अंतरराष्ट्रीय समाचार
अमेरिकी जज का आदेश सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा, अदाणी मामले पर बोले कानून विशेषज्ञ
उद्योगपति गौतम अदाणी के खिलाफ आपराधिक आरोप हटाने की जस्टिस डिपार्टमेंट की अर्जी मंजूर करने से पहले, अमेरिकी फेडरल जज का डिपार्टमेंट से और अधिक जानकारी मांगने का फैसला एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे मामले के रद्द होने पर प्रक्रिया पर शायद ही कोई असर होगा। यह जानकारी अमेरिकी और भारतीय विशेषज्ञ की ओर से आईएएनएस को दी गई।
साथ ही कहा कि मुकदमा चलाने या न चलाने का फैसला आखिरकार कार्यकारी शाखा के हाथ में होता है।
कोलंबिया लॉ स्कूल में लॉ के एडॉल्फ ए. बर्ले प्रोफेसर और सिक्योरिटीज लॉ व कॉर्पोरेट मुकदमों के मामलों में अमेरिका के प्रमुख विशेषज्ञों में से एक, जॉन सी. कॉफी ने कहा कि जज निकोलस गैराफिस अभियोजकों से उनके फैसले को सही ठहराने के लिए कह सकते हैं, लेकिन वे एग्जीक्यूटिव ब्रांच के फैसले की जगह कोर्ट का फैसला नहीं थोप सकते।
कॉफी ने आईएएनएस से कहा, “सामान्यतः, हमारे संविधान के तहत, अभियोजन संबंधी विवेकाधिकार को एक कार्यकारी शक्ति के रूप में देखा जाता है, जो अंततः राष्ट्रपति के पास होती है, क्योंकि वह कार्यपालिका शाखा के प्रमुख हैं।”
उन्होंने कहा, “हालांकि कोर्ट वजह पूछ सकती है, लेकिन वह प्रॉसिक्यूटर के फैसले को पलट नहीं सकती, क्योंकि हमारे संविधान के तहत शक्तियों के बंटवारे के अनुसार यह फैसला लेने का अधिकार कार्यपालिका के पास है। कोर्ट का यह फैसला असामान्य है और इसे इतना नहीं बढ़ाया जा सकता कि कोर्ट प्रॉसिक्यूटर के केस खत्म करने के फैसले की गहराई से समीक्षा कर सके।”
कॉफी का यह आकलन तब आया है, जब जज गैराफिस ने जस्टिस डिपार्टमेंट को आदेश दिया था कि वह अदाणी और सात अन्य आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को ‘हमेशा के लिए’खत्म करने की अपनी अपील के लिए विस्तृत कारण और सहायक तथ्य पेश करे।
पांच पेज के आदेश में जज ने कहा कि सरकार की संक्षिप्त अर्जी में इतनी जानकारी नहीं थी कि कोर्ट ‘फेडरल रूल्स ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर’ के नियम 48(ए) के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभा सके।
जस्टिस डिपार्टमेंट ने सिर्फ इतना कहा था कि उसने मामले की समीक्षा की है और अपने अभियोजन संबंधी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह फैसला किया है कि आपराधिक आरोपों को आगे बढ़ाने में और संसाधन नहीं लगाए जाएंगे।
अमेरिका की पूर्व अटॉर्नी बारबरा मैकक्वेड ने कहा कि जज की यह मांग असामान्य थी, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में थी।
मैकक्वेड ने आईएएनएस को बताया, “मुझे इस मामले के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन किसी जज का केस खारिज करने के कारणों पर सवाल उठाना असामान्य बात है।”
अकसर ऐसा होता है कि जो सरकारी पक्ष केस लाता है, अगर वह उसे खारिज करना चाहता है, तो आमतौर पर बिना किसी जांच-पड़ताल के उसे मंजूरी दे दी जाती है।
उन्होंने आगे कहा कि जज और स्पष्टीकरण मांग सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्याय विभाग अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
हालांकि, जज के लिए यह पता लगाना सही है कि कहीं जस्टिस डिपार्टमेंट अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है जैसे कि किसी एक ही व्यक्ति के खिलाफ बार-बार आरोप लगाना और फिर उन्हें वापस लेना।
मैकक्वेड ने कहा कि भले ही कोर्ट सरकारी वकीलों को केस आगे बढ़ाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, लेकिन उसके पास कुछ सीमित प्रक्रियात्मक अधिकार होते हैं।
मैकक्वेड के मुताबिक,”जज किसी को केस आगे बढ़ाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, लेकिन वे यह तय कर सकते हैं कि केस को ‘विद प्रीज्यूडिस’ (दोबारा आरोप लगाने की मनाही के साथ) या ‘विदाउट प्रीज्यूडिस’ (दोबारा आरोप लगाने की गुंजाइश के साथ) खारिज किया जाए, जिससे यह तय होता है कि भविष्य में दोबारा आरोप लगाए जा सकते हैं या नहीं।”
जाने-माने भारतीय सीनियर वकील और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने जज के आदेश को जस्टिस डिपार्टमेंट के फैसले के खिलाफ कोई बड़ी चुनौती नहीं, बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया
साल्वे ने आईएएनएस से कहा, “दुनिया की हर अदालत में, जब भी कोई केस दायर किया जाता है, तो वह केस अदालत की संपत्ति बन जाता है।”
उन्होंने कहा, “इस कारण, जब आप अदालत से केस खत्म करने के लिए कहते हैं, तो वे पूछते हैं, ‘क्यों?’ फिर सरकार अपनी वजहें बताती है… तो यह एक आम बात है और इसमें कुछ और सोचने की जरूरत नहीं है। नियम के मुताबिक, जज को वजह देखनी होती है और फिर केस खत्म करना होता है।”
जब उनसे पूछा गया कि क्या जज गैराफिस सरकार की अपील ठुकरा सकते हैं, तो साल्वे ने कहा, “यह एक औपचारिकता है। अगर वे उन्हें कारण बताने से मना करते हैं, तो वह कहेंगे कि मुझे कारण बताएं। एक बार जब वे कारण बता देंगे… तो वह कहेंगे, ठीक है… जज का काम उनके फैसलों पर सवाल उठाना नहीं है।”
साल्वे ने उन बातों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि इस नए आदेश से लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है। उन्होंने कहा, “अपील की कोई जरूरत नहीं है। यह प्रक्रिया से जुड़ा एक छोटा सा आदेश है। अदाणी ग्रुप का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह मामला सरकारी वकील और जज के बीच का है।”
पूर्व फेडरल प्रॉसिक्यूटर और नेशनल सिक्योरिटी लॉयर पॉल रोसेनजवेग भी इस बात से सहमत थे कि आखिरकार जस्टिस डिपार्टमेंट की ही जीत होने की संभावना है, हालांकि उन्होंने जज गैराफिस के आदेश को प्रक्रिया के सामान्य कदम से कहीं अधिक अहम बताया।
रोसेनजवेग ने आईएएनएसको बताया, “आखिरकार, जिन भी जजों के सामने यह सवाल आया है, उन्होंने यही तय किया है कि उनके पास केस को खारिज करने के डिपार्टमेंट के अनुरोध को ठुकराने का अधिकार नहीं है।”
रोसेनजवेग ने कहा, “अमेरिका में मुकदमा चलाने का अधिकार एग्जीक्यूटिव ब्रांच यानी डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस के पास होता है, और आप डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस को ऐसा केस चलाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते जिसे वे चलाना नहीं चाहते। इसलिए, मुझे लगता है कि लंबे समय में यह केस खारिज हो जाएगा।”
रोसेनजवेग ने कहा कि अगर कोर्ट जस्टिस डिपार्टमेंट की दलील मान लेती है, तो कार्यवाही कुछ हफ्तों में पूरी हो सकती है, लेकिन अगर जज गारौफिस फैसला सुनाने से पहले सरकार के कारणों की जांच के लिए किसी स्वतंत्र वकील को नियुक्त करते हैं, तो इसमें अधिक समय लग सकता है।
जज गारौफिस ने जस्टिस डिपार्टमेंट को निर्देश दिया है कि वे 13 जुलाई तक अपना विस्तृत स्पष्टीकरण जमा करें।
अक्टूबर 2024 में न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में एक फेडरल ग्रैंड जूरी द्वारा जारी और अगले महीने सार्वजनिक किए गए आरोप-पत्र में, अदाणी ग्रुप के वरिष्ठ अधिकारियों और छह अन्य लोगों पर भारत में सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स से जुड़े रिश्वत, सिक्योरिटीज फ़्रॉड और न्याय में बाधा डालने की कथित साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। सभी आरोपियों ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है।
पिछले महीने, अमेरिकी न्याय विभाग ने सिक्योरिटीज और वायर फ्रॉड के कथित मामले में अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी और उनके भतीजे सागर अदाणी के खिलाफ सभी आपराधिक आरोप हमेशा के लिए हटा दिए।
न्याय विभाग ने कहा, “विभाग ने इस मामले की समीक्षा की है और अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह तय किया है कि इन आरोपियों के खिलाफ आपराधिक आरोपों पर आगे और संसाधन खर्च नहीं किए जाएंगे।”
इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि अदाणी और अन्य के खिलाफ लगाए गए आरोपों को “हमेशा के लिए खारिज” कर दिया जाए।
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ट्रंप का दावा: ईरान के साथ युद्ध ‘बहुत जल्द’ होगा खत्म, इसके बाद तेजी से गिरेंगी तेल की कीमतें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्ध ‘बहुत जल्द’ खत्म हो जाएगा। उन्होंने अनुमान जताया कि संघर्ष खत्म होते ही तेल की कीमतों में तेज गिरावट आएगी। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान सैन्य और आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो चुका है।
टेक्सास पहुंचने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए और बाद में डेंटन में पीटरबिल्ट मोटर्स की एक फैक्ट्री के दौरे के दौरान ट्रंप ने कहा कि अब ईरान के सामने यह फैसला करने का समय है कि संघर्ष किस तरह खत्म होगा।
ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “ईरान का मामला बहुत जल्द किसी न किसी तरह खत्म होने वाला है। या तो वह खुद कहेगा कि देखिए, वहां 301 प्रतिशत महंगाई है। उनके पास पैसा नहीं है, उनकी करेंसी नहीं है। उनकी सेना हार चुकी है, उनकी नौसेना खत्म हो गई है, वायुसेना खत्म हो गई है, सब कुछ खत्म हो गया है।”
उन्होंने कहा, “किसी न किसी तरह यह बहुत जल्द खत्म होने वाला है। और जब यह खत्म होगा, तो तेल की कीमतें चट्टान की तरह तेजी से नीचे गिरेंगी।”
ट्रंप ने कहा कि कीमतों में राहत देने के लिए अमेरिका किसी यूरोपीय देश के पास मौजूद डीजल के स्टॉक को जारी कराने पर विचार कर सकता है। हालांकि, उन्होंने उस देश का नाम नहीं बताया।
ट्रंप ने कहा, “हां, हम ऐसा कर सकते हैं। उनके पास कुछ डीजल है, लेकिन कीमतें नीचे आ रही हैं। सभी कीमतें नीचे आ रही हैं।”
उन्होंने कहा, “एक चीज यह है कि तेल की कीमत थोड़ी ज्यादा है, लेकिन यह बाइडेन के समय के मुकाबले काफी कम है। और हमने वह काम किया जो बाइडेन ने नहीं किया।”
पीटरबिल्ट की फैक्ट्री में अपने बाद के संबोधन में भी ट्रंप ने कई बार ईरान और ऊर्जा की कीमतों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास ईरानी पाबंदियों के बावजूद अमेरिका ने तेल की आवाजाही जारी रखने में मदद की है।
ट्रंप ने कहा, “यह बहुत जल्द खत्म होगा, किसी न किसी तरह इसे खत्म होना ही है। या तो वे कोई सही और समझदारी वाला कदम उठाएंगे या वे ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।”
उन्होंने कहा, “तो किसी न किसी तरह यह खत्म होने वाला है। और जब यह खत्म होगा तो तेल की कीमत बहुत तेजी से नीचे जाएगी। इस बीच तेल की कीमतें पहले ही काफी नीचे आ चुकी हैं।”
ट्रंप से ब्रिटेन के आरएएफ फेयरफोर्ड से जुड़ी एक कथित नाकाम आतंकी साजिश में ईरान की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर ट्रंप ने कहा कि वह ईरान की भूमिका की पुष्टि नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “मैं इसकी पुष्टि के साथ नहीं कह सकता, लेकिन ऐसा ही लग रहा है।”
टेक्सास दौरे के दौरान ट्रंप ने ईरान पर अपनी टिप्पणियों के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को अर्थव्यवस्था की स्थिति के लिए जितना श्रेय मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा है।
ट्रंप ने कहा, “हमारे आंकड़े शानदार हैं। हम मैनेजमेंट के मामले में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।” उन्होंने शेयर बाजार, रिटायरमेंट खातों और नई फैक्ट्रियों में हो रहे निवेश का जिक्र किया। साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को अपने आर्थिक रिकॉर्ड के बारे में लोगों तक अपनी बात ज्यादा बेहतर तरीके से पहुंचाने की जरूरत है।
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भारत के दो नगीने नीरजा और स्मित: जान पर खेलकर इंसानियत को जिंदा रखा, अपने-पराए का भेद मिटाया

नई दिल्ली । हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ता विमान जब अचानक संकट में घिरता है तो दिमाग काम करना बंद कर देता है। यात्रियों के पास सोचने के लिए बहुत कम समय होता है। ऐसे वक्त में विमान के पायलट और चालक दल का एक फैसला सैकड़ों जिंदगियों का भविष्य तय कर सकता है। स्मित मच्छार और नीरजा भनोट दो ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने जान पर खेलकर दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ाया। ये नहीं देखा कि लोग अपने हैं या पराए! याद रखा तो सिर्फ कर्तव्य और मानव सेवा का मर्म। 1986 की नीरजा भनोट के शौर्य से लेकर 2026 में कैप्टन स्मित मच्छार की जांबाजी तक, दो पीढ़ियों के ये दो नाम भारत के इकबाल में चार चांद लगाते हैं।
शुरुआत भनोट से! 5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर आतंकवादियों ने हाईजैक कर ली थी। विमान में सैकड़ों यात्री सवार थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। उस समय विमान की वरिष्ठ फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने असाधारण साहस का उदाहरण पेश किया।
कॉकपिट क्रू के विमान से निकल जाने के बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और उनके सहयोगियों पर आ गई थी। नीरजा ने आतंकवादियों की मांग के अनुसार यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा किए, लेकिन अमेरिकी नागरिकों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट अलग कर दिए। जब हालात बिगड़े और विमान के अंदर गोलीबारी शुरू हुई तो उन्होंने यात्रियों को आपातकालीन निकास की ओर जाने में मदद की।
इस दौरान नीरजा ने बच्चों और दूसरे यात्रियों को बचाने की कोशिश की। वह खुद आतंकवादियों की गोली का शिकार हुईं और उनकी मौत हो गई। भारत सरकार ने उनके साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। अपने-पराए का भेद मिटा अदम्य साहस दिखाने वाली नीरजा को पाकिस्तान ने भी सम्मानित किया। उन्हें मरणोपरांत ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से नवाजा गया।
समय बदला, जमाना बदला लेकिन अगर कुछ नहीं मिला तो भारतीयों के हर परिस्थिति में कुछ कर गुजरने का जज्बा। करीब चार दशक बाद विमानन जगत में एक और ऐसी घटना घटी, जिसमें एक भारतीय पायलट ने जान पर खेलकर 174 लोगों की जिंदगियां बचाने में अहम योगदान दिया।
भारत के सीने पर 30 सितंबर 2026 का दिन खुरच कर लिख दिया गया है। इसी दिन फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान के दौरान कॉकपिट में एक गंभीर हिंसक वारदात हुई। भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर साथी पायलट ने कथित तौर पर चाकू से हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद स्मित ने विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी नहीं भूली।
बाद में यात्रियों की मदद से बड़ा विमान हादसा टाल दिया गया। घटना के बाद विमान का रुख बदला गया और उसे सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया। स्मित को अस्पताल ले जाया गया और उनकी स्थिति स्थिर बताई गई।
नीरजा और स्मित की घटनाओं में करीब 40 साल का अंतर है। परिस्थितियां भी बिल्कुल अलग थीं। नीरजा के सामने हथियारबंद अपहरणकर्ता थे, जबकि स्मित का दुश्मन उनका साथी पायलट ही था। लेकिन दोनों घटनाओं में एक बात समान रही: ‘संकट की घड़ी में दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अपना कर्तव्य।’
नीरजा की कहानी बलिदान की कहानी बन गई। वह यात्रियों को बचाते हुए खुद अपनी जिंदगी हार गईं। स्मित की कहानी में भी खतरा उतना ही वास्तविक था, लेकिन वह विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों की जान बचाने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच सके।इन घटनाओं की खासियत यह भी है कि इनमें बहादुरी किसी युद्धक्षेत्र में नहीं दिखाई गई। एक विमान के भीतर, सीमित जगह और संकटकाल में लिए गए त्वरित निर्णयों ने इन भारतीयों को यादगार बना दिया।
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इजरायली फ्लाइट सऊदी एयरपोर्ट पर हुई लैंड, हाईजैकिंग की आशंका से तेल अवीव का इनकार

इजरायल ने बुधवार को 150 से ज्यादा यात्रियो को लेकर दुबई से तेल अवीव आ रही फ्लाइट के सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर सुरक्षित लैंड होने का ऐलान किया। इससे पहले आशंका जताई गई थी कि प्लेन को हाइजैक कर लिया गया है।
इजरायली सुरक्षा सूत्रों के हवाले से द टाइम्स ऑफ इजरायल ने बताया कि पायलटों के बीच हुई बहस के परिणामस्वरूप विमान को “गैर-कानूनी दखल” और एक सामान्य इमरजेंसी सिग्नल जारी करना पड़ा था। सेना का कहना है कि आईडीएफ चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने इस घटना पर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की।
इन अधिकारियों में इजरायली वायु सेना के प्रमुख मेजर जनरल ओमर टिशलर, ऑपरेशन्स डायरेक्टरेट के प्रमुख मेजर जनरल इत्जिक कोहेन और इंटेलिजेंस डायरेक्टरेट के प्रमुख मेजर जनरल श्लोमी बाइंडर शामिल थे। दुबई से इजरायल के तेल अवीव जा रही फ्लाइट ने उड़ान भरने के कुछ देर बाद ही इमरजेंसी का सिग्नल दिया था। विमान ने ट्रांसपोंडर पर 7700 कोड इस्तेमाल किया। इसका मतलब होता है कि विमान में किसी तरह की इमरजेंसी है।
कुछ फ्लाइट-ट्रैकिंग वेबसाइटों पर थोड़ी देर के लिए 7500 कोड भी नजर आया। आमतौर पर यह कोड विमान के हाइजैक होने पर इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस कोड के इस्तेमाल किए जाने की पुष्टि नहीं की गई है। फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, फ्लाईदुबई की फ्लाइट ने शुरू में 7700 का “स्क्वॉक कोड” भेजा, जो एक इंटरनेशनल इमरजेंसी सिग्नल है।
इसके कुछ समय बाद, उसने 7500 कोड भेजा, जिसका मतलब हाईजैकिंग या गैर-कानूनी दखल होता है। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, इजरायली वायु सेना ने तुरंत फाइटर जेट्स को प्लेन की ओर भेजा था।
इजरायल का एयरस्पेस भी कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया था, और बाद में सऊदी अरब में विमान के उतरने के बाद उसे फिर से खोल दिया गया।
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