राजनीति
पीएफसी, आरईसी चीनी उपकरणों पर आधारित विद्युत परियोजनाओं को फंडिंग बंद सकते हैं
चीन के खिलाफ सरकार के आर्थिक जवाब के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के फायनेंसर उन परियोजनाओं को फंडिंग बंद कर सकते हैं, जिनमें पड़ोसी देश से आयातित उपकरण लगाए जाएंगे। यह जानकारी सूत्रों ने सोमवार को दी। यह कदम सबसे पहले विद्युत क्षेत्र में उठाया जाएगा, जहां सरकारी स्वामित्व वाले पॉवर फायनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी), रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन (आरईसी) और इंडियान रिन्यूवेबल इनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (आईआरईडीए) उन राज्यों को फायनेंस बंद कर सकते हैं, जो विद्युत उत्पादन, पारेषण और वितरण में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल कर परियोजनाएं विकसित करेंगे।
चूंकि विद्युत क्षेत्र में ज्यादातर फंड इन तीन संस्थानों द्वारा मुहैया किए जाते हैं, लिहाजा यह प्रतिबंध चीनी गीयर के बड़े पैमाने पर आयात को रोकने में प्रभावी हो सकता है। यह कदम सौर सेक्टर की परियोजनाओं को प्रभावित करेगा, क्योंकि इस सेक्टर में चीनी आयात 80 प्रतिशत है।
विद्युत मंत्रालय के सूत्रों ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के फायनेंसरों को कहा गया है कि वे आयात को हतोत्साहित करने के लिहाज से फायनेंसिंग स्कीम तैयार करें, खासतौर से ऐसे उपकरणों के आयात को हतोत्साहित करने के लिए जो कम्युनिस्ट देश में विनिर्मित होते हैं। इस कदम के तहत या तो आयात के आधार पर परियोजनाओं को फंडिंग पूरी तरह प्रतिबंधित की जा सकती है या फिर इस तरह की परियोजनाओं पर एक प्रीमियम ब्याज दर लगाई जा सकती है।
सार्वजनिक क्षेत्र के इन तीनों विद्युत फायनेंसरों में से एक से जुड़े एक आधिकारिक सूत्र ने कहा, “हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि इसे कैसे हासिल किया जा सकता है। विभिन्न चीजों पर काम किया जा रहा है, जिसके बारे में फंड चाहने वाली एजेंसियों को अवगत करा दिया जाएगा।”
पिछले सप्ताह विद्युत एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री आर.के. सिंह ने कहा था कि सरकारी स्वामित्व वाला विद्युत क्षेत्र फायनेंसिंग के स्वरूप को इस तरह आकार देने पर विचार कर रहा है, जिसमें उन डेवलपरों से कम दर का ब्याज लिया जाएगा, जो भारत में विनिर्मित उपकरणों का इस्तेमाल करेंगे। इससे आत्मनिर्भर भारत के विचार को बढ़ावा मिलेगा और घरेलू विनिर्माण में तेजी आएगी।
मंत्रालय पहले ही संकेत दे चुका है कि अगस्त से सौर बैटरी सहित सौर मॉड्यूल पर बेसिक सीमा शुल्क 15-20 प्रतिश लागू होगा, जो संचालन के दूसरे साल में बढ़कर 35-40 प्रतिशत हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
बराक ओबामा ने प्रेसिडेंशियल सेंटर का किया उद्घाटन, अमेरिकी लोकतांत्रिक आदर्शों पर दिया जोर

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने शिकागो में ओबामा प्रेसिडेंशियल सेंटर के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिए बिना उनकी कड़ी आलोचना की।
यूएस प्रेसिडेंशियल सेंटर एक ऐसा कॉम्प्लेक्स होता है जो किसी पूर्व प्रेसिडेंट की विरासत को समर्पित होता है। इसमें आम तौर पर एक संग्रहालय, पढ़ाई की जगह, सार्वजनिक कार्यक्रम और प्रेसिडेंशियल रिकॉर्ड का एक अभिलेखागार होता है। ज्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपति के पास एक प्रेसिडेंशियल सेंटर होता है।
न्यूज एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, इतिहास का जिक्र करते हुए ओबामा ने अमेरिका के उस आदर्श को रेखांकित किया, जिसमें “न कोई राजा होगा, न कोई सामंत, न कोई बंधुआ प्रजा और न ही कोई अधीन नागरिक।” यह टिप्पणी हाल के महीनों में देशभर में आयोजित ‘नो किंग’ प्रदर्शनों और मार्चों की प्रतिध्वनि मानी जा रही है।
उन्होंने मिनेसोटा राज्य के मिनियापोलिस में रहने वाले निवासियों की सराहना करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से ट्रंप की आव्रजन नीति की आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि लोगों ने बेहद ठंडे मौसम में भी अपने पड़ोसियों की मदद करने के लिए अपने जोखिम पर खड़े होकर एकजुटता दिखाई और कभी-कभी अजनबियों की भी सहायता की, क्योंकि वे जानते थे कि यही सही काम है।
ओबामा ने उम्मीद जताई कि नया सेंटर इस बात को साबित करेगा कि हमारी लोकतांत्रिक हकीकत कितनी कीमती है।
ओबामा पहली बार 1985 में 23 साल की उम्र में एक कम्युनिटी ऑर्गेनाइजर के तौर पर शिकागो आए थे। अपने भाषण में, उन्होंने बताया कि कैसे वह अपनी पत्नी मिशेल ओबामा से मिले, अपना परिवार शुरू किया और प्रेसिडेंशियल सेंटर से कम दूरी पर ही अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत की।
मिशेल ओबामा शिकागो के दक्षिणी क्षेत्र में पली-बढ़ीं और वहीं अपने करियर की शुरुआती की। उद्घाटन समारोह के दौरान उन्होंने भी पति की सकारात्मक सोच, काबिलियत, काम करने के तरीके, हिम्मत और कामयाबियों की सराहना की।
मिशेल ओबामा ने कहा कि किसी को भी यह तय करने का हक नहीं है कि कौन अधिक अमेरिकी है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश, जो बाइडेन और उनकी पत्नियां इस समारोह में शामिल हुए। इसके अलावा, समारोह में हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई थी। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप को आमंत्रित नहीं किया गया था। ओबामा प्रेसिडेंशियल सेंटर शुक्रवार को आम लोगों के लिए खुलेगा।
अंतरराष्ट्रीय समाचार
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद एलएनजी टैंकर ‘दिशा’ पहुंचा गुजरात, तीन माह बाद होर्मुज से निकला जहाज

अमेरिका और ईरान में हुए समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोल दिया गया है और जहाजों की आवाजाही भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। इस बीच एलएनजी टैंकर ‘दिशा’ होर्मुज स्ट्रेट को पार करके गुजरात के दाहेज पोर्ट पर सफलतापूर्वक पहुंच गया है। तीन महीने से ज्यादा के इंतजार के बाद, इसने 62,370 मीट्रिक टन लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का कार्गो पहुंचाया है।
जहाज के ट्रैकिंग डेटा से मिली जानकारी के मुताबिक यह जहाज बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच खाड़ी इलाके में खड़ा था। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद यह शुक्रवार सुबह करीब 7:32 बजे दाहेज टर्मिनल पर पहुंचा।
एलएनजी कार्गो को कतर के रास लफ्फान एलएनजी टर्मिनल पर लोड किया गया। टैंकर 62,370 मीट्रिक टन एलएनजी ले जा रहा है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक संवेदनशील समय के दौरान भारत की ऊर्जा सप्लाई चेन के लिए एक बड़ी डिलीवरी है।
जहाज दिशा को शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम के तहत चलाया जा रहा है और इसे पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड के लिए किराए पर लिया गया है। जहाज का होर्मुज स्ट्रेट से सफल ट्रांजिट ऐसे समय में हुआ है जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है, जिससे दुनिया भर के मुख्य शिपिंग लेन की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
सूत्रों ने बताया कि टैंकर अपनी यात्रा पूरी करने से पहले तीन महीने से ज्यादा समय तक खाड़ी क्षेत्र में रहा था। तेल और गैस शिपमेंट के लिए दुनिया के सबसे जरूरी समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक, होर्मुज स्ट्रेट से इसका सुरक्षित गुजरना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी माना गया है।
भरूच में दाहेज एलएनजी टर्मिनल भारत का सबसे बड़ा लिक्विफाइड नेचुरल गैस इंपोर्ट हब है और देश के नेचुरल गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में अहम भूमिका निभाता है।
दिशा के आने से एलएनजी की उपलब्धता बढ़ने और इंडस्ट्रियल और घरेलू खपत के लिए स्थिर ऊर्जा सप्लाई को समर्थन मिलने की उम्मीद है।
पश्चिम एशिया में हाल के भू-राजनीतिक तनाव के बीच एलएनजी कैरियर के सुरक्षित आने से भारत के ऊर्जा क्षेत्र के स्टेकहोल्डर्स को राहत मिली है। होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक जरूरी रास्ता बना हुआ है और इस इलाके में कोई भी रुकावट वैश्विक तेल और गैस सप्लाई चेन पर प्रभाव डाल सकती है।
इस यात्रा का सफलतापूर्वक पूरा होना भारत में बिना रुकावट ऊर्जा इम्पोर्ट के लिए सुरक्षित समुद्री रास्तों के महत्व को दिखाता है।
राष्ट्रीय समाचार
भारत में 65,000 करोड़ रुपए से अधिक की कोयला गैसीकरण परियोजनाओं पर चल रहा काम: सरकार

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, भारत में 65,000 करोड़ रुपए से अधिक की कोयला गैसीकरण परियोजनाओं पर वर्तमान में काम चल रहा है, जो इस बात का संकेत है कि कोयले को रसायनों, ईंधन और औद्योगिक कच्चे माल में बदलने की सरकार की पहल अब केवल नीतिगत योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी तेजी से लागू हो रही है।
हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने कहा कि इस क्षेत्र को उद्योग जगत से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है।
उनके अनुसार, जनवरी 2024 में स्वीकृत 8,500 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन योजना के तहत आठ परियोजनाएं पहले से ही क्रियान्वयन के चरण में हैं।
इन परियोजनाओं को 6,233 करोड़ रुपए का प्रोत्साहन समर्थन मिला है। ये परियोजनाएं कोयले से सिंथेटिक प्राकृतिक गैस (एसएनजी), एथेनॉल, हाइड्रोजन, एसीटिक एसिड, अमोनियम नाइट्रेट, डीआरआई आधारित इस्पात और सतत विमानन ईंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।
सरकार 37,500 करोड़ रुपए की बड़ी प्रोत्साहन योजना के तहत निविदा आमंत्रण (आरएफपी) को भी अंतिम रूप दे रही है। मसौदा दस्तावेज को हितधारकों से सुझाव लेने के लिए पहले ही सार्वजनिक किया जा चुका है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि महाराष्ट्र कोयला गैसीकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है। राज्य में पहले से ही पांच परियोजनाओं पर काम चल रहा है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के माध्यम से कोयले की उपलब्धता, मजबूत औद्योगिक ढांचा और नीतिगत सहयोग का लाभ मिल रहा है। यही कारण है कि यह राज्य कोयला गैसीकरण परियोजनाओं का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता रखता है।
वहीं, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य इस क्षेत्र के लिए निवेश-अनुकूल वातावरण बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मुंबई का कोयला गैसीकरण तकनीक से ऐतिहासिक संबंध रहा है।
सरकार को उम्मीद है कि कोयला गैसीकरण पहल के तहत लगभग 25 परियोजनाओं में 2.5 लाख करोड़ रुपए से 3 लाख करोड़ रुपए तक का निवेश आकर्षित होगा।
सरकार ने वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है।
यह कार्यक्रम भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य उर्वरक, रसायन और ईंधन के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू औद्योगिक क्षमता को मजबूत बनाना और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देना है।
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