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Monday,30-March-2026
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कंपनियों द्वारा निदेशकों को किया जाने वाला भुगतान अब जीएसटी के दायरे में

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कंपनियों के निदेशकों को पेशेवर शुल्क और पारिश्रमिक के तौर पर किया जाने वाला भुगतान अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में होगा। सरकार संग्रह बढ़ाने के लिए कराधान प्रणाली की खामियों को दूर करने में जुटी हुई है।

केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने एक सर्कुलर में स्पष्ट किया है कि कंपनियों द्वारा स्वतंत्र निदेशकों या गैर कार्यकारी निदेशकों (कंपनी के कर्मचारी नहीं) को किया जाने वाला भुगतान जीएसटी की लागू दर के अधीन होगा।

सीबीआईसी ने कहा है कि इस तरह के निदेशकों को उनकी सेवा के एवज में किए जाने वाले भुगतान पर कंपनियां रिवर्स चार्ज के आधार पर टैक्स काटेंगी।

इसके अलावा पूर्णकालिक निदेशकों या जो निदेशक कंपनी के कर्मचारी भी हैं, उन्हें वेतन के अलावा दिया जाने वाला पारिश्रमिक भी जीएसटी के सशर्त अधीन होगा।

इसका मतलब यह कि निदेशक, पूर्णकालिक निदेशक, प्रबंध निदेशक, जो किसी कंपनी के रोल पर भी हैं और वेतन लेते हैं, वे यदि किसी तरह ्र का ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं जो वेतन की प्रकृति का नहीं है तो वह जीएसटी के अधीन होगा। हालांकि इस तरह के निदेशकों को भुगतान किए जाने वाले वेतन पर कोई जीएसटी नहीं लगेगा।

सिरिल अमरचंद मंगलदास की पार्टनर, मेखला आनंद ने कहा, “विभिन्न कानूनों के तहत निदेशकों को किए जाने वाले पारिश्रमिक भुगतान की प्रकृति को बताने वाले इस स्पष्टीकरण से, विविध एएआर रूलिंग्स के बीच उलझी कंपनियों को एक अभूतपूर्व स्पष्टता प्राप्त होगी। इस मुद्दे के समाधान से उद्योग को सही संकेत जाएगा, जो कोविड-19 संकट के बाद अपनी रफ्तार वापस हासिल करने पर ध्यान दे रहा है।”

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मध्य पूर्व में तनाव का असर! वित्त वर्ष के आखिरी सत्र में सेंसेक्स 1,635 अंक गिरकर बंद

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मुंबई : चालू वित्त वर्ष (2025-26) के आखिरी कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को बड़ी गिरावट देखने को मिली। दिन के अंत में सेंसेक्स 1,635.67 अंक या 2.22 प्रतिशत की गिरावट के साथ 71,947.55 और निफ्टी 488.20 अंक या 2.14 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 22,331.40 पर था।

बाजार में चौतरफा गिरावट देखी गई। करीब सभी सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। निफ्टी पीएसयू बैंक (4.56 प्रतिशत), निफ्टी फाइनेंशियल सर्विस (3.49 प्रतिशत), निफ्टी प्राइवेट बैंक (3.37 प्रतिशत), निफ्टी रियल्टी (2.84 प्रतिशत), निफ्टी इंडिया डिफेंस (2.80 प्रतिशत), निफ्टी सर्विसेज (2.72 प्रतिशत), निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स ( 2.58 प्रतिशत), निफ्टी मीडिया (2.50 प्रतिशत) और निफ्टी ऑटो (2.39 प्रतिशत) की कमजोरी के साथ बंद हुआ।

लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप में भी गिरावट देखी गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,447.80 अंक या 2.68 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 52,650 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 416.20 अंक या 2.66 प्रतिशत की गिरावट के साथ 15,203.80 पर था।

सेंसेक्स पैक में 30 में केवल दो शेयर हरे निशान में बंद हुए।

बजाज फाइनेंस, एसबीआई, इंडिगो, एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, एचडीएफसी बैंक, ट्रेंट, भारती एयरटेल, अल्ट्राटेक सीमेंट, एमएंडएम, आईटीसी, आईसीआईसीआई बैंक, सन फार्मा और एशियन पेंट्स लूजर्स थे। केवल टेक महिंद्रा और पावर ग्रिड ही हरे निशान में बंद हुए।

शेयर बाजार में बड़ी गिरावट के कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का मार्केटकैप करीब 10 लाख करोड़ रुपए कम होकर 412 लाख करोड़ रुपए हो गया है, जो कि शुक्रवार को 422 लाख करोड़ रुपए था।

बाजार में गिरावट की वजह मध्य पूर्व में तनाव का बढ़ना है, जिसके समाप्त होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। इससे बाजार में निवेशकों की धारणा कमजोरी हुई है।

एसबीआई सिक्योरिटीज के टेक्निकल और डेरिवेटिव्स प्रमुख सुदीप शाह ने कहा कि वित्त वर्ष 26 के आखिरी दिन बाजार की शुरुआत गैप डाउन के साथ हुई है और हालांकि, बाद में हल्की रिकवरी हुई, लेकिन ऊपरी स्तर से लगातार बिकवाली ने बाजार में गिरावट को बढ़ावा दिया। इससे दिन के अंत में निफ्टी 2.14 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।

उन्होंने आगे कहा कि निफ्टी के लिए सपोर्ट 22,200 से लेकर 22,150 के आसपास है और अगर यहां से गिरावट बढ़ती है तो निफ्टी 22,000 और फिर 21,800 तक जा सकता है। हालांकि, 22,450-22,500 रुकावट का स्तर है।

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भारतीय शेयर बाजार में छाई लाली, सेंसेक्स 1,200 अंक तक टूटा; जानिए इस बड़ी गिरावट के मुख्य कारण

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मुंबई : सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली। दोनों प्रमुख बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी50 1 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट के साथ खुले।

कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 1,200 अंक यानी 1.6 प्रतिशत टूटकर 72,326.54 के दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया, जबकि निफ्टी 50 करीब 350 अंक यानी 1.5 प्रतिशत गिरकर 22,453 के इंट्रा-डे लो पर आ गया। इस दौरान, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी 1 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।

इस तेज गिरावट के चलते कुछ ही घंटों में निवेशकों को करीब 6 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 422.04 लाख करोड़ रुपए (शुक्रवार) से घटकर 416.06 लाख करोड़ रुपए रह गया (दोपहर 12.30 बजे तक)।

बाजार में इस गिरावट के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध है, जो एक महीने से ज्यादा समय से जारी है और अपने पांचवें सप्ताह में प्रवेश कर गया है। इस युद्ध के खत्म होने को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने का फैसला बढ़ाया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है। इस बीच यमन के हूती विद्रोहियों के शामिल होने से तनाव और बढ़ गया है।

दूसरा बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री रास्ते पर असर के कारण सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, अपनी 85-90 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी करता है; ऐसे में महंगा तेल अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता है।

तीसरा कारण बाजार में बढ़ती अस्थिरता है। वोलैटिलिटी इंडेक्स इंडिया वीआईएक्स 5 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 28.1 के पार पहुंच गया, जो यह दिखाता है कि निवेशकों में डर और अनिश्चितता बढ़ रही है। आमतौर पर 12-15 का स्तर सामान्य माना जाता है, लेकिन इससे ऊपर जाने पर बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव की आशंका रहती है।

चौथा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मार्च में 27 तारीख तक भारतीय बाजार से 1.23 लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। इससे बाजार पर भारी दबाव बना हुआ है।

पांचवां कारण एफएंडओ (फ्यूचर्स और ऑप्शंस) कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी है। 30 मार्च को मार्च सीरीज के कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो रहे हैं, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव और बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी कारणों के चलते फिलहाल बाजार में कमजोरी बनी रह सकती है। हालांकि लंबी अवधि के निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने से बचने और धैर्य बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।

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अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कीमती धातुओं पर दबाव, सोना 0.50 प्रतिशत से ज्यादा फिसला

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मुंबई : अमेरिका-ईरान संघर्ष के पांचवें सप्ताह में प्रवेश करने के साथ ही कमोडिटी बाजार में गिरावट का रुख देखने को मिला है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार को शुरुआती कारोबार में सोने और चांदी दोनों की कीमतों में कमजोरी दर्ज की गई। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता के माहौल के बावजूद निवेशकों की धारणा कमजोर पड़ती नजर आई, जिससे कीमती धातुओं पर दबाव बना।

सोमवार सुबह करीब 10.43 बजे एमसीएक्स पर अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट वाला सोना 0.68 प्रतिशत यानी 982 रुपए गिरकर 1,43,300 रुपए प्रति 10 ग्राम पर आ गया। वहीं, मई कॉन्ट्रैक्ट वाली चांदी 0.34 प्रतिशत यानी 767 रुपए की तेजी के साथ 2,28,721 रुपए प्रति किलो पर ट्रेड करते हुए नजर आई। हालांकि शुरुआती कारोबार में सिल्वर में भी गिरावट दर्ज की गई।

इससे पहले शुक्रवार को भी सोने और चांदी में हल्की गिरावट दर्ज की गई थी, जहां गोल्ड 1,44,401 रुपए प्रति 10 ग्राम और सिल्वर 2,27,750 रुपए प्रति किलोग्राम पर बंद हुआ था।

वैश्विक बाजारों में भी सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई है, जिससे पिछले सप्ताह की बढ़त लगभग खत्म हो गई। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, ईरान समर्थित गुटों की गतिविधियों और अमेरिकी सैन्य तैनाती में बढ़ोतरी के बावजूद निवेशकों का रुझान सुरक्षित निवेश (सेफ हेवन) से कुछ हद तक हटता दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में करीब 1.7 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।

कमोडिटी एक्सचेंज (कॉमेक्स) में भी सोने की कीमतों पर दबाव बना रहा। सोमवार को सोना 2 प्रतिशत से अधिक गिरकर 4,447.50 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया, हालांकि निचले स्तरों पर खरीदारी के चलते इसमें कुछ सुधार हुआ और कीमतें फिर से 4,500 डॉलर प्रति औंस के स्तर के आसपास पहुंच गईं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई की आशंकाओं ने सोने की मांग को प्रभावित किया है। इसके अलावा, अमेरिका के फेडरल रिजर्व समेत अन्य केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रखने या बढ़ाने की संभावना भी सोने की कीमतों के लिए नकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

बता दें कि युद्ध शुरू होने के बाद से सोने की कीमतों में 15 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। आमतौर पर सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने का आकर्षण इस दौरान कमजोर पड़ा है और यह शेयर बाजार की चाल के साथ तालमेल बिठाता नजर आया है।

वहीं, केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की खरीद में भी बदलाव देखने को मिला है। पिछले कुछ वर्षों में जहां सोने की कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण केंद्रीय बैंकों की खरीद रही, वहीं हालिया घटनाक्रम में तुर्की जैसे देशों ने अपने सोने के भंडार को बेचना शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि तुर्की ने युद्ध के शुरुआती दो हफ्तों में करीब 60 टन सोना, जिसकी कीमत 8 अरब डॉलर से अधिक है, बेच दिया।

इसके अलावा, कई देश जो सोने के बड़े खरीदार हैं, वे ऊर्जा आयातक भी हैं। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से उनके पास सोना खरीदने के लिए डॉलर की उपलब्धता कम हो जाती है, जिसका असर मांग पर पड़ता है।

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