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Wednesday,30-September-2026
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चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 16 अप्रैल को सुनवाई करेगा

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नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 16 अप्रैल को सुनवाई करेगा। इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए गठित समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया है।

एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए सुनवाई का अनुरोध किया।

भूषण ने मामले की प्राथमिकता के आधार पर किसी अन्य दिन सुनवाई करने का आग्रह किया क्योंकि आज सूचीबद्ध मामले पर न्यायालय के व्यस्त कार्यक्रम के कारण सुनवाई होने की संभावना नहीं है। भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने में अधिक समय नहीं लगेगा।

इसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई 16 अप्रैल के लिए निर्धारित कर दी और कहा कि अदालत उस दिन न्यूनतम अत्यावश्यक सुनवाई सुनिश्चित करेगी, ताकि मामले की सुनवाई अदालत की कार्यवाही के आरंभ में की जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और जया ठाकुर (मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस कमेटी की महासचिव), संजय नारायणराव मेश्राम, धर्मेंद्र सिंह कुशवाह, अधिवक्ता गोपाल सिंह द्वारा अधिनियम पर रोक लगाने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत में याचिकाएं दायर की गईं।

याचिकाओं में चुनाव आयुक्त कानून को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्तों और अन्य चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति के लिए चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया था।

याचिकाओं में कहा गया है कि अधिनियम के प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि वे भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के सदस्यों की नियुक्ति के लिए “स्वतंत्र तंत्र” प्रदान नहीं करते हैं।

याचिकाओं में कहा गया है कि अधिनियम भारत के मुख्य न्यायाधीश को ईसीआई के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया से बाहर रखता है, जो शीर्ष अदालत के 2 मार्च, 2023 के फैसले का उल्लंघन है, जिसमें आदेश दिया गया था कि ईसीआई के सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, सीजेआई और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति की सलाह पर की जाएगी, जब तक कि संसद द्वारा कानून नहीं बनाया जाता।

याचिकाओं में कहा गया है कि इस प्रक्रिया से मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने से सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय कमजोर हो जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री और उनके द्वारा मनोनीत व्यक्ति हमेशा नियुक्तियों में “निर्णायक कारक” होंगे।

याचिकाओं में विशेष रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 और 8 को चुनौती दी गई है। ये प्रावधान ईसीआई सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं।

उन्होंने केंद्र से यह निर्देश मांगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाए, जिसमें वर्तमान में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।

इस अधिनियम ने निर्वाचन आयोग (निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तें तथा कार्य संचालन) अधिनियम, 1991 का स्थान लिया।

राष्ट्रीय समाचार

आठ सरकारी विभागों पर 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया: कर्नाटक ठेकेदार संघ

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कर्नाटक राज्य ठेकेदार संघ ने बुधवार को आरोप लगाया कि आठ सरकारी विभागों में लगभग 38,000 करोड़ रुपए का भुगतान बकाया है। संघ ने चेतावनी दी कि अगर नवंबर तक बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो वे कमीशन के तौर पर ली गई रिश्वत से जुड़े दस्तावेज जारी करेंगे। संघ ने यह भी आरोप लगाया है कि उनके फंड का इस्तेमाल कांग्रेस सरकार की गारंटी योजनाओं के लिए किया गया है।

एसोसिएशन ने यह भी दावा किया है कि जिन ठेकेदारों ने कमीशन दिया, उनके बिलों के भुगतान को प्राथमिकता दी जा रही थी।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एसोसिएशन के अध्यक्ष आर. मंजूनाथ ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार की तुलना में ठेकेदारों से मांगे जाने वाले कमीशन में बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने दावा किया कि ठेकेदारों के बकाया भुगतान का इस्तेमाल राज्य सरकार की गारंटी योजनाओं के लिए किया जा रहा है।

मंजूनाथ ने कहा कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने पहले ठेकेदारों को भरोसा दिलाया था कि उनके बकाया बिल 30 जून तक चुका दिए जाएंगे लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपना वादा पूरा करने में नाकाम रही।

उन्होंने ठेकेदारों की चिंताओं को संभालने के तरीके को लेकर कांग्रेस सरकार की आलोचना भी की। उन्होंने पिछली भाजपा सरकार के खिलाफ 40 प्रतिशत कमीशन के आरोपों को लेकर एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष केम्पाना के नेतृत्व में हुए आंदोलन का भी जिक्र किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद भी हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका।अध्यक्ष ने कहा कि शिवकुमार और पीडब्ल्यूडी मंत्री सतीश जारकीहोली ने आंदोलन के दौरान ठेकेदारों से मुलाकात की थी और भरोसा दिलाया था कि कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद सभी बकाया भुगतान कर दिए जाएंगे।

मंजूनाथ ने सरकार से आग्रह किया कि ठेकेदारों के बिलों के लिए तय फंड का इस्तेमाल गारंटी योजनाओं के लिए न किया जाए। उन्होंने कहा कि गारंटी योजनाओं से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। सरकार को दूसरे स्रोतों से फंड का इंतजाम करना चाहिए और हमारा पैसा जारी करना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार नवंबर तक बकाया भुगतान जारी नहीं करती है, तो एसोसिएशन कथित कमीशन भुगतान से जुड़े दस्तावेज जारी करेगी।

एसोसिएशन ने जिला स्तर पर अपने आंदोलन को तेज करने की योजना की भी घोषणा की। मंजूनाथ ने कहा कि अगर शिवकुमार उनके साथ बैठक नहीं बुलाते हैं, तो ठेकेदार डिप्टी कमिश्नर के कार्यालयों तक पदयात्रा करेंगे और ज्ञापन सौंपेंगे। एक और मुद्दा उठाते हुए मंजूनाथ ने कर्नाटक वन विभाग द्वारा 13बी और 13सी प्रावधानों के तहत काम सौंपने की प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगाया।

उन्होंने दावा किया कि सैकड़ों करोड़ रुपए के काम अधिकारियों को सौंपे गए थे और कहा कि एसोसिएशन के पास पिछले चार वर्षों में इस प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि वन मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने हाल ही में इस प्रथा को रोक दिया था और बताया कि 13बी और 13सी प्रावधानों में टेंडर के जरिए काम देने के बजाय सीधे काम सौंपने की व्यवस्था थी।

मंजूनाथ ने कहा कि जब टेंडर निकाले जाते थे, तो अक्सर कॉन्ट्रैक्टरों को यह पता नहीं होता था कि फंड मंजूर हुआ है या नहीं। साथ ही, उन्होंने दावा किया कि अगर स्थानीय कॉन्ट्रैक्टर इसमें हिस्सा नहीं लेते, तो दूसरे राज्यों के ज्यादा मजबूत आर्थिक स्थिति वाले कॉन्ट्रैक्टर ये काम हासिल कर सकते थे।

उन्होंने दावा किया कि पेमेंट में देरी की वजह से पिछले चार-पांच सालों से लगभग 1.5 लाख कॉन्ट्रैक्टर आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।

मंजूनाथ ने कहा कि पीडब्ल्यूडी मंत्री सतीश जारकीहोली कॉन्ट्रैक्टरों के मददगार रहे हैं और पीडब्ल्यूडी उन्हें कुछ राहत दे रहा है। उन्होंने कहा कि मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा भी एसोसिएशन का सहयोग कर रहे हैं।

कॉन्ट्रैक्टरों की एसोसिएशन बकाया बिलों को लेकर कांग्रेस सरकार के साथ लंबे समय से विवाद में उलझी हुई है।

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राष्ट्रीय समाचार

कर्नाटक: सौजन्या मामले में न्याय सुनिश्चित करेगी सरकार, एसआईटी अधिकारी ने मांगा तबादला

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कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने बुधवार को कहा कि सरकार सौजन्या के परिवार या किसी अन्य की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहती और 2012 के कथित धर्मस्थल सामूहिक दुष्कर्म एवं हत्या मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी बीच मामले की नए सिरे से जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) में शामिल बेंगलुरु ग्रामीण के एएसपी वेंकटेश प्रसन्ना ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर टीम से खुद को मुक्त करने का अनुरोध किया है।

कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद 24 सितंबर को मामले की नए सिरे से जांच के लिए पांच सदस्यीय एसआईटी का गठन किया था। इसकी अध्यक्षता आईजीपी एन. शशिकुमार को सौंपी गई है। टीम में मंगलुरु सिटी के पुलिस आयुक्त सी.एच. सुधीर कुमार रेड्डी, इंटेलिजेंस एसपी निशा जेम्स, सीआईडी एसपी लोकेश जगलसर और बेंगलुरु ग्रामीण के एएसपी वेंकटेश प्रसन्ना शामिल हैं।

एसआईटी के गठन के बाद कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और सौजन्या के परिवार के सदस्यों ने टीम में शामिल कुछ अधिकारियों को लेकर आपत्ति जताई थी। खासतौर पर एएसपी वेंकटेश प्रसन्ना की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए और उनके खिलाफ आरोप लगाए गए। इसके बाद प्रसन्ना ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर विशेष जांच दल से उन्हें मुक्त करने का अनुरोध किया है।

इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा कि एसआईटी का गठन मामले की निष्पक्ष और उचित जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है और सरकार की किसी को नुकसान पहुंचाने की कोई मंशा नहीं है।

उन्होंने कहा, “एसआईटी का गठन बेहतरीन इरादे से किया गया था। हमारी किसी के खिलाफ बुरी मंशा नहीं है और न ही किसी को नुकसान पहुंचाने का कोई इरादा है। एसआईटी के गठन के बाद कुछ लोगों, खासकर परिवार के सदस्यों ने आपत्तियां जताई हैं। यह बात मेरे संज्ञान में लाई गई है।”

खड़गे ने कहा कि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य मामले को उसके निष्कर्ष तक पहुंचाना, सच्चाई सामने लाना और न्याय सुनिश्चित करना है।

उन्होंने कहा, “हम किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते। हमारा उद्देश्य है कि इस मामले में निष्कर्ष निकले, आखिरकार सच्चाई सामने आए और न्याय सुनिश्चित हो।”

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर जनता और परिवार की ओर से उठाई गई चिंताओं पर सरकार विचार करने के लिए तैयार है।

उन्होंने कहा, “अगर जनता और परिवार को कुछ अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर कोई आपत्ति है तो सरकार उसे भी जांचने के लिए तैयार है। आखिरकार हम लोगों के लिए हैं। इस मामले में हमारा कोई कठोर रुख नहीं है। हम उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकते। हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार कार्रवाई करेंगे।”

सौजन्या मामले में नए सिरे से एसआईटी जांच सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद शुरू हुई है, जिसमें मामले की दोबारा जांच की मांग वाली याचिका पर निर्देश दिए गए थे। एसआईटी को जांच पूरी कर सक्षम अदालत के समक्ष रिपोर्ट सौंपने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।

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राजनीति

‘इंडिया’ ब्लॉक की अहम बैठक से अखिलेश यादव रहे नदारद, कांग्रेस और तृणमूल ने गैरहाजिरी को सामान्य बताया

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‘इंडिया’ ब्लॉक की बुधवार को हुई बैठक में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए। विपक्षी गठबंधन की एकजुटता को लेकर हो रही चर्चा के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद सौगत रॉय और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि सपा नेता के पहले से तय जरूरी काम थे।

बैठक में अखिलेश यादव के शामिल न होने के बारे में पूछे जाने पर रॉय ने कहा कि सपा प्रमुख ने गठबंधन को पहले ही बता दिया था कि वे लखनऊ में ही रहेंगे।

रॉय ने आईएएनएस को बताया, “हां, हमें यह पता है। अखिलेश यादव ने हमें पहले ही बता दिया था कि वे आज लखनऊ में रामगोपाल यादव का नॉमिनेशन फाइल करने के लिए मौजूद रहेंगे।”

बैठक को एक सकारात्मक पहल बताते हुए तृणमूल सांसद ने कहा, “यह कम समय में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक आयोजित करने की कोशिश है, जो एक अच्छी बात है।”

कांग्रेस नेता राजेंद्रपाल गौतम ने कहा कि बैठक में शामिल होने या किसी प्रतिनिधि को भेजने का फैसला अखिलेश यादव को करना है। साथ ही, उन्होंने जोर दिया कि उनकी पार्टी विपक्षी गठबंधन को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

गौतम ने कहा, “यह अखिलेश यादव को तय करना है कि ‘इंडिया’ गठबंधन का क्या महत्व है और इसे कितना महत्व देना है। वे खुद शामिल हों या अपने प्रतिनिधि को भेजें, यह उनका अधिकार है।”

उन्होंने कहा, “हमारा मकसद यह है कि ‘इंडिया’ गठबंधन मजबूत बना रहे, देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा हो और गठबंधन में शामिल सभी पार्टियों का सम्मान किया जाए, जो हम कर रहे हैं।”

अखिलेश की गैर-मौजूदगी ऐसे समय में हुई है जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच रिश्तों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दोनों पार्टियों के बीच चुनावों के लिए सीट-शेयरिंग पर अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है, जिससे राज्य में उनके चुनावी तालमेल के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में ‘इंडिया’ ब्लॉक के तहत मिलकर चुनाव लड़ा था और गठबंधन ने भाजपा को संयुक्त चुनावी चुनौती दी थी। अब आगामी विधानसभा चुनावों के लिए उनके तालमेल पर बारीकी से नजर रखी जा रही है क्योंकि दोनों पार्टियां अगले चुनावी मुकाबले की तैयारी कर रही हैं।

दिल्ली में ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) और चुनाव आयोग को लेकर विपक्षी दलों की चिंताओं पर चर्चा करने के लिए हो रही है। कई सहयोगी दलों के नेता बैठक में शामिल हो रहे हैं और इस मुद्दे पर एक समन्वित राजनीतिक प्रतिक्रिया पर चर्चा कर रहे हैं।

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