अंतरराष्ट्रीय
जोहान्सबर्ग टेस्ट क्यों हार गया भारत?
सेंचुरियन में अपनी पहली टेस्ट जीत दर्ज करने के बाद भारत जोहान्सबर्ग में दूसरा टेस्ट खेलने गया, एक ऐसी जगह जहां वह पहले कभी भी नहीं हारा था, क्योंकि यहां खेले गए पांच मैचों में दो में जीत और तीन बार ड्रॉ किया था।
हालांकि, चार दिनों के भीतर दक्षिण अफ्रीका ने उन्हें सात विकेट से हरा दिया। भारत की वांडर्स में यह पहली हार थी। हम उन कारणों का पता लगाएंगे, जहां भारत ने 11 जनवरी से केप टाउन में होने वाले निर्णायक मुकाबले से पहले जोहान्सबर्ग में मैच गंवा दिया।
1. बल्लेबाजों का खराब प्रदर्शन (खासकर पहली पारी में)
“मैं कुछ गलत नहीं कहना चाहता, लेकिन मुझे लगता है कि टॉस जीतकर बल्लेबाजों को पहली पारी में अधिक रन बनाने चाहिए थे,” मैच के कप्तान केएल राहुल के इन शब्दों ने उन सबसे बड़े कारणों में से एक को अभिव्यक्त किया, जहां भारत जोहान्सबर्ग में लड़खड़ा गया था।
पहले टेस्ट में भारत के पास केएल राहुल और मयंक अग्रवाल के बीच 117 रनों की साझेदारी की वजह से मजबूत बढ़त थी, जो कि मध्य क्रम के बल्लेबाजों के न चलने के बावजूद 327 रन बने थे। दूसरे टेस्ट में राहुल, अग्रवाल, पुजारा और रहाणे जल्दी आउट हो गए, जिससे भारत एक समय में 91/4 पर था। भारत के लिए 200 पार करने के लिए रविचंद्रन अश्विन ने 46 रनों की शानदारी पारी खेली थी।
दूसरी पारी में पुजारा और रहाणे के साथ मिलकर शार्दुल ठाकुर और हनुमा विहारी ने भारत का स्कोर 266 रनों तक पहुंचा दिया, लेकिन पहली पारी में हुए नुकसान अंतत: महंगा साबित हुआ।
2. दूसरी पारी में पंत का न चलना :
ऋषभ पंत ऐसे खिलाड़ी हैं जो पल भर में खेल को पलटने की क्षमता रखते हैं। वह अपने अच्छे और बुरे दिनों में फर्क देख सकते हैं। दूसरी पारी में चेतेश्वर पुजारा और अजिंक्य रहाणे के आउट होने के बाद पंत की भूमिका अच्छे काम को आगे बढ़ाने की थी।
लेकिन कगिसो रबाडा की गेंद पर खराब शॉट खेलकर वह भी जल्द ही पवेलियन लौट गए, जिस पर मुख्य कोच राहुल द्रविड़ ने कहा कि वे युवा खिलाड़ी के साथ कुछ शॉट्स खेलने पर चर्चा कर सकते हैं। उन्होंने पहली पारी में 12 रन पर कीगन पीटरसन का कैच भी छोड़ दिया था, जो महंगा साबित हुआ।
3. रनों का ज्यादा न बनना :
केएल राहुल भारत के लिए पहली पारी में 123 के साथ पहला टेस्ट जीतने में एक बड़ी भूमिका निभाने का प्रमुख उदाहरण थे। दूसरे टेस्ट में राहुल अर्धशतक तक पहुंचे, लेकिन आउट हो गए। इसके विपरीत, दक्षिण अफ्रीका के कप्तान डीन एल्गर ने एक कप्तानी पारी खेल मैच को अपने नाम कर लिया था और उन्होंने अपनी टीम की जीत सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की।
4. बड़ी साझेदारियों का अभाव :
पहले टेस्ट के पहले दिन के बाद सलामी बल्लेबाज मयंक अग्रवाल ने कहा था कि साझेदारी करना और उन्हें बड़ा बनाना अहम था। लेकिन दूसरे टेस्ट में भारत ने कुछ बड़ी साझेदारियां नहीं कीं, जैसे पहली पारी में भारत की सर्वश्रेष्ठ तीन साझेदारियां 42, 40 और 36 थीं, जबकि दक्षिण अफ्रीका की पहले पारी में सर्वश्रेष्ठ तीन साझेदारियां 74, 60 और 38 थीं।
दूसरी पारी में पुजारा और रहाणे के बीच 111 रनों की साझेदारी को छोड़कर, कोई भी बल्लेबाजों ने अर्धशतकीय साझेदारी भी नहीं की थी। दक्षिण अफ्रीका ने 240 रनों का पीछा करते हुए नाबाद 47, 46, 84 और 68 रनों की साझेदारी कर मैच जीत लिया था।
भारत उम्मीद कर रहा होगा कि वे केप टाउन में बड़ी साझेदारी कर सीरीज पर कब्जा कर सकता है, जिस पर द्रविड़ ने भी जोर दिया था। उन्होंने कहा था, “हमें निश्चित रूप से कुछ बड़ी साझेदारी करनी होगी, जिससे हमें बड़ा स्कोर बनाने में मदद मिलेगी।”
5. सिराज की चोट :
भारत के गेंदबाजी आक्रमण में मोहम्मद सिराज को चोट लग गई थी। हालांकि, सिराज दूसरे दिन गेंदबाजी करने के लिए वापस आए, लेकिन वह अपना सौ प्रतिशत नहीं दे रहे थे, क्योंकि दूसरी पारी में सिराज ने सिर्फ छह ओवर फेंके। चोटिल होने से पहले सिराज ने एल्गर के खिलाफ बेहतर गेंदबाजी की थी।
6. कप्तान कोहली की कमी :
शायद, कोहली की सेवाओं के न होने से भारत जोहान्सबर्ग में मैच गंवा दिया। कोहली के दूसरे टेस्ट की शुरुआत से पहले बाहर होने के कारण केएल राहुल के पास सोचने के लिए ज्यादा समय नहीं था।
दूसरी पारी में कप्तान राहुल नौ ओवर देरी से ठाकुर को लाए, जो गेंद को स्विंग करा सकते थे। वहां, भारत एक चाल चूक गया, क्योंकि स्विंग गेंदबाज पिच पर नमी का इस्तेमाल कर सकता था। दक्षिण अफ्रीका के आसानी से रन बनाने के कारण उनकी फील्डिंग ने कई मौके भी गंवाए थे।
अंतरराष्ट्रीय
भारत ने अफगानिस्तान को फिर से भेजी मदद, जीवनरक्षक चिकित्सीय सहायता काबुल पहुंची

काबुल, 28 नवंबर : भारत हमेशा से अफगानिस्तान के लिए मजबूती से खड़ा रहा है। समय-समय पर मदद की खेप भेजता है। भारत ने निरंतर समर्थन को दोहराते हुए, शुक्रवार को अफगानिस्तान को 73 टन जीवनरक्षक दवाइयों, टीकों और आवश्यक पोषक सप्लीमेंट्स की खेप भेजी। यह सहायता अफगान स्वास्थ्य प्रणाली की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से काबुल पहुंचाई गई।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने एक्स पर लिखा, “अफगानिस्तान के स्वास्थ्य प्रयासों को मजबूती देते हुए भारत ने 73 टन जीवनरक्षक दवाइयां, टीके और आवश्यक सप्लीमेंट्स तत्काल चिकित्सा जरूरतों के लिए काबुल पहुंचाए हैं। अफगान लोगों के प्रति भारत का अटूट समर्थन जारी है।”
पिछले सप्ताह नई दिल्ली में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और अफगानिस्तान के उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी के बीच मुलाकात हुई थी। बैठक में व्यापार, संपर्क और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने पर विस्तृत चर्चा हुई।
जयशंकर ने एक्स पर लिखा, “अफगानिस्तान के उद्योग और वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अज़ीज़ी से मुलाकात कर खुशी हुई। व्यापार, कनेक्टिविटी और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की। अफगान जनता के विकास और कल्याण के लिए भारत के समर्थन को दोहराया।”
इससे पहले भी भारत ने अफगानिस्तान के भूकंप प्रभावित परिवारों की मदद के लिए खाद्य सामग्री भेजी थी। बाल्ख, समनगन और बगलान प्रांतों में आए विनाशकारी भूकंप में 20 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे।
10 अक्टूबर को भारत ने अतिरिक्त खाद्य सहायता भी भेजी थी। उसी दिन विदेश मंत्री जयशंकर की अफगान समकक्ष मौलवी आमिर खान मुत्ताकी से नई दिल्ली में मुलाकात हुई। बैठक में विकास सहयोग, व्यापार, अफगानिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता व स्वतंत्रता, आपसी संपर्क और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दों पर वार्ता हुई।
जयशंकर ने मुत्ताकी की भारत यात्रा को “द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम” बताया और अफगानिस्तान को पांच एम्बुलेंस सौंपने की घोषणा भी की।
भारत की यह मानवीय सहायता अफगानिस्तान के लिए हाल के महीनों में की गई कई निरंतर मददों की नवीनतम कड़ी है, जो दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और जन-संपर्क आधारित रिश्तों को मजबूत करती है।
अंतरराष्ट्रीय
ईरान ने तीसरे देश के जरिए नहीं भेजा अमेरिका को कोई मैसेज, खामेनेई बोले-झगड़े बढ़ा रहा अमेरिका

तेहरान, 28 नवंबर : हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद अमेरिका दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी मुलाकात की। ट्रंप से मुलाकात के पहले क्राउन प्रिंस को ईरान की एक चिट्ठी मिली थी। इस चिट्ठी को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं कि इस चिट्ठी में अमेरिका के लिए एक मैसेज था। हालांकि, ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने इन सभी दावों को मनगढ़ंत बताया है।
न्यूज एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार खामेनेई ने गुरुवार रात को टीवी पर दिए गए संदेश में मीडिया के इन सभी दावों को खारिज कर दिया। अफवाह थी कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने सऊदी क्राउन प्रिंस को उनके यूएस दौरे से पहले जो मैसेज भेजा था, वह वॉशिंगटन के लिए था।
ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई ने कहा, “वे अफवाहें फैला रहे हैं कि ईरानी सरकार ने किसी तीसरे देश के जरिए अमेरिका को मैसेज भेजा है, जो सरासर झूठ है।”
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेजेशकियन की चिट्ठी में कहा गया कि ईरान टकराव नहीं चाहता है। उसका मकसद क्षेत्रीय सहयोग को गहरा करना है और वह कूटनीति के जरिए न्यूक्लियर विवाद को सुलझाने के लिए तैयार है, बशर्ते उसके अधिकारों की गारंटी हो।
खामेनेई ने अपने भाषण के दौरान इजरायल के हमलों और अपराधों में अमेरिका के समर्थन की कड़ी आलोचना की। ईरानी सुप्रीम ने अमेरिका पर अपनी रणनीति और रिसोर्स के फायदे के लिए झगड़ों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
दूसरी ओर, ईरानी अधिकारियों ने पहले ही इस बात को साफ कर दिया था कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस को जो चिट्ठी दी गई, वह सिर्फ द्विपक्षीय मुद्दों को लेकर थी।
तेहरान और वॉशिंगटन ने इसी साल अप्रैल और जून के बीच ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम और अमेरिकी बैन पर बातचीत की थी। दोनों पक्षों के बीच ओमान की मध्यस्थता में पांच राउंड की बातचीत हुई। इसके बाद छठे राउंड की बातचीत की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन उससे पहले ही इजरायल ने ईरान में कई जगहों पर अचानक हमले कर दिए।
इस हमले में ईरान के न्यूक्लियर वैज्ञानिक और सीनियर कमांडर मारे गए। इसके बाद ईरान ने मिसाइल और ड्रोन से जवाबी कार्रवाई की।
22 जून को अमेरिकी सेना ने नतांज, फोर्डो और इस्फहान में ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला किया। ईरान ने अगले दिन कतर में अमेरिकी अल उदीद एयर बेस को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई की। इसके बाद ईरान और इजरायल के बीच 24 जून से सीजफायर लागू हुआ।
अंतरराष्ट्रीय
ट्रंप के टैरिफ वॉर से दुनिया को राहत? अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में आज हो सकता है आखिरी फैसला!

नई दिल्ली, 6 नवंबर : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के ऐलान के साथ वैश्विक व्यापार जगत में उथल-पुथल मच गई। ट्रंप के टैरिफ को लेकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रही, जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि इसपर आखिरी फैसला भी आज आ जाए। वहीं, दूसरी ओर पूरी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं।
5 नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में आखिरी सुनवाई शुरू हुई, जिसमें अधिकांश जजों ने अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले पर सवाल खड़े किए।
निचली फेडरल कोर्ट ने इससे पहले टैरिफ के मामले में फैसला सुनाया था कि ट्रंप के पास अमेरिका के कई व्यापारिक साझेदारों से आयात पर टैरिफ लगाने और कनाडा, चीन और मैक्सिको के उत्पादों पर फेंटानिल टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है। निचले कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
बता दें, टैरिफ को लेकर करीब ढाई घंटे से ज्यादा कोर्ट में बहस चली। कोर्ट ने ट्रंप सरकार के टैरिफ के फैसले पर सवाल उठाए। जस्टिस सोनिया सोतोमयोर ने कहा, “आप कहते हैं कि टैरिफ टैक्स नहीं हैं, लेकिन वास्तव में वे टैक्स ही हैं। वे अमेरिकी नागरिकों से पैसा, राजस्व कमा रहे हैं।”
इस पर सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने कहा, “मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, यह एक नियामक टैरिफ है, टैक्स नहीं। यह सच है कि टैरिफ से राजस्व बढ़ता है और यह केवल आकस्मिक है।”
इसके अलावा जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने कहा, “अगर मैं सही नहीं हूं तो मुझे सुधारें, लेकिन यह तर्क किसी भी देश के किसी भी उत्पाद पर, किसी भी मात्रा में, किसी भी अवधि के लिए टैरिफ लगाने की शक्ति के लिए दिया जा रहा है।”
जस्टिस रॉबर्ट्स की इस टिप्पणी के बाद अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने तर्क दिया कि आईईईपीए राष्ट्रपति को इमरजेंसी की स्थिति के दौरान ‘आयात को विनियमित करने’ की इजाजत देता है।
अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल के तर्क से जस्टिस एमी कोनी बैरेट सहमत नहीं थीं। उन्होंने सॉयर से कहा, “क्या आप संहिता में ऐसे किसी दूसरे स्थान या इतिहास में किसी दूसरे समय का जिक्र कर सकते हैं, जहां ‘आयात को विनियमित करना’ वाक्यांश का उपयोग टैरिफ लगाने का अधिकार देने के लिए किया गया हो?”
इसके अलावा, जस्टिस बैरेट ने कहा कि अगर कांग्रेस भविष्य में आपातकालीन टैरिफ पर किसी भी सीमा को मंजूरी देना चाहती है, तो उसे राष्ट्रपति के वीटो को पार करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
जस्टिस बैरेट ने पूछा, “अगर कांग्रेस कहती है, ‘अरे, हमें यह पसंद नहीं है, इससे राष्ट्रपति को आईईईपीए के तहत बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं,’ तो उसे आईईईपीए से उस टैरिफ शक्ति को वापस लेने में बहुत मुश्किल होगी, है ना?”
हालांकि, कोर्ट की तरफ से मामले में अब तक आखिरी फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ वाले फैसले पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए हैं।
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