अंतरराष्ट्रीय
टॉम लैथम ने की रॉस टेलर की प्रशंसा
न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज टॉम लैथम ने बुधवार को कहा कि रॉस टेलर को टेस्ट टीम में पहली स्लिप या ड्रेसिंग रूम में नहीं देखना थोड़ा अलग होगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि टेलर के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद टीम में युवाओं को मौका मिलेगा। टेलर ने अपने 15 साल के लंबे करियर में 112 टेस्ट मैचों में 19 शतक और 35 अर्धशतक सहित 44.66 की औसत से 7,683 रन बनाए हैं, जिसके बाद उन्होंने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी थी।
क्राइस्टचर्च में हेगले ओवल में बांग्लादेश के खिलाफ दूसरे टेस्ट में, टेलर ने ब्लैककैप की जीत पर मुहर लगाने के लिए इबादत हुसैन का अंतिम विकेट लिया और खेल के सबसे लंबे प्रारूप में अपने करियर का शानदार अंत किया।
एसईएनजेड मॉनिर्ंग शो में लैथम ने कहा, “वह एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिसके साथ मैंने न्यूजीलैंड में सबसे अधिक क्रिकेट खेला है। उन्हें पहली स्लिप में या ड्रेसिंग रूम में न देखना थोड़ा अलग होगा और पहले दो मैचों के लिए थोड़ा सा समायोजन करना होगा। किसी के पास इतने वर्षों का करियर होना अद्भुत है, दुनियाभर की परिस्थितियों में सभी विरोधों के खिलाफ प्रदर्शन करना एक बहुत बड़ी बात है।”
अगले महीने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ न्यूजीलैंड का अगला टेस्ट मैच आने के साथ, लैथम को उम्मीद है कि नियमित कप्तान केन विलियमसन दो मैचों की श्रृंखला के लिए उपलब्ध होंगे, जो फिलहाल चोट के कारण टीम से बाहर हैं।
अंतरराष्ट्रीय
ईरान में दुर्घटनाग्रस्त विमान के पायलट को बचाने के अमेरिकी अभियान में शामिल था उच्च जोखिम

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वॉशिंगटन, 6 अप्रैल : कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी बलों ने ईरान के भीतर गिराए गए एक अमेरिकी पायलट को बचाने के लिए एक उच्च जोखिम वाला अभियान चलाया। इसमें एक जटिल सैन्य ऑपरेशन का इस्तेमाल किया गया, ताकि उसे शत्रुतापूर्ण क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
यह मिशन ईरान के ऊपर एक अमेरिकी एफ-15ई फाइटर जेट के गिराए जाने के बाद शुरू हुआ, जिसमें एक क्रू सदस्य लगभग दो दिनों तक फंसा रहा जबकि ईरानी सुरक्षा बल उसकी तलाश कर रहे थे।
मीडिया रिपोर्टपोलिटिको के अनुसार, अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने धोखे की रणनीति के तहत झूठी जानकारी फैलाई कि पायलट को पहले ही ढूंढ लिया गया है और उसे देश से बाहर ले जाया जा रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया, “सीआईए ने ईरान के भीतर यह खबर फैलाई कि अमेरिकी बलों ने पायलट को ढूंढ लिया है और उसे जमीन के रास्ते देश से बाहर निकाला जा रहा है।” इस रणनीति का उद्देश्य ईरानी खोज टीमों को भ्रमित करना और अमेरिकी बलों को लापता पायलट की सटीक लोकेशन का पता लगाने का समय देना था।
पोलिटिको ने कहा, “इस चाल ने सीआईए को गिराए गए विमान के पायलट का पता लगाने और उसकी सटीक लोकेशन को चुपचाप व्हाइट हाउस और पेंटागन तक पहुंचाने के लिए समय दिया।”
जमीन पर पायलट ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में गिरफ्तारी से बचते हुए जीवित रहने की कोशिश की। सीएनएन के अनुसार, वह पहाड़ी इलाकों में अकेले छिपा रहा, ऊंचाई पर चढ़ता रहा और ईरानी गश्ती दलों से बचते हुए एक दरार (क्रेविस) में शरण ली।
उसके पास सीमित उपकरण थे, जिनमें एक पिस्तौल, संचार उपकरण और एक ट्रैकिंग बीकन शामिल था। एक दिन से अधिक समय तक वह अमेरिकी बलों की पहुंच से बाहर रहा जबकि वे उसे खोजने की कोशिश कर रहे थे।
अमेरिकी सेना ने एक बड़े स्तर का सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया, जिसमें स्पेशल ऑपरेशंस सैनिक, निगरानी विमान और हवाई समर्थन शामिल थे। सीएनएन के अनुसार, इस मिशन में आर्मी डेल्टा फोर्स और नेवी सील टीम सिक्स जैसी एलीट यूनिट्स भी शामिल थीं।
विमान के पायलट को पहले ही बचा लिया गया था लेकिन दूसरा क्रू सदस्य लापता रहा, जिससे खोज अभियान और तेज कर दिया गया।
द वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, यह बचाव अभियान जल्द ही अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों के लिए प्राथमिकता बन गया। रिपोर्ट में कहा गया, “अमेरिकी सेना और सीआईए ने ईरान के ऊपर गिराए गए फाइटर जेट के एक क्रू सदस्य को बचाने के लिए एक उच्च जोखिम वाला मिशन समन्वित किया।”
जब पायलट की स्थिति की पुष्टि हो गई, तो अमेरिकी कमांडो अंधेरे की आड़ में आगे बढ़े। द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, युद्धक विमानों ने पास के इलाकों में हमले कर ईरानी बलों को पास आने से रोकने के लिए समर्थन दिया।
रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया, “कमांडो ने अपने हथियारों से जोरदार फायरिंग की ताकि आसपास मौजूद ईरानी बल उनके करीब न आ सकें।”
बचाव अभियान के दौरान कुछ जटिलताएं भी सामने आईं। ऑपरेशन में इस्तेमाल किए गए विमानों को जमीन पर तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे कमांडरों को अपनी योजना में बदलाव करना पड़ा और अतिरिक्त सहायता बुलानी पड़ी।
इन बाधाओं के बावजूद, अमेरिकी बलों ने मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया और पायलट को सुरक्षित निकाल लिया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अभियान की सराहना करते हुए इसे “अमेरिकी इतिहास के सबसे साहसिक सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशनों में से एक” बताया।
उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “हमने गंभीर रूप से घायल और बेहद बहादुर एफ-15 क्रू सदस्य/अधिकारी को ईरान के पहाड़ों के भीतर से बचा लिया है… सभी का अद्भुत साहस और कौशल!”
उन्होंने यह भी कहा कि बचाव से पहले ईरानी बल “बड़ी संख्या में उसकी तलाश कर रहे थे और उसे पकड़ने के करीब पहुंच चुके थे।”
इस ऑपरेशन में सैन्य और खुफिया संसाधनों का व्यापक इस्तेमाल हुआ। द वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, इसमें स्पेशल ऑपरेशंस फोर्सेस, कई विमान और अंतिम समय में सीआईए की धोखे की रणनीति शामिल थी।
यह स्थिति बेहद संवेदनशील थी। अगर पायलट को पकड़ लिया जाता, तो ईरान को संघर्ष में बड़ा फायदा मिल सकता था, जिससे उसे वार्ता या प्रचार में बढ़त मिलती।
इस घटना ने अमेरिकी वायुसेना के क्रू के लिए सर्वाइवल ट्रेनिंग के महत्व को भी उजागर किया। पूर्व सैन्य अधिकारियों ने फॉक्स न्यूज को बताया कि ऐसी परिस्थितियां “उच्च स्तर की ट्रेनिंग” को दर्शाती हैं, जो पायलटों को कठिन हालात में मजबूत बनने और दुश्मन से बचने के लिए तैयार करती है।
अंतरराष्ट्रीय
ईरान के विदेश मंत्री की भारतीय और रूसी समकक्षों के साथ फोन पर बातचीत, युद्ध के हालातों पर हुई चर्चा

तेहरान, 6 अप्रैल : ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे क्षेत्रीय संघर्ष पर रूस और भारत के विदेश मंत्रियों से बातचीत की।
ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयानों के अनुसार, रविवार को हुई दो अलग-अलग फोन कॉल में अरागची ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ पश्चिम एशिया की ताज़ा स्थिति और अमेरिका व इजराइल के हमलों के सुरक्षा और आर्थिक असर पर चर्चा की।
अरागची ने बताया कि पिछले 37 दिनों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के लोगों के खिलाफ कई हमले किए हैं। इनमें औद्योगिक ढांचे, फैक्ट्रियों, अस्पतालों, स्कूलों, रिहायशी इलाकों और परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया गया है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जुड़े प्रभावशाली देशों से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर जिम्मेदार रवैया अपनाएं।
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की जनता और उसकी सेना अपने देश के हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका और इजरायल के हमलों का असर पूरे क्षेत्र और दुनिया की स्थिरता और सुरक्षा पर पड़ सकता है।
वहीं, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने नागरिक इलाकों पर हो रहे “गैरकानूनी” हमलों को तुरंत रोकने की जरूरत बताई। उन्होंने खास तौर पर दक्षिणी ईरान के बुशेहर परमाणु संयंत्र पर हमलों का जिक्र किया और कहा कि इस संघर्ष को फैलने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने के प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध को रोकने के लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही कोशिशों का समर्थन करता है।
यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब 28 फरवरी से अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है। इसके जवाब में ईरान और उसके सहयोगी देशों ने मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल से जुड़े ठिकानों पर हमले किए हैं।
अंतरराष्ट्रीय
एयू की चेतावनी : मध्य-पूर्व का संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए ‘गंभीर खतरा’

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नई दिल्ली, 6 अप्रैल : अफ्रीकी संघ (एयू) और उसके साझेदारों ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
सिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, एक संयुक्त रिपोर्ट में एयू, संयुक्त राष्ट्र के अफ्रीका आर्थिक आयोग, अफ्रीकी विकास बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने कहा कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और जहाजों के रास्तों, ऊर्जा और खाद (फर्टिलाइजर) की सप्लाई में जितनी ज्यादा बाधा आती है, उतना ही अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका के कई देश अभी भी कोविड से पहले वाली विकास दर तक नहीं पहुंच पाए हैं। अगर यह संघर्ष छह महीने से ज्यादा चलता है, तो साल 2026 में अफ्रीका की जीडीपी वृद्धि दर में 0.2 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
संस्थाओं ने कहा कि यह संघर्ष पहले ही व्यापार पर असर डाल चुका है और अब यह महंगाई का संकट भी बन सकता है, क्योंकि ईंधन और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, जहाजों का किराया, बीमा खर्च, मुद्रा पर दबाव और सख्त राजकोषीय स्थितियां जैसे कारण स्थिति को और खराब कर सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर परिवारों पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में बताया गया कि अफ्रीका के कुल आयात का 15.8 प्रतिशत और निर्यात का 10.9 प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व से जुड़ा है। इससे साफ है कि वहां की स्थिति का अफ्रीका पर सीधा असर पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ देशों के लिए तेल से ज्यादा बड़ा असर खाद की कमी का हो सकता है। अगर खाड़ी देशों से प्राकृतिक गैस की सप्लाई प्रभावित होती है, तो अमोनिया और यूरिया का उत्पादन घटेगा, जिससे खेती के अहम मौसम (मार्च से मई) में खाद महंगी हो जाएगी।
इसका सीधा असर खाने की कीमतों पर पड़ेगा और गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाना और मुश्किल हो जाएगा। इससे अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि इस संघर्ष का असर राजनीति और सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अगर यह संघर्ष बढ़ता है, तो अफ्रीका में बाहरी देशों के प्रभाव की होड़ तेज हो सकती है। सूडान, सोमालिया और लीबिया जैसे देशों में पहले से ही ऐसे संकेत दिख रहे हैं।
अंत में रिपोर्ट में कहा गया कि इस स्थिति से निपटने के लिए अफ्रीका को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी, सरकारी खर्च की स्थिति को संभालना होगा, ‘अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र’ को तेजी से लागू करना होगा और आर्थिक सुरक्षा के उपाय तैयार करने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसे झटकों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।
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