राजनीति
एक बार फिर भाजपा राम के सहारे
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही साल 2022 में हो, लेकिन सभी दल अपने-अपने तरीके से लामबंदी में लगे हुए हैं। इन सबके बीच भाजपा सरकार दोबारा सत्ता पाने के लिए राम का ही सहारे आगे बढ़ने के फिराक में लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बार राममंदिर निर्माण की मुहिम को लेकर जनमानस के पास जाने की तैयारी में हैं।
भाजपा चाहती है कि धर्म के साथ विकास की राजनीति आगे बढ़े, इसलिए इस ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। संगठन और सरकार राम को लेकर काफी संजीदा है। अभी हाल में मुख्यमंत्री योगी के विधानसभा में भाषण में यह चीज देखने को मिली है। उन्होंने कहा कि राम के बिना कोई वैतरणी पार नहीं कर सकता। इशारे-इशारे में उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक एजेंडे को लागू करने का संकेत दिया है।
सरकार कुंभ की तर्ज पर अयोध्या में राममंदिर शुभारंभ की ब्रांडिंग की तैयारी में जुट गई है। इसके लिए मुख्यमंत्री योगी ने विधानसभा में कहा था, “हम अयोध्यापुरी के विकास की नई रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। अभी राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के शुभारंभ का प्रसाद हर प्रदेश तक और हर जनप्रतिनिधि तक पहुंचाने के कार्य को अपने हाथों में लेना है। प्रदेश में सरकार सबको प्रसाद पहुंचाने का दायित्व निभाएगी।”
उन्होंने कहा, “जिस प्रकार प्रयागराज कुंभ के समय मंत्रियों ने ब्रांड एंबेसडर के रूप में कुंभ को यूनिक इवेंट के रूप में प्रस्तुत किया, उसी तरह अयोध्या की इस घटना को हम देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत करेंगे।”
उनके इस भाषण के बाद यह तो साफ हो गया है कि भाजपा सरकार अपने रामरूपी एजेंडे को अभी छोड़ने वाली नहीं है। विपक्ष भले राम बनाम परशुराम की राजनीति कर मामले को उलझना चाहती हो, लेकिन भाजपा राम के सहारे आगे की चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी में है।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन 5 अगस्त को हो चुका है। इसके साथ ही राम मंदिर का निर्माण भी लगभग शुरू हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी अयोध्या के विकास को लेकर काफी संजीदा रहते हैं। वह कई बार ट्विटर के माध्यम से कह चुके हैं कि “रामकाज कीन्हें बिना मोहू कहां विश्राम।”
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ अयोध्या पर हर वक्त ध्यान केंद्रित किए रहे और अब तक कम से कम दो दर्जन बार वह अयोध्या की यात्रा कर चुके हैं। सरकार बनने के बाद पहली ही दिवाली उन्होंने अयोध्या में मनाई और भव्य तरीके से मनाई। रामनगरी अयोध्या का करीब 2,000 करोड़ रुपये से कायाकल्प होने जा रहा है। राम सर्किट और स्वदेश दर्शन योजना के तहत घाटों के सुंदरीकरण के साथ और भी कई काम पहले ही हो चुके हैं।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव ने बताया कि भाजपा राममंदिर के एजेंडे को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उठाती रही है। कभी संघ आगे रहा तो कभी भाजपा आगे रही है। अब जब मंदिर निर्माण की नींव रख दी गई है। लोगों से जो एक वायदा था, वह पूरा हो रहा है। इस मुद्दे को लेकर भाजपा निश्चित ही चुनाव में जाएगी।
उन्होंने कहा कि पार्टी अपनी सांप्रदायिक छवि को हटाने के लिए अयोध्या को विकसित भी कर रही है, जिससे उसकी विकास वाली छवि भी बन रही है। इसकी काट के लिए विपक्षी दल भी अब राम के सहारे आने के फिराक में लगे हैं।
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ गर्भवती पत्रकार की याचिका पर नोटिस जारी किया, सुनवाई 3 नवंबर को होगी।

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 3 नवंबर को एक गर्भवती महिला पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करेगा। पत्रकार का आरोप है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उन्हें धक्का दिया और खींचा। यह घटना तब हुई जब विपक्षी ‘इंडिया’ (भारत) गठबंधन के नेता मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एस आई आर) के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट परिसर की ओर मार्च कर रहे थे। वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष यह मामला उठाया और बताया कि महिला पत्रकार की याचिका अभी तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। इस पर सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में नोटिस पहले ही जारी किया जा चुका है और इस पर 3 नवंबर को सुनवाई होगी। एक समाचार वेबसाइट के लिए काम करने वाली पत्रकार ऋचा पाराशर ने आरोप लगाया है कि विपक्षी नेताओं के मार्च को कवर करते समय राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़ा और जोर से खींचा। इसके बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं।
इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। तीन महीने की गर्भवती पाराशर का आरोप है कि यह घटना 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान मची अफरा-तफरी के बीच हुई। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया है। वहीं, पार्टी नेताओं और समर्थकों ने घटना के वीडियो साझा किए हैं और सवाल उठाया है कि क्या इन दृश्यों से यह साबित होता है कि राहुल गांधी ने पत्रकार को धक्का दिया था। यह घटनाक्रम एक अन्य याचिका के संदर्भ में सामने आया है, जिसमें विपक्षी मार्च के बाद सुप्रीम कोर्ट परिसर और उसके आसपास होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों के खिलाफ सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की गई है। 15 अक्टूबर को, सीजेआई सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस याचिका पर नोटिस जारी किया और घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। यह मार्च ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं (जिसमें राहुल गांधी भी शामिल थे) द्वारा तब निकाला गया था, जब सीजेआई ने उनसे और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात करने तथा मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एस आई आर) पर ज्ञापन सौंपने के उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। सीजेआई ने विपक्षी नेताओं को सलाह दी थी कि वे तय कानूनी प्रक्रिया के जरिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करें। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाना, शक्तियों के बंटवारे के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ होगा।
महाराष्ट्र
नवी मुंबई में शहरी नियोजन और ट्रैफिक संकट पर राज ठाकरे का हमला, बोले- महाराष्ट्र में सत्ता का इंतजार

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने सोमवार को राज्य के जर्जर शहरी बुनियादी ढांचे और बिगड़ते यातायात प्रबंधन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वे उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब महाराष्ट्र की जनता उन्हें सत्ता सौंपेगी।
नवी मुंबई में वाणिज्यिक वाहन परिवहन सम्मेलन और ट्रांसपोर्टरों की रैली को संबोधित करते हुए राज ठाकरे ने नागरिक अनुशासन की कमी, खराब शहरी नियोजन और ई-चालान प्रणाली के दोषपूर्ण कार्यान्वयन की आलोचना की और चेतावनी दी कि राज्य का यातायात संकट जल्द ही बेकाबू हो जाएगा।
राज ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरी क्षेत्रों में यातायात की समस्या पहले ही चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है और सुव्यवस्थित सीमाओं या नागरिक नियमों के पूर्ण अभाव के कारण यह और भी बदतर होने वाली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ई-चालान प्रणाली के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जुर्माने लगाने के मनमाने तरीके की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि ई-चालानों की निगरानी कैमरे द्वारा सख्ती से की जानी चाहिए, न कि कर्मचारियों द्वारा मौके पर मैन्युअल रूप से जारी किए जाने चाहिए।
राज ठाकरे ने अधिकारियों पर विशेषज्ञों से परामर्श करने या उचित नगर नियोजन लागू करने के बजाय ‘बिल्डरों से दोस्ती’ के आधार पर विकास योजनाएं बनाने का आरोप लगाया।
उन्होंने बताया कि आदर्श रूप से सड़कें किसी क्षेत्र के कुल क्षेत्रफल के लगभग 15 प्रतिशत हिस्से को कवर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों को मूल रूप से 50 लोगों के लिए बनाया गया था, उनमें अब पर्याप्त पार्किंग सुविधा के बिना 500 लोग रहते हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि पुल और सड़कें अक्सर दो साल के भीतर खराब होने के लिए बनाई जाती हैं ताकि मरम्मत के ठेके लगातार जारी किए जा सकें।
ठाकरे ने कहा कि इस देश के यातायात को देखकर मुझे इसके वर्तमान और भविष्य की झलक मिलती है। हमें न तो वाहन चलाना आता है और न ही उन्हें पार्क करना। आधुनिक यातायात प्रबंधन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि शहरों में स्वचालित यातायात सिग्नल तो हैं, लेकिन उनके ठीक बगल में मानव यातायात कांस्टेबल तैनात रहते हैं क्योंकि किसी को भी वाहन चालकों पर नियमों का पालन करने का भरोसा नहीं है।
मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) आयुक्त को दिए गए अपने अनसुने सुझाव को साझा करते हुए ठाकरे ने फुटपाथों के लिए रंग-कोडिंग का प्रस्ताव रखा (लाल और काला रंग सख्त ‘नो पार्किंग’ क्षेत्रों के लिए, पीला और काला रंग निर्धारित पार्किंग क्षेत्रों के लिए)।
हालांकि, उन्होंने अफसोस जताया कि सार्वजनिक कार्यान्वयन की कमी के कारण ऐसे विचार निष्प्रभावी हो जाते हैं। ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरों में दूरदर्शिता की कमी है। यदि उपनगरीय रेलवे प्रणाली कभी ठप हो जाती है, तो सड़कों पर निजी वाहनों की अचानक बाढ़ से पूरा शहर जाम हो जाएगा और निवासी अपने घरों में ही फंसे रह जाएंगे।
उन्होंने खेल के मैदानों, बगीचों या टिकाऊ जल आपूर्ति जैसी पर्याप्त सार्वजनिक सुविधाओं के अभाव में बन रही बेतरतीब इमारतों और कॉलोनियों की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या इस अव्यवस्थित शहरीकरण को सचमुच ‘अनुशासन’ कहा जा सकता है।
अपने भाषण का समापन एक प्रत्यक्ष राजनीतिक बयान के साथ करते हुए ठाकरे ने घोषणा की कि महाराष्ट्र के परिवहन और शहरी क्षेत्रों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का काम है। ठाकरे ने कहा कि मैं वास्तव में उस पल का इंतजार कर रहा हूं जब महाराष्ट्र की जनता मुझे सत्ता सौंपेगी। इस तरह की चीजों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इसके लिए बस इसे करने की इच्छाशक्ति चाहिए। उनके इस बयान पर ट्रांसपोर्टरों और पार्टी कार्यकर्ताओं से भरी सभा ने जोरदार तालियां बजाईं।
राष्ट्रीय समाचार
सरकार ने चालू इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर खर्च किए 17.73 लाख करोड़ रुपए

सरकार ने सोमवार को बताया कि सितंबर 2026 तक केंद्र के 17 मंत्रालयों और विभागों में कुल 37.56 लाख करोड़ रुपए की नवीनतम अनुमानित लागत वाली 1,853 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की निगरानी की जा रही है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स पर अब तक कुल 17.73 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जो प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का लगभग 47.21 प्रतिशत है। यह इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन में निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
बयान में कहा गया, “काफी संख्या में प्रोजेक्ट्स अग्रिम चरण में पहुंच गए हैं। कुल 654 प्रोजेक्ट्स (35 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक भौतिक प्रगति दर्ज की गई है, जबकि 338 प्रोजेक्ट्स (18 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक वित्तीय कार्य पूरा हो चुका है।”
कुल 1,853 जारी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से 780 मेगा प्रोजेक्ट्स हैं, जिनकी लागत 1,000 करोड़ रुपए या इससे अधिक है। वहीं, 1,073 प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत 1,000 करोड़ रुपए से कम है।
बयान के अनुसार, परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सबसे अधिक 1,320 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जिनकी कुल लागत 20.07 लाख करोड़ रुपए है। यह कनेक्टिविटी आधारित बुनियादी ढांचे के विकास को दी जा रही प्राथमिकता को दर्शाता है।
बयान में आगे कहा गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के तहत सबसे अधिक 974 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जो कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का 53 प्रतिशत है। इनकी संशोधित कुल लागत 9.46 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 25 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के विकास में मंत्रालय की केंद्रीय भूमिका को दिखाता है।
रेल मंत्रालय के तहत 284 प्रोजेक्ट्स (15 प्रतिशत) जारी हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 7.21 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लागत का 19 प्रतिशत है।
कोयला मंत्रालय के तहत 121 प्रोजेक्ट्स (6 प्रतिशत) चल रहे हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 2.22 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल लागत का 6 प्रतिशत है।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय तथा जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग क्रमशः 115, 106, 49 और 35 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित कर रहे हैं। इनकी संबंधित लागत क्रमशः 4.30 लाख करोड़ रुपए, 6.40 लाख करोड़ रुपए, 3.41 लाख करोड़ रुपए और 1.95 लाख करोड़ रुपए है।
बयान में कहा गया कि शेष 169 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (9 प्रतिशत) विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के अंतर्गत आते हैं। इनकी कुल लागत 2.62 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 7 प्रतिशत है।
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