्षेत्रीय संपर्क रणनीति का हिस्सा हैं।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
होर्मुज में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराए दो टैंकर और एक टगबोट, लगी आग: ईरान

ईरान ने गुरुवार को दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहे दो टैंकर्स और एक टगबोट में आग लग गई। उनके मुताबिक ये अनधिकृत रास्ते से निकलने की कोशिश कर रहे थे और इसी दौरान बारूदी सुरंग से टकरा गए जिससे आग लग गई। इसी बीच, ईरान की इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर यूनिट्स ने अमेरिका के दो ‘लुकास’ ड्रोन को अपने कब्जे में लेने का दावा भी किया है।
ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज एजेंसी फार्स ने इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) के हवाले से ये जानकारी साझा की। आईआरजीसी के अनुसार, “एक ‘अनधिकृत रास्ते’ से गुजरने की कोशिश के दौरान होर्मुज स्ट्रेट में दो तेल टैंकरों और एक टगबोट में आग लग गई।”
आईआरजीसी के बयान अनुसार, “बुधवार रात होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिणी रास्ते से गुजरते समय एक बड़ा तेल टैंकर बारूदी सुरंग (माइन) से टकरा गया, जिससे उसमें आग लग गई। वहीं, एक दूसरा सुपरटैंकर जलमार्ग के पूर्वी हिस्से से बाहर निकलते समय आग की चपेट में आ गया, और आग बुझाने के लिए भेजी गई एक टगबोट भी बाद में जलने लगी।”
बयान में कहा गया है कि अमेरिका द्वारा जहाजों को बारूदी सुरंगों वाले रास्तों से ले जाने की जिद के कारण, अमेरिकी करदाताओं और क्षेत्रीय सहयोगियों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा है और बीमा का खर्च भी बढ़ रहा है।
वहीं, आईआरजीसी की नौसैनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर यूनिट्स ने दावा किया कि उनके वायुक्षेत्र में घुसे दो अमेरिकी ‘लुकास’ ड्रोन को उन्होंने अपने नियंत्रण में ले लिया।
इससे पहले बुधवार को भी नौसैनिक यूनिट ने अमेरिकी ड्रोन को मार गिराने की बात कही थी। बयान के अनुसार, “आईआरजीसी ने होर्मुज स्ट्रेट में केशम द्वीप के ऊपर एक यूएस एमक्यू-1 ड्रोन को इंटरसेप्ट करके नष्ट कर दिया। यह ईरानी एयर डिफेंस द्वारा गिराया गया अपनी तरह का 15वां एयरक्राफ्ट है।”
आईआरजीसी के जनसंपर्क कार्यालय ने कहा, “पहले ड्रोन को ट्रैक किया गया और फिर उसे हमारे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम ने नष्ट कर दिया, जो देश के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस नेटवर्क के तहत काम करता है।” बयान में घटना का सही समय या इस्तेमाल की गई मिसाइल के टाइप के बारे में नहीं बताया गया।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
विदेश मंत्री जयशंकर ने गुयाना के राष्ट्रपति से मुलाकात की; 500 मिलियन डॉलर क्रेडिट लाइन विस्तार का ऐलान

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट मीटिंग’ (सीएचओजीएम) 2026 के दौरान गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली से मुलाकात की। इस मौके पर दोनों देशों ने दक्षिण अमेरिकी देश के सार्वजनिक और रक्षा बुनियादी ढांचे के लिए 500 मिलियन डॉलर की ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ (ऋण सुविधा) को बढ़ाने की घोषणा की।
विदेश मंत्री जयशंकर ने एक्स पर कहा, “गुयाना के राष्ट्रपति डॉ. इरफान अली से मिलकर खुशी हुई। 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के बाद हमने अपने द्विपक्षीय सहयोग में हुई निरंतर प्रगति की समीक्षा की। हमने सड़क, स्वास्थ्य और रक्षा परियोजनाओं के लिए 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ (ऋण सुविधा) बढ़ाने की घोषणा की है।”
उन्होंने आगे कहा, “हमने एमएसई (सूक्ष्म और लघु उद्यम) विनिर्माण परियोजनाओं की आपूर्ति और स्थापना, ‘क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट्स’ (त्वरित प्रभाव वाली परियोजनाओं) को लागू करने के लिए अनुदान सहायता, और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तथा गुयाना में यूपीआई जैसी प्रणाली के संचालन में सहयोग के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2024 में गुयाना की एक ऐतिहासिक राजकीय यात्रा की थी – जो 56 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की इस देश की पहली यात्रा थी। इस दौरान उन्हें गुयाना के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस’ से नवाजा गया था।
मई 1966 में गुयाना की स्वतंत्रता के बाद से ही, भारत और गुयाना के बीच संबंध काफी करीबी और सौहार्दपूर्ण रहे हैं, जिनमें आपसी समझ का स्तर बहुत ऊंचा है।
पिछले महीने, गुयाना में भारत के उच्चायुक्त चिन्मय नाइक ने जॉर्जटाउन में आयोजित एक आधिकारिक समारोह में राष्ट्रपति इरफान अली को अपना परिचय पत्र (क्रेडेंशियल्स) सौंपा। इस मुलाकात के दौरान, दोनों पक्षों ने भारत और गुयाना के बीच बहुआयामी संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया।
गुयाना में भारतीय उच्चायोग ने एक्स पर पोस्ट किया, “द्विपक्षीय बातचीत के दौरान, भारत और गुयाना के बीच बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया गया। साथ ही, कई क्षेत्रों में मौजूद अपार संभावनाओं का लाभ उठाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।”
इरफान अली के अलावा जयशंकर ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज और ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम से अलग-अलग मिले। इसकी जानकारी भी एक्स पोस्ट के जरिए विदेश मंत्री ने दी।
पीएम बर्नहम से मुलाकात के बाद जयशंकर ने लिखा, “मैंने उन्हें प्रधानमंत्री की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं दीं। हमने सीईटीए के संदर्भ में और वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा की।”
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