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Saturday,01-August-2026
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रक्षा उपकरणों के मैन्यूफैक्चरिंग का नया हब बनेगा उत्तर प्रदेश

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Uttar-Pradesh

 डिफेंस इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर (डीआईसी) के जरिये उत्तर प्रदेश, रक्षा विनिर्माण क्षेत्र का नया मैन्यूफैक्चरिंग हब बनेगा। छह जिलों के 50 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे पर बनने वाले कॉरिडोर का सर्वाधिक लाभ, प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाकों में शुमार बुंदेलखंड को मिलेगा।

कॉरिडोर की स्थापना लखनऊ , कानपुर, आगरा, झांसी, चित्रकूट और अलीगढ़ जनपदों में की जा रही है। उत्तर प्रदेश में वर्तमान में अलीगढ़, कानपुर, झांसी एवं चित्रकूट जिलों में 1,289 हेक्टेयर से भी ज्यादा भूमि डिफेंस कॉरिडोर की स्थापना के लिए अधिग्रहित हो चुकी है। अतिरिक्त भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है। यही नहीं अलीगढ़ में अधिग्रहित भूमि निवेशकों को आंवटित कर दी गई है। डीआईसी को गति देने के लिए गुरुवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नेवल टेक्नॉलाजी एक्सीलेरशन कौंसिंल का ऑनलाइन लोकार्पण किया।

विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, “उत्तर प्रदेश में डिफेंस कॉरिडोर की स्थापना छह जिलों के 5,072 हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जा रही है। इस कॉरिडोर का सबसे अधिक लाभ बुंदेलखंड को होगा। झांसी में 3,025 हेक्टेयर, कानपुर में 1,000 हेक्टेयर, चित्रकूट में 500 हेक्टेयर और आगरा में 300 हेक्टेयर भूमि पर कॉरिडोर के नोड्स स्थापित किये जा रहे हैं। इसके अलावा लखनऊ और अलीगढ़ इस कॉरिडोर के विशेष हिस्से होंगे। राज्य में में स्थापित रक्षा उद्योग कॉरिडोर एक ‘ग्रीन फील्ड’ परियोजना है, जिसके तहत रक्षा उत्पादन क्षेत्र की इकाइयों को और सुढृढ़ करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अनेक प्रोत्साहन एवं सब्सिडी की व्यवस्था की है।”

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में प्रदेश सरकार घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार बड़े कदम उठा रही है। इसी क्रम में प्रदेश में पहली बार फरवरी 2020 में आयोजित हुए डेफ एक्सपो-2020 में 50,000 करोड़ रुपये के मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग(एमओयू) हस्ताक्षरित हुए थे। इसके तहत विभिन्न संस्थाओं ने प्रदेश के रक्षा क्षेत्र में निवेश करने में विशेष रुचि ली है।

मालूम हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने के लिए और घरेलू रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र सरकार ने हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मालवाहक विमान, पारंपरिक पनडुब्बियां, तोपें, कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और क्रूज मिसाइलों समेत 101 सैन्य उपकरणों, हथियारों और वाहनों के आयात पर 2024 तक रोक लगाई है। अब इनका निर्माण घरेलू स्तर पर किया जाएगा। प्रदेश की रक्षा विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी औद्योगिक इकाइयों के प्रोत्साहन में केंद्र सरकार का यह फैसला मील का पत्थर बनेगा। इस निर्णय से अगले कुछ वर्षो में घरेलू रक्षा उद्योग को लगभग 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कार्य मिलेंगे। स्वाभाविक है कि इसका सबसे अधिक लाभ उत्तर प्रदेश को मिलेगा।

डीआईसी में भारतीय नौसेना के प्रतिभाग करने से उद्योग, एमएसएमई एवं स्टार्ट-अप उद्योगों का खरीददारों से सीधा सम्पर्क होगा। इसके परिणामस्वरूप वे भारतीय नौसेना के जरूरतों को पूर्ण करने में सुगमता होगी। इस योजना के माध्यम से स्वदेशीकरण में सुगमता के साथ ही साथ डिफेन्स उत्पादन इको सिस्टम में और भी उद्योग जुड़ेंगे। यूपीडा ने आईआईटी, बीएचयू एवं कानपुर के सहयोग से ‘सेन्टर ऑफ एक्सीलेन्स’ की स्थापना की है, जो भारतीय नौसेना के सहयोग से उद्योग-विद्या संस्थान एवं उपभोक्ताओं के बीच एक मजबूत कड़ी का काम करेगा।

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राष्ट्रीय समाचार

पिंगली वेंकैया: ब्रिटिश सैनिकों को सलामी देते देख आया था राष्ट्रीय ध्वज का विचार, फिर बना भारत का तिरंगा

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15 अगस्त 1947 को सुबह 5:30 बजे फहराया गया ध्वज एक नए युग के उदय के प्रतीक के रूप में शान से खड़ा था। सदियों के औपनिवेशिक शासन को सहने वाले राष्ट्र के लिए यह अपार खुशी, गौरव और राहत का क्षण था। उस विजयपूर्ण सुबह तक का सफर लंबा और कठिन था, जिसमें भारत के राष्ट्रीय ध्वज के विभिन्न स्वरूपों में बदलाव हुए। तीन रंगों और 24 चक्रों वाला राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा किसी डिजाइनर की कल्पना से नहीं बना, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रप्रेम की भावना और देश को विश्व में अपनी विशिष्ठ पहचान देने का एक संकल्प था। पिंगली वेंकैया ही वे शख्सियत थे, जिन्होंने हिंदुस्तान को उसके अभिमान का प्रतीक तिरंगा दिया।

2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में जन्मे पिंगली वेंकैया एक स्वतंत्रता सेनानी थे। आजादी की लड़ाई के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को डिजाइन किया, जो आजादी के आंदोलन का प्रतीक बन गया था। जुलाई 1947 में हुई संविधान सभा की बैठक में इस ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया।

इतिहास में दर्ज है कि पिंगली वेंकैया ने ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा की और दक्षिण अफ्रीका के एंग्लो-बोअर युद्ध में भाग लिया था। यहीं से पिंगली गांधीजी के संपर्क में आए और उनकी विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए।

युद्ध के दौरान ब्रिटिश सैनिकों को उनके ध्वज को सलाम करते देखकर वह अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सोचा कि भारत के पास इस प्रकार का कोई ध्वज नहीं है और यहां से भारत के ध्वज के डिजाइन बनाने की शुरुआत हुई।

1906 में एआईसीसी के अधिवेशन में उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को बनाने की इच्छा दिखाई। उन्होंने गांधीजी को सुझाव दिया कि हमारा अपना ध्वज होना चाहिए। गांधीजी को सुझाव पसंद आया और उन्होंने कहा कि अच्छा होगा कि वे स्वयं ध्वज का डिजाइन करें।

इतिहासकार राजीव लोचन ने एक इंटरव्यू में बताया, “पिंगली वेंकैया ने विचार किया कि हमें देश के लिए अलग से झंडा बनाना चाहिए, जोकि हमारे देश को आसानी से बता सके और उन्होंने झंडे के लिए तकरीबन 25 डिजाइनें चुनीं। झंडे के बारे में उन्होंने लोगों से चर्चा करना भी शुरू कर दिया था।”

कई बदलाव के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के सामने एक फाइनल डिजाइन प्रस्तुत किया। 1921 में ध्वज ने अपना अधिक परिचित स्वरूप धारण किया, जिसे पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। तीन पट्टियां भारत के अलग-अलग समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थीं और विविधता में एकता का आह्वान करती थीं। केंद्र में स्थित चरखा भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।

अंतिम परिवर्तन 1931 में हुआ, जब ध्वज के रंगों को अंतिम रूप दिया गया। केसरिया रंग साहस का, सफेद रंग शांति का और हरा रंग उर्वरता और विकास का प्रतीक था। चरखे की जगह धर्म चक्र को शामिल किया गया, जो शाश्वत धर्मचक्र और प्रगति का प्रतीक है। यह ध्वज, जिसे संविधान सभा की ओर से 22 जुलाई 1947 को औपचारिक रूप से अपनाया गया था, आज हमारा पूजनीय तिरंगा बन गया।

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राष्ट्रीय समाचार

जुलाई में यूपीआई ट्रांजैक्शन में 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी, लेनदेन का कुल मूल्य बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए पहुंचा

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देश में डिजिटल भुगतान का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा शनिवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के जरिए किए गए ट्रांजैक्शन्स की संख्या सालाना आधार पर 22 प्रतिशत बढ़कर 23.66 अरब हो गई। वहीं, इन ट्रांजैक्शनों का कुल मूल्य 19 प्रतिशत बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई के दौरान प्रतिदिन औसतन 76.3 करोड़ (763 मिलियन) यूपीआई ट्रांजैक्शन हुए। वहीं, प्रतिदिन औसतन 96,383 करोड़ रुपए के ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए।

इससे पहले, जून 2026 में यूपीआई के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए थे, जो सालाना आधार पर 23 प्रतिशत अधिक थे। जून में इनका कुल मूल्य 20 प्रतिशत बढ़कर 28.92 लाख करोड़ रुपए रहा था। उस महीने प्रतिदिन औसतन 75.7 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे और दैनिक औसत लेनदेन मूल्य 96,405 करोड़ रुपए था।

सरकार के अनुसार, पिछले पांच वित्त वर्षों में यूपीआई ट्रांजैक्शन में लगातार तेज वृद्धि दर्ज की गई है।

वित्त वर्ष 2021-22 में यूपीआई के जरिए 4,595.61 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए, जिनका कुल मूल्य 84.16 लाख करोड़ रुपए था। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़कर 8,371.44 करोड़ और कुल मूल्य 139.15 लाख करोड़ रुपए हो गया।

इसके बाद वित्त वर्ष 2023-24 में यूपीआई के जरिए 13,112.95 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए, जिनका मूल्य 199.95 लाख करोड़ रुपए रहा। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 18,586.60 करोड़ ट्रांजैक्शन और 260.56 लाख करोड़ रुपए के कुल ट्रांजैक्शन तक पहुंच गई।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने पिछले महीने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया था कि एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल), जिसकी स्थापना अप्रैल 2020 में एनपीसीआई की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में की गई थी, भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली को वैश्विक स्तर पर विस्तार देने के लिए विभिन्न देशों के साथ साझेदारी कर रही है।

इन साझेदारियों के जरिए भारतीय पर्यटक और विदेशों में रहने वाले भारतीय आसानी से सीमा पार डिजिटल भुगतान कर पा रहे हैं। साथ ही, साझेदार देशों को भी यूपीआई जैसी रियल-टाइम भुगतान प्रणाली और रुपे जैसी घरेलू कार्ड भुगतान व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल रही है।

फिलहाल यूपीआई संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस और श्रीलंका समेत आठ से अधिक देशों में उपलब्ध है, जिससे वैश्विक फिनटेक क्षेत्र में भारत की मौजूदगी लगातार मजबूत हो रही है।

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महाराष्ट्र

मुंबई: 8 साल के बच्चे के माता-पिता को टी-शर्ट से मिला सुराग, जोगेश्वरी से लापता बच्चा सुरक्षित माता-पिता को सौंपा गया, मुंबई पुलिस की बड़ी कामयाबी

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मुंबई पुलिस ने एक गुमशुदा बच्चे के माता-पिता को ढूंढ निकाला, जो एक स्पेशल चाइल्ड था और अपना नाम और पता नहीं बता पा रहा था। पुलिस ने T-सीईआरटी से बच्चे के माता-पिता को ढूंढ निकाला। मुंबई 30 जुलाई, 2026 को जोगेश्वरी पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में, पुलिस नायक मिसाल की तुरंत कार्रवाई से लड़के के माता-पिता को सफलतापूर्वक ढूंढ लिया गया। पेट्रोलिंग के दौरान गुमशुदा बच्चा मिल गया। 30 जुलाई, 2026 को शाम करीब 4 बजे, सुभाष रोड, जोगेश्वरी (ईस्ट), मुंबई में ‘यूल चाय’ दुकान के सामने, पैदल पेट्रोलिंग के दौरान, पुलिस नायक मिसाल को लगभग 7 से 8 साल का एक लड़का रोता हुआ और अकेला घूमता हुआ मिला। शुरुआती पूछताछ और उसका नाम और पता पूछने पर पता चला कि लड़का बोल नहीं सकता था। वह सिर्फ “अब्बा” (पिता) और “अम्मा” (माँ) शब्द बोल पा रहा था। पुलिस नाइक मैसेल ने लड़के की टी-शर्ट की बारीकी से जांच की और उस पर मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन हिंदी स्कूल, जोगेश्वरी ईस्ट, मुंबई लिखा हुआ पाया। उन्होंने तुरंत उक्त म्युनिसिपल स्कूल का दौरा किया और वहां के एक शिक्षक लक्ष कुमार नंदेश्वर से संपर्क किया। शिक्षक ने कहा कि लड़का उस समय उस विशेष स्कूल में कक्षाओं में भाग नहीं ले रहा था, टी-शर्ट उसे प्रवेश के समय जारी की गई थी। हालांकि लड़के को वर्तमान में वहां भर्ती नहीं किया गया था, लेकिन स्कूल के प्रवेश रिकॉर्ड में उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि वह वर्तमान में ‘सुप्पन स्पेशल इंग्लिश मीडियम स्कूल’ में पढ़ रहा है। स्कूल से संपर्क करने पर, नेहा तेंदुलकर नामक एक शिक्षिका ने लड़के की पहचान की और उसके माता-पिता के बारे में जानकारी दी। माता-पिता की पहचान रियाज अहमद अकबर अली अंसारी के रूप में हुई है। बच्चे का नाम मुहम्मद शहबाज अंसारी उम्र: 8 वर्ष बताया गया है कि बच्चा ठीक से बोल या पढ़ नहीं सकता है। माता-पिता का बयान इसके बाद बच्चे को सुरक्षित रूप से उन्हें सौंप दिया गया। यह जानकारी जोगेश्वरी पुलिस स्टेशन के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर इकबाल शकीलगर ने दी।

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