महाराष्ट्र
महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ मनोज जारांगे-पाटिल के विस्फोटक दावे: ‘कुछ मंत्री मराठों के खिलाफ काम कर रहे हैं’; कहा, ’13 जुलाई के बाद नामों का खुलासा करेंगे’
महाराष्ट्र: अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के एक कार्यकर्ता लक्ष्मण हेक द्वारा जालना के वाडिगोदरी गांव में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करने के नौ दिन बाद, यह मांग करते हुए कि ओबीसी कोटा मराठा आरक्षण से अप्रभावित रहेगा, मराठा कार्यकर्ता मनोज जारांगे-पाटिल ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने शुक्रवार को दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा करने की कोशिश का आरोप लगाया।
जारांगे ने दावा किया कि सरकार संघर्ष और दंगे भड़काने की कोशिश कर रही है, यह सुझाव देते हुए कि कुछ मंत्री मराठा के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं और समुदाय को आगामी विधानसभा चुनावों में एक स्टैंड लेने की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ने के लिए 127 विधानसभा सीटों की पहचान की गई है।
सरकार के फैसले से समुदायों के भीतर अशांति फैल गई
राज्य सरकार ने जारांगे-पाटिल से वादा किया था कि वह 10 दिन पहले जालना के अंतरवाली सारथी गांव में अपनी भूख हड़ताल फिर से शुरू करने के बाद एक महीने के भीतर रक्त रिश्तेदारों या ऋषि-सोयारे को कुनबी प्रमाण पत्र देने के लिए अंतिम अधिसूचना जारी करेगी।
इस आश्वासन से ओबीसी में अशांति फैल गई, जिन्हें डर था कि इससे मराठा पिछले दरवाजे से ओबीसी कोटा तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं। अनुभवी ओबीसी नेता छगन भुजबल और समुदाय के अन्य लोग मराठों को सरकार की रियायतों से नाखुश हैं, जो पिछले साल शुरू हुए जारांगे-पाटिल के विरोध प्रदर्शन की प्रतिक्रिया है।
समुदाय को खुश करने के सरकार के प्रयासों के बावजूद, ये कार्य हाल के लोकसभा चुनावों में वोटों में परिवर्तित नहीं हुए। अब, हेक के चल रहे विरोध ने मामले को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे दोनों समूहों के बीच राजनीतिक संघर्ष पैदा हो गया है।
एचटी से बात करते हुए एक बीजेपी नेता ने कहा कि हेक के विरोध से राज्य सरकार को मराठों के लिए कुनबी प्रमाणपत्रों की अधिसूचना में देरी करने का कारण मिल सकता है, जिससे उनके पारंपरिक ओबीसी वोट बैंक की रक्षा होगी, यह देखते हुए कि मराठों ने चुनावों में उनका समर्थन नहीं किया था।
राज्य सरकार के ख़िलाफ़ जारांगे के विस्फोटक दावे
जारांगे-पाटिल ने आरोप लगाया है कि दो मराठों समेत नौ मंत्री मराठा हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं. उन्होंने सरकार के लिए अधिसूचना जारी करने के लिए 13 जुलाई की समय सीमा की घोषणा की, जिसके बाद वे इन मंत्रियों के नामों का खुलासा करेंगे और अपने अगले कदम की रणनीति बनाएंगे, विधानसभा चुनावों में 127 निर्वाचन क्षेत्रों को जीतने का विश्वास का दावा करेंगे। उन्होंने हेक के विरोध को ‘प्रायोजित’ कहकर खारिज कर दिया और जमीनी स्तर पर मराठों और ओबीसी के बीच ऐतिहासिक सौहार्दपूर्ण संबंधों पर जोर दिया और जोर देकर कहा कि वे किसी को भी उन्हें विभाजित नहीं करने देंगे।
जारंगे-पाटिल ने तर्क दिया कि मराठों को 1884 से कुनबी के रूप में आरक्षण मिल रहा है, सतारा और बॉम्बे गजट में ऐतिहासिक रिकॉर्ड यह साबित करते हैं, जबकि ओबीसी को आजादी के बाद आरक्षण दिया गया था। उन्होंने सरकार से ओबीसी को यह समझाने का आग्रह किया कि मराठों को कोटा में शामिल करने से उनके अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता है।
हेक ने जारांगे-पाटिल के दावों का खंडन किया
हेक ने जारांगे-पाटिल के दावों का प्रतिवाद करते हुए कहा कि वे निराधार हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ओबीसी समुदाय को राज्य के बजट का एक प्रतिशत से भी कम प्राप्त करके हाशिए पर रखा गया है, जबकि राजनीतिक और आर्थिक शक्ति काफी हद तक मराठा समुदाय के पास है, जो महाराष्ट्र में 90% चीनी मिलों को नियंत्रित करता है। हेक के कठोर शब्दों ने ओबीसी समुदाय की हताशा और दर्द को प्रतिबिंबित किया, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक संसाधनों में मराठों के प्रभुत्व को उजागर किया।
महाराष्ट्र
नीट प्रोटेस्ट पर दिविजा फडणवीस की अपील-प्रदर्शनकारी शिक्षा सुधार का करें समर्थन, राजनीति का नहीं

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की बेटी दिविजा फडणवीस ने नीट और शिक्षा सुधारों को लेकर देशभर में चल रहे प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए लोगों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन का समर्थन करने, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल या उसकी विचारधारा का बिना सोचे-समझे समर्थन न करने की अपील की।
दिविजा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में लिखा कि उनसे कई बार इन प्रदर्शनों पर अपनी राय देने के लिए कहा गया। ऐसे में उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर हिंसा और पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हिंसा, दोनों की अनुमति नहीं होनी चाहिए।”
उन्होंने लिखा कि लोग शिक्षा सुधारों की मांग का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन जिस राजनीतिक दल या विचारधारा के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है, उसका आंख मूंदकर समर्थन नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन का समर्थन करने से पहले उसके वास्तविक उद्देश्य को समझना जरूरी है।
दिविजा फडणवीस ने लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एक मजबूत विपक्ष का उद्देश्य देश के हित में काम करना होना चाहिए। विपक्ष को सरकार को बेहतर फैसले लेने में मदद करनी चाहिए, न कि केवल सत्ता पक्ष को बदनाम कर उसका विरोध करना चाहिए।
उन्होंने सोशल मीडिया पर चलने वाले ट्रेंड्स को लेकर भी लोगों को सावधान रहने की सलाह दी। उन्होंने लिखा कि सिर्फ इसलिए किसी आंदोलन का हिस्सा न बनें, क्योंकि वह सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। किसी भी विचारधारा के प्रभाव में आए बिना सोच-समझकर फैसला लें।
दिविजा ने कहा कि जब तक आंदोलन छात्रों के हित, शिक्षा सुधार, नीट, पेपर लीक और एनटीए से जुड़े मुद्दों तक सीमित रहता है, तब तक यह उचित है। लेकिन जैसे ही आंदोलन धर्म या इन मुद्दों से बाहर के विषयों की ओर मुड़ता है, उसके इरादे बदल जाते हैं। ऐसे में लोगों को सतर्क रहना चाहिए।
महाराष्ट्र
धोखाधड़ी की एफआईआर के बाद एक्शन में एमएचएडीए और बीएमसी: मडियार मेंशन की एनओसी रद्द, ‘स्टॉप वर्क’ नोटिस जारी

मुंबई: धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज होने के बाद म्हाडा (एमएचएडीए) और बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने मांडवी डिवीजन स्थित ‘मडियार मेंशन’ इमारत पर बड़ा शिकंजा कसा है। म्हाडा ने इस परियोजना को जारी की गई अपनी अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) रद्द कर दी है, वहीं बीएमसी के बिल्डिंग प्रपोजल विभाग ने निर्माण कार्य पर रोक लगाते हुए ‘स्टॉप वर्क नोटिस’ जारी कर दिया है।
म्हाडा के सख्त निर्देश
म्हाडा द्वारा जारी आधिकारिक आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
इस संबंधित परियोजना को भविष्य में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक अनुमति, संशोधन या मंजूरी प्रदान नहीं की जाएगी।
किसी भी कानूनी या प्रशासनिक जटिलता से बचने के लिए निर्माण स्थल पर चल रहे सभी कार्यों को तत्काल प्रभाव से रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
ध्यान देने योग्य बात: मामले में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, निर्माण स्थल पर सातवें माले (ग्राउंड + 7) का निर्माण कार्य जारी रखा गया था।
फर्जी दस्तावेजों पर बने 8 रजिस्ट्रेशन रद्दी के दायरे में
मामले में FIR दर्ज होने के बाद सब-रजिस्ट्रार ऑफ एश्योरेंस (उप-पंजीयक (आश्वासन)) द्वारा 8 दस्तावेजों को रजिस्टर किया गया था। इस पर संज्ञान लेते हुए सब-रजिस्ट्रार कार्यालय ने संबंधित पुलिस स्टेशन को पत्र लिखा है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि इन 8 दस्तावेजों की नींव फर्जी कागजातों पर टिकी है, इसलिए इनका इस्तेमाल कहीं भी न किया जाए।
क्या है पूरा मामला?
इस संपत्ति से जुड़ी धोखाधड़ी का खुलासा इस साल 2 फरवरी को हुआ था। शिकायतकर्ता मोहम्मद रफीक उस्मान पुदीनावाला ने संपत्ति में धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े के आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत के आधार पर पायधूनी पुलिस स्टेशन में निम्नलिखित आरोपियों के खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत मामला (FIR) दर्ज किया गया था:
मरियम महबूब कोड़िया
हुसैन कोड़िया
यूसुफ इब्राहिम सुपारीवाला (बिल्डर)
म्हाडा की इस सख्त कार्रवाई के बाद माना जा रहा है कि इस परियोजना से जुड़े अन्य प्रशासनिक पहलुओं और अधिकारियों की भूमिका की जांच भी तेज हो सकती है।
महाराष्ट्र
‘संवाद खत्म होते ही तानाशाही ढहने लगती है,’ सामना में केंद्र सरकार पर शिवसेना (यूबीटी) ने उठाए सवाल

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि नई दिल्ली में हाल में हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने “पतन के दौर” में प्रवेश कर चुकी है। संपादकीय में कहा गया कि जनता से संवाद करने के बजाय सरकार बल प्रयोग का रास्ता अपना रही है और यही किसी भी शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।
संपादकीय में दावा किया गया कि पुलिस सड़कों पर प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसा रही थी, लेकिन वे पीछे हटने के बजाय शांतिपूर्वक चोट सहते रहे। इसमें कहा गया, “जब ऐसे प्रदर्शनकारी पैदा हो जाते हैं, जो कहते हैं कि और मारो, लेकिन हम यहां से नहीं हटेंगे, तब तानाशाह उनका क्या बिगाड़ सकते हैं?”
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में “सरकारी दमन” देखने को मिला। संपादकीय में दावा किया गया कि बुद्ध की धरती पर सरकार की हिंसा मानवता का मजाक बन गई है। लेख के अनुसार, एक ओर प्रधानमंत्री को वैश्विक मंचों पर “विश्वगुरु” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और उनके समर्थकों में उनके प्रति अत्यधिक श्रद्धा है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ प्रशासनिक कड़ाई सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। संपादकीय के अनुसार, यदि सत्ता में बैठे लोग जनता से संवाद शुरू नहीं करेंगे तो उनका शासन अधिक समय तक नहीं टिकेगा।
संपादकीय में दावा किया गया कि पुलिस कार्रवाई के बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे, जो सरकार के खिलाफ बढ़ते विरोध का संकेत है। इसमें आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार आंदोलनकारियों, पत्रकारों और प्रभावित लोगों से सीधे संवाद करने से लगातार बचती रही है।
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा भी उठाया। संपादकीय में कहा गया कि मौजूदा युवा असंतोष के बीच उनसे इस्तीफा लेना आसान था, लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसमें दावा किया गया कि यदि एक मंत्री का इस्तीफा लिया गया तो उसके बाद पूरी कैबिनेट में इस्तीफों की कतार लग सकती है।
संपादकीय में देशभर में भूमि और पर्यावरण से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया गया। इसमें ऋषिकेश में पेड़ों की कटाई के खिलाफ चल रहे आंदोलन, झारखंड और छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्रों की कटाई तथा महाराष्ट्र के नासिक, अकोला, सोलापुर, भंडारा और बुलढाणा जिलों में भूमि अधिग्रहण, रिंग रोड निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विरोध में किसानों के आंदोलनों का जिक्र किया गया।
उद्धव ठाकरे की पार्टी ने आरोप लगाया कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है। संपादकीय में दावा किया गया कि न्यायपालिका में नियुक्तियां और चुनाव आयोग कार्यपालिका के प्रभाव में हैं। साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की आलोचना करते हुए विधानसभा में विपक्ष के नेता की नियुक्ति नहीं होने तथा संसदीय कार्यवाही को लेकर भी सवाल उठाए गए।
संपादकीय में लीबिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए छात्र एवं युवा आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इतिहास गवाह है कि जब शासकों और जनता के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त हो जाता है, तब नागरिक असंतोष बढ़ता है और तानाशाही शासन का पतन हो जाता है।
शिवसेना (यूबीटी) ने कहा, “राजनीति में संवाद सबसे जरूरी होता है, लेकिन भाजपा और जनता के बीच संवाद खत्म हो चुका है। भाजपा के लिए मतदाता अब खरीदने की वस्तु बन गया है। 12 वर्षों तक इसी सोच के आधार पर चुनाव जीतने का दावा करने वाला अहंकार अब युवाओं के गुस्से के सामने धूल में मिल गया है।”
संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि इतिहास बताता है कि भ्रष्ट और जनता की बात न सुनने वाली सरकारें तब गिर जाती हैं, जब लोगों का धैर्य जवाब दे देता है। साथ ही भाजपा पर न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करने तथा विपक्ष को कमजोर करने का आरोप भी लगाया गया।
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