राजनीति
सिब्बल के बयान का जिक्र कर फडणवीस बोले, एसआईआर का विरोध करने से पहले कांग्रेस अपना इतिहास देखे
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी के नेतृत्व में चुनाव आयोग तथा एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन और उससे मध्य दिल्ली में काफी देर तक यातायात प्रभावित रहने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शुक्रवार को कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।
सीएम फडणवीस ने सोशल मीडिया पर संसद का पुराना फुटेज साझा किया, जिसमें कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल एसआईआर फ्रेमवर्क का आधिकारिक तौर पर समर्थन करते हुए दिख रहे हैं।
फडणवीस की ओर से साझा की गई वीडियो क्लिप तेजी से वायरल हो रही है। यह क्लिप विपक्ष की ओर से किए गए उन दावों को खारिज करती है, जिसमें कहा गया है कि वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया एक ‘साजिश’ या असंवैधानिक तरीका है। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 13 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम छूट गए हैं और वे इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रही हैं।
कांग्रेस नेतृत्व पर सीधा हमला करते हुए देवेंद्र फडणवीस ने पार्टी के पुराने रुख और अभी सड़कों पर हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच जबरदस्त अंतर को उजागर किया। सीएम सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “कांग्रेस हर मंच से एसआईआर के खिलाफ शोर मचा रही है, लेकिन उनके ही पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल के शब्द इस ड्रामे की पोल खोल रहे हैं। राजनीतिक सुविधा के हिसाब से संसद का रिकॉर्ड नहीं बदलता। शायद नई-नई साजिश की थ्योरी गढ़ने से पहले कांग्रेस को अपना इतिहास देख लेना चाहिए। कभी-कभी, सबसे अच्छा जवाब आपकी अपनी पार्टी के अतीत से ही मिलता है।”
महाराष्ट्र के सीएम ने वीडियो का कैप्शन ‘कांग्रेस का दोहरा रवैया’ रखा और नागरिकों से यूपीए के समय की संसद की आधिकारिक कार्यवाही सुनने और यह तय करने की अपील की कि कौन सच बोल रहा है?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से शेयर किए गए वीडियो में तत्कालीन कानून मंत्री कपिल सिब्बल उन तीन खास कैटेगरी के बारे में बता रहे हैं जिनके तहत एसआईआर प्रक्रिया वोटर लिस्ट से नाम हटाती है या अपडेट करती है। पूर्व कानून मंत्री ने वीडियो में कह रहे हैं, “डुप्लीकेट एंट्री तब हटाई जाती हैं जब कोई वोटर एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाता है और नए पते पर आसानी से दोबारा रजिस्टर हो जाता है। चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्गठन के दौरान पुरानी वोटर लिस्ट को अपडेट करते समय भी ऐसा होता है। वेरिफिकेशन के बाद मृत लोगों के नाम भी नियमित रूप से हटाए जाएंगे।”
फुटेज में सिब्बल ने जोर देकर कहा कि रजिस्ट्रेशन अधिकारी किसी भी वैध वोटर को नहीं रोक सकते, क्योंकि लाखों नागरिक तय कानूनी प्रावधानों के तहत नाम शामिल कराने के लिए नियमित रूप से आवेदन करते हैं।
सीएम फडणवीस की ओर से साझा किया हुआ यह वीडियो ऐसे वक्त पर आया है, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा एसआईआर प्रक्रिया को रोकने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार सड़क पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका दावा है कि हालिया एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 13 करोड़ लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। जंतर-मंतर और चुनाव आयोग के हेडक्वार्टर के पास हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों के साथ तीखी झड़पें हुईं, जिसके बाद पुलिस में शिकायतें दर्ज की गईं और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला।
भाजपा नेताओं ने सीएम फडणवीस के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि विपक्ष वोटर लिस्ट को ठीक करने की एक सामान्य प्रक्रिया को लेकर बेवजह विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। इस प्रक्रिया को उनकी अपनी सरकार ने पहले संसद में मंजूरी दी थी और उसका बचाव भी किया था।
राष्ट्रीय समाचार
मणिपुर के मुख्यमंत्री ने जेएनयू से बर्खास्तगी के बाद सांसद अकोइजम के इस्तीफे की मांग की

मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने शनिवार को कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम के संसद से इस्तीफे की मांग की। उनकी यह मांग यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) द्वारा अकोइजम को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त किए जाने के एक दिन बाद आई।
फेसबुक और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मणिपुर के मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने लिखा कि इनर मणिपुर के सांसद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से बर्खास्त करना बेहद चिंताजनक और शर्मनाक है।
उन्होंने कहा कि आधिकारिक आदेश के अनुसार, आंतरिक समिति ने विश्वविद्यालय में उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच की और कड़ी सजा की सिफारिश की। उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि एक उच्च विधायी पदधारी और प्रोफेसर द्वारा इस प्रकार का गंभीर दुराचार अस्वीकार्य है और मणिपुर की छवि को धूमिल करता है। सांसद जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए संसद की गरिमा को बनाए रखना आवश्यक है। जब इसकी गरिमा से समझौता होता है, तो जनता का विश्वास कम हो जाता है। नैतिक आधार पर, प्रोफेसर अकोइजम ने जन प्रतिनिधि के रूप में बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है और जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें लोकसभा से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।
इस बीच, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री डी पंडित ने शुक्रवार को एक आदेश में कहा कि सामाजिक विज्ञान संकाय के सामाजिक प्रणाली अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर अकोइजम के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों के मद्देनजर आंतरिक समिति द्वारा जांच की गई थी।
जांच के आधार पर, आंतरिक समिति ने सेवा नियमों के अनुसार और केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमों का हवाला देते हुए प्रो. अंगोमचा बिमोल अकोइजम को कड़ी सजा देने की सिफारिश की है।
आदेश में कहा गया कि उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए और सभी उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद, तथा आंतरिक समिति की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के सामाजिक प्रणाली अध्ययन केंद्र के प्रो. अंगोमचा बिमोल अकोइजम को तत्काल प्रभाव से विश्वविद्यालय की सेवाओं से बर्खास्त किया जाता है।
इस समाचार रिपोर्ट को लिखे जाने के समय तक, मणिपुर के भीतरी लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले अकोइजम की ओर से कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं थी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मई में कम से कम 11 छात्राओं ने अकोइजम के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज कराई थीं।
शिकायतों में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने छात्रों को बैठकों या सभाओं के बहाने अपने कैंपस आवास पर बुलाया और उनका यौन उत्पीड़न करने का प्रयास किया।
कुछ छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने कक्षा में अश्लील और अनुचित टिप्पणियां कीं।
बताया गया है कि विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें बर्खास्त करने के निर्णय से पहले हुई जांच के हिस्से के रूप में इन आरोपों और शिकायतों की जांच की गई थी।
इस रिपोर्ट को लिखते समय जांच के विशिष्ट निष्कर्ष उपलब्ध नहीं थे।
राष्ट्रीय समाचार
मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने ओबीसी की पीठ में छुरा घोंपा : कांग्रेस

मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर आए जबलपुर उच्च न्यायालय के फैसले को लेकर कांग्रेस ने राज्य की भाजपा सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि राज्य सरकार ने ओबीसी की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है। दरअसल राज्य में ओबीसी को 14 से बढ़कर 27 आरक्षण दिए जाने का मामला जबलपुर उच्च न्यायालय में लंबित था। इस मामले पर शुक्रवार को न्यायालय की दो जजों की खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाया।
इस फैसले के मुताबिक ओबीसी को 14 फीसदी आरक्षण ही मिलेगा। आरक्षण बढ़ाने का अध्यादेश तत्कालीन कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने लाया था। जबलपुर उच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्य की सियासत गरमाई हुई है। भाजपा जहां कांग्रेस के अध्यादेश पर ही सवाल उठा रही है, वहीं कांग्रेस राज्य सरकार पर हमलावर है।
विधानसभा में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कांग्रेस मुख्यालय भोपाल में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया और सरकार की पहल पर सवाल उठाए । उन्होंने कहा कि न्यायालय के आए फैसले से प्रदेश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले ओबीसी समाज की उम्मीदों को झटका लगा है।
उन्होंने बताया कि समाज को उम्मीद थी कि 27 प्रतिशत आरक्षण से बच्चों को शिक्षा और रोजगार में नए अवसर मिलेंगे। कांग्रेस नेताओं ने भाजपा की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत ने कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह अपने पक्ष में मजबूत और विश्वसनीय तथ्य प्रस्तुत करे।
हाईकोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की 1996–97 और 2019–20 की सिफारिशें 1983 की महाजन आयोग रिपोर्ट पर आधारित थीं। अदालत ने पाया कि इन सिफारिशों के लिए इस उद्देश्य से नए आंकड़े एकत्र नहीं किए गए थे।
नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार से सवाल किया है कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के समर्थन में सरकार ने नए, व्यापक और विश्वसनीय आंकड़े क्यों नहीं जुटाए? कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक तरफ जहां केंद्र सरकार वोट चोरी कर रही है तो वही मध्य प्रदेश की सरकार ने ओबीसी आरक्षण की चोरी की है।
राष्ट्रीय समाचार
सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में करीब 1,000 लोग हिरासत में लिए गए

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे करीब 1,000 लोगों को शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी के अलग-अलग इलाकों में हिरासत में लिया गया। पुलिस ने यह जानकारी दी।
प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। दिल्ली की सीमाओं पर भी सुरक्षा बढ़ाई गई है। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने कई कदम उठाए हैं।
इसी क्रम में भारतीय रेलवे ने नई दिल्ली पहुंचने वाली कई ट्रेनों को रद्द कर दिया और कुछ ट्रेनों के समय में बदलाव किया। वहीं, दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) ने 45 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए।
पुलिस ने शुक्रवार को कहा था कि सीजेपी के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई है। पुलिस के मुताबिक, आयोजकों ने पिछले प्रदर्शन के दौरान दिए गए आश्वासनों और कानूनी निर्देशों का पालन नहीं किया था।
इससे पहले शनिवार को सीजेपी के नेताओं अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रंका को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया। तीनों नेता मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे थे।
पुलिसकर्मी इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान के उतरने के बाद उसमें दाखिल हुए और अभिजीत दिपके समेत अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया।
दिपके ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें दिल्ली पुलिस के जवान विमान के अंदर प्रवेश करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में दिपके पुलिसकर्मियों से कहते सुनाई देते हैं, “मैं यहां गिरफ्तार होने के लिए आया हूं, मुझे गिरफ्तार कीजिए।” सीजेपी ने भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर तीनों नेताओं की हिरासत की जानकारी दी।
वहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी को भी गुरुग्राम स्थित उनके आवास से हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई। सीजेपी के एक्स अकाउंट पर किए गए पोस्ट के मुताबिक, सुबह करीब आठ बजे सादे कपड़ों में लगभग 50 पुलिसकर्मी ध्रुव राठी के आवास पर पहुंचे और उन्हें एहतियातन हिरासत में ले लिया।
इस बीच, मतदाता सूची के एसआईआर में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे कई विपक्षी नेताओं को भी हिरासत में लिया गया। इनमें आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, पार्टी नेता गोपाल राय और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल हैं।
प्रदर्शनकारियों की मांग है कि कथित चुनावी अनियमितताओं की जवाबदेही तय की जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें।
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