राजनीति
हरियाणा : विहिप की शिकायत पर मुख्यमंत्री खट्टर पहुंचे मेवात
हरियाणा के मेवात में दलित उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन की घटनाओं को लेकर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा लगातार शिकायत के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर मंगलवार को मेवात पहुंचे। उन्होंने हालात की समीक्षा की और पीड़ित हिंदू परिवार व जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की। विहिप मुख्यमंत्री के दौरे के बावजूद सरकार द्वारा समय पर कार्रवाई नहीं किए जाने से नाराज है। सूत्रों के मुताबिक, विहिप की खट्टर सरकार से नाराजगी इस कदर है कि मुख्यमंत्री के मेवात दौरे के दौरान उनसे मिलने विहिप का कोई भी आला अधिकारी नहीं गया।
वीहिप के महासचिव सुरेंद्र जैन ने आईएएनएस से कहा, “हम मुख्यमंत्री के मेवात दौरे का स्वागत करते हैं, लेकिन चाहते हैं कि हरियाणा सरकार मेवात में हुई घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कारवाई करे। यहां के हिंदुओं को राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं है, इसलिए मेवात में सीआरपीएफ या बीएसएफ की ट्रेंनिग सेंटर स्थापित किया जाए।”
उन्होंने कहा, “हम पिछले कई महीनों से सरकार के सामने अपनी आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन खट्टर सरकार को उनकी ब्यूरोक्रेसी खबर ही नहीं देती है। आज जनता का दबाव काम आया है और मुख्यमंत्री खुद मौके का निरीक्षण करने आए, उम्मीद करता हूं कि समस्याओं का हल निकलेगा।”
उधर, भाजपा के महासचिव और हरियाणा प्रभारी अनिल जैन ने कहा कि यह मुद्दा पृरी तरह से आंतरिक मामला है। सरकार की इस पर नजर है। मुख्यमंत्री खुद गए। ध्यान रखा जाएगा कि किसी तरह की तुष्टीकरण न हो, सबको न्याय मिलेगा।
वहीं, विहिप कैम्प में यह चर्चा आम है कि कम से कम खट्टर सरकार से तो इस मसले पर इतनी उदासीनता की अपेक्षा नहीं थी। विहिप नेताओं का मानना है कि मई में संगठन के प्रतिनिधिमंडल के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से भेंट करने के बाद भी राज्य सरकार ने उच्चस्तरीय जांच की दिशा में न कदम उठाया और न ही आरोपियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर कार्रवाई की। इससे ऐसा लगता है कि राज्य सरकार इस गंभीर मसले पर उदासीन है।
गौरतलब है कि नई दिल्ली से करीब सौ किलोमीटर दूर हरियाणा में मेवात जिला है। वर्ष 2005 में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने गुरुग्राम और फरीदाबाद के कुछ हिस्सों को काटकर मेवात जिले का गठन किया था। लेकिन 2016 में खट्टर सरकार ने जिले का नाम बदलकर नूंह कर दिया था। हरियाणा के दक्षिणी हिस्से में स्थित यह जिला पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है। विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार से जुड़े संगठन इस इलाके में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन और दलित उत्पीड़न होने की बात करते रहे हैं। मेवात सदियों से मुस्लिम बहुल क्षेत्र रहा है। विहिप का दावा है कि मेवात के 500 गांवों में से 103 गांव हिंदू विहीन हो चुके हैं।
पिछले महीने विहिप ने मुख्यमंत्री खट्टर से मुलाकात कर एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें मेवात के कुल 500 गांवों में से 103 गांवों के हिंदू विहीन होने और 84 गांवों में चार से कम हिंदू परिवार होने की बात कही थी। विहिप नेताओं के मुताबिक, उस वक्त मुख्यमंत्री ने जांच कराने का आश्वसान दिया था, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाया गया।
विहिप का आरोप है कि एक साजिश के तहत बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक बना दिया गया है। मेवात में देश विरोधी गतिविधियां चल रही हैं और रोहिंग्याओं का अड्डा बन चुका है।
सन् 1947 में देश विभाजन के बाद पलायन रोकने के लिए महात्मा गांधी और सीमांत गांधी कहलाने वाले अब्दुल गफ्फार खां मुस्लिम बहुल क्षेत्र मेवात आए थे। उन्होंने मुस्लिमों से कहा था कि वे अपने पुश्तैनी घर और पुरखों की कब्रें छोड़कर पाकिस्तान न जाएं, भारत की नई सरकार उन्हें खास सहूलियतें देगी। गांधी और सीमांत गांधी के आश्वासन पर मेवात से मुस्लिमों का पलायन रुका था। उस दौरान गांधी मेवात के घासेरा गांव में ठहरे थे, जिसका नाम बाद में गांधीग्राम रखा गया था। इस क्षेत्र में हिंदुओं के कम होने को विहिप बड़ा मुद्दा बनाने में जुटी हुई है।
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ गर्भवती पत्रकार की याचिका पर नोटिस जारी किया, सुनवाई 3 नवंबर को होगी।

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 3 नवंबर को एक गर्भवती महिला पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करेगा। पत्रकार का आरोप है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उन्हें धक्का दिया और खींचा। यह घटना तब हुई जब विपक्षी ‘इंडिया’ (भारत) गठबंधन के नेता मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एस आई आर) के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट परिसर की ओर मार्च कर रहे थे। वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष यह मामला उठाया और बताया कि महिला पत्रकार की याचिका अभी तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। इस पर सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले में नोटिस पहले ही जारी किया जा चुका है और इस पर 3 नवंबर को सुनवाई होगी। एक समाचार वेबसाइट के लिए काम करने वाली पत्रकार ऋचा पाराशर ने आरोप लगाया है कि विपक्षी नेताओं के मार्च को कवर करते समय राहुल गांधी ने उनका हाथ पकड़ा और जोर से खींचा। इसके बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं।
इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। तीन महीने की गर्भवती पाराशर का आरोप है कि यह घटना 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान मची अफरा-तफरी के बीच हुई। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया है। वहीं, पार्टी नेताओं और समर्थकों ने घटना के वीडियो साझा किए हैं और सवाल उठाया है कि क्या इन दृश्यों से यह साबित होता है कि राहुल गांधी ने पत्रकार को धक्का दिया था। यह घटनाक्रम एक अन्य याचिका के संदर्भ में सामने आया है, जिसमें विपक्षी मार्च के बाद सुप्रीम कोर्ट परिसर और उसके आसपास होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों के खिलाफ सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की गई है। 15 अक्टूबर को, सीजेआई सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस याचिका पर नोटिस जारी किया और घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। यह मार्च ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं (जिसमें राहुल गांधी भी शामिल थे) द्वारा तब निकाला गया था, जब सीजेआई ने उनसे और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात करने तथा मतदाता सूची के पुनरीक्षण (एस आई आर) पर ज्ञापन सौंपने के उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था। सीजेआई ने विपक्षी नेताओं को सलाह दी थी कि वे तय कानूनी प्रक्रिया के जरिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करें। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाना, शक्तियों के बंटवारे के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ होगा।
महाराष्ट्र
नवी मुंबई में शहरी नियोजन और ट्रैफिक संकट पर राज ठाकरे का हमला, बोले- महाराष्ट्र में सत्ता का इंतजार

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने सोमवार को राज्य के जर्जर शहरी बुनियादी ढांचे और बिगड़ते यातायात प्रबंधन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वे उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब महाराष्ट्र की जनता उन्हें सत्ता सौंपेगी।
नवी मुंबई में वाणिज्यिक वाहन परिवहन सम्मेलन और ट्रांसपोर्टरों की रैली को संबोधित करते हुए राज ठाकरे ने नागरिक अनुशासन की कमी, खराब शहरी नियोजन और ई-चालान प्रणाली के दोषपूर्ण कार्यान्वयन की आलोचना की और चेतावनी दी कि राज्य का यातायात संकट जल्द ही बेकाबू हो जाएगा।
राज ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरी क्षेत्रों में यातायात की समस्या पहले ही चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है और सुव्यवस्थित सीमाओं या नागरिक नियमों के पूर्ण अभाव के कारण यह और भी बदतर होने वाली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ई-चालान प्रणाली के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जुर्माने लगाने के मनमाने तरीके की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि ई-चालानों की निगरानी कैमरे द्वारा सख्ती से की जानी चाहिए, न कि कर्मचारियों द्वारा मौके पर मैन्युअल रूप से जारी किए जाने चाहिए।
राज ठाकरे ने अधिकारियों पर विशेषज्ञों से परामर्श करने या उचित नगर नियोजन लागू करने के बजाय ‘बिल्डरों से दोस्ती’ के आधार पर विकास योजनाएं बनाने का आरोप लगाया।
उन्होंने बताया कि आदर्श रूप से सड़कें किसी क्षेत्र के कुल क्षेत्रफल के लगभग 15 प्रतिशत हिस्से को कवर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों को मूल रूप से 50 लोगों के लिए बनाया गया था, उनमें अब पर्याप्त पार्किंग सुविधा के बिना 500 लोग रहते हैं। उन्होंने टिप्पणी की कि पुल और सड़कें अक्सर दो साल के भीतर खराब होने के लिए बनाई जाती हैं ताकि मरम्मत के ठेके लगातार जारी किए जा सकें।
ठाकरे ने कहा कि इस देश के यातायात को देखकर मुझे इसके वर्तमान और भविष्य की झलक मिलती है। हमें न तो वाहन चलाना आता है और न ही उन्हें पार्क करना। आधुनिक यातायात प्रबंधन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि शहरों में स्वचालित यातायात सिग्नल तो हैं, लेकिन उनके ठीक बगल में मानव यातायात कांस्टेबल तैनात रहते हैं क्योंकि किसी को भी वाहन चालकों पर नियमों का पालन करने का भरोसा नहीं है।
मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) आयुक्त को दिए गए अपने अनसुने सुझाव को साझा करते हुए ठाकरे ने फुटपाथों के लिए रंग-कोडिंग का प्रस्ताव रखा (लाल और काला रंग सख्त ‘नो पार्किंग’ क्षेत्रों के लिए, पीला और काला रंग निर्धारित पार्किंग क्षेत्रों के लिए)।
हालांकि, उन्होंने अफसोस जताया कि सार्वजनिक कार्यान्वयन की कमी के कारण ऐसे विचार निष्प्रभावी हो जाते हैं। ठाकरे ने चेतावनी दी कि शहरों में दूरदर्शिता की कमी है। यदि उपनगरीय रेलवे प्रणाली कभी ठप हो जाती है, तो सड़कों पर निजी वाहनों की अचानक बाढ़ से पूरा शहर जाम हो जाएगा और निवासी अपने घरों में ही फंसे रह जाएंगे।
उन्होंने खेल के मैदानों, बगीचों या टिकाऊ जल आपूर्ति जैसी पर्याप्त सार्वजनिक सुविधाओं के अभाव में बन रही बेतरतीब इमारतों और कॉलोनियों की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि क्या इस अव्यवस्थित शहरीकरण को सचमुच ‘अनुशासन’ कहा जा सकता है।
अपने भाषण का समापन एक प्रत्यक्ष राजनीतिक बयान के साथ करते हुए ठाकरे ने घोषणा की कि महाराष्ट्र के परिवहन और शहरी क्षेत्रों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का काम है। ठाकरे ने कहा कि मैं वास्तव में उस पल का इंतजार कर रहा हूं जब महाराष्ट्र की जनता मुझे सत्ता सौंपेगी। इस तरह की चीजों में अनुशासन लाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इसके लिए बस इसे करने की इच्छाशक्ति चाहिए। उनके इस बयान पर ट्रांसपोर्टरों और पार्टी कार्यकर्ताओं से भरी सभा ने जोरदार तालियां बजाईं।
राष्ट्रीय समाचार
सरकार ने चालू इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर खर्च किए 17.73 लाख करोड़ रुपए

सरकार ने सोमवार को बताया कि सितंबर 2026 तक केंद्र के 17 मंत्रालयों और विभागों में कुल 37.56 लाख करोड़ रुपए की नवीनतम अनुमानित लागत वाली 1,853 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की निगरानी की जा रही है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स पर अब तक कुल 17.73 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जो प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का लगभग 47.21 प्रतिशत है। यह इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन में निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
बयान में कहा गया, “काफी संख्या में प्रोजेक्ट्स अग्रिम चरण में पहुंच गए हैं। कुल 654 प्रोजेक्ट्स (35 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक भौतिक प्रगति दर्ज की गई है, जबकि 338 प्रोजेक्ट्स (18 प्रतिशत) में 80 प्रतिशत से अधिक वित्तीय कार्य पूरा हो चुका है।”
कुल 1,853 जारी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में से 780 मेगा प्रोजेक्ट्स हैं, जिनकी लागत 1,000 करोड़ रुपए या इससे अधिक है। वहीं, 1,073 प्रमुख इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत 1,000 करोड़ रुपए से कम है।
बयान के अनुसार, परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सबसे अधिक 1,320 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जिनकी कुल लागत 20.07 लाख करोड़ रुपए है। यह कनेक्टिविटी आधारित बुनियादी ढांचे के विकास को दी जा रही प्राथमिकता को दर्शाता है।
बयान में आगे कहा गया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के तहत सबसे अधिक 974 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जो कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का 53 प्रतिशत है। इनकी संशोधित कुल लागत 9.46 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 25 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के विकास में मंत्रालय की केंद्रीय भूमिका को दिखाता है।
रेल मंत्रालय के तहत 284 प्रोजेक्ट्स (15 प्रतिशत) जारी हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 7.21 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लागत का 19 प्रतिशत है।
कोयला मंत्रालय के तहत 121 प्रोजेक्ट्स (6 प्रतिशत) चल रहे हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 2.22 लाख करोड़ रुपए है। यह कुल लागत का 6 प्रतिशत है।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय तथा जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग क्रमशः 115, 106, 49 और 35 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित कर रहे हैं। इनकी संबंधित लागत क्रमशः 4.30 लाख करोड़ रुपए, 6.40 लाख करोड़ रुपए, 3.41 लाख करोड़ रुपए और 1.95 लाख करोड़ रुपए है।
बयान में कहा गया कि शेष 169 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (9 प्रतिशत) विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के अंतर्गत आते हैं। इनकी कुल लागत 2.62 लाख करोड़ रुपए है, जो सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की कुल लागत का 7 प्रतिशत है।
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