अंतरराष्ट्रीय
इजरायल से ईरान पर हमले रोकने के लिए कहना मुश्किल: ट्रंप
न्यूयॉर्क, 21 जून। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह भले ही संघर्ष को खत्म करने के लिए एक कूटनीतिक समाधान की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस समय इजरायल से ईरान पर हवाई हमले रोकने के लिए कहना मुश्किल होगा।
ट्रंप न्यू जर्सी में अपने गोल्फ कोर्स में एक फंडरेजर कार्यक्रम में शामिल हुए थे। स्थानीय मीडिया के हवाले से बताया कि यहां पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने ईरान के साथ कूटनीतिक रूप से जुड़ने के यूरोपीय प्रयासों को भी खारिज कर दिया।
ट्रंप ने कहा, “उन्होंने मदद नहीं की, ईरान यूरोप से बात नहीं करना चाहता। वह हमसे बात करना चाहते हैं। यूरोप इस मामले में मदद नहीं कर पाएगा।”
इससे पहले, अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने कहा कि वह इस बारे में ‘अटकलें नहीं लगा सकतीं’ कि क्या ट्रंप प्रशासन अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए ईरान और इजरायल के बीच युद्धविराम के लिए दबाव डालेगा।
ब्रूस ने शुक्रवार को एक न्यूज ब्रीफिंग में कहा, “अभी जो हो रहा है, राष्ट्रपति या विदेश मंत्री की उन वार्ताओं पर क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं इसका वर्णन नहीं करने जा रही हूं।”
इस बीच, इजरायल डिफेंस फोर्सेस (आईडीएफ) ने घोषणा की है कि शुक्रवार की सुबह 25 से अधिक इजरायली वायु सेना के लड़ाकू विमानों के हमलों में ईरान के तिबेरियास और केरमानशाह क्षेत्रों में 35 से अधिक मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च फैसिलिटी तबाह हो गई हैं।
आईडीएफ ने एक्स पोस्ट में लिखा, “आज सुबह, वायुसेना ने इंटेलिजेंस ब्रांच से मिले सटीक मार्गदर्शन के साथ ईरान के करमनशाह और तिबेरियास जैसे क्षेत्रों में ईरानी शासन के सैन्य ठिकानों के खिलाफ हमलों की एक सीरीज पूरी की। हमलों की इस सीरीज के एक हिस्से के रूप में, 25 से ज्यादा फाइटर जेट्स ने ईरान के तिबेरियास और करमनशाह क्षेत्रों में 35 से अधिक मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च फैसिलिटी पर हमला किया।”
आईडीएफ ने यह भी उल्लेख किया कि इजरायली वायुसेना ने इस्फहान और तेहरान के क्षेत्रों में कई ईरानी मिसाइल सिस्टम्स और रडार इंस्टॉलेशंस पर हमला किया, जिसका मकसद उसके एयरक्राफ्ट को निशाना बनाना और उनके ऑपरेशन को बाधित करना था।
अंतरराष्ट्रीय
ईरान के विदेश मंत्री की भारतीय और रूसी समकक्षों के साथ फोन पर बातचीत, युद्ध के हालातों पर हुई चर्चा

तेहरान, 6 अप्रैल : ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे क्षेत्रीय संघर्ष पर रूस और भारत के विदेश मंत्रियों से बातचीत की।
ईरानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयानों के अनुसार, रविवार को हुई दो अलग-अलग फोन कॉल में अरागची ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ पश्चिम एशिया की ताज़ा स्थिति और अमेरिका व इजराइल के हमलों के सुरक्षा और आर्थिक असर पर चर्चा की।
अरागची ने बताया कि पिछले 37 दिनों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के लोगों के खिलाफ कई हमले किए हैं। इनमें औद्योगिक ढांचे, फैक्ट्रियों, अस्पतालों, स्कूलों, रिहायशी इलाकों और परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया गया है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जुड़े प्रभावशाली देशों से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर जिम्मेदार रवैया अपनाएं।
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की जनता और उसकी सेना अपने देश के हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका और इजरायल के हमलों का असर पूरे क्षेत्र और दुनिया की स्थिरता और सुरक्षा पर पड़ सकता है।
वहीं, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने नागरिक इलाकों पर हो रहे “गैरकानूनी” हमलों को तुरंत रोकने की जरूरत बताई। उन्होंने खास तौर पर दक्षिणी ईरान के बुशेहर परमाणु संयंत्र पर हमलों का जिक्र किया और कहा कि इस संघर्ष को फैलने से रोकने के लिए हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने के प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध को रोकने के लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही कोशिशों का समर्थन करता है।
यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब 28 फरवरी से अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है। इसके जवाब में ईरान और उसके सहयोगी देशों ने मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल से जुड़े ठिकानों पर हमले किए हैं।
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एयू की चेतावनी : मध्य-पूर्व का संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए ‘गंभीर खतरा’

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नई दिल्ली, 6 अप्रैल : अफ्रीकी संघ (एयू) और उसके साझेदारों ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।
सिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, एक संयुक्त रिपोर्ट में एयू, संयुक्त राष्ट्र के अफ्रीका आर्थिक आयोग, अफ्रीकी विकास बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने कहा कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है और जहाजों के रास्तों, ऊर्जा और खाद (फर्टिलाइजर) की सप्लाई में जितनी ज्यादा बाधा आती है, उतना ही अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका के कई देश अभी भी कोविड से पहले वाली विकास दर तक नहीं पहुंच पाए हैं। अगर यह संघर्ष छह महीने से ज्यादा चलता है, तो साल 2026 में अफ्रीका की जीडीपी वृद्धि दर में 0.2 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
संस्थाओं ने कहा कि यह संघर्ष पहले ही व्यापार पर असर डाल चुका है और अब यह महंगाई का संकट भी बन सकता है, क्योंकि ईंधन और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, जहाजों का किराया, बीमा खर्च, मुद्रा पर दबाव और सख्त राजकोषीय स्थितियां जैसे कारण स्थिति को और खराब कर सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर परिवारों पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में बताया गया कि अफ्रीका के कुल आयात का 15.8 प्रतिशत और निर्यात का 10.9 प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व से जुड़ा है। इससे साफ है कि वहां की स्थिति का अफ्रीका पर सीधा असर पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ देशों के लिए तेल से ज्यादा बड़ा असर खाद की कमी का हो सकता है। अगर खाड़ी देशों से प्राकृतिक गैस की सप्लाई प्रभावित होती है, तो अमोनिया और यूरिया का उत्पादन घटेगा, जिससे खेती के अहम मौसम (मार्च से मई) में खाद महंगी हो जाएगी।
इसका सीधा असर खाने की कीमतों पर पड़ेगा और गरीब परिवारों के लिए भोजन जुटाना और मुश्किल हो जाएगा। इससे अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि इस संघर्ष का असर राजनीति और सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अगर यह संघर्ष बढ़ता है, तो अफ्रीका में बाहरी देशों के प्रभाव की होड़ तेज हो सकती है। सूडान, सोमालिया और लीबिया जैसे देशों में पहले से ही ऐसे संकेत दिख रहे हैं।
अंत में रिपोर्ट में कहा गया कि इस स्थिति से निपटने के लिए अफ्रीका को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी, सरकारी खर्च की स्थिति को संभालना होगा, ‘अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र’ को तेजी से लागू करना होगा और आर्थिक सुरक्षा के उपाय तैयार करने होंगे, ताकि भविष्य में ऐसे झटकों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके।
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ट्रंप का दावा: ईरान के साथ ‘गहरी’ बातचीत जारी, सैन्य ऑपरेशन जारी रखने के दिए संकेत

TRUMP
नई दिल्ली, 6 अप्रैल : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली मीडिया से कहा कि अमेरिका, ईरान के साथ संघर्ष विराम कराने के लिए “गंभीर” बातचीत कर रहा है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका इस संघर्ष को बीच में छोड़कर नहीं जाएगा।
ट्रंप ने बताया कि उनकी सरकार ईरान के साथ कई माध्यमों से संपर्क बनाए हुए है। इन कोशिशों की अगुवाई उनके सलाहकार स्टीव विटकॉफ और जैरेड कुशनर कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, बातचीत दो तरीकों से हो रही है। पहला, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देशों के जरिए अप्रत्यक्ष बातचीत। दूसरा, अमेरिकी प्रतिनिधियों और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच सीधे संपर्क।
इन मध्यस्थ देशों की कोशिश है कि दोनों पक्ष ऐसे कदमों पर सहमत हों, जिससे अमेरिका द्वारा तय की गई समय सीमा को आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, हाल ही में हुई फोन पर बातचीत से कोई खास नतीजा नहीं निकला है।
ट्रंप ने चैनल 12 से कहा कि मंगलवार की तय समय सीमा से पहले समझौता होने की “अच्छी संभावना” है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अमेरिका क्षेत्र में “कड़ी कार्रवाई” करेगा।
रविवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर “मंगलवार, रात 8:00 बजे (ईस्टर्न टाइम)” लिखा। यह संदेश इस बात का संकेत प्रतीत होता है कि ईरान द्वारा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलने के लिए दी गई समय-सीमा को संभवतः आगे बढ़ाया जा सकता है।
इससे पहले रविवार को ही ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि मंगलवार ईरान के लिए “पावर प्लांट डे और ब्रिज डे” जैसा होगा, यानी उस दिन कड़ी कार्रवाई हो सकती है। उन्होंने फिर से ईरान से स्ट्रेट खोलने को कहा।
द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने मंगलवार शाम तक स्ट्रेट नहीं खोला, तो अमेरिका उसके सभी पावर प्लांट नष्ट कर सकता है।
ट्रंप ने कहा, “यदि वे बात नहीं मानते, यदि वे इसे बंद ही रखना चाहते हैं, तो उन्हें पूरे देश में मौजूद अपने हर एक पावर प्लांट और अन्य सभी प्लांटों से हाथ धोना पड़ेगा।”
फॉक्स न्यूज से फोन पर बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ चल रहा यह संघर्ष सोमवार तक खत्म करने के लिए समझौता हो सकता है।
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