अंतरराष्ट्रीय
बांग्लादेश अशांति: शेख हसीना के लिए ब्रिटेन जाने की तुलना में भारत में रहना अधिक सुरक्षित होगा।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अपने इस्तीफे और ढाका से भागने के बाद भारत में शरण ली है। रिपोर्टों के अनुसार, शुरू में हसीना का इरादा भारत में कुछ समय रुकने के बाद ब्रिटेन जाने का था, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों से वीज़ा स्वीकृति लंबित होने के कारण नई दिल्ली में उनका प्रवास लंबा हो सकता है।
हसीना 1975 में पहले भी भारत में रह चुकी हैं।
भारत ने ऐतिहासिक रूप से हसीना को शरण दी है, खास तौर पर 1975 में उनके पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद, जब उन्हें और उनकी बहन को गुप्त रूप से बर्लिन से नई दिल्ली लाया गया था।
वे छह साल तक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के संरक्षण में एक सुरक्षित घर में रहीं। यह ऐतिहासिक मिसाल यह साबित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि क्यों एक बार फिर भारत हसीना के लिए ब्रिटेन की तुलना में अधिक सुरक्षित प्रतीत होता है।
हसीना की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए त्वरित सुरक्षा उपाय किए गए
हाल ही में भागने के दौरान भारतीय वायुसेना के रडार ने हसीना के विमान को भारत की ओर उड़ते हुए पाया। विमान को भारतीय वायु क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी गई और पश्चिम बंगाल के हाशिमारा एयर बेस से दो राफेल लड़ाकू विमानों द्वारा सुरक्षा प्रदान की गई।
भारतीय वायुसेना और सेना प्रमुखों ने स्थिति पर बारीकी से नज़र रखी और ज़मीन पर शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के साथ समन्वय किया। हिंडन एयर बेस पर उतरने के बाद, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति और उनकी भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करने के लिए हसीना से मुलाकात की।
हसीना के आगमन पर भारत सरकार की तत्काल और व्यापक प्रतिक्रिया उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उच्च स्तर की तैयारी और इच्छाशक्ति को दर्शाती है। यह ब्रिटेन के विपरीत है, जहां उनका वीजा अनुमोदन अभी भी लंबित है, जिससे उनका तत्काल भविष्य अनिश्चित है।
हसीना के शरण अनुरोध पर यू.के. की प्रतिक्रिया
बांग्लादेश की स्थिति पर यू.के. की प्रतिक्रिया, शरण मुद्दे को सीधे संबोधित किए बिना, उथल-पुथल की यू.एन. के नेतृत्व वाली जांच के आह्वान तक ही सीमित रही है। स्पष्टता की यह कमी हसीना के यू.के. में संभावित कदम के इर्द-गिर्द अनिश्चितता को बढ़ाती है।
यदि यू.के. उन्हें शरण देने से इनकार करता है, तो हसीना को किसी अन्य स्थान की तलाश करनी होगी, जिससे उनकी पहले से ही अनिश्चित स्थिति और जटिल हो जाएगी। ऐसी स्थिति में, 76 वर्षीय हसीना के लिए अन्य विकल्पों की तलाश करने के बजाय भारत में रहना बेहतर विकल्प होगा।
हत्या का संभावित खतरा
विश्व नेताओं को आसानी से राजनीतिक शरण देने की प्रतिष्ठा रखने वाले ब्रिटेन में भी हत्याओं का इतिहास रहा है, जिन पर सरकार का ध्यान नहीं गया। हसीना के मामले में, उनके पिता की भी हत्या कर दी गई थी और अब जबकि उनके अपने देश में उनके खिलाफ़ हंगामा हो रहा है, तो उन्हें अपनी जान का भी डर सता रहा होगा।
भारत सरकार सक्रिय रूप से बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री की सुरक्षा का ध्यान रख रही है और अगर वह यहां रहती हैं, तो भी वह देश के साथ उनके संबंधों को देखते हुए उनकी सुरक्षा का ध्यान रखेगी।
अंतरराष्ट्रीय
मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव: ईरान के समर्थन में उतरा इराकी ‘कताइब हिज्बुल्लाह’, अमेरिका को चेताया

बगदाद, 8 जून: इराक की शिया मिलिशिया ‘कताइब हिज्बुल्लाह’ ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो वह इराक और पूरे क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएंगे।
समूह ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक संक्षिप्त बयान में कहा, “अगर अमेरिका इस टकराव में हस्तक्षेप करता है, तो हम इराक और क्षेत्र में उसके ठिकानों और हितों पर हमला करेंगे।”
सिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, यह बयान ऐसे समय आया है, जब रविवार शाम ईरान ने इजरायल की ओर कई चरणों में मिसाइलें दागीं। उत्तरी इजरायल के बड़े हिस्सों में हवाई हमले के सायरन बजने लगे। इजरायली सेना ने कहा कि उसने इन मिसाइल हमलों को रोक लिया। इस बीच, इराक के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने देश का हवाई क्षेत्र 72 घंटों के लिए अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की है।
मिसाइल हमलों के कारण उत्तरी इजरायल के कई इलाकों में सायरन बज उठे। फिलहाल किसी के घायल होने या किसी बड़े नुकसान की खबर नहीं है।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने एक बयान में कहा कि उसने इजरायल के रामत डेविड एयरबेस को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। उसके अनुसार यह कार्रवाई लेबनान में इजरायल के ‘व्यापक अपराधों’ के जवाब में की गई।
ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स के मुताबिक, ईरान के खातम अल-अंबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रमुख कमांडर अली अब्दोल्लाही ने रविवार रात कहा कि अगर इजरायल दक्षिणी लेबनान और बेरूत के दक्षिण में स्थित दहियेह इलाके पर अपने हमले बढ़ाता है, या ईरान की कार्रवाई का जवाब देता है, तो उसे और भी ‘कड़े और पछतावा कराने वाले’ हमलों का सामना करना पड़ेगा।
दूसरी ओर इजरायल ने सोमवार तड़के पश्चिमी और मध्य ईरान में सैन्य ठिकानों पर हमले किए। ईरान की मिसाइल बौछारों के बाद इजरायल ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है। इजरायल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) ने दावा किया कि इजरायली वायु सेना ने पश्चिमी और मध्य ईरान में सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। तेहरान अग्निशमन विभाग के हवाले से आईआरएनए ने बताया कि पश्चिमी तेहरान के निवासियों ने तड़के लगभग 4:43 बजे और 4:45 बजे दो धमाकों की आवाजें सुनीं। हालांकि, शहर के किसी भी शहरी क्षेत्र में विस्फोट की पुष्टि नहीं हुई।
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका-ईरान तनाव का समाधान युद्ध से नहीं, सिर्फ कूटनीति से संभव: डॉ. मोहम्मद फतहली

नई दिल्ली, 5 जून: भारत में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फतहली ने मिडिया को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिका-ईरान तनाव और बार-बार टूटते संघर्षविराम पर चर्चा की। उन्होंने क्षेत्रीय हालात, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और शांति को लेकर ईरान का पक्ष रखते हुए कहा कि उनका देश शांति, संवाद और कूटनीति में विश्वास रखता है।
अमेरिका और ईरान के बीच फिर बढ़ते तनाव तथा कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर डॉ. फतहली ने कहा, “हम पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं कि हम युद्ध और शांति, दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार हैं। हम बातचीत और संवाद का स्वागत करते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी विवाद या मतभेद का समाधान कूटनीति के माध्यम से निकाला जा सकता है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ने कभी युद्ध या तनाव की शुरुआत नहीं की है और हमेशा शांतिपूर्ण तथा राजनीतिक समाधान पर जोर दिया है।”
उन्होंने दावा किया कि आठ अप्रैल को घोषित सीजफायर का हाल के दिनों में कई बार अमेरिकी सेनाओं की ओर से उल्लंघन किया गया। उनके अनुसार, इसी कारण ईरानी सेना ने आत्मरक्षा के अपने वैध अधिकार का उपयोग करते हुए जवाबी कार्रवाई की।
डॉ. फतहली ने कहा कि हम संघर्षविराम के प्रति अब भी प्रतिबद्ध हैं और बातचीत का रास्ता चुनते हैं, लेकिन हमारे देश की सुरक्षा और संप्रभुता हमारे लिए ‘रेड लाइन’ है। यदि हमारे देश पर कोई हमला या आक्रामकता होती है, तो उसका जवाब उसी स्तर पर और जरूरत पड़ने पर उससे भी अधिक कड़े तरीके से दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि कूटनीति के लिए अभी भी अवसर मौजूद हैं और समझौता संभव है, बशर्ते दूसरा पक्ष भी अपनी जिम्मेदारियों का पालन करे तथा किसी प्रकार की उकसावे वाली कार्रवाई या संघर्षविराम उल्लंघन से बचे।
सवाल: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में हाल ही में पारित उस प्रस्ताव को आप कैसे देखते हैं, जिसमें ईरान संघर्ष में राष्ट्रपति ट्रंप के अधिकारों को सीमित करने की बात कही गई है? क्या यह वॉशिंगटन में राजनीतिक विभाजन का संकेत है?
जवाब: यह सवाल कि क्या यह प्रस्ताव अमेरिका के भीतर किसी असहमति या राजनीतिक विभाजन को दर्शाता है, इसका जवाब अमेरिकी नेताओं और विश्लेषकों को देना चाहिए। हम अमेरिका के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करते।
हमारे लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भी कदम तनाव कम करने, संघर्ष को बढ़ने से रोकने और क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है, वह सकारात्मक और ध्यान देने योग्य है। इस दृष्टिकोण से हम इसे तनाव बढ़ने से रोकने और युद्ध दोबारा शुरू होने की आशंका को कम करने की दिशा में एक कदम मानते हैं।
ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा है और न ही वह युद्ध चाहता है। हम हमेशा कहते आए हैं कि मौजूदा विवादों का समाधान धमकी या बल प्रयोग से नहीं, बल्कि बातचीत, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के पालन से होना चाहिए। हर देश में विदेश नीति को लेकर अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है, अमेरिका में भी ऐसा है। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि जो लोग कूटनीति, संयम और शांतिपूर्ण समाधान की बात करते हैं, उनकी भूमिका ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए ताकि संकट न बढ़े। हम अब भी मानते हैं कि मौजूदा समस्याओं का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत की मेज पर और रचनात्मक संवाद से ही निकलेगा।
सवाल: कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले के आरोपों पर ईरान की क्या प्रतिक्रिया है?
जवाब: कुवैत और बहरीन की तरफ से जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी नियमों और अच्छे पड़ोसी संबंधों के सिद्धांत का खुला उल्लंघन हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 3314 के अनुसार, इन्हें ईरान के खिलाफ ‘आक्रामक कार्रवाई’ माना जाता है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर कोई देश अपनी जमीन, समुद्री या हवाई क्षेत्र या वहां मौजूद सुविधाओं को किसी आक्रामक पक्ष को ईरान के खिलाफ हमले या सैन्य कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करने देता है, तो वह भी आक्रामकता में शामिल माना जाता है।
हम अपने देश की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के अपने अधिकार के तहत हर जरूरी कदम उठाएंगे, जिसमें हमले की जगह और स्रोत को निशाना बनाना भी शामिल है। हालांकि हमारे सैन्य विशेषज्ञों की जांच और आकलन बताता है कि कुवैत एयरपोर्ट की तरफ कोई ईरानी मिसाइल नहीं दागी गई। एयरपोर्ट को जो नुकसान हुआ, वह संभवतः अमेरिका में बने ‘पैट्रियट’ डिफेंस सिस्टम की खराबी की वजह से हुआ, जिनकी इंटरसेप्टर मिसाइलें लक्ष्य को रोकने में असफल रहीं और टर्मिनल पर गिर गईं।
इसके अलावा, कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी ड्रोन हमलों और उनसे जुड़े प्रभावों के दावे जो किए जा रहे हैं, वे रात के समय हुए बताए जाते हैं। लेकिन जिन तस्वीरों और वीडियो को सबूत के तौर पर दिखाया जा रहा है, वे साफ तौर पर दिन के उजाले में लिए गए लगते हैं। इससे साफ होता है कि ये वीडियो असली घटनाओं से मेल नहीं खाते और बनावटी हैं। हमारा मकसद नागरिकों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, लेकिन इस पूरी स्थिति के परिणामों की जिम्मेदारी अमेरिकी-जायोनिस्ट पक्ष और उनके सहयोगियों पर है, जो अपने इलाके और सुविधाएं उनके इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराते हैं।
सवाल: लेबनान और इजरायल के बीच संघर्ष का लेबनान की संप्रभुता और आंतरिक स्थिरता पर क्या असर पड़ता है?
जवाब: हमारी राय में, इजरायली शासन जो लेबनान में कर रहा है, वह साफ तौर पर लेबनान की राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन है और युद्ध अपराधों की श्रेणी में आता है। पिछले कई दशकों से इस शासन का रिकॉर्ड कब्जे, सैन्य हमलों, हत्याओं और आम नागरिकों की हत्या जैसी घटनाओं से भरा रहा है। हमारा मानना है कि यह शासन पश्चिम एशिया में अस्थिरता और असुरक्षा का मुख्य कारण है। गाजा में जो घटनाएं हुईं, उन्हें कोई नहीं भूल सकता, जहां 70,000 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। दस लाख से ज्यादा लोग बेघर हुए और गाजा शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गया।
आज भी यह शासन अलग-अलग बहानों के नाम पर लेबनान पर हमले जारी रखे हुए है, जिससे सिर्फ लेबनान ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। ये कदम अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और देशों की संप्रभुता के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ हैं। हम हमेशा से इस बात पर जोर देते आए हैं कि लेबनान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। हमारा मानना है कि लेबनान की सुरक्षा वहां के लोगों और सरकार को खुद सुनिश्चित करनी चाहिए, और किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह बलपूर्वक दूसरे देश पर अपना फैसला थोपे।
हमने यह भी कहा है कि लेबनान के खिलाफ चल रहे युद्ध को खत्म करना, क्षेत्र में शांति स्थापित करने के किसी भी समझौते का जरूरी हिस्सा होना चाहिए। हम किसी भी हाल में नागरिकों और निर्दोष लोगों की हत्या के खिलाफ हैं, चाहे उनका धर्म या राष्ट्रीयता कुछ भी हो। हमारा मानना है कि स्थायी शांति तभी संभव है जब हिंसा और अपराधों को रोका जाए।
सवाल: मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के समय में ईरान अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांति और स्थिरता के बारे में क्या संदेश देना चाहता है?
जवाब: ईरान एक ऐसा देश है, जिसकी सभ्यता सात हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। इतिहास में यह हमेशा से देशों के बीच शांति, साथ रहने और दोस्ती का संदेश देने वाला रहा है। हमारी ऐतिहासिक पहचान और संस्कृति दूसरे देशों के साथ बातचीत और सहयोग पर आधारित रही है। इतिहास यह दिखाता है कि पिछले तीन सौ वर्षों में ईरान ने किसी भी युद्ध की शुरुआत नहीं की है और हमेशा विवादों को सुलझाने के शांतिपूर्ण तरीकों का समर्थन किया है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सोच हमेशा बातचीत, कूटनीति और आपसी सम्मान पर आधारित रही है।
आज जब दुनिया अनेक चुनौतियों और अनिश्चितताओं का सामना कर रही है, तब ईरान का संदेश अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए स्पष्ट है। टिकाऊ शांति, स्थिरता और सुरक्षा तभी संभव है, जब देशों के अधिकारों का सम्मान किया जाए, अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन हो और समानता के आधार पर खुला तथा सकारात्मक संवाद स्थापित किया जाए।
हम उम्मीद करते हैं कि अमेरिका एक मजबूत और स्वतंत्र ईरान की हकीकत को स्वीकार करेगा, जिसकी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम भूमिका है, और ईरानी लोगों के वैध अधिकारों को भी मान्यता देगा। ईरान हमेशा से आपसी सम्मान और साझा हितों के आधार पर बातचीत और सहयोग के लिए तैयार रहा है। हमारा मानना है कि सभी देशों के लिए सुरक्षित और स्थिर भविष्य का निर्माण केवल कूटनीति और आपसी समझ के माध्यम से ही संभव है।
राष्ट्रीय
आरबीआई ने एनआरआई और ओसीआई के लिए बढ़ाई इक्विटी निवेश सीमा

मुंबई, 5 जून: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को घोषणा की कि शेयर बाजार में कारोबार होने वाले इक्विटी साधनों में बिना सेबी पंजीकरण के निवेश करने के लिए एनआरआई (अनिवासी भारतीय) और ओसीआई (भारतीय मूल के विदेशी नागरिक) की निवेश सीमा बढ़ाई जा रही है।
उन्होंने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बाद अपने संबोधन में कहा कि यही सुविधा अब सभी व्यक्तिगत विदेशी निवासी व्यक्तियों (पीआरओआई) को भी एनआरआई और ओसीआई के समान उपलब्ध कराई जाएगी।
गवर्नर ने कहा, “सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा बाहरी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) को प्रोत्साहित करने के लिए 30 सितंबर 2026 तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा, अधिकृत डीलर (एडी) बैंकों को 3 से 5 वर्ष की नई एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट जुटाने के लिए पूरी हेजिंग लागत वहन करने की समान सुविधा भी 30 सितंबर 2026 तक दी जाएगी।”
विदेशी पूंजी आकर्षित करने के उद्देश्य से आरबीआई ने पूरी तरह सुलभ मार्ग (एफएआर) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों के लिए “निर्दिष्ट प्रतिभूतियों” के दायरे का विस्तार करने का फैसला किया है। इसके तहत 15 वर्ष, 30 वर्ष और 40 वर्ष की अवधि वाली सभी नई सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) को शामिल किया जाएगा।
मल्होत्रा ने कहा कि सामान्य मार्ग (जनरल रूट) के तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के निवेश पर लागू अल्पकालिक निवेश, निवेश एकाग्रता और व्यक्तिगत प्रतिभूतियों से जुड़ी सीमाओं को भी हटाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ये कदम और सरकार द्वारा शुक्रवार सुबह घोषित कर लाभ (टैक्स बेनिफिट) सरकारी उधारी के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने में मदद करेंगे।
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि निर्यात आय की प्राप्ति के लिए समयसीमा को फिर से 9 महीने करने का प्रस्ताव रखा गया है।
उन्होंने कहा, “इन उपायों से देश के भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट्स) को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही हम निर्यात को बढ़ावा देने और पूंजी प्रवाह आकर्षित करने के लिए आगे भी आवश्यक नीतिगत बदलाव करते रहेंगे।”
संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि भारत की विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा, “हम किसी विशेष विनिमय दर या उसकी किसी सीमा को लक्ष्य नहीं बनाते। विनिमय दर का निर्धारण बाजार की ताकतों के आधार पर होने दिया जाता है।”
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कई बार बढ़ी हुई अनिश्चितता के दौरान सट्टेबाजी के दबाव के कारण बाजार में ऐसे उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं, जो आर्थिक बुनियादी कारकों के अनुरूप नहीं होते और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य बाजार द्वारा तय किए गए स्वाभाविक बदलावों को रोकना नहीं है, लेकिन अत्यधिक अस्थिरता और अव्यवस्थित बाजार गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आरबीआई वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने और अनावश्यक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए सतर्क बना रहेगा।
-
दुर्घटना9 months agoनागपुर विस्फोट: बाजारगांव स्थित सौर ऊर्जा संयंत्र में बड़ा विस्फोट; 1 की मौत, कम से कम 10 घायल
-
व्यापार6 years agoआईफोन 12 का उत्पादन जुलाई से शुरू होगा : रिपोर्ट
-
अपराध4 years agoभगौड़े डॉन दाऊद इब्राहिम के गुर्गो की ये हैं नई तस्वीरें
-
महाराष्ट्र1 year agoमीरा भयंदर हजरत सैयद बाले शाह बाबा की मजार को ध्वस्त करने का आदेश
-
महाराष्ट्र1 year agoईद 2025 पर डोंगरी में दंगे और बम विस्फोट की ‘चेतावनी’ के बाद मुंबई पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी
-
महाराष्ट्र11 months agoहाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी किया, मस्जिदों के लाउडस्पीकर विवाद पर
-
राजनीति1 year agoवक्फ संशोधन बिल लोकसभा में होगा पेश, भाजपा-कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने जारी किया व्हिप
-
अनन्य3 years agoउत्तराखंड में फायर सीजन शुरू होने से पहले वन विभाग हुआ सतर्क
