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Thursday,17-September-2026
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गृहणियों को वेतन बनाम महिलाओं के अवैतनिक काम की गणना

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तमिलनाडु में कमल हसन की राजनीतिक पार्टी ने अपने चुनावी अभियान के तहत गृहणियों को वेतन देने का वादा किया है। उनके इस विचार का कांग्रेस नेता शशि थरूर ने स्वागत किया है। वहीं मीडिया में पायलट जोया अग्रवाल के नेतृत्व में महिला पायलटों द्वारा सैन फ्रांसिस्को से बेंगलुरु की सबसे लंबी उड़ान पूरी करने की खबरें छाई हुई हैं।

लेकिन ये सोचने वाली बात है कि ये खबरें राष्ट्रीय श्रम सांख्यिकी में महिलाओं के काम के बेहतर आंकड़े पाने के लिए नारीवादी सांख्यिकीविदों और अर्थशास्त्रियों द्वारा लंबे समय से लड़ी जा रही लड़ाई की तुलना में सुर्खियां बटोरने में कैसे कामयाब रहीं? इतना ही नहीं वे दस्तावेज भी जो उनके भुगतान और अवैतनिक कार्यों की गिनती कर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उनका पूरा योगदान बताते हैं?

1988 में सेल्फ-एम्प्लॉयड यानि कि खुद का काम करने वाली महिलाओं और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों पर राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट ‘श्रमशक्ति’ में कहा गया था कि “सभी महिलाएं श्रमिक हैं क्योंकि वे उत्पादक और प्रजननकर्ता हैं। यहां तक कि जब वे कामकाजी नहीं है तब भी वे इसमें शामिल हैं। वे सामाजिक रूप से उत्पादन श्रम और प्रजनन में शामिल हैं, जो सभी समाजों के अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में घर के काम करने वाली गृहणियों को सामाजिक/आर्थिक उत्पादक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।”

महिलाओं की काम में सहभागिता को मापने के लिए दशकों से बहस चल रही है। इतना ही नहीं यह आरोप भी लगता रहा है कि सरकारी सांख्यिकीय प्रभाग पारंपरिक श्रम बल के आंकड़ों में महिलाओं के अवैतनिक कामों की अनदेखी की जाती है। काम को मापने की परिभाषाएं और मानक इंटनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ) और इसके इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन लेबर स्टेटिसटिशियन (आईसीएलएस) द्वारा तय किए जाते हैं। 1982 में 13वीं आईसीएलएस ने आर्थिक रूप से सक्रिय जनसंख्या, रोजगार, बेरोजगारी औके लिए परिभाषा और मानदंड निर्धारित किए थे, जिनमें बाद में 1987, 1998 और 2008 में संशोधन किया गया।

जीडीपी पर डेटा संग्रह के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देश देने वाले संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रीय खातों की प्रणाली सिफारिश करती है कि महिलाओं के प्रजनन संबंधी काम या देखभाल करने जैसे अवैतनिक कामों को देश के राष्ट्रीय खातों में गिना जाना चाहिए और उनका लेखा-जोखा भी होना चाहिए। लेकिन इस पर तर्क दिया जाता है इन अवैतनिक कामों का मूल्य राष्ट्रीय आय में आय के प्रवाह के लिए लगाए जाने वाले अनुमानों को गड़बड़ा देगी।

आईएलओ की 19वीं आईसीएलएस ने काम को मापने के लिए जो मानक बनाए हैं, वे लिंग को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं। पारंपरिक परिभाषा में श्रम बल को तीन श्रेणियों में – नियोजित, बेरोजगार और श्रम बलों (या निष्क्रिय) से बाहर, में बांटा गया है। लेकिन 19वीं आईसीएलएस में ‘काम’ की एक अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय परिभाषा पर सहमति व्यक्त की गई जिसमें ऐसी 5 प्रमुख गतिविधियां बताई गई थीं, जिनमें लोग शामिल हो सकते हैं।

पहला बड़ा बदलाव यह था कि ‘काम’ में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने के लिए भुगतान करने वाली और अवैतनिक गतिविधियां शामिल थीं। इसमें काम को बताने वाली गतिविधियां थीं – 1. स्वयं के उपयोग के लिए उत्पादन करना, 2. दूसरों के उपयोग के लिए वेतन या लाभ के लिए काम करना, 3. दूसरों के उपयोग के लिए काम करना लेकिन बिना भुगतान के (ए) अवैतनिक प्रशिक्षु की तरह काम करना, (बी) अन्य अवैतनिक काम और (सी) स्वयंसेवक की तरह काम करना।

दूसरा बड़ा बदलाव यह किया गया था कि एक व्यक्ति एक ही समय में एक से अधिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।

नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसओ) अपने श्रम बल सर्वेक्षण में पहले एम्प्लॉयमेंट एंड अनएम्प्लॉयमेंट सर्वे (ईयूएस) में महिलाओं के काम को मापने के लिए पारंपरिक परिभाषा का उपयोग करता था। अब इसका नया वर्जन पेरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) है। वैसे तो विशेषज्ञ अब भी आईसीएलएस में उपयोग की गई परिभाषाओं के विचार से जूझ रहे हैं और एनएसओ सोच रहा है कि क्या नई परिभाषाओं को श्रम बल के आंकड़ों को इकट्ठा करने में उपयोग किया जा सकता है।

जबकि महिलाओं की वर्क फोर्स में हिस्सेदारी में कमी आ रही है। 2004-05 के एम्प्लॉयमेंट एंड अनएम्प्लॉयमेंट सर्वे में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी 48 प्रतिशत थी जो 2017-18 के पेरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे में घटकर 23 फीसदी होगी। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी क्रमश: इन वर्षों में 23 फीसदी से घटकर 18 प्रतिशत हो गई।

वैसे हाल ही में सामने आए टाइम यूज सर्वे (टीयूएस), 2019 में उम्मीद की किरण नजर आती है। यह सर्वे 20 साल पहले 1999 में 6 राज्यों में किया गया था। वहीं इस बार 5 राज्यों में किया गया था।

यदि हम 19वीं आईसीएलएस के काम की 5 गतिविधियों वाली परिभाषा का उपयोग करते हैं, तो टीयूएस में हमें पहले बदलाव के अनुसार भुगतान और अवैतनिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी काफी बढ़ी हुई नजर आती है।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 5 गतिविधियों में भाग लेने वाली महिलाओं के प्रतिशत को देखें तो – 1. स्वयं के उपयोग के लिए काम करने वाली, 20 प्रतिशत, 2. वेतन या लाभ के लिए दूसरों के उपयोग के लिए काम करना 18.4 प्रतिशत, 3. दूसरों के उपयोग के लिए लेकिन बिना भुगतान के काम करना – इसमें अवैतनिक प्रशिक्षु काम और स्वयंसेवक की तरह काम करने वालों का 2 प्रतिशत और अन्य अवैतनिक काम करने वालों का प्रतिशत 81 प्रतिशत है।

दूसरे प्रमुख परिवर्तन के अनुसार, एक व्यक्ति एक ही समय में एक से अधिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि टीयूएस का उपयोग करने वाले इन अनुमानों की तुलना पारंपरिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण पीएलएफएस में सामने आई दरों से नहीं की जा सकती है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट है कि पारंपरिक तरीके से सर्वेक्षण करने की स्टैंडर्ड प्रश्नावली से एक ही समय में कई भुगतान और अवैतनिक कामों में लगीं महिलाओं के कार्य सहभागिता की गणना करना कठिन है।

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सामान्य

आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा पद्धतियों में रुझानों का पता लगाने के लिए AIIA का राष्ट्रीय संगोष्ठी

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नई दिल्ली, 12 जुलाई। आयुष मंत्रालय ने शनिवार को बताया कि अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), नई दिल्ली, आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा पद्धतियों में रुझानों का पता लगाने के लिए तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन करेगा।

शल्यकॉन 2025, जो 13-15 जुलाई तक आयोजित होगा, सुश्रुत जयंती के शुभ अवसर पर मनाया जाएगा। 15 जुलाई को प्रतिवर्ष मनाई जाने वाली सुश्रुत जयंती, शल्य चिकित्सा के जनक माने जाने वाले महान आचार्य सुश्रुत की स्मृति में मनाई जाती है।

“अपनी स्थापना के बाद से, AIIA दुनिया भर में आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए समर्पित रहा है। शल्य तंत्र विभाग द्वारा आयोजित शल्यकॉन, आधुनिक शल्य चिकित्सा प्रगति के साथ आयुर्वेदिक सिद्धांतों के एकीकरण को बढ़ावा देकर इस प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस पहल का उद्देश्य उभरते आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सकों को एकीकृत शल्य चिकित्सा देखभाल के अभ्यास में बेहतर दक्षता और आत्मविश्वास प्रदान करना है,” AIIA की निदेशक (प्रभारी) प्रो. (डॉ.) मंजूषा राजगोपाला ने कहा।

नवाचार, एकीकरण और प्रेरणा पर केंद्रित विषय के साथ, शल्यकॉन 2025 का आयोजन राष्ट्रीय सुश्रुत संघ के सहयोग से राष्ट्रीय सुश्रुत संघ के 25वें वार्षिक सम्मेलन के सतत शैक्षणिक कार्यक्रम के एक भाग के रूप में किया जाएगा।

इस सेमिनार में सामान्य एंडोस्कोपिक सर्जरी, गुदा-मलाशय सर्जरी और यूरोसर्जिकल मामलों पर लाइव सर्जिकल प्रदर्शन होंगे।

मंत्रालय ने कहा, “पहले दिन, 10 सामान्य एंडोस्कोपिक लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की जाएँगी। दूसरे दिन 16 गुदा-मलाशय सर्जरी की लाइव सर्जिकल प्रक्रियाएँ होंगी, जो प्रतिभागियों को वास्तविक समय की सर्जिकल प्रक्रियाओं को देखने और उनसे सीखने का अवसर प्रदान करेंगी।”

शल्यकॉन 2025 परंपरा और प्रौद्योगिकी का एक गतिशील संगम होगा, जिसमें भारत और विदेश के 500 से अधिक प्रतिष्ठित विद्वान, शल्य चिकित्सक, शोधकर्ता और शिक्षाविद भाग लेंगे। यह कार्यक्रम विचारों के आदान-प्रदान, नैदानिक प्रगति को प्रदर्शित करने और आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा पद्धतियों में उभरते रुझानों का पता लगाने में सहायक होगा।

तीन दिनों के दौरान एक विशेष पूर्ण सत्र भी आयोजित किया जाएगा जिसमें सामान्य और लेप्रोस्कोपिक सर्जरी, घाव प्रबंधन और पैरा-सर्जिकल तकनीक, गुदा-मलाशय सर्जरी, अस्थि-संधि मर्म चिकित्सा और सर्जरी में नवाचार जैसे क्षेत्रों पर चर्चा की जाएगी।

अंतिम दिन 200 से अधिक मौखिक और पोस्टर प्रस्तुतियाँ भी होंगी, जो चल रहे विद्वानों के संवाद और अकादमिक संवर्धन में योगदान देंगी।

मंत्रालय ने कहा कि नैदानिक प्रदर्शनों के अलावा, एक वैज्ञानिक सत्र विद्वानों, चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को अपना काम प्रस्तुत करने और अकादमिक संवाद में शामिल होने के लिए एक मंच प्रदान करेगा।

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न्याय

‘आपकी बेटी आपके साथ में है’: विनेश फोगाट शंभू बॉर्डर पर किसानों के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं।

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भारतीय पहलवान विनेश फोगट शंभू सीमा पर किसानों के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं, क्योंकि उन्होंने अपना रिकॉर्ड 200वां दिन मनाया और बड़ी संख्या में लोगों ने प्रदर्शन किया।

पेरिस 2024 ओलंपिक में पदक न मिलने के विवादास्पद फैसले के बाद संन्यास लेने वाली फोगट ने किसानों के आंदोलन को अपना पूरा समर्थन देने का वादा किया।

“मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा जन्म एक किसान परिवार में हुआ। मैं आपको बताना चाहती हूं कि आपकी बेटी आपके साथ है। हमें अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना होगा क्योंकि कोई और हमारे लिए नहीं आएगा।

मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं कि आपकी मांगें पूरी हों और अपना अधिकार लिए बिना वापस न जाएं। किसान अपने अधिकारों के लिए 200 दिनों से यहां बैठे हैं।

मैं सरकार से उनकी मांगों को पूरा करने की अपील करती हूं। यह बहुत दुखद है कि 200 दिनों से उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्हें देखकर हमें बहुत ताकत मिली।”

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राजनीति

पीएम मोदी: ’25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गए हैं’; बजट 2024 पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की सराहना की।

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लगातार सातवें बजट को पेश करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बजट 2024 से नव-मध्यम वर्ग, गरीब, गांव और किसानों को और अधिक ताकत मिलेगी।

देश के नाम अपने भाषण में पीएम मोदी ने कहा कि बजट युवाओं को असीमित अवसर प्रदान करेगा।

पिछले दस वर्षों में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, इस बजट से नए मध्यम वर्ग को सशक्त बनाया जाएगा।

उन्होंने घोषणा की, ‘यह बजट युवाओं को असीमित अवसर प्रदान करेगा।’ यह बजट शिक्षा और कौशल के लिए एक नया मानक स्थापित करेगा और उभरते मध्यम वर्ग को सशक्त करेगा। पीएम मोदी ने कहा कि इस बजट से महिलाओं, छोटे उद्यमों और एमएसएमई को फायदा होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि जो लोग अभी अपना करियर शुरू कर रहे हैं, उन्हें ‘रोजगार-संबंधी प्रोत्साहन योजना’ के माध्यम से सरकार से अपना पहला वेतन मिलेगा।

उन्होंने कहा, ‘सरकार ने इस बजट में जिस ‘रोजगार-संबंधी प्रोत्साहन योजना’ की घोषणा की है, उससे रोजगार के कई अवसर पैदा होंगे।’

प्रधानमंत्री ने घोषणा की, ‘सरकार इस योजना के तहत उन लोगों को पहला वेतन देगी, जो अभी कार्यबल में शामिल होने की शुरुआत कर रहे हैं। प्रशिक्षुता कार्यक्रम के तहत, ग्रामीण क्षेत्रों के युवा देश के प्रमुख व्यवसायों के लिए काम करने में सक्षम होंगे।’

मोदी 3.0 का पहला बजट

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला बजट है।

लोकसभा में बजट पेश करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के लोगों ने मोदी सरकार में अपना भरोसा फिर से जताया है और इसे तीसरे कार्यकाल के लिए चुना है।

सीतारमण ने आगे कहा, “ऐसे समय में जब नीतिगत अनिश्चितता वैश्विक अर्थव्यवस्था को जकड़े हुए है, भारत की आर्थिक वृद्धि अभी भी प्रभावशाली है।”

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