राजनीति
यूपी के पहले मुख्यमंत्रियों के लिए विकास वहीं तक सीमित था जहां उनका घर था : मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूपी की पूर्ववर्ती सराकारों पर हमला करते हुए कहा कि पिछले मुख्यमंत्रियों के लिए विकास वहीं तक सीमित था, जहां उनका घर था लेकिन आज जितना पश्चिम का सम्मान है, उतनी ही पूर्वांचल के लिए भी प्राथमिकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंगलवार को 341 किमी लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया। मोदी ने पूर्वांचल एक्सप्रेस का लोकार्पण करने के बाद जनसभा को भी संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन विपक्ष को आड़े हांथों लिया। कहा कि पिछले मुख्यमंत्रियों के लिए विकास वहीं तक सीमित था जहां उनका घर था। लेकिन पूर्वांचल एक्सप्रेसवे आज यूपी की इस खाई को पाट रहा है और यूपी को जोड़ रहा है।
मोदी ने कहा कि भाजपा की सरकार आने के बाद से ही देश के दूरदराज के इलाकों को सड़कों से जोड़ा गया है। 2017 के पहले प्रदेश में राह नहीं राहजनी होती थी। बिजली कटौती लगातार होती थी पर भाजपा की सरकार आने के बाद प्रदेश विकास के रास्ते पर बढ़ रहा है और कानून व्यवस्था में भी सुधार हुआ है पर अब जिस तरह से यूपी में विकास हो रहा है उससे साफ है कि यूपी का भाग्य बदलना शुरू हो गया है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से राजनीति हुई, जिस तरह से लंबे समय तक सरकारें चलीं, उन्होंने यूपी के सर्वांगीण विकास पर ध्यान ही नहीं दिया। यूपी का यह क्षेत्र तो माफियावाद और यहां के लोगों को गरीबी के हवाले कर दिया गया था। जिस तरह से यूपी में विकास हो रहा है उससे साफ है कि यूपी का भाग्य बदलना शुरू हो गया है। पहले कितनी बिजली कटौती होती थी, कौन भूल सकता है कि यूपी में कानून व्यवस्था की क्या हालत थी, यहां मेडिकल सुविधा की क्या व्यवस्था थी। मुझे मालूम था कि जिस तरह से योगी आदित्यनाथ जी की सरकार आने से पहले वाली सरकारों ने विकास में भेदभाव किया, अपने परिवार का लाभ किया, ऐसे लोगों को यूपी के लोग रास्ते से हटा देंगे। पूर्व की सरकारों को मुझे देख कर हैरानी होती थी कि आखिर यूपी को किस बात की सजा दी जा रही है। जितनी जरूरी देश की समृद्धि है उतनी ही जरूरी देश की सुरक्षा भी है। अभी कुछ ही देर में हमारे फाइटर प्लेन इस पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर लैंड करेंगे। प्लेनों की गर्जना उनके कानों तक पहुंचेगी, जो सुरक्षा से खिलवाड़ करते रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह एक्सप्रेसवे 22 हजार करोड़ रुपये में बनकर तैयार हुआ है जो कि आने वाले समय में प्रदेश में लाखों करोड़ रुपये के निवेश का माध्यम बनेगा। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे की विशेषता सिर्फ यही नहीं है कि यह 9 जनपदों को जोड़ेगा बल्कि यह एक्सप्रेसवे लखनऊ को उन शहरों से भी जोड़ेगा, जहां विकास की असीम संभावनाएं हैं। पहले यूपी जैसे विशाल प्रदेश में एक शहर दूसरे शहर से दूर रहता था। पूर्वांचल के लोगों के लिए तो लखनऊ पहुचना भी महाभारत जीतने जैसा होता था पर अब आवागमन बेहद आसान होगा।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
खेतों से स्कूलों तक फ्रांस में बेचैनी, महंगाई से लेकर एआई तक ने बढ़ाई चिंता

भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने रविवार को दुनिया का ध्यान उन प्रदर्शनों और घटनाक्रमों की ओर दिलाया जिसका जिक्र संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने अपने उस बयान में नहीं किया था जो नई दिल्ली में हुए प्रदर्शन के खिलाफ दिया गया था। एमईए प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था से कहा कि उन्हें अपने पास के क्षेत्रों पर भी नजर दौड़ानी चाहिए। उन्होंने नाम नहीं लिया लेकिन इन पास के क्षेत्रों में से एक फ्रांस भी है, जहां पिछले कुछ दिनों से बवाल मचा हुआ है।
फ्रांस को अक्सर बेहतर जीवन स्तर, मजबूत सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा वाले देश के रूप में देखा जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से तस्वीर वैसी नहीं रही है। बच्चे अपनी शिक्षण व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं, किसान सूखे की मार से परेशान हैं, अस्पतालों में संसाधनों का दबाव है, परिवार महंगाई से जूझ रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल से रोजगार के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
फ्रांसीसी अखबार ‘ले मोंद’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में आर्थिक दबाव, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक सेवाओं की कमजोर स्थिति और राजनीतिक अनिश्चितता एक-दूसरे से जुड़कर लोगों की बेचैनी बढ़ा रहे हैं। यह असंतोष किसी एक वर्ग या समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे रहा है।
फ्रांस में हाल के दिनों में हाईस्कूल के विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शनों ने विशेष ध्यान खींचा है। विद्यार्थियों की शिकायत है कि कई स्कूलों में इमारतों की हालत खराब है, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं और अनुपस्थित शिक्षकों की जगह दूसरे शिक्षकों की व्यवस्था नहीं हो पाती।
रिपोर्ट बताती है कि, फ्रांस में माध्यमिक स्तर पर फ्रेंच भाषा की एक कक्षा में औसतन 29 विद्यार्थी होते हैं, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों का औसत 26 है। कुछ शहरी स्कूलों में एक कक्षा में 36 या उससे अधिक विद्यार्थी होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
समस्या केवल कक्षा के आकार की नहीं है। कुछ स्कूलों में छत से पानी टपकने, शौचालयों की खराब स्थिति, बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियां नहीं होने और गर्मियों में कक्षाओं का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाने की शिकायतें हैं। कई विद्यार्थियों का कहना है कि शिक्षक उपलब्ध नहीं होने के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है।
दिलचस्प बात यह है कि फ्रांस हाईस्कूल शिक्षा पर ओईसीडी के औसत से अधिक खर्च करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च माध्यमिक शिक्षा पर उसका खर्च ओईसीडी के औसत से 28 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद संसाधनों के वितरण, शिक्षकों की उपलब्धता और स्कूलों की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे यह बहस तेज हुई है कि अधिक खर्च करने के बावजूद शिक्षा व्यवस्था सभी विद्यार्थियों को समान अवसर क्यों नहीं दे पा रही है।
फ्रांस की अर्थव्यवस्था और उसकी सामाजिक पहचान में कृषि की अहम भूमिका है। लेकिन किसानों के सामने भी चुनौतियां बढ़ रही हैं। सूखा, भीषण गर्मी, जलवायु परिवर्तन और खेती में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों की बढ़ती कीमतें उनकी आय पर दबाव डाल रही हैं।
खेती के लिए जरूरी ऊर्जा, खाद और अन्य सामान महंगे होने से उत्पादन लागत बढ़ती है। दूसरी ओर, मौसम की अनिश्चितता फसल की पैदावार को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि अगली फसल से उन्हें पर्याप्त कमाई होगी या नहीं।
जलवायु परिवर्तन का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। फ्रांस में गर्मी की लहरों और जंगलों में आग की घटनाओं ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर भी सवाल उठाए हैं। बढ़ते तापमान से खेती, पानी की उपलब्धता और लोगों के स्वास्थ्य पर एक साथ दबाव पड़ सकता है।
इस तरह किसानों की परेशानी केवल कृषि नीति का विषय नहीं रह जाती। इसका संबंध खाद्य पदार्थों की कीमतों, ग्रामीण रोजगार और आम परिवारों के घरेलू बजट से भी है।
फ्रांस में परिवारों के सामने जीवनयापन की लागत एक बड़ी चिंता बन रही है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें, महंगे आवास और रोजमर्रा के खर्च लोगों की आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं।
जब आय की तुलना में जरूरी खर्च तेजी से बढ़ते हैं, तो परिवारों के पास बचत, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की योजनाओं के लिए कम पैसा बचता है। जिन लोगों की आय पहले से सीमित है, उनके लिए यह स्थिति और कठिन हो सकती है।
आर्थिक दबाव का असर केवल व्यक्तिगत जीवन पर नहीं पड़ता। जब बड़ी संख्या में परिवार भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं, तो सरकारी नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं और राजनीतिक नेतृत्व के प्रति असंतोष भी बढ़ सकता है।
तकनीकी विकास ने फ्रांस सहित दुनिया के कई देशों में उत्पादकता बढ़ाने और नए काम पैदा करने की संभावनाएं खोली हैं। लेकिन एआई के तेजी से विस्तार ने रोजगार की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी पैदा की हैं।
एआई आधारित उपकरण कई ऐसे काम कर सकते हैं, जिनके लिए पहले इंसानी श्रम की जरूरत होती थी। इससे कुछ क्षेत्रों में काम करने के तरीके बदल सकते हैं और कर्मचारियों को नए कौशल सीखने की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, कुछ नौकरियों की मांग घटने या रोजगार के स्वरूप में बदलाव आने की आशंका भी है।
वहीं, फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन अस्पतालों के कर्मचारियों पर काम का बढ़ता बोझ, संसाधनों की कमी और कामकाज की परिस्थितियों को लेकर असंतोष भी सामने आ रहा है।
जब शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं में समस्याएं एक साथ दिखाई देती हैं, तो नागरिकों के मन में यह सवाल उठता है कि सरकार उनकी बुनियादी जरूरतों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर पा रही है।
यह चुनौती ऐसे समय में और जटिल हो जाती है, जब सरकार के सामने बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज और सीमित बजट के बीच खर्च की प्राथमिकताएं तय करने का दबाव हो। एक ओर नागरिक बेहतर सेवाओं की मांग करते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार को उपलब्ध संसाधनों के भीतर कई प्रतिस्पर्धी जरूरतों का समाधान खोजना पड़ता है।
राष्ट्रीय समाचार
भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में सौदों का मूल्य 2026 की तीसरी तिमाही में दोगुने से अधिक बढ़कर 7.3 अरब डॉलर रहा

भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में 2026 की तीसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में 7.3 अरब डॉलर के 67 सौदे दर्ज किए गए। यह जानकारी सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान सौदों का कुल मूल्य तिमाही-दर-तिमाही आधार पर 129 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सौदों की संख्या मामूली रूप से 65 से बढ़कर 67 हो गई।
सौदों के मूल्य में इस तेज वृद्धि के पीछे बड़े मूल्य वाले विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए) सौदे और सार्वजनिक बाजार में पूंजी जुटाने की गतिविधियों की अहम भूमिका रही। इनमें दो बड़े आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भी शामिल थे।
आईपीओ और क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (क्यूआईपी) को छोड़कर विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए) और प्राइवेट इक्विटी/वेंचर कैपिटल (पीई/वीसी) गतिविधियों के तहत 3 अरब डॉलर के 58 सौदे हुए।
2026 की तीसरी तिमाही में एमएंडए सौदों का मूल्य पिछली तिमाही की तुलना में 54 प्रतिशत बढ़ा। साथ ही, सार्वजनिक बाजार के माध्यम से पूंजी जुटाने की गतिविधियों में मजबूती आई, वहीं पीई/वीसी निवेश में सौदों की संख्या और मूल्य, दोनों में गिरावट दर्ज की गई।
फिनटेक, बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का संयुक्त रूप से कुल सौदों की संख्या में लगभग 67 प्रतिशत योगदान रहा। यह प्रौद्योगिकी आधारित वित्तीय प्लेटफॉर्म और ऋण कारोबार में निवेशकों के लगातार बने हुए विश्वास को दर्शाता है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत में फाइनेंशियल सर्विसेज रिस्क एडवाइजरी के पार्टनर और एनबीएफसी इंडस्ट्री लीडर विवेक अय्यर ने कहा, “जैसे-जैसे पूंजी निवेश के मामले में चयनात्मक रुख बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ग्रोथ को टिकाऊ रिटर्न में बदलने की क्षमता यह तय करेगी कि किन वित्तीय कंपनियों को निवेश मिलेगा।”
उन्होंने कहा कि अधिक लागत वाले माहौल में मजबूत फंडिंग मॉडल, बेहतर यूनिट इकोनॉमिक्स और नियामकीय चुनौतियों से निपटने की क्षमता उतनी ही महत्वपूर्ण होगी, जितना कि कारोबार का विस्तार करने का अवसर।
उन्होंने आगे कहा, “भारत के वित्तीय इकोसिस्टम में विकास की अभी भी काफी संभावनाएं हैं, लेकिन अगले चरण में उन कारोबारों को फायदा होगा जो केवल तेजी से नहीं, बल्कि टिकाऊ तरीके से आगे बढ़ सकते हैं।”
2026 की तीसरी तिमाही में एमएंडए गतिविधियों के तहत 2.3 अरब डॉलर के 23 सौदे दर्ज किए गए। हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में सौदों की संख्या में 4 प्रतिशत की गिरावट आई, लेकिन एक बड़े सौदे के कारण कुल मूल्य में 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
घरेलू सौदों की कुल संख्या में 78 प्रतिशत हिस्सेदारी रही, लेकिन सौदों के कुल मूल्य में उनका योगदान केवल 9 प्रतिशत था। वहीं, विदेश से भारत में किए गए तीन सौदों का एमएंडए के कुल मूल्य में लगभग 90 प्रतिशत योगदान रहा।
विदेशों में भारतीय कंपनियों की ओर से किए गए सौदों की गतिविधियां भी धीमी रहीं। दूसरी तिमाही में ऐसे सात सौदे हुए थे, जबकि तीसरी तिमाही में इनकी संख्या घटकर दो रह गई।
राष्ट्रीय समाचार
जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग सड़क हादसों में दो लोगों की मौत, दो घायल

जम्मू-कश्मीर में सड़क हादसों की दो अलग-अलग घटनाओं में एक युवक और एक महिला की मौत हो गई, जबकि दो लोग घायल हो गए। पुलिस ने सोमवार को यह जानकारी दी।
बारामूला जिले के पट्टन इलाके में हैदरबेग के पास 10 सेक्टर के नजदीक एक डंपर की टक्कर लोड कैरियर गाड़ी से हो गई, जिसमें एक युवक की मौत हो गई और उसके पिता घायल हो गए। डंपर ट्रक ने लोड कैरियर को टक्कर मारी, जिसे अनंतनाग जिले के बिजबेहरा के रहने वाले मुर्तजा शब्बीर भट चला रहे थे।
हादसे में मुर्तजा और उनके पिता शब्बीर अहमद भट घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए ट्रॉमा हॉस्पिटल पट्टन ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने मुर्तजा को मृत घोषित कर दिया, जबकि उनके पिता को बेहतर इलाज के लिए श्रीनगर के झेलम वैली कॉलेज हॉस्पिटल रेफर कर दिया गया। पुलिस पोस्ट पलहलन ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
सोमवार को हुई एक और सड़क दुर्घटना में अनंतनाग जिले के फुर्राह मीर बाजार इलाके में एक कार की टक्कर से मोटरसाइकिल सवार एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसका पति गंभीर रूप से घायल हो गया।
इस टक्कर से बाइक सवार गंभीर रूप से घायल हो गया और उसकी पत्नी की मौके पर ही मौत हो गई। मृतक महिला की पहचान फरीदा अख्तर के तौर पर हुई है, वहीं उसका पति मोहम्मद अल्ताफ भट घायल हो गया। घायल को अस्पताल ले जाया गया है। पुलिस ने घटना का संज्ञान लिया है।
जम्मू-कश्मीर में सड़क दुर्घटनाएं सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी समस्या हैं; इस केंद्र शासित प्रदेश में आबादी के अनुपात में मौत की दर राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में कुल दुर्घटनाओं में थोड़ी कमी आई और ये 5,318 हो गईं, लेकिन सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 984 हो गई।
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