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Wednesday,07-October-2026
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लुलु मॉल विवाद: सीएम योगी ने विरोध-प्रदर्शन पर लखनऊ प्रशासन को लगाई फटकार

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YOGI

 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के लुलु मॉल विवाद को लेकर हो रहे विरोध-प्रदर्शन को लेकर जिला और पुलिस प्रशासन को फटकार लगाई। सीएम योगी ने कहा, इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए और इस तरह की चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मॉल में तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे उपद्रवियों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने सोमवार शाम को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि व्यापारिक प्रतिष्ठान लुलु मॉल को सियासी गढ़ में तब्दील कर दिया गया है। कुछ लोगों द्वारा अनावश्यक बयान दिए जा रहे थे और मॉल में आने वाले लोगों की आवाजाही में बाधा डालने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे थे। किसी को भी प्रार्थना या अन्य कार्यक्रम आयोजित करके सड़क पर यातायात बाधित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इस बीच, लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने कहा कि 12 जुलाई को लुलु मॉल में कथित तौर पर नमाज अदा करने वाले चार लोगों का वीडियो फर्जी था।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि 15 जुलाई को वायरल हुआ यह वीडियो असल में उन लोगों का है, जिन्हें पुलिस ने 15 जुलाई को मॉल के अंदर हनुमान चालीसा पढ़ने और नमाज पढ़ने के प्रयास में गिरफ्तार किया था।

मुख्यमंत्री ने पुलिस अधिकारियों से अपने-अपने जिलों में स्थिति की समीक्षा करने और असामाजिक तत्वों पर नजर रखने को कहा।

राजनीति

जंतर-मंतर जा रहे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के नेता हिरासत में लिए गए

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इंडिया ब्लॉक के नेताओं को बुधवार को जंतर-मंतर जाते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इनमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी शामिल हैं। विपक्षी नेता लगातार दूसरे दिन मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने के लिए जंतर-मंतर जा रहे थे।

हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गांधी ने कहा, “गृह मंत्री अमित शाह, पीएम नरेंद्र मोदी, सीईसी ज्ञानेश कुमार और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ये सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन हम उन्हें न्याय के कटघरे में लाएंगे। यह मेरी गारंटी है कि इन चारों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा। यह सब घबराहट में की गई प्रतिक्रिया है। यह सब डर है।”

पुलिस ने राहुल गांधी समेत कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को धक्का देते हुए बसों में बैठाया। इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कस्तूरबा गांधी मार्ग पर हिरासत में लिए गए राहुल गांधी और अन्य नेताओं को ले जा रही बस का टायर कथित तौर पर पंक्चर कर दिया।

इससे पहले प्रियंका गांधी प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की भारी मौजूदगी के बीच सड़क पर लेट गईं और विपक्षी नेताओं को चुनाव आयोग से मिलने की अनुमति दिए जाने तक वहां से हटने से इनकार कर दिया।

प्रियंका गांधी ने पत्रकारों से कहा, “यह है कि वे सांसदों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, जो सिर्फ चुनाव आयुक्त से मिलने की मांग कर रहे हैं।”

उन्होंने सुरक्षाकर्मियों पर सांसदों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाते हुए कहा, “पुलिसकर्मियों ने मुझे पूरी तरह खरोंच दिया है। उन्होंने हमें जमीन पर गिरा दिया। अब हम यहां से नहीं हटेंगे। उन्हें अपनी फोर्स वापस बुलाने दीजिए। मैं यहां से नहीं हटूंगी।”

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सुरक्षाकर्मियों पर लाठीचार्ज करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हम कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज बर्दाश्त नहीं करेंगे। राहुल जी और मैं बस में थे। जब राहुल जी बस से नीचे उतरे तो राहुल जी और प्रियंका जी के साथ धक्का-मुक्की शुरू हो गई। उन्होंने गुंडागर्दी की है और गुंडों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।”

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा, “जब तक हमें अपने सवालों के जवाब नहीं मिलते, हमारी आवाज मजबूत बनी रहेगी।”

वहीं, कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ पुलिस के कथित व्यवहार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि नेताओं को बसों में भरकर पुलिस थानों ले जाया गया और दुर्भाग्य से सुबह उनके खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई। उन्होंने सवाल किया कि क्या सार्वजनिक स्थानों पर जाना, धरना देना, विरोध प्रदर्शन करना या मार्च निकालना देश में गैरकानूनी है।

इससे पहले जंतर-मंतर के लिए रवाना होने से पहले राहुल गांधी ने मंगलवार को आकाशवाणी भवन के बाहर नौ घंटे से अधिक समय तक धरना देने के मामले में अपने खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ पहले से ही 45 मामले हैं और उनका “लक्ष्य 100 प्राथमिकी” का है।

मंगलवार को इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी मांगें रखने के लिए प्रदर्शन किया था। बुधवार को भी विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन जारी रखा।

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राजनीति

पिंक पास को लेकर सौरभ भारद्वाज बोले- जनता को परेशान करना इनकी आदत

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दिल्ली की बसों में महिलाओं के मुफ्त सफर के लिए पिंक पास को अनिवार्य किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि पिंक पास बनवाने के लिए महिलाओं को घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। उनका दावा है कि दिनभर लाइन में लगने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाओं के पास नहीं बन पा रहे हैं, जिससे उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जनता को परेशान करना इस सरकार की आदत बन गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले से आसानी से मिल रही सुविधाओं को भी जटिल बना दिया गया है और आम लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए सड़कों पर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि मुख्यमंत्री ने हर आसान काम और पहले से चल रही सुविधा के लिए लोगों को लाइनों में खड़ा कर दिया है।

उन्होंने नोटबंदी, एसआईआर और पिंक पास के साथ-साथ एलपीजी सिलेंडर से जुड़ी परेशानियों का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि लोगों को इतना परेशान कर दिया जाए कि वे सरकार से किसी नई सुविधा की मांग ही न करें और अपनी रोजमर्रा की परेशानियों में उलझे रहें। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली में पहले सभी महिलाएं बसों में मुफ्त सफर करती थीं और इसके लिए किसी विशेष पास की जरूरत नहीं होती थी।

उनके मुताबिक, अब पिंक पास को अनिवार्य किए जाने से महिलाओं को पास बनवाने के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली में बड़ी संख्या में महिलाओं के वोट काटे गए हैं और ऐसे में उन्हें पिंक पास की सुविधा से वंचित किया जा रहा है। वहीं, जिन महिलाओं को पास मिलने की उम्मीद है, उन्हें भी इसे बनवाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।

आप नेता ने दिल्ली में रहने वाली दूसरे राज्यों की महिलाओं को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित आसपास के राज्यों से दिल्ली आने वाली महिलाएं, जिनमें नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम और सोनीपत से आने वाली महिलाएं शामिल हैं, उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि दिल्ली में रोजगार, शिक्षा और अन्य जरूरी कामों के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं पड़ोसी शहरों से आती-जाती हैं। ऐसे में मुफ्त बस यात्रा की सुविधा से जुड़ी किसी भी नई व्यवस्था का सीधा असर इन महिलाओं पर पड़ता है। उन्होंने सरकार से व्यवस्था को सरल बनाने और महिलाओं की परेशानियों को तत्काल दूर करने की मांग की।

आम आदमी पार्टी का कहना है कि पहले से उपलब्ध मुफ्त बस यात्रा की सुविधा को आसान बनाए रखने के बजाय पिंक पास की अनिवार्यता से महिलाओं के सामने नई समस्या खड़ी हो गई है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार को महिलाओं को राहत देने के लिए व्यवस्था को सरल करना चाहिए, न कि उन्हें पास बनवाने के लिए लंबी कतारों में खड़ा करना चाहिए।

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राष्ट्रीय समाचार

पुलिस और आरएएफ के लिए बॉडी कैमरों की एसओपी पर सरकार छह महीने में ले फैसला : दिल्ली हाई कोर्ट

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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को सरकार को निर्देश दिया कि वह भीड़ को नियंत्रित करने और विरोध-प्रदर्शनों को संभालने के काम में तैनात दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों के लिए बॉडी कैमरों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को एक ‘रिप्रेजेंटेशन’ (यानी सरकार के सामने रखी गई मांग) के तौर पर ले।

एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की बेंच ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विरोध-प्रदर्शनों और भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पुलिस और आरएएफ कर्मियों द्वारा बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) बनाने पर छह महीने के भीतर फैसला ले।

हाई कोर्ट ने यह आदेश वकील चाहत राघव द्वारा दायर एक पीआईएल का निपटारा करते हुए दिया। यह पीआईएल जंतर-मंतर पर जुलाई 2026 में हुए प्रदर्शनों के बाद दायर की गई थी, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक शामिल थे।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील अखिल सिबल ने कहा कि दिल्ली पुलिस का मौजूदा सिस्टम बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है, जो घेरे के बाहर तैनात होते हैं और इसमें भीड़ को काबू करने के लिए तैनात कर्मियों की गतिविधियों की साथ-साथ रिकॉर्डिंग का कोई सही तरीका नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि बॉडी कैमरों के लिए टेक्नोलॉजी की उपलब्धता भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जवाबदेही तय करने में बहुत मददगार साबित हो सकती है।

सीनियर वकील ने तर्क दिया, “अगर टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, तो जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करने में यह बहुत काम आ सकती है। यह फेशियल रिकग्निशन से अलग है, जिसमें निगरानी (सर्विलांस) को लेकर चिंताएं होती हैं।”

केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि याचिका को एक रिप्रेजेंटेशन (अनुरोध) के तौर पर माना जा सकता है और छह महीने के भीतर फैसला बता दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले और दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों का हवाला देते हुए एएसजी शर्मा ने कहा कि पीआईएल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से पहले संबंधित अधिकारियों के सामने एक रिप्रेजेंटेशन देना जरूरी था।

केंद्र ने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पहले से ही गाइडलाइंस मौजूद हैं और मौजूदा सिस्टम में वीडियोग्राफी भी शामिल है। याचिकाकर्ता बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एसओपी बनाने की मांग करते हुए एक रिप्रेजेंटेशन दे सकता है, जिस पर कानून के अनुसार विचार किया जा सकता है।

सरकार द्वारा इस मुद्दे पर रिप्रेजेंटेशन के तौर पर विचार करने और छह महीने के भीतर अपना फैसला बताने पर सहमत होने के बाद, हाई कोर्ट ने पीआईएल का निपटारा कर दिया।

यह याचिका जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों के बाद दायर की गई थी, जिसमें छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ 50 से ज्यादा पुलिस और पैरामिलिट्री कर्मी घायल हो गए थे।

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