राजनीति
शहरी नक्सलियों को विकास परियोजनाओं को ठप करने से रोकने की जरूरत : मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को विकास परियोजनाओं में रुकावटें पैदा करने के लिए ‘शहरी नक्सलियों’ को जिम्मेदार ठहराया और प्रगतिशील कार्यों को रोकने के लिए वैश्विक निकायों और संस्थानों को प्रभावित करने के लिए उन पर निशाना साधा। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे तत्वों की ‘षड्यंत्रों’ को रोकने की जरूरत है।
गुजरात के एकता नगर में सरदार सरोवर बांध के स्थान पर राज्य के पर्यावरण मंत्रियों के एक सम्मेलन में अपने वर्चुअल संबोधन में, मोदी ने कहा, “हमने देखा है कि कैसे पर्यावरण मंजूरी के नाम पर आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण को रोकने के लिए बाधाएं पैदा की जाती हैं। आप नहीं मानेंगे कि कैसे शहरी नक्सलियों और विकास विरोधी तत्वों ने सरदार सरोवर बांध के निर्माण में देरी की थी।
“यहां एकता नगर में, पंडित नेहरू द्वारा स्वतंत्रता के तुरंत बाद बांध की आधारशिला रखी गई थी, लेकिन फिर शहरी नक्सलियों ने दावा किया कि यह परियोजना पर्यावरण विरोधी थी और यह कई दशकों तक ठप रही। जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री बना तब ही यह पूरा हो सका। जनता का इतना पैसा बर्बाद हुआ।”
प्रधानमंत्री ने कहा, वही एकता नगर अब पर्यावरण का तीर्थ है।
पीएम ने कहा, “फिर भी, ये शहरी नक्सली चुप नहीं रहे हैं। उनके झूठ का पदार्फाश होने के बावजूद, वे हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने का प्रबंधन करते हैं और यह आश्चर्यजनक है कि कितनी वैश्विक संस्थाएं उनसे प्रभावित हैं जो विकास परियोजनाओं के खिलाफ आपत्तियां उठाती हैं। हमें ऐसे शहरी नक्सलियों की साजिशों को रोकना होगा।”
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के रास्ते में कोई समझौता नहीं होना चाहिए और ऐसे मुद्दों पर समग्र ²ष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
मोदी ने राज्य पर्यावरण मंत्रियों से कहा, “हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परियोजनाओं के लिए पर्यावरण और वन मंजूरी में देरी न हो। इससे लागत बढ़ जाती है। हमें ऐसी पर्यावरणीय परियोजनाओं में लंबित मामलों को जितना संभव हो कम करने की जरूरत है।”
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों दोनों को पर्यावरण से संबंधित परियोजनाओं को मंजूरी में तेजी लाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
राजनीति
आंध्र प्रदेश स्कूल में छात्रा पर चेनसॉ से हमले को लेकर जगन मोहन रेड्डी ने सरकार पर साधा निशाना

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के राप्ताडु स्थित जिला परिषद हाई स्कूल में दसवीं कक्षा की छात्रा पर चेनसॉ से हुए हमले को लेकर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने राज्य की टीडीपी गठबंधन सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने घटना को राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति के पूरी तरह चरमराने का उदाहरण बताते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
जगन मोहन रेड्डी ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि राप्ताडु जिला परिषद हाई स्कूल की कक्षा में घुसकर एक छात्रा पर चेनसॉ से किया गया बर्बर हमला टीडीपी गठबंधन सरकार के ‘जंगल राज’ को उजागर करता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कोई हमलावर सरकारी स्कूल में इतनी आसानी से कैसे घुस सकता है और एक मासूम छात्रा पर बेरहमी से हमला कर सकता है? यह घटना शैक्षणिक संस्थानों के भीतर भी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सरकार की लापरवाही को दर्शाती है। उन्होंने हमले के दौरान छात्रा को बचाने की कोशिश में घायल हुई दूसरी छात्रा का भी जिक्र किया।
वाईएसआरसीपी प्रमुख ने आरोप लगाया कि जब शासन की प्राथमिकता राजनीतिक प्रतिशोध और ‘रेड बुक’ के जरिए शासन करने पर केंद्रित हो जाती है, तो अपराधियों में कानून का डर खत्म हो जाता है। उन्होंने मांग की कि घायल छात्राओं को तत्काल सर्वोत्तम आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए और उनके परिवारों को भरोसे में लिया जाए। साथ ही, हमलावर को तुरंत गिरफ्तार कर पारदर्शी जांच के जरिए न्याय के दायरे में लाने की मांग की।
जगन मोहन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के सभी स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल समीक्षा करने और इस घटना के लिए मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू तथा नारा लोकेश की जवाबदेही तय करने की भी मांग की।
गौरतलब है कि शनिवार को राप्ताडु स्थित जिला परिषद हाई स्कूल में एक व्यक्ति ने दसवीं कक्षा की छात्रा पर चेनसॉ से हमला कर दिया था। हमले में छात्रा के चेहरे, सिर और गले पर गंभीर चोटें आईं। उसकी गर्दन और पेट पर गहरे घाव हुए, जबकि उसका दाहिना हाथ लगभग कट गया था। हमले के दौरान उसे बचाने की कोशिश करने वाली एक अन्य छात्रा भी गंभीर रूप से घायल हो गई।
घटना के बाद मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने अधिकारियों से बात कर घायल छात्राओं के इलाज की जानकारी ली और चिकित्सा टीम को बेहतर से बेहतर उपचार उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। उन्होंने पुलिस को हमलावर की तलाश कर जल्द गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने का आदेश भी दिया।
मुख्यमंत्री ने घायल छात्रा की मां से फोन पर बात कर उन्हें हरसंभव सरकारी सहायता का भरोसा दिलाया। वहीं, पुलिस मामले की जांच कर रही है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आरोपी का घायल छात्रा से पहले से कोई परिचय था या नहीं।
राष्ट्रीय समाचार
कैसे एक ही तारीख बनी ऐतिहासिक? 1 नवंबर को 8 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों का स्थापना दिवस

यह दुर्लभ संयोग है कि भारत के 8 राज्य और 5 केंद्र शासित प्रदेश एक ही दिन एक नवंबर को अपना स्थापना दिवस मनाते हैं। सभी राज्यों के गठन का वर्ष भले अलग था लेकिन सभी के लिए एक नवंबर की तारीख ऐतिहासिक रूप में दर्ज है।
1 नवंबर को गठित 8 राज्यों में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, पंजाब और मद्रास (अब तमिलनाडु) शामिल हैं। इसके अलावा, 5 केंद्र शासित प्रदेशों में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, चंडीगढ़, दिल्ली, लक्षद्वीप और पुडुचेरी शामिल हैं।
मध्य प्रदेश: भारत के मध्य में स्थित मध्य प्रदेश का पुनर्गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य इस तिथि को ‘मध्य प्रदेश स्थापना दिवस’ के रूप में मनाता है, जिसमें रंग-बिरंगी परेड, पारंपरिक प्रस्तुतियां और स्थानीय उपलब्धियां हासिल करने वालों को सम्मानित करने के लिए पुरस्कार समारोह आयोजित किए जाते हैं।
छत्तीसगढ़: यह भारत में बनने वाला 26वां राज्य था, जो 1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। छत्तीसगढ़ को ‘भारत का धान का कटोरा’ कहा जाता है। हालांकि, पारंपरिक रूप से यह शब्द कृष्णा और गोदावरी नदियों के बनाए डेल्टा क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लगभग 1,35,192 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह भारत का नवां सबसे बड़ा राज्य है और यहां की जनसंख्या लगभग 2.55 करोड़ है।
हरियाणा: भाषाई आधार पर पंजाब से अलग करके 1 नवंबर 1966 को इस राज्य का गठन किया गया था। अपने समृद्ध इतिहास और कृषि व खेल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पहचाना जाने वाला हरियाणा, अपनी विशिष्ट पहचान का जश्न मनाने के लिए इस दिन सार्वजनिक कार्यक्रम और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित करता है।
पंजाब: 1966 में इसी दिन पंजाबी भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य बनाने के उद्देश्य से पंजाब का पुनर्गठन किया गया था। अपनी जीवंत संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध पंजाब इस दिन को अपनी विरासत और उपलब्धियों को उजागर करने वाले उत्सवों के साथ मनाता है।
आंध्र प्रदेश: यह भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य था। आंध्र प्रदेश 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया, जब ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ के तहत हैदराबाद राज्य को विभाजित किया गया था।
कर्नाटक: अपनी जीवंत संस्कृति और टेक्नोलॉजी हब के रूप में मशहूर कर्नाटक पहले मैसूर के नाम से जाना जाता था। यह राज्य 1 नवंबर 1956 को ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ के तहत कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर पुनर्गठित किया गया था।
केरल: दक्षिण भारत के इस राज्य का गठन भी 1 नवंबर 1956 को मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर क्षेत्रों को मिलाकर किया गया था। अपनी प्राकृतिक सुंदरता और साक्षरता के क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए पहचाना जाने वाला केरल, अपने गठन का जश्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए मनाता है।
तमिलनाडु: 1 नवंबर 1956 को ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ के अंतर्गत तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी का भाषाई आधार पर विभाजन किया गया था। हालांकि, 1969 में मद्रास का नाम बदलकर तमिलनाडु रखा गया।
दिल्ली: 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के तहत दिल्ली को ‘पार्ट-सी’ राज्य से बदलकर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था।
चंडीगढ़: इस शहर की आधारशिला 1952 में रखी गई थी लेकिन एक नवंबर 1966 को राज्य के पुनर्गठन के समय, जब पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने, तो इस शहर को पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी होने का अनूठा गौरव प्राप्त हुआ। साथ ही, इसे एक केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया और यह केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत इसी दिन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को भी ‘पार्ट-सी’ राज्य से बदलकर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था।
लक्षद्वीप: 1 नवंबर 1956 को लक्षद्वीप को भारत के एक अलग केंद्र शासित प्रदेश के रूप में गठित किया गया था, और 1 नवंबर 1973 को इस द्वीप समूह का आधिकारिक नाम बदलकर लक्षद्वीप रख दिया गया।
पुडुचेरी: 1947 में अंग्रेज हमेशा के लिए भारत छोड़कर चले गए लेकिन फ्रांसीसियों का शासन 1954 तक बना रहा। 1 नवंबर 1954 को भारत में फ्रांसीसी कब्जे वाले क्षेत्रों को व्यावहारिक रूप से भारतीय संघ को सौंप दिया गया था, जिसके बाद यह एक केंद्र शासित प्रदेश बना। इसके साथ ही, भारत से 280 वर्षों के फ्रांसीसी शासन का अंत हुआ था।
राजनीति
किरेन रिजिजू ने कांग्रेस को दी 5 सवालों की चुनौती, पूछा- जब ज्ञानेश सीईसी नहीं थे, तो कांग्रेस को कैसे मिली हार

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने चुनाव आयोग और वोट चोरी के आरोपों को लेकर कांग्रेस पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कांग्रेस को 5 सवालों के जवाब देने की चुनौती दी है।
किरेन रिजिजू ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में लिखा, “मैं कांग्रेस पार्टी को इन बुनियादी सवालों का जवाब देने की चुनौती देता हूं।”
पहला सवाल, जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कांग्रेस की सरकार ने की थी, तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 44 सांसद कैसे मिले?
दूसरा सवाल जब, 2024 में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं थे, तो कांग्रेस को लगातार तीसरी बार हार का सामना कैसे करना पड़ा?
तीसरा सवाल, क्या मौजूदा कांग्रेस के मुख्यमंत्री इस्तीफा देंगे और 2014 से 2026 के दौरान सरकारें बनाने के लिए माफी मांगेंगे?
चौथा सवाल, क्या वोटर लिस्ट से अवैध अप्रवासी, मृत, शिफ्ट हो चुके या डुप्लीकेट नाम हटाए जाने चाहिए या नहीं?
पांचवा सवाल, क्या 1952-56, 1958-61, 1965-66, 1983-84, 1987-88, 1993, 1995 और 2002-2004 में किए गए एसआईआर अवैध थे?
उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट में आगे लिखा कि एक परिवार की पार्टी बाहरी ताकतों के साथ मिलकर संविधान और भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिश कर रही है।
दरअसल, कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि उन्होंने चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता किया है और ‘वोट चोरी’ किया है।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया का इस्तेमाल वोटर के नाम मनमाने तरीके से हटाने और सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में वोटरों को एक बूथ से दूसरे बूथ पर शिफ्ट करने के लिए किया गया है।
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के प्रभाव में काम कर रहे हैं, जिससे चुनावी संस्था की संवैधानिक स्वतंत्रता कमजोर हो रही है।
विपक्षी नेताओं का यह भी आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने आयोग के अंदर अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी या सहमति के बिना महत्वपूर्ण फैसले लिए और सुप्रीम कोर्ट में झूठे बयान दिए गए।
इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने तीन मांगें रखी हैं, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, एसआईआर को रद्द करना और ईवीएम की जगह पूरी तरह से पेपर बैलेट से वोटिंग कराना शामिल हैं।
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