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Tuesday,13-October-2026
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हार्ट फेलियर के मरीजों के लिए एक जैसी दवा नहीं हो सकती असरदार, नई स्टडी में खुलासा

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हार्ट फेलियर एक गंभीर बीमारी है, जिससे दुनिया भर में लाखों लोग प्रभावित हैं। यह बीमारी अस्पताल में भर्ती होने की बड़ी वजहों में से एक है। हालांकि इसके लिए दी जाने वाली दवाई हर तरह के मरीजों के लिए के फायदेमंद नहीं हो सकती।

हार्ट फेलियर में दिल शरीर की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पाता। जब दिल सही तरीके से काम नहीं कर पाता तो मरीजों को सांस लेने में परेशानी, जल्दी थकान, पैरों और टखनों में सूजन और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

हार्ट फेलियर हर मरीज में एक जैसा नहीं होता। इसका एक प्रकार ऐसा होता है जिसमें दिल की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और वह खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता। इसे हार्ट फेलियर विद रिड्यूस्ड इजेक्शन फ्रैक्शन कहा जाता है। इसके इलाज के लिए कई दवाएं लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही हैं।

वहीं, हार्ट फेलियर का एक दूसरा प्रकार भी है, जो लगभग आधे मरीजों में देखा जाता है। इसमें दिल खून को सामान्य मात्रा में पंप तो करता है, लेकिन दिल की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और ठीक से फैल नहीं पातीं। इस वजह से हर धड़कन के बीच दिल में पर्याप्त खून नहीं भर पाता। इसे हार्ट फेलियर विद प्रिजर्व्ड इजेक्शन फ्रैक्शन (एचएफपीईएफ) कहा जाता है।

डॉक्टर कमजोर दिल वाले हार्ट फेलियर के मरीजों को अक्सर बीटा-ब्लॉकर दवाएं देते हैं। ये दवाएं दिल की धड़कन को धीमा करती हैं और दिल पर पड़ने वाले दबाव को कम करती हैं। इन दवाओं से कमजोर दिल वाले मरीजों में फायदा देखा गया है और इससे अस्पताल में भर्ती होने का खतरा भी कम हो सकता है।

लेकिन क्या ये दवाएं सख्त दिल वाले मरीजों के लिए भी उतनी ही फायदेमंद हैं? इसी बात को जानने के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी स्टडी की। यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के डॉ. टिमोथी प्लांटे के नेतृत्व में किया गया और इसे जेएएमए नेटवर्क ओपन में प्रकाशित किया गया।

शोधकर्ताओं ने टॉपकैट स्टडी के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जो अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा समर्थित एक बड़ा क्लिनिकल ट्रायल था। इसमें शामिल करीब 80 प्रतिशत मरीज बीटा-ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे। इससे शोधकर्ताओं को दवा लेने वाले और दवा न लेने वाले मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों की तुलना करने का मौका मिला।

स्टडी के नतीजे कुछ चौंकाने वाले रहे। शोधकर्ताओं ने पाया कि सख्त दिल वाले मरीज जो बीटा-ब्लॉकर ले रहे थे, उनमें हार्ट फेलियर बिगड़ने की वजह से अस्पताल में भर्ती होने का खतरा 74 प्रतिशत तक ज्यादा देखा गया।

इसका मतलब यह नहीं है कि बीटा-ब्लॉकर हर मरीज के लिए नुकसानदायक हैं, लेकिन यह जरूर संकेत मिलता है कि जो दवाएं कमजोर दिल वाले मरीजों के लिए फायदेमंद हैं, जरूरी नहीं कि वही दवाएं सख्त दिल वाले मरीजों के लिए भी काम करें।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे एक कारण यह हो सकता है कि एचएफपीईएफ में दिल पहले से ही ठीक से रिलैक्स नहीं कर पाता। बीटा-ब्लॉकर दिल की गति को धीमा करते हैं, जिससे कुछ मरीजों में दिल के अंदर दबाव बढ़ सकता है। इससे शरीर में पानी जमा होने, सांस फूलने और सूजन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि मरीज अपनी मर्जी से बीटा-ब्लॉकर दवा बंद न करें। कई लोग इन दवाओं का इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित दिल की धड़कन, हार्ट अटैक के बाद सुरक्षा या अन्य कारणों से करते हैं। दवा में कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए।

यह अध्ययन हार्ट फेलियर के एचएफपीईएफ प्रकार के लिए नए और बेहतर इलाज खोजने की जरूरत पर जोर देता है।

राजनीति

आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए लगातार उठाता रहेगा कदम : वित्त मंत्री

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रुपए में गिरावट पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की प्राथमिकता घरेलू मुद्रा के किसी स्तर का बचाव करना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित माहौल तैयार करना है।

राष्ट्रीय राजधानी में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में उन्होंने कहा कि वैश्विक कारणों के चलते रुपए पर दबाव के बीच केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए लगातार कदम उठाता रहेगा।

उन्होंने कहा, “आरबीआई रुपए में स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने नियामक उपायों के जरिए अहम कोशिशें कर रहा है। वे रुपए को किसी खास स्तर पर बनाए करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।”

सीतारमण ने कहा, “आगे भी इसी तरह के उपाय जारी रहेंगे।”

उनका यह बयान तब आया है जब हाल ही में भारतीय रुपए में गिरावट के बाद मुद्रा बाजार को स्थिर करने के लिए केंद्रीय बैंक ने कई कदम उठाए थे।

इससे पहले अक्टूबर में, केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक खास डॉलर लिक्विडिटी विंडो खोली थी, कैंसल किए गए फॉरेन-एक्सचेंज डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से बुक करने के नियमों को कड़ा किया था और बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर वाले कुछ डेरिवेटिव ट्रांजैक्शन की लिमिट को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया था।

हालांकि, इन उपायों से मार्केट को भरोसा मिला और रुपया मजबूत होकर 94.50 प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया है।

वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि नीति-निर्माता राजकोषीय अनुशासन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार के जरिए मजबूत व्यापक आर्थिक आधार बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि हाल ही में मुद्रा में आई ज्यादातर कमजोरी ऐसे कारणों से है जो भारत के नियंत्रण से बाहर हैं।

उन्होंने कहा, “पिछले डेढ़ साल में रुपए की कीमत में काफी गिरावट आई है और इसे रोकने के लिए उपाय किए गए हैं।”

उनके अनुसार, “लेकिन इसके पीछे कई कारण हैं और मेरा मानना ​​है कि उनमें से ज्यादातर देश के बाहर की चुनौतियों से जुड़े हैं।”

मंगलवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया 77 पैसे मजबूत होकर 95.05 पर पहुंच गया।

भारत की आर्थिक मजबूती पर भरोसा जताते हुए मंत्री ने कहा कि केंद्रीय बैंक सतर्क रहेगा और अगर जरूरत पड़ी तो मुद्रा बाजार में अस्थिरता को रोकने के लिए अतिरिक्त कदम उठाएगा।

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राष्ट्रीय समाचार

भारत को बढ़ती ऊर्जा मांग के चलते तेजी से बढ़ानी होगी कोयला आधारित क्षमता: सीईए चेयरमैन

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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के चेयरमैन घनश्याम प्रसाद ने मंगलवार को कहा कि भारत को अपनी तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग को बनाए रखने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी के विस्तार के साथ पहले लगाए गए अनुमान से अधिक कोयला आधारित ऊर्जा क्षमता को तैयार करना होगा।

इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम में सीईए प्रमुख ने कहा कि मांग के रुझानों की वजह से नीति निर्मताओं को आने वाले दशक में भरोसेमंद बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोयले से बिजली बनाने की क्षमता बढ़ाने के पैमाने पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, सरकार ने पिछले साल अनुमान लगाया था कि 2035 तक देश की कोयले से चलने वाली बिजली उत्पादन क्षमता में 97 गीगावाट की बढ़ोतरी होगी, जिससे कुल स्थापित कोयला आधारित ऊर्जा क्षमता लगभग 307 गीगावाट हो जाएगी।

हालांकि, बिजली की खपत में उम्मीद से ज्यादा तेजी से हो रही बढ़ोतरी भविष्य की जरूरतों को काफी बढ़ा सकती है।

प्रसाद ने कहा, “मांग बढ़ रही है और जैसे-जैसे मांग बढ़ती है, हमें उस मांग को पूरा करने के लिए आपूर्ति के स्थिर स्रोतों की जरूरत है।”

प्रसाद के अनुसार, कोयले से चलने वाली अतिरिक्त क्षमता की जरूरतें पहले के अनुमानों से ज्यादा हो सकती हैं और मौजूदा विस्तार योजनाओं के अलावा 105 गीगावाट से 150 गीगावाट तक पहुंच सकती हैं।

उनका यह बयान उस चुनौती को दिखाता है जिसका सामना भारत कर रहा है, क्योंकि देश तेजी से बढ़ती बिजली की खपत और साफ ऊर्जा की ओर बढ़ने के अपने लंबे समय के लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

प्रसाद ने कहा कि इस साल बिजली की मांग में काफी तेजी आई है और रोजाना की पीक डिमांड पिछले साल के मुकाबले 45 गीगावाट से 50 गीगावाट ज्यादा रही है।

इसके अलावा, मानसून के मौसम में कम बारिश की वजह से पनबिजली उत्पादन भी कम हुआ है, जिससे सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए थर्मल पावर प्लांट पर निर्भरता बढ़ गई है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में बिजली की कमी बढ़कर 560 मिलियन किलोवाट-घंटे हो गई, जो अगस्त 2023 के बाद सबसे ज्यादा स्तर था और यह तब हुआ जब कोयले से चलने वाले पावर प्लांट से बिजली का उत्पादन ज्यादा था।

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राष्ट्रीय समाचार

जम्मू-कश्मीर : डोडा में गाड़ी पलटने से चार लोग घायल, दो महिलाएं भी शामिल

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जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में सड़क हादसे में कम से कम चार लोग घायल हो गए। अधिकारियों ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी।

अधिकारियों ने बताया कि जिले के भल्ला इलाके में शेनाई के पास एक गाड़ी के पलटने से उसमें सवार चार लोग घायल हो गए, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “अभी-अभी डोडा से भदरवाह जा रही एक मिनी-बस के साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण सड़क हादसे के बारे में पता चलने पर डोडा के डीसी कृष्ण लाल से बात की।”

मंत्री ने कहा, “घायल यात्रियों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया है और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है। अच्छी बात यह है कि किसी की मौत नहीं हुई है। हर जरूरी मदद दी जा रही है। मेरा कार्यालय जिला प्रशासन के संपर्क में है।”

घायलों की पहचान; आशिक हुसैन (35), पिता गुलाम रसूल (भदरवाह के गोठा के निवासी); मोहम्मद जावेद (48), पिता तालिब हुसैन और उनकी पत्नी रुबीना बेगम (46) (दोनों भल्ला के ब्रासू के निवासी); और इंशा (35), पत्नी राशिद अहमद (भदरवाह की निवासी); के रूप में हुई है।

इस बीच, पुलिस ने घटना का संज्ञान लिया है और आगे की जानकारी की पुष्टि की जा रही है।

जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी जिलों (जैसे रामबन, डोडा, किश्तवाड़, उधमपुर और बड़गाम के कुछ हिस्सों) में सड़क हादसे मुश्किल भौगोलिक स्थिति, खराब मौसम और मानवीय या बुनियादी ढांचे से जुड़ी वजहों से होते हैं।

खतरनाक इलाके, खराब सड़क बनावट, संकरी सड़कें, तीखे मोड़, खड़ी ढलान और कम दृश्यता के कारण पहाड़ी हाईवे और लिंक रोड पर गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाता है।

जरूरी सुरक्षा सुविधाओं जैसे क्रैश बैरियर, पैरापेट वॉल और सही सड़क संकेतों की कमी के कारण अक्सर छोटी-मोटी लापरवाही भी गहरी खाइयों में गिरने जैसे जानलेवा हादसों में बदल जाती है।

मानसून की बारिश, बर्फ पिघलने और घने कोहरे के कारण अक्सर भूस्खलन, चट्टानें खिसकने और सड़क की सतह खराब होने जैसी घटनाएं होती हैं, जिससे पकड़ और दृश्यता बहुत कम हो जाती है।

जुलाई और मानसून के महीनों में हादसों में काफी बढ़ोतरी होती है क्योंकि गीली सड़कों और कीचड़ के कारण गाड़ी पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है।

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