अंतरराष्ट्रीय
आईएमएफ की पहली उप प्रबंध निदेशक के रूप में ओकामोटो की जगह लेंगी गीता गोपीनाथ
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने घोषणा की है कि गीता गोपीनाथ, वर्तमान में आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री, अगले साल की शुरुआत में पहली उप प्रबंध निदेशक (एफडीएमडी) के रूप में पदभार संभालेंगी। सिन्हुआ न्यूज एजेंसी ने आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा के हवाले से कहा है कि विशेष रूप से यह देखते हुए कि महामारी ने हमारे सदस्य देशों के सामने व्यापक आर्थिक चुनौतियों के पैमाने और दायरे में वृद्धि की है, मेरा मानना है कि गीता के पास ठीक वैसी ही विशेषज्ञता है जिसकी हमें इस समय एफडीएमडी भूमिका के लिए आवश्यकता है।
जॉर्जीवा ने कहा कि वास्तव में, उनका विशेष कौशल मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में फंड में उनके वर्षों के अनुभव के साथ-साथ उन्हें विशिष्ट रूप से योग्य बनाता है। इसके लिए वह सही समय पर सही व्यक्ति हैं।
जॉर्जीवा ने यह भी कहा कि आईएमएफ की वरिष्ठ प्रबंधन टीम की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों में कुछ बदलाव किया जा रहा है। जो विशेष रूप से, एफडीएमडी निगरानी और संबंधित नीतियों का नेतृत्व करेगा।
आईएमएफ के अनुसार, गोपीनाथ 21 जनवरी, 2022 को एफडीएमडी के रूप में अपनी नई स्थिति शुरू करेंगी।
2019 की शुरूआत में मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में आईएमएफ में शामिल होने से पहले, गोपीनाथ हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन और अर्थशास्त्र के जॉन ज्वानस्ट्रा प्रोफेसर थी।
गीता ने एक बयान में कहा, “मैं आईएमएफ की अगली एफडीएमडी बनने के लिए सम्मानित और विनम्र हूं। जैसा कि महामारी ने हम पर अपनी पकड़ जारी रखी है, फंड का काम कभी भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कभी भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं रहा है।
गोपीनाथ की नई नियुक्ति अप्रत्याशित थी क्योंकि उन्होंने अक्टूबर में कहा था कि उन्होंने जनवरी 2022 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय लौटने की योजना बनाई थी।
व्यापार
भारतीय परिवार बन रहे निवेशक, बैंकों में जमा राशि में भारी बढ़ोतरी : एसबीआई रिपोर्ट

नई दिल्ली, 12 जनवरी: वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 2025 के बीच भारतीय बैंकों में जमा राशि और कर्ज की रकम लगभग तीन गुना हो गई है। इससे यह साफ होता है कि देश का बैंकिंग सिस्टम मजबूत हुआ है और कर्ज देने की प्रक्रिया फिर से तेज हुई है। सोमवार को जारी एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2015 से 2025 के दौरान बैंकों में जमा राशि 85.3 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 241.5 लाख करोड़ रुपए हो गई। वहीं, बैंकों द्वारा दिया गया कर्ज 67.4 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 191.2 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बैंकों की कुल संपत्ति देश की जीडीपी के मुकाबले बढ़कर 94 प्रतिशत हो गई है, जो पहले 77 प्रतिशत थी। इससे पता चलता है कि देश की वित्तीय स्थिति और बैंकिंग प्रणाली मजबूत हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई राज्यों में अब परिवार सिर्फ बचत ही नहीं कर रहे, बल्कि निवेश की ओर भी रुख करने लगे हैं। गुजरात, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में बैंक में जमा राशि का एक हिस्सा तेजी से शेयर बाजार और अन्य वित्तीय बाजारों की ओर जा रहा है।
लंबे समय की बात करें तो वित्त वर्ष 2005 से 2025 के बीच बैंकों में जमा राशि 18.4 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 241.5 लाख करोड़ रुपए हो गई। इसी तरह बैंकों का कर्ज 11.5 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 191.2 लाख करोड़ रुपए हो गया। इससे साफ है कि बैंकिंग प्रणाली का आकार काफी बढ़ गया है।
हालांकि, रिपोर्ट में बताया गया है कि कर्ज देने की रफ्तार जमा की तुलना में तेज रही है, जिससे कर्ज और जमा का अनुपात वित्त वर्ष 2021 में 69 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 79 प्रतिशत हो गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी बैंक भी धीरे-धीरे फिर से ज्यादा कर्ज देने लगे हैं। पहले कुछ वर्षों में उनका हिस्सा कम हो गया था, लेकिन अब उनकी आर्थिक स्थिति सुधर रही है और वे ज्यादा कर्ज देने को तैयार हैं।
वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में बैंकों में नई जमा राशि 8.6 लाख करोड़ रुपए से घटकर 8.1 लाख करोड़ रुपए रह गई, जबकि इस दौरान कर्ज बढ़कर 7.6 लाख करोड़ रुपए हो गया।
एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी बैंकों का मुनाफा बढ़ने के पीछे ब्याज से होने वाली कमाई, सरकारी बॉन्ड से लाभ और खुदरा तथा छोटे कारोबारियों को दिए गए कर्ज की अहम भूमिका रही है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वित्त वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में बैंकों का मुनाफा और बेहतर होगा। त्योहारी सीजन में बढ़ी मांग, कर्ज में तेजी, कम कैश रिजर्व रेशियो (सीआरआर) आवश्यकता से मिलने वाले फायदे और असुरक्षित व एमएफआई सेगमेंट में डिफॉल्ट के मामलों के धीरे-धीरे सामान्य होने से बैंकों को फायदा मिलेगा।
राष्ट्रीय समाचार
सरकार ने स्मार्टफोन कंपनियों से सोर्स कोड शेयर करने की खबर को बताया गलत

नई दिल्ली, 12 जनवरी: सरकार ने एक इंटरनेशनल न्यूज ऑर्गेनाइजेशन की उस रिपोर्ट को गलत बताया है, जिसमें कहा गया था कि सरकार स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों को अपना सोर्स कोड सरकार के साथ शेयर करने के लिए मजबूर करना चाहती है और इसके लिए कई सॉफ्टवेयर बदलाव करने की योजना बना रही है। इस खबर में यह भी कहा गया था कि एप्पल और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, इन न्यूज रिपोर्ट्स में न तो किसी स्मार्टफोन कंपनी का बयान दिया गया है और न ही उन उद्योग संगठनों का, जो इन कंपनियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “इन रिपोर्टों ने जानबूझकर उद्योग संगठन की बातों को नजरअंदाज किया है, जिससे साफ लगता है कि खबर को सनसनीखेज बनाने की कोशिश की गई है।”
सरकार ने कहा कि वह साइबर सुरक्षा को मजबूत करने और नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मोबाइल सुरक्षा से जुड़ा एक मजबूत और सही नियम बनाने के लिए सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जा रही है।
ये परामर्श सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सुरक्षा मानकों पर उद्योग के साथ नियमित और निरंतर संवाद का हिस्सा हैं। मंत्रालय लगातार ऐसे कदम उठा रहा है, जिससे तेजी से बदलते डिजिटल माहौल में यूजर्स की सुरक्षा बनी रहे और उनकी निजी जानकारी सुरक्षित रहे।
मंत्रालय ने बताया, “हम नियमित रूप से सुरक्षा नियमों, इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप और अनुकूलता मानकों, भारतीय भाषाओं के समर्थन, इंटरफेस की जरूरतों और सुरक्षा मानकों जैसे विषयों पर चर्चा करते हैं। इन चर्चाओं के बाद उद्योग के साथ सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से बात होती है।”
मंत्रालय ने कहा कि वह उद्योग से जुड़े लोगों के साथ मिलकर काम कर रहा है और उनकी चिंताओं को सकारात्मक तरीके से सुलझाने की कोशिश कर रहा है।
इसके तहत सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय उद्योग प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहा है, ताकि तकनीकी समस्याओं, नियमों के पालन में आने वाली दिक्कतों और दुनिया में अपनाए जा रहे अच्छे तरीकों को समझा जा सके।
मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि उद्योग द्वारा उठाई गई सभी सही और जरूरी चिंताओं पर खुले मन से विचार किया जाएगा, ताकि देश और उद्योग दोनों के हित सुरक्षित रहें।
इससे पहले, भारत के स्मार्टफोन निर्माण उद्योग ने भी सोर्स कोड शेयर करने से जुड़ी खबरों पर चिंता को कम करने की कोशिश की थी। उद्योग का कहना था कि यह मुद्दा काफी समय से चल रही बातचीत का हिस्सा है और इसका मतलब कोई नई या तुरंत लागू होने वाली नीति नहीं है।
इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) ने कहा कि सरकार और उद्योग के बीच इस विषय पर कई वर्षों से चर्चा चल रही है और इसे अचानक नीति में बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
व्यापार
कर व्यवस्था पर एशिया में सबसे ज्यादा विश्वास, भारत सबसे आगे : रिपोर्ट

INCOME TAX
नई दिल्ली, 5 जनवरी: दुनिया में कर (टैक्स) व्यवस्था को लेकर जनता का विश्वास सबसे ज्यादा एशिया में देखा गया है। इस मामले में भारत खास तौर पर आगे है, जहां लोगों में कर चुकाने की नैतिक भावना और सरकारी वित्त व्यवस्था पर भरोसा मजबूत है। सोमवार को एसीसीए, आईएफएसी, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड (सीए एएनजेड) और ओईसीडी द्वारा संयुक्त रूप से जारी एक नई रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के लगभग 45 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकार द्वारा इकट्ठा किया गया कर जनहित के कामों में खर्च होता है। वहीं 41 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कर देना उनके लिए कोई बोझ नहीं, बल्कि अपने समाज और देश के लिए योगदान है। इससे यह साफ होता है कि भारत में टैक्स को नागरिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 68 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे किसी भी हालत में टैक्स चोरी को सही नहीं ठहराएंगे, चाहे उन्हें ऐसा करने का मौका ही क्यों न मिले। यह भारत में लोगों के उच्च नैतिक मूल्यों को दिखाता है।
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि भारत में लोग पर्यावरण और समाज के लंबे समय के विकास के लिए टैक्स देने को तैयार हैं।
लगभग 80 प्रतिशत भारतीयों ने कहा कि वे टिकाऊ विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए थोड़ा या ज्यादा अतिरिक्त कर देने को भी तैयार हैं। इससे पता चलता है कि लोग कर नीति को देश और समाज के भविष्य से जोड़कर देखते हैं।
एसीसीए के भारत निदेशक मोहम्मद साजिद खान ने कहा कि भारत के नतीजे पूरे एशिया के रुझान को दिखाते हैं। एशिया में लोग कर व्यवस्था को न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जनकल्याण से जुड़ा मानते हैं। भारत में लोगों की अतिरिक्त टैक्स देने की इच्छा यह दिखाती है कि कर नीति और समाज के लक्ष्य एक दिशा में बढ़ रहे हैं।
रिपोर्ट में शामिल 29 देशों के सर्वेक्षण में पाया गया कि एशिया के लोग अपने टैक्स सिस्टम को दूसरे क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा निष्पक्ष और उपयोगी मानते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में तो लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने टैक्स को समाज के लिए योगदान माना है, न कि एक खर्च।
एसीसीए की मुख्य कार्यकारी अधिकारी हेलेन ब्रांड ओबीई ने कहा कि एशिया में कर व्यवस्था पर जनता का भरोसा पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। इस भरोसे को बनाए रखने के लिए सरकारों को लगातार ईमानदारी और पारदर्शिता दिखानी होगी।
ओईसीडी के कर नीति और प्रशासन केंद्र की निदेशक मनल कोर्विन ने कहा कि यह एशिया में कर नैतिकता पर शुरू किए गए एक नए अध्ययन का पहला चरण है।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में हम सरकारों के साथ मिलकर इन परिणामों पर चर्चा करेंगे ताकि पूरे एशिया में टैक्स सिस्टम में विश्वास के कारकों और विश्वास बढ़ाने के सर्वोत्तम तरीकों की पहचान की जा सके। इससे सरकारों को अधिक निष्पक्ष, अधिक उत्तरदायी और अधिक सुसंगत टैक्स सिस्टम तैयार करने में मदद मिलेगी।
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