अंतरराष्ट्रीय समाचार
भारत को चीन पर सैन्य बढ़त : अमेरिकी थिंक टैंक
क्या चीन को भारत पर सैन्य बढ़त हासिल है? इसका जवाब कुछ रिपोर्ट नहीं में दे रहीं हैं। इनमें कहा गया है कि चीन की बढ़त एक गलत धारणा है। भारत ने 1962 से एक लंबा सफर तय किया है। अगर चीन कहता है कि इतिहास को मत भूलना, तो हम भी उनसे यही कहते हैं।
दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए वार्ताएं चल रही हैं और ऐसे में कुछ विशेषज्ञ यह साबित करने के लिए ओवरटाइम काम कर रहे हैं कि युद्ध की स्थिति में चीन की सैन्य शक्ति भारत की तुलना में कहीं बेहतर है। उनका दावा है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को अपने संख्या बल, हथियारों और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में बुनियादी ढांचे की वजह से भारतीय सेना पर निर्णायक बढ़त है।
चीनी मीडिया में भी हथियारों और लॉजिस्टिक की कथित कमी पर भारत का मजाक उड़ाया जा रहा है।
लेकिन, क्या चीन की बेहतर सैन्य ताकत का ‘पारंपरिक ज्ञान’ सही है? हार्वर्ड में बेलफर सेंटर और सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (सीएनएएस) द्वारा किए गए हाल के अध्ययनों से एक अलग ही तस्वीर सामने आई है। इन शोधों से पता चलता है कि ऊंचाई वाले पर्वतीय युद्ध की स्थिति में भारत को चीन पर बढ़त हासिल है।
1962 में भारत और चीन ने युद्ध लड़ा, जिसे भारत हार गया। लेकिन, यह 58 साल पहले की बात है। तब से बहुत कुछ बदल गया है।
रिपोर्ट कहती है, “हमारा आकलन है कि भारत के पास चीन के खतरों और हमलों को कम कर देने वाली महत्वपूर्ण लेकिन कम प्रसिद्ध पारंपरिक बढ़त (कन्वेंशनल एडवांटेज) है। भारत आमतौर पर चीन के खिलाफ अपनी सैन्य स्थिति में अधिक आत्मविश्वास दिखा रहा है, जो बात भारतीय बहसों में नजर नहीं आती है। इससे देश को परमाणु पारदर्शिता और संयम की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के नेतृत्व का अवसर मिला है।”
किसी को भी दोनों देशों के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध की संभावना नहीं दिख रही है और परमाणु युद्ध का तो कोई सवाल नहीं है। फिर भी, विशेषज्ञ हमेशा दोनों की परमाणु शक्ति की तुलना करते हैं। बेलफर की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के परमाणु हथियारों में जमीन व समुद्र आधारित बैलिस्टिक मिसाइल और विमान का इस्तेमाल परमाणु बमवर्षकों के रूप में किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, चीन के पास 104 मिसाइलें हैं जो पूरे भारत में हमला कर सकती हैं। जहां तक भारत का संबंध है तो उसका अधिकांश मिसाइल बल चीन से अधिक पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित है।
रिपोर्ट के अनुसार, “लगभग दस अग्नि-3 लांचर पूरे चीनी मुख्य भूमि तक पहुंच सकते हैं। आठ अग्नि-2 लांचर केंद्रीय चीनी लक्ष्यों तक पहुंच सकते हैं। जगुआर आईएस के दो स्क्वाड्रन और मिराज 2000एच लड़ाकू विमानों का एक स्क्वाड्रन, लगभग 51 विमान, को परमाणु मिशन सौंपा जा सकता है। ये विमान परमाणु ग्रैविटी बमों से लैस तिब्बती हवाई क्षेत्र तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, यह निश्चित है कि वे तिब्बत से चीन में और अंदर तक बढ़ने से पहले हवाई बचाव प्रणाली द्वारा पहचाने और ट्रैक कर लिए जाएंगे। तिब्बत-केंद्रित मिशनों में जो कुछ हासिल किया जा सकेगा, वह चीन में कहीं और मिशनों में पाना संभव नहीं होगा, क्योंकि तिब्बत के पार जाने के लिए भारतीय वायुयानों को जो आवश्यक अतिरिक्त समय चाहिए होगा, उतने में चीनी हवाई सुरक्षा सतर्क हो जाएगी।”
बेलफर रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत की कुल स्ट्राइक फोर्स 2,25,000 के आसपास होगी, जिसे उत्तरी, मध्य और पूर्वी कमान में चीन के खिलाफ तैनात किया जाएगा। हालांकि चीन में संख्यात्मक श्रेष्ठता हो सकती है लेकिन रिपोर्ट में कई कारकों पर प्रकाश डाला गया है जो भारत को चीन पर बढ़त दिलाते हैं। इसमें कहा गया है कि 1965 से भारत, पाकिस्तान के साथ कई प्राक्सी लड़ाई लड़ चुका है। भारत ने 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल की निर्णायक लड़ाई लड़ी।
रिपोर्ट में कहा गया है, “पश्चिमी जगत के सैनिकों ने युद्धाभ्यास में सदैव अपने भारतीय समकक्षों की सामरिक रचनात्मकता और अनुकूलनशीलता के उच्च स्तर की प्रशंसा की है।”
उधर, पीएलए का अंतिम संघर्ष 1979 का वियतनाम युद्ध रहा है जहां उसे अमेरिकी युद्ध से और जुझारू हो उठे वियतनामी सैनिकों के हाथों काफी नुकसान का सामना करना पड़ा था। सीएनएएस का अनुमान है कि कुल संख्या में भारतीय जमीनी बल एलएसी की निकटता को देखते हुए और साथ ही आगे की वायु संपत्तियों की तैनाती को देखते हुए चीनियों पर भारी पड़ेंगे। भारत विभिन्न पठारों, पर्वतीय दर्रो और घाटियों में बड़ी संख्या में सैन्य और अर्धसैनिक बल रखता है, जो ट्रांस-हिमालयन प्रवेश के सबसे स्पष्ट संभावित बिंदु प्रदान करते हैं जबकि चीन अपने सीमावर्ती रक्षा के सिद्धांत के अनुसार संघर्ष की स्थिति में आगे बढ़ने के लिए पारंपरिक बलों को आंतरिक स्तर पर रखता है।
सेंटर फॉर अ न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी की अक्टूबर 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने चीन के दृष्टिगत इस क्षेत्र में कई अड्डे विकसित किए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभावित पीएलए हमले का सामना करने के लिए भारत ने बुनियादी सैन्य ढांचे को मजबूत करने पर अधिक जोर दिया है।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि अपाचे और चिनूक रोटरी-विंग परिसंपत्तियों के भारतीय अधिग्रहण और सी-130 और सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे सैन्य परिवहन विमानों ने अलग-थलग भारतीय सैनिकों के लिए महत्वपूर्ण तेजी से दी जाने वाली मदद को संभव बनाया है। जबकि, चीन के पास थिएटर में चौथी पीढ़ी के लगभग 101 फाइटर्स हैं, जिनमें से कई को रूसी रक्षा के लिए उसे तैनात करना होता है। जबकि, भारत में इसके लगभग 122 मॉडल हैं, जिनका निशाना पूरी तरह से चीन की तरफ है।
संभावित भारत-चीन युद्ध में चीन काफी हद तक अकेला हो सकता है, जबकि भारत ऐसे देशों से रक्षा संबंध विकसित कर रहा है जो चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति से सशंकित हैं। भारत हाल के वर्षों में अमेरिकी सेना के करीब हुआ है। अमेरिका ने द्विपक्षीय और बहुपक्षीय प्रशिक्षण को बढ़ाते हुए भारत को प्रमुख रक्षा भागीदार के रूप में वर्णित करना शुरू किया है।
चीन की मुख्य चिंता अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते संबंध हैं। रिपोर्ट के अनुसार, “दक्षिण एशिया में चीन का असली जवाब भारत है। दक्षिण एशिया में, दक्षिण-पूर्व, पूर्व या मध्य एशिया के विपरीत एक महत्वपूर्ण ताकत है और वह है भारत। चीन इसे आसानी से नहीं भुला सकता।”
भारत ने पारंपरिक रूप से चीन को श्रेष्ठ के बजाय बराबर के रूप में देखा है। वह चीन द्वारा भारतीय परिधि में होने वाली संदिग्ध गतिविधियों को लेकर सावधान है। इन दोनों अध्ययनों में कहा गया है कि ‘भारत के पास पारंपरिक सैन्य बढ़त (एडवांटेज) है जो चीनी खतरों और हमलों की संभावनाओं को कम करती है लेकिन जो कम प्रसिद्ध है और जिन्हें ठीक से मान्यता नहीं मिली है।’
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अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या घटी, 13.5 फीसदी गिरावट दर्ज: डीएचएस डेटा

अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वहां रह रहे सक्रिय भारतीय छात्रों की संख्या एक साल में लगभग 13.5 प्रतिशत घटकर 3,16,893 रह गई है। इसमें सबसे बड़ी गिरावट ‘मास्टर्स’ (स्नातकोत्तर) स्तर पर देखी गई है, हालांकि इसके बावजूद भारत अभी भी अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।
स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विजिटर इंफॉर्मेशन सिस्टम (एसईवीआईएस) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में भारत से सक्रिय छात्रों की संख्या 316,893 थी, जो अक्टूबर 2025 में 366,258 थी यानी इसमें 49,365 की कमी आई है।
यह गिरावट कुल गिरावट के मुकाबले कहीं अधिक थी। एसईवीआईएस में कुल सक्रिय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या 1,283,240 से घटकर 1,192,572 हो गई, जो लगभग 7.1 प्रतिशत की कमी है।
चीन से आने वाले छात्रों की संख्या में भी कमी आई है। ये दूसरा सबसे बड़ा समूह है, और इसमें लगभग 10.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ये 245,038 से घटकर 220,157 रह गईं।
सक्रिय अंतरराष्ट्रीय छात्रों में भारत की हिस्सेदारी लगभग 28.5 प्रतिशत से घटकर लगभग 26.6 प्रतिशत हो गई है।
भारतीय छात्रों में यह गिरावट मुख्य रूप से मास्टर्स (स्नातकोत्तर) प्रोग्राम में देखी गई, जहां भारतीय छात्रों का सबसे बड़ा हिस्सा नामांकित होता है। मास्टर्स प्रोग्राम में भारतीय छात्रों की संख्या 292,929 से घटकर 234,034 रह गई, जो लगभग 20 प्रतिशत की कमी है।
इसके विपरीत, डॉक्टोरल (पीएचडी) स्तर पर नामांकन में वृद्धि हुई है। डीएचएस के आंकड़ों के अनुसार, डॉक्टोरल स्तर पर भारतीय छात्रों की संख्या 28,609 से बढ़कर 41,729 हो गई।
अक्टूबर 2026 में स्नातक (बैचलर) स्तर पर भारतीय छात्रों की संख्या 36,011 थी, जबकि एक साल पहले यह 38,522 थी।
कुल भारतीय छात्रों में 195,341 पुरुष और 121,552 महिला छात्र शामिल थे।
एसईवीआईएस के आंकड़ों में उन छात्रों को गिना जाता है जिनके रिकॉर्ड सिस्टम में सक्रिय हैं, जिनमें ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (ओपीटी) वाले छात्र भी शामिल हैं। ये आंकड़े किसी एक महीने की स्थिति को दर्शाते हैं, न कि पूरे साल का कुल योग।
यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब अमेरिका में छात्र वीजा की जांच-पड़ताल सख्त हो गई है, ओपीटी और स्टेम एक्सटेंशन पर नई फीस लगाने का प्रस्ताव है, और कानूनी आव्रजन (इमिग्रेशन) के रास्तों पर भी सख्ती बढ़ाई जा रही है।
भारतीय मूल के नेताओं के एक गैर-लाभकारी नेटवर्क, ‘इंडियास्पोरा’ ने 30 अक्टूबर को एक बयान में कहा कि “अमेरिका में पढ़ाई करने के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या कम हो रही है।” उन्होंने इस रुझान को मौजूदा चुनावी मौसम में चल रही “भारत-विरोधी बयानबाजी” से जोड़ा है।
दक्षिण एशिया के अन्य देशों से भी अमेरिका जाने वालों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। नेपाल से अमेरिका में पढ़ाई कर रहे छात्रों की संख्या 35,273 से घटकर 33,992 रह गई है।
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दिसंबर के जी20 शिखर सम्मेलन तक साझा सहमति बनने की उम्मीद: जयशंकर

भारत को उम्मीद है कि दिसंबर में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन तक सदस्य देश कुछ प्रमुख मुद्दों पर साझा सहमति बनाने में सफल होंगे। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को कहा कि यदि इसके लिए गंभीर प्रयास किए जाते हैं तो भारत इस दिशा में होने वाली कोशिशों का समर्थन करेगा।
अटलांटा में जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक के समापन पर भारतीय पत्रकारों से बातचीत में जयशंकर से पूछा गया कि भारत की अध्यक्षता के दौरान जी20 शिखर सम्मेलन में जिस तरह आम सहमति बनी थी, क्या इस बार भी वैसी ही सहमति की उम्मीद की जा सकती है?
इस पर उन्होंने कहा, “अभी दिसंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन का समय नहीं आया है, और उस समय की परिस्थितियों को देखकर ही कुछ कहा जा सकेगा।”
उन्होंने कहा, “जाहिर है, उम्मीद है कि जी20 साझा सहमति बनाने में सफल होगा।”
जयशंकर ने इस संदर्भ में ब्रिक्स का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग देशों की भागीदारी के बावजूद इस समूह में प्रमुख सदस्यों के बीच साझा बयान पर सहमति बन सकी थी। उन्होंने कहा कि दिसंबर करीब आने के साथ जी20 में भी इस तरह की सहमति बनाने के प्रयास किए जाएंगे और भारत इसमें सहयोग करेगा।
विदेश मंत्री ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहमति बनाना आसान नहीं होता, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया कई मुद्दों पर ध्रुवीकृत नजर आ रही है। इसके बावजूद भारत का मानना है कि संवाद और प्रयासों के जरिए साझा आधार तैयार किया जा सकता है।”
बातचीत के दौरान जयशंकर से अमेरिका को ‘अकेली महाशक्ति’ बताने वाली उनकी पहले की टिप्पणी के बारे में भी सवाल किया गया। उनसे पूछा गया कि क्या जी20 की बैठक में भी अन्य देशों के बीच इस तरह की भावना देखने को मिली।
इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी वह टिप्पणी एक बिल्कुल अलग संदर्भ में की गई थी। उन्होंने कहा, “म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने यह बात कही थी। वह कार्यक्रम जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक से अलग था।”
जयशंकर ने कहा, ” म्यूनिख में वह विश्लेषकों और नीति-निर्माताओं को संबोधित कर रहे थे, जबकि अटलांटा में विभिन्न देशों के विदेश मंत्री एक साथ मौजूद थे। इसलिए दोनों अवसरों पर कही गई बातों और चर्चाओं को एक ही संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि जी20 की बैठक में भारत की उस भूमिका की सामान्य रूप से सराहना देखने को मिली, जिसके तहत वह दुनिया के अलग-अलग पक्षों के साथ संवाद बनाए रखता है।
विदेश मंत्री के मुताबिक, बैठक में यह समझ और सराहना थी कि आज की ध्रुवीकृत दुनिया में भारत सभी पक्षों से बात करने की क्षमता रखता है। भारत संवाद में योगदान दे रहा है, देशों के बीच सेतु का काम कर रहा है और एक-दूसरे तक अपनी बात पहुंचाने में मदद कर रहा है।
जयशंकर ने कहा, “भारत के बारे में यह सामान्य समझ और सराहना थी कि आज की कुछ हद तक ध्रुवीकृत दुनिया में हम सभी पक्षों से बात कर सकते हैं। हम योगदान दे रहे हैं, सेतु बना रहे हैं और संवाद कायम कर रहे हैं।”
अटलांटा में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक पर भी उन्होंने बात की। जयशंकर ने बताया कि इस साल विदेश मंत्री स्तर पर क्वाड की यह तीसरी बैठक थी। इससे पहले दिल्ली और मनीला में भी इस स्तर की बैठकें हो चुकी हैं।
उन्होंने कहा, “भारत को लगता है कि क्वाड ने इस दौरान अच्छी प्रगति की है। अब उम्मीद है कि समूह की अगली बैठकें ऐसी होंगी, जिनमें भविष्य की दिशा तय करने और उसके एजेंडे का विस्तार करने पर विचार किया जा सके।”
जयशंकर ने बताया कि जी20 बैठक के दौरान उन्होंने लगभग सभी देशों के प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय बातचीत की। इनमें कुछ मुलाकातें अलग-अलग हुईं, जबकि कुछ देशों के प्रतिनिधियों के साथ समूह में चर्चा की गई।
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दुनिया को युद्ध नहीं, कूटनीति से समाधान चाहिए: एस जयशंकर

भारत ने जी-20 देशों से अनुरोध किया है कि विभिन्न संघर्षों के समाधान का रास्ता डिप्लोमेसी यानी कूटनीति से निकाला जाए। उन्होंने खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित होने से बचाने के लिए ठोस प्रयास करने का आग्रह किया है।
अमेरिका के अटलांटा में शनिवार को जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद भारतीय पत्रकारों से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत अपने प्रयासों में अमेरिका के साथ तालमेल बिठा रहा है। उन्होंने उत्पादन नेटवर्क को भौगोलिक रूप से और अधिक विविध बनाने पर भी जोर दिया और उम्मीद जताई कि दिसंबर में होने वाले शिखर सम्मेलन से पहले यह समूह किसी आम सहमति पर पहुंच जाएगा।
इन चर्चाओं में भारत का संदेश स्पष्ट था कि संघर्षों की कीमत केवल सीधे तौर पर शामिल देशों को ही नहीं, बल्कि अन्य देशों को भी चुकानी पड़ रही है, खासकर ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) को। भारत की प्राथमिकताओं में कूटनीति, आपूर्ति सुरक्षा और किसी एक उत्पादन केंद्र पर निर्भरता को कम करना शामिल थे।
भारत रूस, यूक्रेन और यूरोपीय देशों के साथ लगातार संपर्क में है। इन बातचीत का उद्देश्य काला सागर में अनाज की आवाजाही बहाल करना, नागरिक जहाजों और उन पर काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों को रोकने के रास्ते तलाशना है।
उन्होंने कहा, “युद्ध को खत्म करने के लिए, अंतहीन युद्धों का सिलसिला रुकना चाहिए।”
जयशंकर ने कहा कि अटलांटा में हुई बैठक उपयोगी और खुली चर्चा का मंच रही। इसमें भू-राजनीतिक हालात, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े मुद्दों पर तीन सत्र आयोजित किए गए। पहले दो सत्र शुक्रवार को हुए, जबकि आपूर्ति श्रृंखला पर चर्चा शनिवार को हुई।
जयशंकर ने कहा कि भू-राजनीतिक चर्चा के दौरान दो बड़े संघर्षों के वैश्विक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया गया। भारत ने स्पष्ट किया कि सैन्य कार्रवाई से इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। इसके बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए रास्ता तलाशना होगा।
उन्होंने कहा, “भारत स्वयं इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, और बैठक में दूसरे देशों के विदेश मंत्रियों ने भी भारत के प्रयासों का उल्लेख किया।”
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्धों को समाप्त करने की दिशा में प्रयास होने चाहिए। संघर्षों का असर खाद्य, ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति पर पड़ता है, जिसका सबसे अधिक दबाव विकासशील देशों पर आता है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में भारत की पहल का ब्योरा देते हुए जयशंकर ने बताया, “भारत तीन प्रमुख मुद्दों पर संबंधित पक्षों से बातचीत कर रहा है। इनमें नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा, रूस और यूक्रेन से अनाज का निर्यात फिर शुरू करना तथा ऊर्जा से जुड़े ठिकानों पर हमलों को रोकने की संभावनाएं शामिल हैं।”
उन्होंने कहा कि भारत ने रूस और यूरोपीय देशों के साथ इस विषय पर चर्चा की है। काला सागर से अनाज की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। रूस और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक बाजार में अनाज के बड़े निर्यातक हैं। ऐसे में निर्यात प्रभावित होने का सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो अपनी खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
जयशंकर के मुताबिक, ग्लोबल साउथ के देशों की चिंता इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध अनाज के बड़े खरीदार हैं। भारत चाहता है कि अनाज की आपूर्ति फिर सामान्य हो सके, ताकि खाद्य सुरक्षा पर संकट और गहरा न हो।
ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के सवाल को उन्होंने बातचीत का सबसे जटिल पहलू बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों के लिए ऊर्जा ढांचे का अर्थ अलग-अलग है। किसी के लिए इसमें तेल रिफाइनरी शामिल है, तो किसी के लिए बिजली ग्रिड और ईंधन की आपूर्ति करने वाले जहाज भी इसी दायरे में आते हैं।
जयशंकर ने कहा कि इस मुद्दे पर सभी पक्षों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है, लेकिन भारत उन्हें एक साथ लाने और साझा रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इस विषय पर बातचीत की है। वह स्वयं मॉस्को और कीव की यात्रा कर चुके हैं। अटलांटा में भी उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की।
भारत यूक्रेन के संपर्क में भी है और अमेरिका के साथ समन्वय बनाए हुए है। हालांकि, जयशंकर ने बातचीत की मौजूदा स्थिति या उसके विस्तृत ब्योरे को सार्वजनिक करने से परहेज किया।
ऊर्जा सुरक्षा पर चर्चा के दौरान भारत ने बाजार में पैदा हो रही विकृतियों और ऊर्जा आपूर्ति को राजनीतिक हथियार बनाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। जयशंकर ने कहा कि ऊर्जा प्रवाह का राजनीतिकरण नुकसानदेह है और इसका सबसे ज्यादा असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि ऊर्जा की कमी और आपूर्ति में रुकावट का सामना करने वाले देशों के लिए यह गंभीर चुनौती है। भारत ने जी-20 के मंच पर इस समस्या को स्वीकार करने और इसके समाधान के लिए कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया।
खाद्य सुरक्षा पर चर्चा में अनाज की आपूर्ति के अलावा उर्वरकों की उपलब्धता का मुद्दा भी उठा। जयशंकर ने बताया कि उर्वरकों की आपूर्ति में व्यवधान का संबंध काला सागर के साथ-साथ खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र से भी है। इन क्षेत्रों में अस्थिरता का असर कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के मुद्दे पर भारत ने उत्पादन और विनिर्माण के केंद्रों को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित करने की जरूरत बताई। जयशंकर ने कहा कि दुनिया को किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने कोविड महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब उत्पादन और आपूर्ति के सीमित केंद्र बाधित होते हैं तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। युद्ध और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाएं भी ऐसी ही चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।
भारत ने यह भी आगाह किया कि आपूर्ति श्रृंखलाओं को राजनीतिक दबाव बनाने या दूसरे देशों को नुकसान पहुंचाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति से बचना होगा। इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादन केंद्र विकसित करना सबसे बेहतर रास्ता है।
जी-20 बैठक में सर्वसम्मत साझा बयान जारी नहीं होने के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि अभी नेताओं का शिखर सम्मेलन होना बाकी है। दिसंबर में होने वाली बैठक से पहले सदस्य देशों के बीच साझा सहमति बनाने के प्रयास तेज होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि भारत को उम्मीद है कि जी-20 देश कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक साझा जमीन तलाश सकेंगे। इसके लिए प्रयास किए जाएं तो सहमति बनना संभव है।
जयशंकर ने ब्रिक्स का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग परिस्थितियों और सदस्य देशों के बावजूद वहां महत्वपूर्ण प्रतिभागी साझा बयान पर सहमत हुए थे। भारत जी-20 में भी इसी तरह की सहमति बनाने के प्रयासों का समर्थन करेगा।
अटलांटा में बैठक के दौरान जयशंकर ने कई देशों के विदेश मंत्रियों के साथ द्विपक्षीय और छोटे समूहों में बातचीत भी की। उन्होंने कहा कि मौजूदा ध्रुवीकृत वैश्विक माहौल में भारत की यह क्षमता महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि वह अलग-अलग पक्षों के साथ संवाद बनाए रख सकता है और उनके बीच मतभेद कम करने में योगदान दे सकता है।
जी-20 बैठक से इतर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों ने भी शनिवार सुबह क्वाड की बैठक की। इस साल यह चारों देशों के विदेश मंत्रियों की तीसरी बैठक थी। इससे पहले नई दिल्ली और मनीला में भी उनकी मुलाकात हुई थी।
जयशंकर ने कहा कि चारों देशों ने माना कि क्वाड के कामकाज में आगे बढ़ने के लिए उपयोगी प्रगति हुई है। आने वाले समय में इस समूह की प्राथमिकताओं और कार्ययोजना को नई दिशा देने के साथ इसके एजेंडे का विस्तार करने पर भी विचार किया जाएगा।
अमेरिका को लेकर पहले की गई अपनी टिप्पणियों पर सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “वे टिप्पणियां म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ अलग संदर्भ में हुई बातचीत का हिस्सा थीं। अटलांटा में विदेश मंत्रियों की बैठक का माहौल और उद्देश्य अलग थे।”
उन्होंने कहा कि किसी भी कार्यक्रम में कही जाने वाली बात उसके संदर्भ और वहां मौजूद श्रोताओं के अनुरूप होती है।
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