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Tuesday,13-October-2026
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होर्मुज समझौता बंद होने से 2026 में खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट की आशंका, क्रूड ऑयल की कीमत 95.74 डॉलर रहने का अनुमान: आईएमएफ

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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने मंगलवार को कहा कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने के कारण 2026 में मध्य पूर्व और मध्य एशिया क्षेत्र की अर्थव्यवस्था सिकुड़ सकती है। आईएमएफ की अक्टूबर 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ) रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि दर 2025 के 3.7 प्रतिशत से घटकर 2026 में -0.3 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि 2027 में इसके दोबारा 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है।

आईएमएफ ने कहा कि अप्रैल 2026 के अनुमान की तुलना में 2026 के लिए वृद्धि दर में 2.2 प्रतिशत अंक की कटौती की गई है, जिसकी प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने की आशंका है, जबकि उसके दोबारा खुलने के बाद 2027 में अपेक्षाकृत मजबूत रिकवरी देखने को मिल सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक असर छोटे खाड़ी तेल उत्पादक देशों पर पड़ेगा। कुवैत की अर्थव्यवस्था 2026 में 16.7 प्रतिशत, इराक की 16 प्रतिशत, कतर की 15.6 प्रतिशत और बहरीन की 11.3 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है। आईएमएफ का मानना है कि ऊर्जा उत्पादन और परिवहन में बाधाओं का इन देशों पर सबसे ज्यादा प्रभाव होगा।

हालांकि 2027 में इन देशों में तेज वापसी की संभावना जताई गई है। आईएमएफ के अनुसार, 2027 में इराक 19 प्रतिशत, कतर 18.8 प्रतिशत, कुवैत 17.1 प्रतिशत और बहरीन 13.9 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहेगा क्योंकि उसके पास निर्यात के अधिक विविध मार्ग उपलब्ध हैं। सऊदी अर्थव्यवस्था के 2026 में 3.3 प्रतिशत सिकुड़ने और 2027 में 7.9 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अर्थव्यवस्था 2026 में 3.9 प्रतिशत घट सकती है और 2027 में 7.7 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। ओमान इस रुझान से अलग रहेगा और उसके 2026 में 4.1 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है।

आईएमएफ ने ईरान की अर्थव्यवस्था के 2026 में 7.6 प्रतिशत सिकुड़ने का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य तनाव बढ़ने, नौसैनिक नाकेबंदी फिर से लागू होने और कड़े प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था दबाव में रहेगी। देश में मुद्रास्फीति 78.6 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

आईएमएफ के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल, जो दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई है, इसी मार्ग से गुजरता था। रिपोर्ट में कहा गया है कि खाड़ी देशों ने कुछ निर्यात अन्य बंदरगाहों के जरिए मोड़ा है, जबकि खाड़ी क्षेत्र के बाहर तेल उत्पादन में भी प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल की वृद्धि हुई है।

वहीं इसके साथ ही, आईएमएफ ने कहा है कि 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95.74 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है, जो 2025 के 67.74 डॉलर प्रति बैरल से काफी अधिक है। 2027 में यह कीमत घटकर 87.39 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में कच्चे तेल की कीमतों में 41 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 48 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसके प्रभाव से उर्वरक कीमतें 10 प्रतिशत और खाद्य कीमतें 5 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है।

आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा आयात पर निर्भर देश सबसे ज्यादा दबाव में रहेंगे। उन्हें ऊंचे आयात बिल, मुद्रा विनिमय दर पर दबाव, कम वास्तविक आय और सीमित राजकोषीय क्षमता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि आईएमएफ ने कहा कि ऊंची तेल कीमतों के बावजूद भारत मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र के समर्थन से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है और उसे ऊर्जा आयातक उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उन श्रेणियों से अलग रखा गया है, जिनके विकास अनुमान में कटौती की गई है।

आईएमएफ ने आगाह किया है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है या लंबे समय तक बना रहता है, तो ऊर्जा और खाद्य कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं, जिससे वैश्विक महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वित्तीय संतुलन पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय समाचार

समुद्र में एक साथ नजर आएंगे भारत और रूस की नौसेनाओं के आधुनिक युद्धापोत

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भारत और रूस की मजबूत दोस्ती को और आगे बढ़ाते हुए मंगलवार से दोनों देशों के बीच नौसैनिक अभ्यास ‘इंद्र-2026’ शुरू हो रहा है। भारतीय नौसेना के मुताबिक, यह अभ्यास मंगलवार 13 अक्टूबर से शुरू हो रहा है और 18 अक्टूबर तक जारी रहेगा। यहां दोनों देशों के आधुनिक युद्धापोत एक साथ समुद्र में नजर आएंगे।

भारतीय नौसेना का युद्धपोत आईएनएस सह्याद्रि इस अभ्यास में शामिल होने के लिए पहले ही 10 अक्टूबर को रूस के व्लादिवोस्तोक पहुंच चुका है। यही युद्धपोत द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘इंद्र-2026’ में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा। इस अभ्यास के दौरान भारत-रूस की पुरानी रक्षा साझेदारी को और अधिक मजबूती मिलेगी।

इस नौसैनिक अभ्यास का उद्देश्य भारत और रूसी नौसेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाना, एक-दूसरे के संचालन तरीकों को समझना और समुद्र में मिलकर काम करने की क्षमता को मजबूत करना है। दोनों देशों की नौसेना यहां एक-दूसरे के संचालन तरीकों को समझेंगी व समुद्र में मिलकर काम करने की क्षमता को मजबूत किया जाएगा। यहां दोनों देशों के बीच बंदरगाह से समुद्र तक तालमेल स्थापित किया जाएगा।

‘इंद्र-2026’ के तहत दो अलग-अलग चरण आयोजित किए जाएंगे। पहले चरण में बंदरगाह पर विभिन्न गतिविधियां होंगी। इस दौरान पेशेवर बातचीत और समुद्री गतिविधियों के माध्यम से दोनों नौसेनाएं अपने अनुभव साझा करेंगी। इससे संयुक्त अभियानों के दौरान बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलेगी। इसके बाद दोनों देशों की नौसेनाएं समुद्र में मिलकर अभ्यास करेंगी।

गौरतलब है कि भारतीय युद्धपोत की यह तैनाती भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा और समुद्री सहयोग का हिस्सा है। यह भारत सरकार के विजन ‘महासागर’ के अनुरूप है। इसके तहत क्षेत्र में समुद्री सहयोग और साझेदारी को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

इस बीच असाधारण युद्ध कौशल और अभियान की तैयारी का प्रदर्शन करते हुए, भारतीय सेना की शत्रुजीत ब्रिगेड ने चुनौतीपूर्ण ऊंचाई वाले क्षेत्र में गहन हवाई अभ्यास सफलतापूर्वक पूरा किया है। भारत में आयोजित इस अभ्यास से कठिन परिस्थितियों में हवाई योद्धाओं की तेजी से तैनाती, विभिन्न टुकड़ियों के बीच बेहतर तालमेल और मिशन के अनुरूप कार्रवाई करने की क्षमता की पुष्टि हुई। पल भर के नोटिस पर ही सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार शत्रुजीत के योद्धाओं ने अपनी तेज गति, सटीकता और युद्धक्षेत्र में बढ़त बनाए रखने की क्षमता को फिर साबित किया है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

खेतों से स्कूलों तक फ्रांस में बेचैनी, महंगाई से लेकर एआई तक ने बढ़ाई चिंता

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भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने रविवार को दुनिया का ध्यान उन प्रदर्शनों और घटनाक्रमों की ओर दिलाया जिसका जिक्र संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने अपने उस बयान में नहीं किया था जो नई दिल्ली में हुए प्रदर्शन के खिलाफ दिया गया था। एमईए प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था से कहा कि उन्हें अपने पास के क्षेत्रों पर भी नजर दौड़ानी चाहिए। उन्होंने नाम नहीं लिया लेकिन इन पास के क्षेत्रों में से एक फ्रांस भी है, जहां पिछले कुछ दिनों से बवाल मचा हुआ है।

फ्रांस को अक्सर बेहतर जीवन स्तर, मजबूत सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा वाले देश के रूप में देखा जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से तस्वीर वैसी नहीं रही है। बच्चे अपनी शिक्षण व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं, किसान सूखे की मार से परेशान हैं, अस्पतालों में संसाधनों का दबाव है, परिवार महंगाई से जूझ रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल से रोजगार के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

फ्रांसीसी अखबार ‘ले मोंद’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में आर्थिक दबाव, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक सेवाओं की कमजोर स्थिति और राजनीतिक अनिश्चितता एक-दूसरे से जुड़कर लोगों की बेचैनी बढ़ा रहे हैं। यह असंतोष किसी एक वर्ग या समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे रहा है।

फ्रांस में हाल के दिनों में हाईस्कूल के विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शनों ने विशेष ध्यान खींचा है। विद्यार्थियों की शिकायत है कि कई स्कूलों में इमारतों की हालत खराब है, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं और अनुपस्थित शिक्षकों की जगह दूसरे शिक्षकों की व्यवस्था नहीं हो पाती।

रिपोर्ट बताती है कि, फ्रांस में माध्यमिक स्तर पर फ्रेंच भाषा की एक कक्षा में औसतन 29 विद्यार्थी होते हैं, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों का औसत 26 है। कुछ शहरी स्कूलों में एक कक्षा में 36 या उससे अधिक विद्यार्थी होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

समस्या केवल कक्षा के आकार की नहीं है। कुछ स्कूलों में छत से पानी टपकने, शौचालयों की खराब स्थिति, बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियां नहीं होने और गर्मियों में कक्षाओं का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाने की शिकायतें हैं। कई विद्यार्थियों का कहना है कि शिक्षक उपलब्ध नहीं होने के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है।

दिलचस्प बात यह है कि फ्रांस हाईस्कूल शिक्षा पर ओईसीडी के औसत से अधिक खर्च करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च माध्यमिक शिक्षा पर उसका खर्च ओईसीडी के औसत से 28 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद संसाधनों के वितरण, शिक्षकों की उपलब्धता और स्कूलों की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे यह बहस तेज हुई है कि अधिक खर्च करने के बावजूद शिक्षा व्यवस्था सभी विद्यार्थियों को समान अवसर क्यों नहीं दे पा रही है।

फ्रांस की अर्थव्यवस्था और उसकी सामाजिक पहचान में कृषि की अहम भूमिका है। लेकिन किसानों के सामने भी चुनौतियां बढ़ रही हैं। सूखा, भीषण गर्मी, जलवायु परिवर्तन और खेती में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों की बढ़ती कीमतें उनकी आय पर दबाव डाल रही हैं।

खेती के लिए जरूरी ऊर्जा, खाद और अन्य सामान महंगे होने से उत्पादन लागत बढ़ती है। दूसरी ओर, मौसम की अनिश्चितता फसल की पैदावार को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि अगली फसल से उन्हें पर्याप्त कमाई होगी या नहीं।

जलवायु परिवर्तन का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। फ्रांस में गर्मी की लहरों और जंगलों में आग की घटनाओं ने आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर भी सवाल उठाए हैं। बढ़ते तापमान से खेती, पानी की उपलब्धता और लोगों के स्वास्थ्य पर एक साथ दबाव पड़ सकता है।

इस तरह किसानों की परेशानी केवल कृषि नीति का विषय नहीं रह जाती। इसका संबंध खाद्य पदार्थों की कीमतों, ग्रामीण रोजगार और आम परिवारों के घरेलू बजट से भी है।

फ्रांस में परिवारों के सामने जीवनयापन की लागत एक बड़ी चिंता बन रही है। ऊर्जा की ऊंची कीमतें, महंगे आवास और रोजमर्रा के खर्च लोगों की आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं।

जब आय की तुलना में जरूरी खर्च तेजी से बढ़ते हैं, तो परिवारों के पास बचत, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की योजनाओं के लिए कम पैसा बचता है। जिन लोगों की आय पहले से सीमित है, उनके लिए यह स्थिति और कठिन हो सकती है।

आर्थिक दबाव का असर केवल व्यक्तिगत जीवन पर नहीं पड़ता। जब बड़ी संख्या में परिवार भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं, तो सरकारी नीतियों, सार्वजनिक सेवाओं और राजनीतिक नेतृत्व के प्रति असंतोष भी बढ़ सकता है।

तकनीकी विकास ने फ्रांस सहित दुनिया के कई देशों में उत्पादकता बढ़ाने और नए काम पैदा करने की संभावनाएं खोली हैं। लेकिन एआई के तेजी से विस्तार ने रोजगार की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी पैदा की हैं।

एआई आधारित उपकरण कई ऐसे काम कर सकते हैं, जिनके लिए पहले इंसानी श्रम की जरूरत होती थी। इससे कुछ क्षेत्रों में काम करने के तरीके बदल सकते हैं और कर्मचारियों को नए कौशल सीखने की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, कुछ नौकरियों की मांग घटने या रोजगार के स्वरूप में बदलाव आने की आशंका भी है।

वहीं, फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन अस्पतालों के कर्मचारियों पर काम का बढ़ता बोझ, संसाधनों की कमी और कामकाज की परिस्थितियों को लेकर असंतोष भी सामने आ रहा है।

जब शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं में समस्याएं एक साथ दिखाई देती हैं, तो नागरिकों के मन में यह सवाल उठता है कि सरकार उनकी बुनियादी जरूरतों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर पा रही है।

यह चुनौती ऐसे समय में और जटिल हो जाती है, जब सरकार के सामने बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज और सीमित बजट के बीच खर्च की प्राथमिकताएं तय करने का दबाव हो। एक ओर नागरिक बेहतर सेवाओं की मांग करते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार को उपलब्ध संसाधनों के भीतर कई प्रतिस्पर्धी जरूरतों का समाधान खोजना पड़ता है।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमले की भारत ने की न‍िंदा, दो भारतीय लापता

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होर्मुज स्ट्रेट में दो जहाजों पर हमले की भारत ने कड़ी आलोचना की है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इन हमलों में दो भारतीय नाविक लापता हैं। मंत्रालय ने कहा कि इन हमलों में जहाज ‘एमटी पेट्रो डॉल्फिन’ पर सवार 11 में से 9 भारतीय नाविक सुरक्षित हैं, जबकि दो लापता हैं। ‘एमटी वाल्थेरा’ पर सवार सभी 11 भारतीय सुरक्षित हैं।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्‍स’ पर इस घटना की जानकारी साझा की।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट क्षेत्र में दो जहाजों पर हमला बेहद निंदनीय है। उन्होंने बताया क‍ि इन हमलों में दो भारतीय नाविक लापता हो गए हैं।

सिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के हमले तुरंत बंद होने चाहिए। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से समुद्री व्यापार का निर्बाध संचालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

मंत्रालय ने बताया कि जहाज ‘एमटी पेट्रो डॉल्फिन’ पर उस समय 11 भारतीय नाविक सवार थे, जब जहाज पर ड्रोन हमला हुआ। इनमें से 9 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन दो नाविक अब भी लापता हैं।

वहीं, ‘एमटी वाल्थेरा’ पर सवार 11 भारतीय सुरक्षित हैं। जहाज को किसी अज्ञात प्रोजेक्टाइल (हथियार) से निशाना बनाया गया था, लेकिन सभी भारतीय नाविक सुरक्षित बताए गए हैं।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों पर लगातार हो रहे हमले बेहद चिंताजनक हैं। इससे पहले से ही तनावपूर्ण हालात और ज्यादा बिगड़ सकते हैं।

मंत्रालय ने दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक समुद्री मार्गों पर आवाजाही की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से व्यापार का सुरक्षित व बिना किसी रुकावट के जारी रहना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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