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Tuesday,20-October-2026
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नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने नए मानचित्र का समर्थन किया जिसमें भारतीय क्षेत्र शामिल

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नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने देश के नए और विवादित नक्शे को लेकर पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। नेपाल में मीडिया र्पिोटों के अनुसार, भारत के साथ सीमा गतिरोध के बीच इस नए नक्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल ने अपने क्षेत्र में दिखाया है। प्रधानमंत्री के. पी. ओली के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने इस संविधान संशोधन विधेयक को नेपाल की संसद में पेश किया, जिसके बाद प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस और मधेसी-आधारित पार्टियों की तरफ से इसे समर्थन मिल गया है। इसके बाद अब इस विधेयक को संसद में पारित कराने का रास्ता साफ हो गया है।

नेपाल के संसदीय कार्य मंत्री शिवमया तुंबांगफे ने 30 मई को देश के नक्शे को अपडेट करने और संविधान में संशोधन करने के लिए संसद में चर्चा के लिए विधेयक पेश किया था।

भारत ने 28 मई को कहा था कि वह नेपाल के साथ पारस्परिक सम्मान के आधार पर और सीमा के मुद्दे को हल करने के लिए विश्वास के माहौल में मुद्दे को सुलझाना चाहता है। भारत ने यह प्रतिक्रिया तब दी थी, जब नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था, जिसमें लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में दिखाया था। यह इलाके भारतीय क्षेत्र का हिस्सा रहे हैं।

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा आठ मई को उत्तराखंड में लिपुलेख र्दे को चीन में कैलाश मानसरोवर मार्ग से जोड़ने वाली एक नई सड़क का उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने इसका विरोध किया था और क्षेत्र में सुरक्षा चौकी लगाने की धमकी दी थी।

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अराघची और लावरोव की बैठक में परमाणु साझेदारी पर जोर, यूरोप से पश्चिम एशिया तक कई मुद्दों पर हुई चर्चा

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ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया क‍ि रूस के व‍िदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ द्विपक्षीय बैठक में यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक कई मुद्दों पर चर्चा की। इस दौरान परमाणु क्षेत्र में साझेदारी आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर भी जोर द‍िया गया।

विदेश मंत्री अराघची ने सोशल मीड‍िया प्‍लेटफॉर्म ‘एक्‍स’ पोस्‍ट पर बैठक की जानकारी साझा की।

अराघची ने पोस्‍ट में ल‍िखा, ”आज सर्गेई लावरोव का तेहरान में स्वागत किया और उनके साथ अहम बातचीत हुई। हमने यूरोप से लेकर पश्चिम एशिया तक कई मुद्दों पर चर्चा की। इसमें लेबनान, फिलिस्तीन, यूक्रेन और यमन की स्थिति भी शामिल रही।”

उन्‍होंने पोस्‍ट में आगे ल‍िखा, ”हमने आर्थिक सहयोग बढ़ाने और परमाणु क्षेत्र में साझेदारी को और मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया। हमारे इतिहास में शायद ही कभी ऐसा समय आया हो जब ईरान और रूस के रिश्ते आज जितने करीब और मजबूत रहे हों।”

इससे पहले सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्‍क‍ियन ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल ही में हुए घटनाक्रमों पर चर्चा की।

पेजेश्‍क‍ियन ने कहा कि तेहरान और मॉस्को के बीच हुए समझौतों और आपसी सहमतियों को तेजी से लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा, परिवहन, व्यापार और बिजली संयंत्रों से जुड़े बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना दोनों देशों के रिश्तों की प्राथमिकता है।

पेजेश्‍क‍ियन ने आगे कहा कि ईरान और रूस अपनी साझा क्षमताओं का बेहतर उपयोग करके और क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए मिलकर शांति, स्थायी सुरक्षा और बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

बैठक के दौरान तेहरान और मॉस्को के संबंधों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। साथ ही, दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत बनाने के तरीकों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

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अंतरराष्ट्रीय समाचार

दक्षिण कोरिया की प्रधानमंत्री ने प्योंगयांग के साथ बातचीत फिर से शुरू करने पर दिया जोर

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दक्षिण कोरिया की प्रधानमंत्री हान सियोंग-सूक ने रविवार को कहा कि सरकार सोल और प्योंगयांग के बीच बातचीत फिर से शुरू करने का प्रयास करेगी और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में काम करेगी।

सोल में विस्थापित उत्तर कोरियाई नागरिकों के लिए आयोजित एक प्रतियोगिता में शामिल होते हुए, हान ने कहा, “दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच बातचीत के रास्ते खोलने और शांति तथा साझा समृद्धि पर चर्चा करने के प्रयास किए जाएंगे।”

योनहाप समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने दोनों देशों के विभाजन को एक “हकीकत” बताया और इस बात पर जोर दिया कि विस्थापित नागरिकों और अलग हुए परिवारों का दर्द आज भी “जारी” है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का रास्ता खोलने के हमारे प्रयास रुक नहीं सकते।” उन्होंने प्रतिभागियों से शांति स्थापित करने में सहयोग मांगा और दक्षिण कोरिया के आर्थिक विकास तथा लोकतंत्रीकरण में उनके योगदान के लिए उन्हें धन्यवाद दिया।

8 अक्टूबर को, दक्षिण कोरिया ने संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया से “जिम्मेदार कदम” उठाने का आग्रह किया। दक्षिण कोरिया ने प्योंगयांग पर ‘युद्धविराम समझौते’ के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने जानबूझकर एक बारूदी सुरंग बिछाई थी, जिसकी चपेट में आने से पिछले महीने दोनों कोरियाई देशों की सीमा के पास तीन दक्षिण कोरियाई सैनिक घायल हो गए थे।

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र की एक समिति बैठक के दौरान, संयुक्त राष्ट्र में दक्षिण कोरिया के राजदूत चा जी-हून ने बताया कि दक्षिण कोरियाई सेना और संयुक्त राष्ट्र कमान (यूएनसी) की संयुक्त जांच से पुष्टि हुई है कि 21 सितंबर को हुआ विस्फोट एक बारूदी सुरंग के कारण हुआ था। इस सुरंग को उत्तर कोरियाई सैन्य बलों ने जानबूझकर ‘सैन्य सीमा रेखा’ (एमडीएल) के दक्षिण में बिछाया था, जो दोनों कोरियाई देशों को अलग करती है।

चा ने कहा, “दक्षिण कोरियाई सेना और यूएनसी की संयुक्त जांच, जिसे फोरेंसिक विश्लेषण का भी समर्थन प्राप्त है, से पुष्टि हुई है कि यह विस्फोट उत्तर कोरियाई बलों द्वारा सैन्य सीमा रेखा के दक्षिण में जानबूझकर बिछाई गई बारूदी सुरंग के कारण हुआ था।” उन्होंने दोनों कोरियाई देशों को उनके आधिकारिक नामों – ‘रिपब्लिक ऑफ कोरिया’ (दक्षिण कोरिया) और ‘डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया’ (उत्तर कोरिया) – से संबोधित किया।

चा ने कहा कि यह घटना ‘युद्धविराम समझौते’ का स्पष्ट उल्लंघन है। उन्होंने आगे कहा, “हम उत्तर कोरिया (डीपीआरके) से आग्रह करते हैं कि वह माफी मांगे, तनाव बढ़ाने वाली ऐसी गतिविधियों को रोके और जिम्मेदार कदम उठाए।”

हालांकि, उत्तर कोरिया के प्रतिनिधि ने सोल के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह प्योंगयांग द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा को मजबूत करने के प्रयासों को ‘सैन्य घुसपैठ’ के रूप में पेश करने की एक कोशिश है। प्रतिनिधि ने कहा, “यह आरओके (दक्षिण कोरिया) सेना की एक घटिया चाल के अलावा और कुछ नहीं है, जिसका मकसद अपनी गलतियों का दोष डीपीआरके (उत्तर कोरिया) पर मढ़ना है।”

दोनों कोरियाई देशों ने प्योंगयांग के परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर अपने-अपने विपरीत रुख को फिर से दोहराया।

चा ने परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के प्रति सोल की प्रतिबद्धता को दोहराया और उत्तर कोरिया से आग्रह किया कि वह ‘परमाणु अप्रसार संधि’ और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों का पूरी तरह से पालन करे।

उत्तर कोरियाई प्रतिनिधि ने प्योंगयांग के परमाणु हथियारों का बचाव करते हुए कहा कि अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए यह एक अनिवार्य विकल्प था, क्योंकि उन्हें “दशकों से अमेरिकी परमाणु खतरे” का सामना करना पड़ रहा है।

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ईरान पर सैन्‍य कार्रवाई का ट्रंप ने क‍िया बचाव; कहा-परमाणु हथियारों का खतरा गंभीर था, इसलिए क‍िया हस्तक्षेप

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नॉर्दर्न केंटकी यूनिवर्सिटी के ‘ट्रूइस्ट एरिना’ में आयोजित एक रिपब्लिकन चुनावी रैली में ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के अपने फैसले का बचाव किया। ट्रंप ने अपने दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल की सबसे बड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा उपलब्धियों का बखान करते हुए कहा क‍ि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के जरिए ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता पूरी तरह नष्ट कर दी गई है और तेहरान को दोबारा यह क्षमता विकसित नहीं करने दी जाएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि परमाणु हथियारों से लैस ईरान का खतरा इतना गंभीर था कि अमेरिका के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया था।

ट्रंप ने समर्थकों से कहा, “ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते। ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि अगर उनके पास होगा तो वे उसका इस्तेमाल करेंगे।”

राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु ढांचे को सफलतापूर्वक निशाना बनाया है और यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं कि यह कार्यक्रम फिर से शुरू न हो सके। उन्होंने कहा, “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह दोबारा वापस न आए।”

ट्रंप ने बताया कि सैन्य अभियान के दौरान उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसी दिशा में काम करने के निर्देश दिए थे। ट्रंप ने इस कार्रवाई को अपने उस बड़े दावे से भी जोड़ा, जिसमें वे कहते रहे हैं कि उनके नेतृत्व में अमेरिका की सैन्य ताकत फिर से मजबूत हुई है और देश अब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

उन्होंने कहा कि यह फैसला ऐसे समय में लिया गया, जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। राष्ट्रपति ने माना कि इस अभियान के कारण अमेरिका को मध्य पूर्व पर अतिरिक्त ध्यान और संसाधन लगाने पड़े, लेकिन उनका कहना था कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना किसी भी अल्पकालिक आर्थिक प्रभाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी दावा किया कि सैन्य अभियान खत्म होने के बाद ऊर्जा की कीमतों में गिरावट आएगी।

ट्रंप ने कहा, “यह बहुत जल्दी खत्म होने वाला है।” उन्होंने आगे कहा कि अभियान समाप्त होने के बाद पेट्रोल की कीमतें पहले के मुकाबले और नीचे आ जाएंगी। अपने भाषण में बाद में ट्रंप फिर इस मुद्दे पर लौटे और इसे अपनी सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बताया।

उन्होंने कहा, “ईरान के पास न परमाणु हथियार है, न होगा, और कभी नहीं होगा। बात बिल्कुल साफ है।” ट्रंप का कहना था कि इस समस्या का समाधान पहले की अमेरिकी सरकारों को ही कर देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने ईरान का सामना करने के लिए जरूरी दृढ़ता और इच्छाशक्ति दिखाई है।

राष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ अभियान को अपनी अन्य विदेश नीति पहलों, जैसे वेनेजुएला और ग्रीनलैंड से जुड़े घटनाक्रमों के साथ भी जोड़ा।

ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा खर्च में बढ़ोतरी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार और रिपब्लिकन बहुमत वाली कांग्रेस ने सेना के लिए एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग उपलब्ध कराई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है और देश की रक्षा क्षमताएं ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।

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